सनातन चेतना के सांस्कृतिक अग्रदूत
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होम भारत

तुलसीदास : सनातन चेतना के सांस्कृतिक अग्रदूत

तुलसीदास एक सच्चे संत थे, जिन्होंने धार्मिक और नैतिक मूल्यों का प्रचार किया। उन्होंने समाज में व्याप्त बुराइयों का विरोध करते हुए आदर्श जीवन का मार्ग दिखाया। उनकी रचनाएं लोगों के जीवन को दिशा देने वाली और आध्यात्मिक प्रेरणा का स्रोत हैं

Written byशिवेन्द्र राणाशिवेन्द्र राणा
Aug 4, 2025, 09:04 pm IST
in भारत, विश्लेषण, धर्म-संस्कृति

गोस्वामी तुलसीदास हिंदी साहित्य के ऐसे स्तंभ हैं, जिन्होंने न केवल भक्ति आंदोलन को सुदृढ़ किया, बल्कि सांस्कृतिक नवजागरण के भी प्रणेता बने। वे रामकथा के कवि मात्र नहीं, अपितु भारतीय समाज की आत्मा से संवाद करने वाले व सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना के दृढ़ हस्ताक्षर थे। उनका संपूर्ण साहित्य रामभक्ति के माध्यम से सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक प्रतिरोध का एक सशक्त माध्यम बना। तुलसीदास के काव्य में भक्ति, नीति, दर्शन और सामाजिक मूल्यों का अद्भुत समन्वय मिलता है।

राम के माध्यम से राष्ट्र निर्माण

शिवेन्द्र राणा
स्तंभकार

तुलसीदास के राम मर्यादा पुरुषोत्तम ही नहीं, पराक्रमी भी हैं। वे सत्य, पराक्रम और धर्म की प्रतिष्ठा के प्रतीक हैं। उन्होंने ऐसे राम का चित्रण किया है, जो धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करते हैं, नीति का पालन करते हैं और अधर्म को दंडित करते हैं। तुलसीदास की दृष्टि में राम भारत की सांस्कृतिक अस्मिता के जीवंत स्वरूप हैं, जो संकट में पड़े समाज को दिशा देते हैं। राम को केंद्र में रख वे भारत को उसकी मूल सांस्कृतिक धारा से जोड़ते हैं। यह केवल धार्मिक नहीं, सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रयत्न था, जिसकी परिणति ‘रामचरितमानस’ के रूप में हुई। उनके राम भारतीय जीवन मूल्यों के मूर्त रूप हैं, जिसमें शस्त्र और शास्त्र का संतुलन स्थापित है। तुलसीदास के राम भारतीय सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय अस्मिता के जीवंत प्रतीक हैं। इसीलिए तुलसीदास सनातन और भारत विरोधी सेमेटिक (सामी) मताग्राहियों एवं वामपंथी षड्यंत्रकारियों के निशाने पर रहते हैं। उनकी आलोचना अक्सर तुलसीदास की सांस्कृतिक परंपरा की दृढ़ता और धार्मिक चेतना से जुड़ी स्थापनाओं के कारण होती है।

भारतीय जनमानस के प्रेरणास्रोत 

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी तुलसीदास को केवल भक्त नहीं, भारतीय जनमानस के प्रेरक और जागरण के संवाहक मानते थे। ‘तुलसीदास का स्मरण’ शीर्षक निबंध में उन्होंने लिखा है, ‘‘मुझे तुलसीदास का स्मरण करने में विशेष आनन्द आता है। यह जो व्यक्ति आज हमारे लिए इतना पूज्य है, कोटि-कोटि भारतवासियों के हृदय और मस्तिष्क को बल दे रहा है।’’ (दूसरी परंपरा की खोज, नामवर सिंह, पृष्ठ-24)
दरअसल, तुलसीदास को परंपरागत रूप से केवल भक्ति के दायरे में देखा गया, जिससे उनके व्यापक साहित्यिक, सांस्कृतिक व राष्ट्रीय योगदान की उपेक्षा हुई।

तुलसी को समझना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि वे संघर्षशील जीवन, सामाजिक जागरण और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के प्रतीक हैं। भक्ति काव्य के रचयिता होने के साथ वे भारतीय संस्कृति के पुनर्निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले युगद्रष्टा भी थे। उनके व्यक्तित्व को केवल साहित्य या भक्ति की सीमित दृष्टि से देखना उनके व्यापक योगदान को संकुचित करना होगा। काशी के विद्वत समाज द्वारा अस्वीकृति के बावजूद वे अपने उद्देश्य पर अडिग रहे। ‘कवितावली’, ‘हनुमानबाहुक’ व ‘विनय पत्रिका’ उनके जीवन-संघर्ष की साहित्यिक अभिव्यक्तियां हैं।

‘रामचरितमानस’ सिर्फ रामकथा नहीं, बल्कि भारतीय लोकमर्यादा, संस्कारों व मूल्यों का जीवंत दस्तावेज है। यह ग्रंथ तुलसी की गोस्वामी होने की जिजीविषा और आत्मदर्शन को भारत के जीवन-दर्शन से जोड़ने वाला अयन है। इसलिए उनका साहित्यिक अवदान, विशेष रूप से ‘मानस’ भारत की आत्मा को प्रतिबिंबित करने वाला कालजयी काव्य है। डाॅ. पांडुरंग राव ‘रामकथा नवनीत’ की भूमिका में लिखते हैं, ‘‘गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी कालजयी रचना ‘रामचरितमानस’ के माध्यम से रामकथा की अनेक उक्तियों को जनमानस में इस प्रकार संचरित कर दिया है कि अनपढ़ व्यक्ति भी प्रसंग के अनुसार मानस का कोई दोहा या चौपाई सहज भाव से स्मरण कर लेता है।’’ (पृष्ठ- XIV)

दृढ़ व्यक्तित्व, अडिग लक्ष्य 

तुलसीदास का जीवन प्रारंभ से ही विषम परिस्थितियों से घिरा रहा। जन्म के साथ माता-पिता का साया उठ गया, बाल्यकाल में उन्हें दर-दर भटकना पड़ा। युवावस्था भी कठिन रही। स्वयं उन्होंने लिखा है-
बारे तें ललात बिललात द्वार-द्वार दीन,
 जानत हौं चारि फल चारि ही चणक को।
काशी के पंडितों ने उन्हें अपमानित किया। उन्हें ‘जुलाहा’, ‘अघोरी’ कहा, पर वे विचलित नहीं हुए। उन्होंने दृढ़ता से कहा-
धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूत कहौ, जुलहा कहाै कोऊ।
काहू की बेटी सों बेटा न व्याहब, काहू के जात न सोऊ॥
यह उनके आत्मसम्मान और समाज के विरोध में अडिग रहने का परिचायक है। कठिनाइयों के बावजूद वे अपने लक्ष्य पर डटे रहे और युगपुरुष बनकर उभरे। उनका संघर्ष समाज के विनाश की नहीं, नवजागरण की दिशा में था। तुलसी होना कठिन है, क्योंकि ध्वंसकारी क्रांतियां-जैसे रूसी, क्यूबाई, चीनी और फ्रांसीसी क्रांति-सृजन नहीं, प्रताड़ना, हिंसा और स्वतंत्रता के हनन की ओर गईं। इसीलिए तुलसी से मार्ग को अधिक स्थायी और मानवीय माना गया।

परंपरागत रूप से तुलसीदास को केवल भक्ति के दायरे में देखा गया, जिससे उनके व्यापक साहित्यिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय योगदान की उपेक्षा हुई। तुलसी को समझना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि वे संघर्षशील जीवन, सामाजिक जागरण और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के प्रतीक हैं।

रामानंदी परंपरा में अद्वितीय तुलसी 

तुलसी का जीवन भक्ति काल के अन्य संत कवियों की तरह वंचना और सामाजिक पीड़ा से जुड़ा था, पर उनकी रचनात्मकता व मेधा उससे विकृत नहीं हुई। वे निर्गुणवाद के प्रभाव में आकर नास्तिकता या वेद-विरोध की राह पर नहीं चले, बल्कि स्थापित व्यवस्था में मानवतामूलक समन्वय की खोज की। इस दृष्टि से तुलसी रामानंदी परंपरा में अद्वितीय हैं। तुलसीदास मूलतः समन्वयकारी संत थे। उन्होंने शैव-वैष्णव विवाद को हिंदू एकता के लिए बाधक समझा व उसे शांत करने का प्रयास किया। रामचरितमानस में भगवान राम स्वयं शिवभक्ति का समर्थन करते हैं-
सिव द्रोही मम भगत कहावा| सो नर मोहि सपनेहुँ नहि न पावा||
संकर बिमुख भगति चह मोरी| सो नारकी मूढ़ मति थोरी||
(श्रीरामचरित मानस, लंकाकाण्ड, पृष्ठ-400)
वहीं, भगवान शिव भी श्रीराम की स्तुति करते हैंं-
एक बात नहि मोहि सुहानी| जदपि मोहवश कहेहु भवानी||
तुम्ह जो कहा राम कोउ आना| जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना||
यह तुलसीदास की धार्मिक समरसता की स्पष्ट झलक है। सांस्कृतिक दृष्टि से भी वे दूरदर्शी थे। उन्होंने मानस को अवधी में रचकर ईश्वर-साधना को जन-जन तक पहुंचाया। यह भाषाई अभिजनवाद के विरुद्ध एक सांस्कृतिक उत्तर था, जैसा फिरदौसी ने अरबी प्रभाव के विरुद्ध फारसी में शाहनामा रचकर दिया था।

 सनातन विरोधियों का अनर्गल प्रलाप 

तुलसी की हिंदू जनमानस में व्यापक स्वीकृति और गहन सम्मान निर्विवाद है। तथापि, हिंदू आलोचक वामपंथी और सामी मताग्रही द्वारा तुलसीदास के विरुद्ध बारंबार यह प्रचार किया गया कि वे ‘सवर्ण’ और ‘वर्ण व्यवस्था’ के कट्टर समर्थक थे। यह आरोप एकपक्षीय व संदर्भहीन व्याख्याओं पर आधारित है। वस्तुत: वर्णाश्रम व्यवस्था सनातन समाज की शाश्वत व जीवनोपयोगी सामाजिक रचना है, जिसे हिंदू ज्ञान परंपरा ईश्वर-प्रदत्त मानती है। श्रीकृष्ण कहते हैं- चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। (गीता 4/13)
अर्थात्, गुण और कर्म के आधार पर चार वर्णों की रचना मैंने की है। इसमें जन्म, वंश और संस्कार की निरंतरता को भी महत्व दिया गया है, क्योंकि बच्चे की शिक्षा-दीक्षा व कर्म दिशा इन्हीं पर आधारित होती है। तुलसीदास इसी परंपरा में आस्था रखने वाले मनीषी थे। उन पर सवर्णवादी होने का आरोप उनके समग्र दर्शन व कार्य की गहराई को न समझ पाने का द्योतक है, न कि तटस्थ आलोचना का।

एनी बेसेंट ने सेंट्रल हिंदू कॉलेज में छात्रों को संबोधित करते हुए वर्ण व्यवस्था को सामाजिक कर्तव्य की तर्कसंगत अभिव्यक्ति बताया था। उन्होंने कहा था, ‘‘इस योजना का उद्देश्य है कि प्रत्येक व्यक्ति समाज-धर्म की तर्कसंगत अभिव्यक्ति के रूप में अपना कर्तव्य करे। अपनी समाज व्यवस्था के आधार के रूप में उसने सामाजिक कार्यों के व्यवस्थित वितरण प्रणाली को अपनाया, जिसमें समाज के अंगभूत घटकों को प्रत्येक के गुणों के अनुसार कार्य सौंपा गया।’’ (हिंदू जीवनादर्श, पृष्ठ-24)

एनी बेसेंट स्पष्ट करती हैं कि यह व्यवस्था कार्य के समुचित वितरण की प्रणाली थी, जिसमें अधिकार नहीं, बल्कि कर्तव्यों को प्राथमिकता दी गई। कर्तव्य और अधिकार में कोई सारभूत अंतर नहीं है; अंतर केवल दृष्टिकोण का है।’’ ऐसे में यदि तुलसीदास इस संतुलित व्यवस्था के समर्थक हैं, तो उन पर सवर्णवादी आलोचना तर्कहीन और एकपक्षीय है।

कालांतर में वर्ण-व्यवस्था की मूल वैज्ञानिक दृष्टि विकृत होकर वर्णभेद में बदल गई। ऊंच-नीच, छुआछूत और सामाजिक भेदभाव जैसी विकृतियां पनपने लगीं। इस संदर्भ में करपात्री महाराज लिखते हैं- ‘‘यह सब शास्त्रीय व्यवस्था न समझने का ही दुष्परिणाम है। शास्त्रोक्त वर्णाश्रम व्यवस्था किसी का भी अपमान करना नहीं सिखलाती।’’(रामायण मीमांसा, पृष्ठ-763)

आचार्य द्विवेदी ने लिखा है—‘‘तुलसीदास राम-भक्ति के उपासक थे। लोक में वर्णाश्रम व्यवस्था के वे पक्के समर्थक थे, पर उपासना के क्षेत्र में जात-पात की मर्यादा को व्यर्थ समझते थे।’’(हिंदी साहित्य की भूमिका, पृष्ठ-51)

सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक

तुलसीदास उस युग में अकेले नहीं थे जो रामानंदी परंपरा और नवधार्मिक चेतना को लेकर आगे बढ़े। उस समय निर्गुण भक्ति की धारा भी सामाजिक-धार्मिक चेतना को प्रभावित कर रही थी। किंतु यह विचारणीय है कि व्यवस्था-विरोधी निर्गुण भक्ति को सराहने वाले वामपंथी व सामी अनुयायी तुलसीदास के समन्वयवादी और पुनर्निर्माणकारी दर्शन के प्रति आक्रामक क्यों हैं? इसका उत्तर भारतीय संस्कृति, परंपरा और सनातन चिंतन के प्रति उनकी कुंठित मानसिकता में निहित है। यही कारण है कि ये लोग ‘ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी… ’ जैसे अर्धपारिभाषिक वाक्यांशों को संदर्भ से काटकर प्रस्तुत करते हैं, ताकि तुलसी की चेतना को कलंकित किया जा सके। जबकि यह पंक्ति सुंदरकांड में समुद्र द्वारा कही गई है—एक नकारात्मक पात्र की भूमिका से। यह रामकार्य में बाधा बनने वाली मानसिकता का प्रतीक है, न कि तुलसीदास की मूल भावना।

हिंदू जनमानस तुलसीदास की मूल भावना और उनके व्यापक सांस्कृतिक अवदान को भलीभांति समझता है। यही कारण है कि तमाम आलोचनाओं के बावजूद तुलसीदास की लोकप्रियता और उनकी सामाजिक स्वीकार्यता आज भी अडिग और निर्विवाद बनी हुई है। अतः आचार्य रामचंद्र शुक्ल जब तुलसी और उनके राम को ‘लोकधर्मी’ कहते हैं, तो यह सिर्फ शब्द-चातुर्य नहीं, उस सांस्कृतिक यथार्थ का सम्मान है जो जनमानस की आत्‍मा में गहराई तक समाया हुआ है। वस्तुतः तुलसीदास की लेखनी उस समय सनातन धर्म पर मंडरा रही मजहबी कट्टरता के विरुद्ध सशक्त सांस्कृतिक प्रत्युत्तर थी। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने लिखा है-‘‘तुलसी के भीतर से यह और कोई नहीं, स्वयं हिंदू धर्म बोल रहा था। वह हिंदू धर्म, जिसकी प्रतिमाएं और मंदिर ध्वस्त किए जा चुके थे। वह हिंदू धर्म, जिसे मुस्लिम आलोचक साकारवादी होने के कारण तुच्छ समझते थे और वह हिंदू धर्म, जिसकी संततियां इस्लाम स्वीकार करके अथवा निर्गुणवादी प्रभावों में आकर सगुण उपासना की अवहेलना कर रही थीं।’’ (संस्कृति के चार अध्याय, पृष्ठ 278)

यह सांस्कृतिक हमला केवल ‘उम्मत’ की विस्तारवादी मानसिकता का परिणाम नहीं था, बल्कि समाज के कुछ वर्गों के सेमेटिक मतों से प्रभावित होने का दुष्परिणाम भी था। वास्तव में, जैसे अरबी इस्लाम एकेश्वरवाद के नाम पर सनातन की विविधतामूलक ज्ञान-परंपरा को चुनौती देता रहा, वैसे ही निर्गुणवाद के नाम पर कुछ विचारधाराएं भी सनातन धर्म की मूल अवधारणाओं को खंडित करने का प्रयास कर रही थीं। इस वैचारिक आक्रमण का सशक्त प्रत्युत्तर तुलसीदास ने दिया, जो प्रखर हिंदुत्व चेतना के उन्नायक के रूप में सामने आए। आगे चलकर यही सांस्कृतिक प्रतिरोध की परंपरा उन्नीसवीं शताब्दी में दक्षिणेश्वर के संत रामकृष्ण परमहंस में दिखाई देती है। इस स्थिति की विवेचना करते हुए रामधारी सिंह दिनकर लिखते हैं -‘‘उन्नीसवीं सदी में जो हाल राजा राममोहन राय और केशवचंद्र सेन का हुआ, मुस्लिम-काल में वही दशा कबीर और उनके अनुयायियों की थी। और जिस शालीन वीरता के दर्शन हम रामकृष्ण परमहंस में करते हैं, उसी का प्रतिनिधित्व मुस्लिम काल में तुलसीदास ने किया। इसलिए वे हिंदुत्व के परम त्राता और अन्यतम रक्षक माने जाते हैं।’’ (संस्कृति के चार अध्याय, पृष्ठ 278)

संत नहीं, सांस्कृतिक योद्धा भी

तुलसीदास सांस्कृतिक योद्धा भी थे। उनकी सनातन चेतना और सगुण भक्ति की धारा ने हिंदुत्व की सांस्कृतिक स्थिरता को आधार प्रदान किया। उनकी भक्ति परंपरा ने भारतीय संस्कृति, संस्कार और साहित्य को गहराई से प्रभावित किया। परंतु उस काल में सनातन समाज कई संकटों से भी जूझ रहा था। निर्गुण संत परंपरा, विशेषकर दादू से लेकर कबीर तक, ईश्वर के प्रति प्रेम को नारी रूप में व्यक्त करने की प्रवृत्ति रखती थी। द्राविड़ भक्ति से उपजे इस प्रेम-प्रतीकवाद ने धीरे-धीरे समाज की पौरुष चेतना को स्त्रैण बनाने की दिशा में ढालना शुरू कर दिया था। सगुण परंपरा में भी यह प्रवृत्ति गहराने लगी थी। राधा-कृष्ण भक्ति में राग-वियोग के माध्यम से कवित्व की सीमाएं पार कर यह कामुकता तक पहुंचने लगी, जिसकी अभिव्यक्ति जयदेव के गीत-गोविन्द और वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग में देखी जा सकती है। इस संक्रमण से रामभक्ति भी अछूती नहीं रही। ‘रसिक’ संप्रदाय के साधक केवल अपने काव्य में ही नहीं, जीवन व्यवहार में भी नारी नाम और रूप धारण करते थे। तुलसी के समकालीन कवि अग्रदास की अष्टयाम रचना में राम की रासलीला का वर्णन मिलता है। इतना ही नहीं, रसिक कल्पना में हनुमान को ‘चारुशीला सखी’ अर्थात् ‘राम की प्रधान सखी’ के रूप में कल्पित किया गया। इस प्रवृत्ति का प्रमाण ‘हनुमत्संहिता’ जैसे ग्रंथों में मिलता है। (डॉ. भगवती प्रसाद सिंह, रामभक्ति में रसिक संप्रदाय, अवध साहित्य मंदिर, बलरामपुर, 1997, पृष्ठ 98)

तुलसीदास इस समूचे संक्रमण के विरुद्ध एक संतुलित, मर्यादित और सांस्कृतिक पुनर्निर्माण का मार्ग प्रस्तुत करते हैं। काशी की विशिष्ट रामलीला परंपरा, जिसके पीछे तुलसीदास की प्रेरणा मानी जाती है, इसका प्रमाण है। रंगमंच के माध्यम से जनमानस की चेतना को झकझोरने का कार्य नाग नथैया, प्रह्लादलीला, ध्रुवलीला जैसी धार्मिक प्रस्तुतियों ने किया-जिन्हें किशोरों और नवयुवकों द्वारा मंचित किया जाता था। कहा जाता है कि काशी के अखाड़ों और व्यायामशालाओं में हनुमान जी की प्रतिमा की स्थापना की परंपरा भी तुलसी की प्रेरणा से आरंभ हुई थी। (मानस का हंस, प्रस्तावना, अमृतलाल नागर)
संभवतः यही कारण है कि प्रसिद्ध साहित्यवेत्ता डॉ. अब्राह्म ग्रियर्सन ने गोस्वामी तुलसीदास को भगवान बुद्ध के बाद सबसे महान सांस्कृतिक नायक माना है। बुद्ध ने जिस सहज व्यावहारिकता से स्थापित धार्मिक व्यवस्थाओं के विरुद्ध गंगा घाटी में वैचारिक विद्रोह का नेतृत्व किया था, उसी प्रकार तुलसीदास ने इस्लामी प्रभुत्व के कठिन काल में सनातन समाज को एक रचनात्मक और समन्वयी मार्ग दिखाया। इस संदर्भ में तुलसी के समकालीन कवि गंग का उदाहरण विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने कन्वर्जन और सांस्कृतिक दमन के विरुद्ध खुलेआम स्वर उठाया, जैसा कि उनकी इन पंक्तियों से स्पष्ट है-
सब देवन को दरबार जुरयो, तहं पिंगल छंद बनाय कै गायो| 
जब काहू ते अर्थ कह्यो न गायो, तब नारद एक प्रसंग चलायो |
तथा
कबहुं न भडुआ रन चढ़े, कबहुं न बाजी बंब|
सकल सभाहि प्रनाम करि, बिदा होत कवि गंग|
(हिंदी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पृ. 159)
जब कवि गंग ने खुले तौर पर हिंदू समाज की चेतना को झकझोरने का प्रयास किया, तब विधार्मियों ने आगरा में उन्हें आरे से काट डाला। तुलसीदास उनके प्रशंसक थे-‘तुलसी गंग दुवो भए सुकविन के सरदार।’ ऐसे माहौल में तुलसीदास ने प्रतिकार का परोक्ष और सांस्कृतिक मार्ग चुना। वे धर्मरक्षा की चेतना को अप्रत्यक्ष रूप से ही नहीं, प्रतीकात्मक रूप से भी अभिव्यक्त करते हैं-
कहा कहौ छवि आपकी, भले बने हो नाथ|
तुलसी मस्तक नवत है, धनुष बाण ली हाथ||
यह मात्र भक्ति नहीं, बल्कि धर्म-संरक्षण की सांस्कृतिक सक्रियता है-जो तुलसी को केवल कवि नहीं, युगनायक बनाती है।  आचार्य द्विवेदी तुलसीदास की धार्मिक प्रतिष्ठा को बुद्ध के बाद उत्तर भारत के धार्मिक क्षेत्र पर सबसे प्रभावशाली और एकछत्र प्रभुता के रूप में स्वीकार करते हैं- ‘बुद्धदेव के बाद उत्तर भारत के धार्मिक राज्य पर इस प्रकार एकच्छत्र अधिकार किसी का न हुआ।’ (हिंदी साहित्य की भूमिका, पृ. 50) यह तुलसी की सांस्कृतिक दृष्टि और लोक-संवाद की शक्ति का प्रमाण है।

हिंदू जनमानस तुलसीदास की मूल भावना और उनके व्यापक सांस्कृतिक अवदान को भलीभांति समझता है। यही कारण है कि तमाम आलोचनाओं के बावजूद तुलसीदास की लोकप्रियता और उनकी सामाजिक स्वीकार्यता आज भी अडिग और निर्विवाद बनी हुई है।

हिंदू जागरण के ध्वजवाहक 

प्रो. डाॅ. पुरुषोत्तम अग्रवाल भी मानते हैं-‘तुलसीदास की कविता का वैचारिक आशय और सामाजिक दिशा स्पष्ट हैं।’ (अकथ कहानी प्रेम की, पृ. 19)
अर्थात्, वे बिना किसी वैचारिक विचलन के हिंदू जागरण के ध्वजवाहक बने। यद्यपि तुलसीदास व मुगल शासक अकबर की भेंट का कोई प्रामाणिक विवरण नहीं है, पर एक लोकप्रिय आख्यायिका प्रचलित है। जब तुलसीदास अकबर के बुलावे पर नहीं पहुंचे, तो उन्हें बंदी बना लिया गया। तब बंदरों ने आगरा में भारी उत्पात मचाया, जिससे घबरा कर तुलसीदास को मुक्त करना पड़ा। यह प्रसंग किंवदंती हो सकता है, जैसा कि अनेक संतों के जीवन से जुड़ी कहानियों में होता है।  परंतु जैसा कि प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल लिखते हैं-‘‘किंवदन्ती की संधा-भाषा को तथ्यात्मकता की वैसी उम्मीद के साथ पढ़ना व्यर्थ है, जैसी उम्मीद के साथ आप अखबार पढ़ते हैं। उम्मीद करनी चाहिए यह जान पाने की कि किंवदन्ती बता क्या रही है, और जो भी बता रही है, उसके जरिए जता क्या रही है।’’ (अकथ कहानी प्रेम की, पृष्ठ-181)
इस दृष्टि से देखें तो यह कथा तुलसीदास को तत्कालीन इस्लामी सत्ता के प्रतिरोध के एक सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में स्थापित करती है। यह उस आत्मसम्मान और अवज्ञा की प्रतीक है, जो रामभक्ति के माध्यम से जनमानस में जाग्रत हो रही थी-एक ऐसा विद्रोह, जिसकी प्रेरणा गोस्वामी तुलसीदास ही थे। उनके काव्य में मुगल अधीनता के दौर में समाज की दुर्दशा, दासत्व और आत्महीनता के विरुद्ध तीव्र असंतोष प्रकट होता है-
हम पंखपाई पींजरनि तरसत अधिक अभाग हमारी।
अरि बस दैउ जिआवत जाही, मरनु नीक तेहि जीवन चाही।।  (मानस 2/20/2)
इन पंक्तियों में स्पष्ट है कि वे पराधीनता को जीवन से भी अधिक अपमानजनक मानते हैं। वे चाहते हैं कि भारतीय समाज के भीतर शक्ति, शील और पुरुषार्थ प्रतिष्ठित हों, ताकि वह समर्थ बनकर पराधीनता और कष्टों का साहसपूर्वक प्रतिरोध कर सके-जैसा कि वे कहते हैं:
‘समरथ को दुख नाहि गोसाईं।‘
‘पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं, नहि दरिद्र सम दुःख जग माहीं।’
यह तुलसीदास की जागरूक और यथार्थवादी चेतना का प्रमाण है, जहां वे भक्ति के माध्यम से शक्ति, प्रतिरोध और सम्मान अर्जित करने की प्रेरणा देते हैं-
बिनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि  दिन बीति।
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति॥  (सुंदरकांड, 57)
यहां राम की वाणी के माध्यम से तुलसी स्पष्ट करते हैं कि केवल विनय से नहीं, शक्ति-प्रदर्शन से भी संबंधों में संतुलन और सम्मान सुनिश्चित होता है। तुलसीदास की राजनीतिक जागरूकता और सामाजिक विघटन के प्रति उनकी चिंता तथा चिंतन उनके साहित्य में स्पष्ट रूप से व्यक्त हुआ है। वे न केवल धर्म के क्षरण से व्यथित हैं, बल्कि तत्कालीन शासकों के अनैतिक आचरण और प्रजा के शोषण पर भी तीव्र प्रतिक्रिया देते हैं-
नृप पाप परायण धर्म नहीं, करि दण्ड विडंब प्रजा नित ही।
कालु कराल, नृपाल कृपाल न। राज समाजु बड़ोई छली है।

तुलसीदास सांस्कृतिक योद्धा भी थे। उनकी सनातन चेतना और सगुण भक्ति की धारा ने हिंदुत्व की सांस्कृतिक स्थिरता को आधार प्रदान किया। उनकी भक्ति परंपरा ने भारतीय संस्कृति, संस्कार और साहित्य को गहराई से प्रभावित किया।

श्रीराम के मुख से वे यह महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश दिलवाते हैं कि यदि राजा अनीति पर चल रहा हो तो प्रजाजनों को निर्भय होकर उसका विरोध करना चाहिए- ‘जो अनीति कछु भाषउं भाई, तो मोहि बरजहु भय बिसराई।’ धर्म के पतन, लूटपाट और साधुओं पर हो रहे अत्याचारों को तुलसीदास अत्यंत पीड़ा के साथ चित्रित करते हैं-
वेद-धर्म दूरि गए, भूमि चोर भूप भये।
साधु सीद्यमान जानि, रीति पाप पीन की।
इन पंक्तियों में तुलसी केवल भक्ति नहीं, बल्कि धर्मनिष्ठ शासन, सामाजिक न्याय और जन-जागरण की आवश्यकता का आह्वान करते हैं।
मारग मारि, महीसुर मारि, कुमारग कोटिक कै धन लीयो।
संकर कोप सों पाप को दाम परीच्छित जाहिगो जारिके हीयो।

तुलसीदास को भगवान बुद्ध के बाद सबसे महान सांस्कृतिक नायक माना है। हालांकि यह आकलन आंशिक है। पूर्ण सत्य यह है कि बुद्ध के समान व्यावहारिकता और सांस्कृतिक चेतना के उच्चतम शिखर पर यदि कोई दूसरा व्यक्तित्व दिखाई देता है, तो वह तुलसीदास ही हैं।

इस प्रकार, जब राष्ट्र, धर्म और समाज के मूल आधार हिलने लगे थे, तब गोस्वामी तुलसीदास ने सनातन धर्म के अवतारवाद की अवधारणा के माध्यम से ध्वस्त हो रहे जनमानस को ढाढ़स और आशा दी। वे लिखते हैं:
जब जब होइ धरम कै हानी। बाढ़हि असुर अधम अभिमानी।।
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी।।
तब तब प्रभु धरि विविध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।।
जैसा कि स्वामी करपात्री महाराज स्पष्ट करते हैं, वेदों और पुराणों में अवतारवाद की परंपरा स्थापित है, जिसमें विष्णु के असंख्य अवतारों की बात कही गई है। श्रीराम साक्षात् उसी परंपरा के अवतारी विष्णु हैं:
भवान् नारायणो देवः।
आदिकर्ता 

स्वयं प्रभुः।।
(वा.रा. 7/119/1, 18, रामायण मीमांसा, 
पृ. 650)
इसलिए यह कहना उचित होगा कि तुलसीदास का साहित्य, केवल भक्ति का मार्ग नहीं था, बल्कि धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पुनर्निर्माण का संदेश भी था। उनकी संवेदना भारत की तत्कालीन विघटित स्थिति में भक्ति के माध्यम से पुरुषार्थ, आशा और कर्मठता का संबल बनकर सामने आई।
वास्तव में, तुलसी न केवल मध्यकालीन, बल्कि आधुनिक भारत के पौरुष, पुरुषार्थ और सांस्कृतिक पराक्रम के प्रतीक हैं। वे प्राचीन चेतना में अर्वाचीन जागरण के प्रणेता हैं। इसी कारण उन्हें हिंदू नवजागरण का अग्रदूत मानना ऐतिहासिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक रूप से पूर्णतः न्यायसंगत है।
महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने तुलसीदास की इस महत्ता को कुछ इस प्रकार शब्द दिए:
भारत के नभ का प्रभा-पूर्ण,
शीतलच्छाय सांस्कृतिक सूर्य।
अस्तमित आज – रे तमस्तूर्य, दिङ्मण्डल! 

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