सऊदी अरब में कायदे कानून कितने कड़े और मजहब से परे हैं, इसका फिर से एक उदाहरण सामने आया है। मक्का की ‘ग्रैंड मस्जिद’ में मिस्र से आए एक यात्री द्वारा फिलिस्तीन के समर्थन में प्रदर्शन करना और ‘गाजा गाजा’ नारे लगाना सऊदी सरकार को रास नहीं आया। देखते ही देखते वहां पुलिस आ पहुंची और उस आदमी को पकड़कर जेल में डाल दिया गया। मिस्र के उस ‘गाजा प्रेमी’ आदमी की गिरफ्तारी मजहब आदि से परे देखी जा रही है। बेशक यह घटना मजहबी, राजनीतिक, मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय संबंधों से जुड़ी थोथी बातों से परे, किसी देश के कानून से जुड़ी हुई है।
मिस्र से वहां आए उस यात्री ने काबा के पास फिलिस्तीन का झंडा लहराते हुए गाजा पर हमले रोकने की अपील की थी। उसने ‘वा इस्लामा’ चिल्लाते हुए नारे लगाए और वहां खड़े लोगों का गाजा के ‘बच्चों की भूख और पीड़ा’ पर ध्यान खींचने की कोशिश की। लेकिन सऊदी सुरक्षा बल फौरन हरकत में आए और उसे हिरासत में ले लिया गया। इधर उस घटना के वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं।
सऊदी अरब में हज और उमराह के दौरान किसी भी प्रकार के राजनीतिक प्रदर्शन पर सख्त प्रतिबंध है। वहां के प्रशासन द्वारा मजहबी जगहों को राजनीतिक गतिविधियों से दूर रखने की नीति के तहत यह कार्रवाई की गई है। सऊदी सरकार का कहना है कि यह नियमों के उल्लंघन पर आधारित कार्रवाई थी, न कि किसी विचारधारा पर। यहां यह भी सच है कि सऊदी अरब ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर फिलिस्तीन के समर्थन में कई बार बयान दिए हैं। लेकिन जब उसी मुद्दे पर उसकी धरती पर नारे लगाए गए, तो उसने उन नारों को दबा दिया। सोशल मीडिया पर कुछ लोग इसे सऊदी सरकार का ‘दोगलापन’ बता रहे हैं तो बहुत से ऐसे भी हैं तो वहां के प्रशासन की तारीफ कर रहे हैं कि उसने मजहब से परे जाकर कायदों को प्राथमिकता दी।
कुछ गाजा समर्थक एक्टिविस्ट इसे ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ और ‘मानवाधिकारों’ का उल्लंघन कह रहे हैं। वे पूछ रहे हैं कि क्या मजहबी स्थलों पर मानवीय मुद्दों की ओर ध्यान दिलाना अपराध है? लेकिन वे इस सवाल को छुपाए ले रहे हैं कि क्या कायदों का सख्ती से पालन करना अपराध है? स्वाभाविक तौर पर ऐसे कई मानवाधिकार संगठनों ने ‘गाजा गाजा’ नारे लगाने वाले उस व्यक्ति की गिरफ्तारी की आलोचना की है।
इस्लामवादी देशों के टीवी चैनल दिन भर खबरें चला रहे हैं कि गाजा में इस्राएली हमलों और नाकेबंदी के कारण हालात बेहद खराब हैं। उनके अनुसार, वहां 59,000 से अधिक मौतें हो चुकी हैं और 20 लाख से ज्यादा लोग भुखमरी से जूझ रहे हैं। मक्का मस्जिद से पकड़े गए मिस्र के उस यात्री की अपील इसी ‘संकट’ को लेकर थी।
















