मालेगांव धमाके का निर्णय आते ही कथित सेक्युलरों के बदले सुर, न्याय की बदली परिभाषा
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मालेगांव धमाके का निर्णय आते ही कथित सेक्युलरों के बदले सुर, न्याय की बदली परिभाषा

एनआईए कोर्ट निर्णय पर बहुत ही हैरान करने वाली प्रतिक्रिया कथित सेकुलरों की है। कुछ दिन पहले मुंबई बम कांड में सभी आरोपियों को दोषमुक्त करने के निर्णय पर खुशियां मनाने वाले लोग इस निर्णय से नाराज हैं।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Aug 1, 2025, 06:31 pm IST
in भारत, महाराष्ट्र

मालेगांव धमाकों का 17 वर्षों के बाद निर्णय आ ही गया और इससे यह साबित हुआ कि कैसे हिन्दू आतंकवाद का झूठ कांग्रेस ने और सेक्युलर मीडिया ने फैलाया था। कैसे साध्वी प्रज्ञा के बहाने तीन निशाने साधे गए थे, जिनमें न केवल सन्यासी और भगवा को, बल्कि महिला को भी निशाना बनाया गया था।

कर्नल पुरोहित के बहाने सेना पर निशाना साधने का षड्यन्त्र था, अभिनव भारत, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, सरसंघचालक मोहन भागवत और उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी इस झूठे जाल में फंसाने की साजिश रची गई थी। जैसा कि अब अधिकारियों द्वारा सामने आ रहा है कि जिन लोगों ने ऐसा कदम उठाने से मना किया, उन्हें किसी और मामलों में निलंबित कर दिया गया।

मालेगांव विस्फोट कांड की जांच करने वाली एटीएस टीम का हिस्सा रहे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी महबूब मुजावर ने एनआईए कोर्ट को बताया कि उन्हें उस टीम में रहते हुए कुछ ऐसे काम करने को कहा गया, जिनका मालेगांव कांड से कोई वास्ता ही नहीं था।

अब जब बातें निकलकर सामने आ रही हैं, तो इस निर्णय पर बहुत ही हैरान करने वाली प्रतिक्रिया कथित सेकुलरों की है। कुछ दिन पहले मुंबई बम कांड में सभी आरोपियों को दोषमुक्त करने के निर्णय पर खुशियां मनाने वाले लोग इस निर्णय से नाराज हैं। मालेगांव धमाकों को लेकर कथित सेकुलर पत्रकारों ने भी प्रतिकूल टिप्पणियां की थीं। साध्वी प्रज्ञा के साथ जेल में किये गए दुर्व्यवहार को लेकर किसी भी पत्रकार ने कुछ प्रश्न किये हों, ऐसा याद नहीं आता।

परंतु मालेगांव धमाकों में साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित समेत सभी आरोपियों को निर्दोष पाए जाने के बाद सेकुलर खेमे में बेचैनी है। आरटीआई कार्यकर्ता का दावा करने वाले कुणाल शुक्ला ने एक्स पर पूछा कि आरोपी बरी हो गए तो फिर मालेगांव बम ब्लास्ट आखिर किया किसने था? NIA कम से कम देशवासियों को यही बतला दे।

सबसे रोचक ज़ुबैर का पोस्ट है कि “तो मालेगांव में मस्जिद के पास हुए धमाकों में कोई भी शामिल नहीं था। एक स्पेशल एनआईए अदालत ने प्रज्ञा ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित समेत सभी सात लोगों को बरी कर दिया है।“

लोगों ने सोशल मीडिया पर ज़ुबैर से पूछा कि क्या यही सवाल उसने मुंबई बम धमाकों के आरोपियों की रिहाई पर भी किये थे? कथित सेकुलरिज्म का दावा करने वाले मुस्लिम हैंडलर्स भी यही प्रश्न उठाते नजर आए कि तो मालेगांव में किसी ने भी इन मुस्लिमों को नहीं मारा?

तृणमूल कांग्रेस के साकेत गोखले ने गृहमंत्री अमित शाह के संसद में दिए गए उस बयान कि कोई भी हिन्दू कभी आतंकवादी नहीं हो सकता, को आधार बनाकर इस निर्णय पर प्रश्न उठाए। हालांकि टाइमिंग को लेकर राहुल गांधी और अखिलेश यादव भी प्रश्न कर चुके हैं, परंतु वे ये भूल जाते हैं कि निर्णय कब सुनाया जाएगा, वह न्यायालय द्वारा पहले ही निर्धारित था और यह तारीख तो बहुत पहले से ही न्यायालय दे चुका था।

यदि पत्रकारों की बात की जाए तो राजदीप सरदेसाई का दोहरा व्यवहार लोगों ने सोशल मीडिया पर साझा किया। लोगों ने मुंबई धमाकों के निर्णय वाले दिन के और मालेगांव धमाकों के निर्णय वाले दिन के राजदीप के पोस्ट साझा किये।

एक मामले में वे लिख रहे हैं कि कौन इन मुस्लिमों को इनके दस साल वापस देगा? उनसे क्षमा मांगी जानी चाहिए। मगर वहीं राजदीप मालेगांव वाले मामले में लिख रहे हैं कि पूर्व सांसद प्रज्ञा ठाकुर समेत 7 लोगों को 2008 में हुए मालेगांव बम धमाकों के मामले में बरी कार दिया गया। तो किसी ने भी मालेगांव में धमाका नहीं किया, जिसने लगभग 6 लोगों की जान ली और लगभग 100 के करीब घायल हुए। राजदीप जैसे कथित बड़े पत्रकार ने यह नहीं पूछा कि आखिर इन लोगों को इनके बीते हुए वर्ष कौन वापस देगा?

कथित पत्रकार राना अयूब ने एक्स पर पोस्ट किया कि मालेगांव धमाकों में प्रज्ञा ठाकुर समेत सभी आरोपी बरी. अब किसे हैरानी है? वहीं सबा नकवी ने भी लिखा कि मालेगांव, समझौता एक्सप्रेस, अजमेर, मक्का मस्जिद, धमाकों और सबूतों का सिलसिला। मालेगांव मामले को खारिज करने से पता चलता है कि राज्य किसी भी ऐसे मामले को दबा सकता है जिसे वह आगे नहीं बढ़ाना चाहता। और ज़रा याद कीजिए कि प्रज्ञा ठाकुर ने गांधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे की प्रशंसा की थी।

सबा नकवी जैसे लोग पत्रकार के भेष मे रहकर मजहबी आतंकियों के अपराधों पर कुछ नहीं कहते हैं। सबा नकवी से भी लोगों ने प्रश्न किया कि वे 2006 के मुंबई बम धमाकों में छूटे हुए आरोपियों के विषय में क्या सोचती हैं?

भारत में कथित सेक्युलर वर्ग की यही एक बहुत बड़ी समस्या है कि वे कानून, न्यायालयों को भी अपने अनुसार ही संचालित करना चाहते हैं। न्यायालय उनके अनुसार निर्णय दे तो वह निष्पक्ष है और यदि उनके एजेंडे के अनुसार निर्णय नहीं देता है तो उसकी छवि खराब करने का प्रयास किया जाता है कि सरकार अपने अनुसार निर्णय लाती है।

हाल ही के इन दो मामलों में इस वर्ग की असलियत सामने आ गई है। दरअसल इस निर्णय ने उस षड्यन्त्र को उजागर कर दिया है जो कांग्रेस के साथ मिलकर हिंदुओं को आतंकी घोषित करने का कथित सेकुलर लोगों ने किया था।

Topics: मालेगांव विस्फोटमालेगांव ब्लास्ट केसमालेगांव धमाकाmalegaon blast
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