अभी इसे पूरे 24 घंटे भी नहीं बीते, जब संसद में गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था कि हिन्दू आतंकवाद जैसा कुछ नहीं होता, जिन्होंने ये झूठा नैरेटिव चलाया है, वह भी जानते हैं कि ये झूठ दूसरे प्रकार के आतंकवाद के सामने खड़ा करने के लिए गढ़ा गया है। और आज इस फैसले पर न्यायालय ने भी मोहर लगा दी है। कोर्ट के फैसले के बाद भी कांग्रेस को शर्म नहीं आई। उसके नेता हिंदू आतंकवाद शब्द का प्रयोग कर रहे हैं। कांग्रेस नेता रेणुका चौधरी ने आज एक सवाल के जवाब में कहा कि हिंदू आतंकवाद होता है।
महाराष्ट्र का मालेगांव और वर्ष 2008 का बम धमाका, जिसमें छह लोगों की जान चली गई और लगभग 100 लोग घायल हुए थे। उस समय अचानक मीडिया में शोर सुनाई दिया, भगवा आतंकवाद, हिन्दू आतंकवाद का। तत्कालीन राजनीतिक बयानबाजी और कुछ जांच एजेंसियों की सक्रियता ने जिस दिशा में इस केस को मोड़ा, उसने न सिर्फ एक घटना की जांच को प्रभावित किया, बल्कि पूरे एक धार्मिक समूह हिंदू धर्म को कठघरे में खड़ा कर दिया। इसके जो मुख्य किरदार उभरे, सुशील कुमार शिंदे, पी. चिदंबरम और दिग्विजय सिंह। इनमें से दो तो देश के पूर्व गृह मंत्री तक रह चुके हैं। इन्होंने अपने बयानों में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से “हिंदू आतंकवाद” शब्द का प्रयोग किया और इसे एक संगठित खतरे के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। लेकिन अब 31 जुलाई 2025 को विशेष राष्ट्रीय जांच अभिकरण (एनआईए) कोर्ट का फैसला आया है। 17 वर्षों की लंबी सुनवाई के बाद तीन जांच एजेंसियों, चार न्यायाधीशों और तीन चार्जशीट के पश्चात न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि हिन्दू आतंकवाद एक फेक नैरेटिव गढ़ा गया था। इसमें पकड़े गए सभी सात आरोपितों को ससम्मान दोष मुक्त किया जाता है।
एटीएस और एनआईए जैसी एजेंसियों की शुरुआती जांच में कई खामियां उजागर हुईं, तभी यह संदेह गहरा गया था कि उन पर भगवा आतंकवाद सिद्ध करने का गहरा राजनीतिक दबाव था। मालेगांव केस में मोटरसाइकिल का मालिकाना प्रमाण, फॉरेंसिक रिपोर्ट, गवाहों के बयान जैसे साक्ष्य सभी बाद में कोर्ट में ताश के पत्तों की तरह बिखरते नजर आए। जो साक्ष्य कोर्ट के सामने रखे गए, वह सभी एक के बाद एक ढह गए। लेकिन इसके साथ आज कई सवाल खड़े हो गए हैं। क्या उन्हें जो “हन्दू” शब्द को बदनाम कर रहे थे, उन्हें भी कोई सजा मिलेगी?
घटना का विवरण: 29 सितंबर 2008 – मालेगांव का काला दिन
29 सितंबर 2008 की शाम मालेगांव की भीड़-भाड़ वाली गलियों में एक बम धमाका हुआ। धमाके में 6 लोगों की मृत्यु हुई और प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार 101 लोग घायल हुए, हालांकि कोर्ट ने कहा कि 95 लोग घायल हुए थे, कुछ मेडिकल दस्तावेजों में हेरफेर के प्रमाण मिले। इस धमाके के बाद जांच की कमान महाराष्ट्र एटीएस के पास गई। उन्होंने कुछ ही समय बाद यह दावा किया कि यह विस्फोट ‘हिंदू चरमपंथियों’ द्वारा किया गया है।
वे जिन पर झूठ का पहाड़ लादा गया
जांच के दौरान जिन नामों को उछाला गया, उनमें कुल सात मुख्य आरोपी थे; साध्वी प्रज्ञा, कर्नल प्रसाद पुरोहित, रमेश उपाध्याय (सेवानिवृत्त मेजर), अजय राहिरकर, सुधाकर धर द्विवेदी, समीर कुलकर्णी, सुधाकर चतुर्वेदी। इन सभी पर यूएपीए (Unlawful Activities Prevention Act) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। साध्वी प्रज्ञा को तो सालों जेल में बिताने पड़े। इन सभी को इतना प्रताड़ित किया गया कि दवाओं के प्रभाव से साध्वी प्रज्ञा सिंह तो कैंसर तक की शिकार हो गईं। लेकिन फिर भी जांच एजेंसियों को कोई ठोस सबूत नहीं मिला जो इन सभी को मालेगांव बम ब्लास्ट से जोड़ पाता।
जांच एजेंसियों की भूमिका: एटीएस, एनआईए और जांच में भ्रम
आप सभी जांच एजेंसियों की कार्रवाइयों को देखिए; मालेगांव ब्लास्ट की शुरुआती जांच महाराष्ट्र एटीएस ने की थी। इसके बाद 2011 में यह केस राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंपा गया। एनआईए ने 2016 में चार्जशीट दाखिल की, लेकिन वह भी आरोपों को पुख़्ता रूप से नहीं सिद्ध कर सकी। ये सभी जांच संस्थाएं मिलकर भी कोर्ट में नहीं बता सकीं कि आखिर आरडीएक्स आया कहां से था। बम कहां और कैसे बना, इसका कोई वैज्ञानिक या भौतिक प्रमाण नहीं मिला। बम बनाने में किसकी भूमिका थी, यह भी केवल अटकलों पर आधारित था।
कोर्ट का फैसला : केवल धारणा के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता
इस संबंध में विशेष राष्ट्रीय जांच अभिकरण (एनआईए) कोर्ट के न्यायाधीश ए.के. लाहोटी ने 31 जुलाई 2025 को फैसला सुनाते हुए कहा, “अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा है कि धमाका जिस मोटरसाइकिल में हुआ, वह साध्वी प्रज्ञा की थी। बम निर्माण, योजना और निष्पादन से संबंधित कोई साक्ष्य पेश नहीं किया गया, जो अभियुक्तों को सीधे दोषी ठहरा सके।” कोर्ट ने यह भी कहा कि बाइक का चेसिस नंबर रिकवर नहीं हुआ। फिंगरप्रिंट नहीं मिले। घटनास्थल का पंचनामा ठीक से नहीं किया गया। सबूतों की चेन टूटी हुई पाई गई। जबकि घटना के बाद उस समय सुशील कुमार शिंदे कह रहे थे कि आरएसएस और भाजपा आतंकवाद की ट्रेनिंग दे रही हैं… भगवा आतंकवाद एक सच्चाई है।”
दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आतंकवाद से जोड़ने के लिए बार-बार बयान दिए। कई प्रमुख अंग्रेजी और हिंदी चैनलों ने बिना किसी ठोस सबूत के आरोपियों को “भगवा आतंकी” कहना शुरू कर दिया था। टीवी डिबेट्स में रास्वसंघ और उससे वैचारिक रूप से जुड़े संगठनों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन धमाकों से जोड़ने की कोशिश की गई। जिसमें कि कुछ पत्रकारों ने इसे “India’s Saffron Terror” जैसा अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव बनाने की कोशिश की।
राजनीतिक नैरेटिव: “भगवा आतंकवाद” – एक गढ़ी गई कल्पना
कहना होगा कि 2008-2014 के दौरान कई बार कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने ‘हिंदू आतंकवाद’ या ‘भगवा आतंकवाद’ जैसा शब्द प्रयोग किया। तत्कालीन गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे और पी. चिदंबरम तो इसे सार्वजनिक मंचों से बार-बार दोहराया करते थे। इसका असर न सिर्फ अभियुक्तों पर पड़ा, बल्कि पूरे देश में हिन्दुओं के बीच हिन्दुओं को ही संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा। देश और दुनिया में हिन्दुओं के प्रति एक अविश्वास का भाव पैदा किया गया।
गृहमंत्री अमित शाह का संसद में बयान : न्यायिक पुष्टि के पहले सत्य का उद्घाटन था
30 जुलाई 2025 को, यानी कोर्ट के फैसले से ठीक 24 घंटे पहले गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में जोरदार भाषण देते हुए कहा, “हिंदू आतंकवाद जैसा कुछ नहीं होता। ये एक राजनीतिक नैरेटिव था जिसे जानबूझकर खड़ा किया गया ताकि दूसरे प्रकार के आतंकवाद से ध्यान हटाया जा सके।” यह बयान देश भर में वायरल हुआ और अगले दिन जब कोर्ट ने सात लोगों को बरी किया, तो अमित शाह का कथन अब तथ्य से पुष्ट हो गया है कि हिन्दू आतंकवाद कभी भी भारत वर्ष या दुनिया के किसी भी कोने में नहीं रहा, न वर्तमान में है।
साध्वी प्रज्ञा; चेहरे पर एक आत्मिक प्रसन्नता के बीच बोलीं- “भगवा को बदनाम किया गया”
न्यायालय से बाहर निकलते ही जब साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर से इस प्रकरण के बारे में जानना चाहा, तब उनकी आंखें नम थीं, वहीं एक संतोष और चेहरे से आत्मिक प्रसन्नता भी झलग रही थी। वास्तव में ये उनके लिए ही नहीं इस केस में आरोपित बनाए गए सभी लोगों के लिए सुख-दुख का मिश्रित पल रहा है, जब उन्हें न्यायालय ने सभी आरोपों से मुक्त किया है । उन्होंने मीडिया से कहा, “मैं एक साध्वी थी, तपस्विनी थी। मुझे षड्यंत्र के तहत फंसाया गया। मेरे जीवन के बहुमूल्य वर्ष जेल में गुजरे। उन्होंने भगवा को बदनाम किया, लेकिन आज भगवा की जीत हुई है, हिंदुत्व की जीत हुई है।” उन्होंने आगे बताया कि कैसे-कैसे उन्हें इस पूरे मामले में जबरदस्त मानसिक, शारीरिक और सामाजिक पीड़ा दी गई।
पूर्व मेजर रमेश उपाध्याय : “हम निर्दोष थे, हैं और रहेंगे”
सेवानिवृत्त मेजर रमेश उपाध्याय ने कहा है कि “हम पर झूठे आरोप लगाए गए। हम शुरुआत से ही निर्दोष थे। अब सत्य सामने आ गया है।यह देश की न्याय प्रणाली की जीत है और अब समय है कि साजिशकर्ताओं को बेनकाब किया जाए।” (स्वतंत्र लेखन : लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

















