राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने हाल ही में कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक ‘एक्सप्लोरिंग सोसाइटी, इंडिया एंड बियॉन्ड’ में कई महत्वपूर्ण संशोधन किए हैं। ये बदलाव राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा के अनुरूप किए गए हैं। इसका मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों में भारत के सामाजिक विकास की एकीकृत, समग्र और बहु-विषयक समझ विकसित करना है, जिसमें इतिहास, भूगोल, शासन और आर्थिक जीवन जैसे विषयों को परस्पर जोड़कर प्रस्तुत किया गया है।

शिक्षाविद् एवं संस्थापक, शिक्षा-सोपान
पुस्तक में 13वीं से 17वीं शताब्दी के मध्यकालीन भारतीय इतिहास को प्रमुखता दी गई है। इसमें दिल्ली सल्तनत का उदय-पतन, समकालीन प्रतिरोध, राजनीतिक अस्थिरता, सैन्य अभियान, विजयनगर साम्राज्य, मुगलों और उनके प्रतिरोधों के साथ मराठा एवं सिख शक्तियों के उदय पर जोर दिया गया है। विशेष रूप से, दिल्ली सल्तनत व मुगल काल पर आधारित अध्यायों में मंदिरों-शिक्षा केंद्रों पर हुए हमलों, लूटपाट की घटनाओं और मजहबी कट्टरता के उदाहरणों को प्रमाण सहित प्रस्तुत किया गया है। जैसे-सल्तनत काल में बौद्ध, जैन और हिंदू मंदिरों पर हुए हमलों, मूर्तियों की तोड़फोड़, गांवों और नगरों की लूट तथा उपासना स्थलों के विनाश का उल्लेख। अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर द्वारा श्रीरंगम, मदुरै, चिदंबरम और रामेश्वरम् जैसे दक्षिण भारत के धार्मिक स्थलों पर आक्रमण की घटनाओं को भी इसमें दर्ज किया गया है।
इसी संदर्भ में जजिया कर का जिक्र किया गया है, जिसे कुछ मुस्लिम शासकों ने गैर-मुस्लिम प्रजा पर दमनकारी कर के रूप में थोपा था। इसे न केवल आर्थिक शोषण, बल्कि सामाजिक और मानसिक अपमान का माध्यम बताया गया है, जिसका उद्देश्य कन्वर्जन को बढ़ावा देना था।
इतिहास का अंधकारमय अध्याय
मुगल आक्रांता बाबर को कुशल शासक कहे जाने के साथ-साथ उसके द्वारा किए गए नरसंहार, स्त्रियों व बच्चों को गुलाम बनाना, नगरों की लूट और खोपड़ियों की मीनारें बनवाने जैसी घटनाओं का भी जिक्र किया गया है। अकबर को ‘क्रूरता और सहिष्णुता का मिश्रण’ बताया गया है। पुस्तक के अनुसार, चित्तौड़गढ़ की घेराबंदी के दौरान अकबर ने लगभग 30,000 लोगों के नरसंहार का आदेश दिया था।
औरंगजेब के शासन के संदर्भ में कहा गया है कि उसकी कुछ नीतियां राजनीतिक कारणों से प्रेरित थीं, जैसे कुछ मंदिरों को संरक्षण और अनुदान देना। परंतु उसके कई फरमानों में मजहबी असहिष्णुता स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है, जैसे-मंदिरों और शिक्षा संस्थानों के विनाश के निर्देश, जिनमें वाराणसी, मथुरा, सोमनाथ मंदिर, जैन मंदिरों और सिख गुरुद्वारों का उल्लेख शामिल है।
पुस्तक में मध्यकालीन प्रशासनिक ढांचे और आर्थिक गतिविधियों का विश्लेषण भी है। इसमें यह दर्शाया गया है कि सल्तनत और मुगल शासनकाल में व्यापार, शिल्पकला और नगरीय विकास में उल्लेखनीय प्रगति हुई। विदेशी आक्रमणों के बावजूद भारतीय समाज ने मंदिरों, नगरों और आर्थिक संरचनाओं के पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जहांगीर और शाहजहां को कला और स्थापत्य के संरक्षक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, विशेषकर शाहजहां को ताजमहल निर्माण के लिए। हालांकि, यह भी उल्लेखनीय है कि औरंगजेब ने सत्ता की लालसा में अपने पिता शाहजहां को बंदी बनाया और बड़े भाई दारा शिकोह की हत्या कर गद्दी पर बैठा।
इस संपूर्ण कालखंड को पुस्तक में ‘इतिहास का एक अंधकारमय अध्याय’ बताया गया है, जहां युद्ध, मजहबी कट्टरता, रक्तपात और दमन प्रमुख रहे। साथ ही यह स्पष्ट किया गया है कि ऐसे इतिहास को बिना पूर्वाग्रह के समझने की आवश्यकता है, ताकि हम अतीत से सीख लेकर एक समावेशी और सहिष्णु भविष्य की ओर बढ़ सकें।

ऐतिहासिक संतुलन की आवश्यकता
अब तक स्कूलों में इतिहास के नाम पर विद्यार्थियों को दिल्ली सल्तनत और मुगलिया वंशावली रटाई जा रही थी, जबकि भारतीय राजवंशों और बौद्धिक परंपराओं से उन्हें वंचित रखा गया। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या इतिहास केवल दिल्ली केंद्रित होना चाहिए? क्यों समग्र और समावेशी भारतीय इतिहास को प्रमुखता नहीं दी गई? आज जब राजनीतिक दल, विभिन्न संगठन, तथाकथित बुद्धिजीवी और वामपंथी इतिहासकार भारत की विविधता और बहुलतावादी सांस्कृतिक परंपराओं की बात कर रहे हैं, तब यह पूछना उचित है कि क्या अतीत में इतिहास लेखन में संतुलन बरता गया? क्या यह उचित था कि मध्यकाल और आधुनिक काल के इतिहास को कुछ वंशों और नेताओं तक सीमित कर दिया गया?
वामपंथी इतिहासकारों ने भारत के गौरवशाली और सशक्त राजवंशों की उपेक्षा की। मगध, मौर्य, गुप्त, चोल, चालुक्य, पाल, प्रतिहार, पल्लव, परमार, वाकाटक, विजयनगर, कार्कोट, कलिंग, काकतीय, मैत्रक, मैसूर के वोडेयार, आहोम, नागा, सिख, राष्ट्रकूट, शुंग और सातवाहन इत्यादि ने भारत को सांस्कृतिक, आर्थिक और बौद्धिक दृष्टि से समृद्ध किया। इनमें से कई वंशों ने तो सदियों तक राज किया और उनके काल में कला, साहित्य, संस्कृति, स्थापत्य, नगर नियोजन और शिक्षा का अद्वितीय विकास हुआ। विश्व के अनेक देशों से व्यापार और सांस्कृतिक संबंध स्थापित हुए और ख्यातिप्राप्त ज्ञान केंद्रों की स्थापना हुई। स्थापत्य और कला की दृष्टि से भव्य किले, मठ, मंदिर, स्तंभ आदि बनाए गए। क्या नई पीढ़ी को इस सांस्कृतिक विरासत के बारे में जानना नहीं चाहिए?
क्या यह ऐतिहासिक रूप से सत्य नहीं है कि बाबर ने खानवा, चंदेरी, घाघरा सहित कई युद्धों में भारी नरसंहार और लूटपाट की? स्वयं ‘बाबरनामा’ में इन घटनाओं का विवरण मिलता है। अकबर को ‘महान’ कहे जाने के बावजूद, 9 मार्च, 1568 के अकबर के घोषणापत्र ‘फतहनामा-ए-चित्तौड़’ में उसके द्वारा चित्तौड़ में किए गए भीषण संहार की स्वीकारोक्ति मिलती है। इसमें उसने स्पष्ट रूप से अपने जिहादी इरादों और मजहबी मंसूबों का उल्लेख किया है। अकबर लिखता है, यह अल्लाह की ताकत है कि उसने काफिरों के विनाश का कार्य मेरे जैसे जिहादी, मजहब के अनुयायी को सौंपा। अल्लाह ने हमें मुजाहिद बनाया और हिंदुस्तान जैसे विशाल देश की हुकूमत हमें दी। हमने हर जगह इस्लाम का परचम लहरा दिया है। तलवार के बल पर हमने मूर्तिपूजकों के पाप और अंधकार को मिटा दिया। चित्तौड़ और भारत के अन्य भागों में मंदिरों को नष्ट किया। पूरी शक्ति से चित्तौड़ किले पर हमला किया, युद्ध तीन दिन और रात चला। अंततः 25 शाबान 975 हिजरी (23 फरवरी, 1568) की रात किले में प्रवेश किया और अल्लाह के आदेशानुसार काफिरों का संहार किया और उनकी स्त्रियों व बच्चों को बंदी बना लिया।
अकबर के समकालीन इतिहासकारों-जैसे आरिफ मोहम्मद कंधारी (तारीख-ए-अकबरी), मीर अब्दुल कासिम नमकीन (मुंशत-ए-नमकीन), अबुल फजल (अकबरनामा, आइन-ए-अकबरी) और अब्दुल कादिर बदायूनी (मुन्तखब-उत-तवारीख) ने भी उसकी नीतियों, क्रूरता, विलासप्रियता और मजहबी कट्टरता का जिक्र किया है। कंधारी ने लिखा है कि अकबर ने लगभग 30,000 लोगों का कत्ल किया। विजय के बाद अधिकांश सैनिक धनवान हो गए और अकबर के अधीन उनकी प्रतिष्ठा बढ़ गई। हर किसी को उसकी इच्छानुसार पुरस्कार मिला। विलासिता में लिप्त लोगों ने सुंदर स्त्रियों के सुख भोगे। युद्ध के बाद अकबर रमजान की 26 तारीख को ख्वाजा मुईनुद्दीन की दरगाह अजमेर पहुंचा। दस दिन वहां रहा, फिर आगरा लौटा।”
इतिहास और सिनेमा में अकबर को आदर्श प्रेमी और उदार नायक के रूप में चित्रित किया गया, जबकि उसके दरबारी अबुल फजल के अनुसार, अकबर के हरम में उसकी 36 बेगमों के अलावा लगभग 5,000 स्त्रियां थीं। कई इतिहासकार यह संख्या अधिक बताते हैं। अकबर सुंदर स्त्रियों को बलात् अपने हरम में लाने के लिए ‘मीना बाज़ार’ लगाता था। उसकी अतिशय कामुकता और विलासप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उसने अपने संरक्षक बैरम खां की हत्या करवा दी और उसकी विधवा सलीमा सुल्तान बेगम से निकाह कर लिया। कई घटनाएं बताती हैं कि हिंदू महिलाओं के लिए जौहर तब एकमात्र सम्मानजनक विकल्प बन गया था।
‘महान’ कौन?
यह विचारणीय है कि नैतिक रूप से पतित, विलासी, वासनाप्रिय, क्रूर और असहिष्णु प्रवृत्ति का शासक ‘महान’ कैसे कहलाया? और क्यों छत्रपति शिवाजी महाराज तथा महाराणा प्रताप जैसे राष्ट्रनायक-जिन्होंने अपने धर्म, स्वराज्य और सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष किया-को इतिहास के पन्नों में हाशिए पर रखा गया? क्या ऐसे कोई प्रमाण हैं जो यह सिद्ध करते हों कि छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप या किसी भी सनातनी शासक ने कभी पंथ के आधार पर नरसंहार किया या उपासना स्थलों को नष्ट किया? फिर ‘महानता’ की संज्ञा के वास्तविक अधिकारी कौन हैं?
ऐतिहासिक रूप से स्वीकार्य तथ्य है कि औरंगजेब ने तलवार के बल पर हिंदुस्थान को दारुल-हर्ब (काफिरों की भूमि) से दारुल-इस्लाम (इस्लामी शासन) में बदलने का लक्ष्य रखा था। उसकी दृष्टि में प्रत्येक हिंदू ‘काफिर’ था और मंदिरों का विध्वंस, उनके विश्वास का दमन तथा रक्तपात को ‘पवित्र मजहबी फर्ज’ समझता था। 12 अप्रैल, 1669 को उसने हिंदुओं पर जज़िया कर पुन: लागू करने का आदेश दिया। इस कर की वसूली के बहाने हिंदुओं को अपमानित और प्रताड़ित किया गया। सेना तक को जज़िया वसूलने में लगाया गया।
प्रसिद्ध इतिहासकार मार्क जेसन गिल्बर्ट ने अपनी पुस्तक ‘South Asia in World History’ में लिखा है कि हिंदू गृहस्थ को यह कर चुकाने के लिए मुस्लिम अधिकारियों या मौलवियों के समक्ष अपमानजनक मुद्रा में प्रस्तुत होना पड़ता था। प्रत्येक कदम पर यह बोध कराया जाता था कि हिंदू, मुसलमानों की तुलना में हीन और द्वितीय श्रेणी के नागरिक हैं। इस निरंतर अपमान और सामाजिक-धार्मिक दमन से त्रस्त होकर अनेक हिंदुओं ने इस्लाम स्वीकार करना ही उचित समझा। 1668 में औरंगज़ेब ने एक शाही फ़रमान द्वारा हिंदू पर्व-त्योहारों (जैसे दीपावली और होली) पर सार्वजनिक रूप से प्रतिबंध लगा दिया। उसने शिक्षण संस्थानों, मंदिरों और धार्मिक स्थलों के ध्वंस का आदेश भी दिया, जिसके तहत हजारों उपासना स्थलों को तोड़ा गया। इनमें काशी का विश्वनाथ मंदिर, मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर और पाटन का सोमनाथ मंदिर प्रमुख हैं।
1688 में औरंगज़ेब ने एक और फ़रमान जारी किया, जिसमें हिंदुओं के पालकी, हाथी या घोड़े पर चढ़ने पर रोक लगा दी गई और आत्मरक्षार्थ शस्त्र धारण करना अपराध घोषित कर दिया गया। इन आदेशों और घटनाओं का प्रामाणिक विवरण स्वयं उसके दरबारी इतिहासकार मुहम्मद साक़ी मुस्तईद ख़ान की प्रसिद्ध कृति ‘मआसिर-ए-आलमगीरी’ में विस्तार से मिलता है। उदाहरण के लिए, अध्याय 12 (पृष्ठ 51 व 55) में दर्ज है: ‘‘17 जिलकादा 1079 हिजरी (9 अप्रैल, 1669) को औरंगज़ेब को यह सूचना मिली कि थत्ता, मुल्तान और बनारस में काफिर ब्राह्मण झूठे धार्मिक ग्रंथों से बालकों को शिक्षा दे रहे हैं, जिनमें मुस्लिम बच्चे भी सम्मिलित हो रहे हैं। इसलिए सम्राट ने इन आश्रमों और मंदिरों को पूर्णतः नष्ट करने का आदेश दिया।’’
‘‘2 सितंबर, 1669 को उसे सूचित किया गया कि उसके आदेशानुसार काशी का विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त कर दिया गया है।’’
औरंगजेब के शासन की कठोरता केवल मंदिर विध्वंस या कर-प्रणाली तक सीमित नहीं रही। उसने गुरु तेगबहादुर जी और उनके अनुयायी भाई मति दास, सती दास और दयाल दास की सार्वजनिक रूप से निर्मम हत्या करवाई। वहीं, उनके पुत्र गुरु गोबिंद सिंह जी के नन्हे साहिबज़ादों की भी क्रूरतापूर्वक हत्या कर दी गई।

महिमामंडन की राजनीति और उसका परिणाम
इन तमाम ऐतिहासिक तथ्यों के बावजूद यह विचारणीय है कि आखिर ऐसी कौन-सी बाध्यता थी कि भारत जैसे लोकतांत्रिक राष्ट्र में इतिहास की पुस्तकों और सार्वजनिक स्मारकों में इन शासकों को ‘गौरवशाली’ रूप में प्रस्तुत किया गया? क्या अमेरिका में आप ओसामा बिन लादेन के नाम पर कोई सड़क या भवन की कल्पना कर सकते हैं? या इंग्लैंड अथवा इस्राएल में हिटलर के नाम पर कोई सार्वजनिक स्मारक? स्वयं जर्मनी में भी हिटलर का नाम पूर्णतः निषिद्ध है। लेकिन भारत में कृत्रिम सेकुलरिज्म और तुष्टीकरण की राजनीति के चलते, न केवल इन क्रूर आक्रमणकारियों को नायक बनाया गया, बल्कि उनके नाम पर भवन, सड़कें और नगर तक नामांकित किए गए। दशकों तक इन्हें सार्वजनिक मंचों पर सराहा गया। और जब कभी किसी इतिहासबोधी व्यक्ति, राष्ट्रचिंतक विचारक या संगठन ने इस एकतरफा महिमामंडन का विरोध किया, तो उन्हें ‘सांप्रदायिक’ करार दे दिया गया।
चिंतन का विषय यह भी है कि जब ईसाई समुदाय जनरल डायर या ब्रिटिश लॉर्ड्स से और जर्मन नागरिक हिटलर या नाज़ी विचारधारा से स्वयं को नहीं जोड़ते, तो फिर भारत का मुसलमान विदेशी आक्रांताओं से अपनी पहचान क्यों जोड़ता है? क्यों कुछ मौलवी और मज़हबी नेता ग़ज़नवी, गौरी, खिलजी, अब्दाली, बाबर, तैमूर, अकबर और औरंगज़ेब जैसे आक्रांताओं के साथ जुड़ाव को गर्व का विषय मानते हैं, जबकि इन आक्रमणकारियों ने उनके ही पूर्वजों को रौंदा था? क्या यह उचित नहीं कि उन वामपंथी और तथाकथित उदारवादियों से यह पूछा जाए कि यदि अंग्रेज विदेशी आक्रांता थे, तो दिल्ली सल्तनत और मुगलों को क्यों नहीं उसी श्रेणी में रखा गया? जो ‘कला और संस्कृति’ के नाम पर मुगलों का गुणगान करते हैं, किंतु यह स्वीकार नहीं करते कि मुगलों और इस्लामी आक्रांताओं के डर से हिंदू समाज में पर्दा प्रथा, बाल विवाह जैसी सामाजिक कुप्रथाएं प्रचलित हुईं। दिन में होने वाले वैवाहिक संस्कार भी रात में किए जाने लगे। यहां तक कि जाति-व्यवस्था भी इस्लामी काल में अधिक कठोर और जड़ हो गई।
वामपंथी इतिहासकार यह तर्क देते हैं कि ‘हिंदू राजाओं ने भी मंदिर तोड़े’, परंतु वे आज तक किसी एक उदाहरण का प्रमाण नहीं प्रस्तुत कर सके। इसके विपरीत, डॉ. भीमराव आंबेडकर ने अपने प्रसिद्ध निबंध ‘The Decline and Fall of Buddhism in India’ में स्पष्ट लिखा है: ‘‘इस बात में कोई संदेह नहीं कि भारत में बौद्ध धर्म के पतन का मुख्य कारण मुस्लिम आक्रमण थे। इस्लाम ‘बुत’ (मूर्ति) का शत्रु बनकर आया, जो ‘बुद्ध’ शब्द का अरबी रूप है। इसलिए मुस्लिम आक्रांताओं के लिए मूर्तिपूजा और बौद्ध धर्म एक ही चीज़ थे।’’ डॉ. आंबेडकर के इस स्पष्ट कथन से यह सिद्ध होता है कि इस्लामी आक्रमणों ने न केवल भौतिक, बल्कि बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत को भी नष्ट किया।
इतिहास लेखन में वैचारिक नियंत्रण
इतिहास लेखन में वैचारिक हस्तक्षेप नया नहीं है। 1977 से पहले जिन पुस्तकों को एनसीईआरटी से मान्यता मिली (जैसे आर.एस. शर्मा की प्राचीन भारत, बिपिन चंद्र की आधुनिक भारत और रोमिला थापर द्वारा लिखित मध्यकालीन भारत) उनमें भारत के इतिहास को मार्क्सवादी और यूरोपीय नजरिए से देखने की प्रवृत्ति स्पष्ट थी। इन पर तथ्यों को विकृत करने के गंभीर आरोप लगे। नतीजा, जुलाई 1978 में आरएस शर्मा की पुस्तक को सीबीएसई पाठ्यक्रम से हटाना पड़ा। 1982 में एनसीईआरटी ने निर्देश जारी किया कि इतिहास को ‘हिंदू-मुस्लिम संघर्ष’ के रूप में न पढ़ाया जाए। 1989 में पश्चिम बंगाल सरकार ने आदेश दिया कि पाठ्यपुस्तकों में मुस्लिम शासकों की आलोचना, मंदिर ध्वंस या जबरन कन्वर्जन का उल्लेख नहीं किया जाएगा।
1947-1977 के बीच 5 मुस्लिम नेताओं मौलाना अबुल कलाम आजाद, हुमायूं कबीर, मो. करीम छागला, फखरुद्दीन अली अहमद और नूरुल हसन के पास शिक्षा मंत्रालय रहा। क्या यह केवल संयोग था या एक विचारधारा-विशेष के विस्तार की रणनीति? नूरुल हसन ने विशेष रूप से शिक्षा को वामपंथी नियंत्रण में लाने का कार्य किया। उन्होंने इरफान हबीब, बिपिन चंद्र और रोमिला थापर जैसे इतिहासकारों को एनसीईआरटी, आईसीएचआर और विश्वविद्यालयों में प्रमुख पदों पर नियुक्त किया। इन इतिहासकारों ने एक ऐसा आख्यान गढ़ा, जिसमें हिंदू समाज को ‘उत्पीड़क’ और मुस्लिम आक्रांताओं को ‘प्रगतिशील’ बताया गया। अब जब एनसीईआरटी की नई पुस्तकों में एक वस्तुनिष्ठ और समग्र दृष्टिकोण से इतिहास को प्रस्तुत करने का प्रयास हो रहा है, तो उसे ‘भगवाकरण’ कहकर खारिज कर देना बुद्धिजीवी ईमानदारी नहीं है। इन पुस्तकों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 के अनुरूप तैयार किया गया है, जिसमें लाखों विद्यार्थियों, अभिभावकों और शिक्षकों की भागीदारी रही है।
यह प्रयास न तो किसी मजहबी के विरुद्ध है और न ही किसी समुदाय के। यह एक ऐतिहासिक सत्यबोध की दिशा में उठाया गया कदम है, जिसमें भारत की सांस्कृतिक विरासत, बौद्धिक परंपरा और सामाजिक अनुभव को न्यायसंगत स्थान दिलाने की कोशिश की जा रही है।

















