एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक में मुगल शासकों के क्रूर पक्षों, मंदिर विध्वंस और मजहबी कट्टरता जैसी घटनाओं का उल्लेख किए जाने पर कुछ शिक्षाविद्, इतिहासकार और सामाजिक संगठन विरोध जता रहे हैं। इनमें जेएनयू की इतिहासकार डॉ. रुचिका शर्मा, प्रो. एस. इरफान हबीब, अपूर्वानंद जैसे लोग शामिल हैं। इनका कहना है कि ये संशोधन बिना व्यापक परामर्श और इतिहास विशेषज्ञों की सलाह के किए गए हैं।
इतिहास को संतुलित दृष्टिकोण से प्रस्तुत करना चाहिए, जिसमें न तो तथ्यों को छिपाया जाए और न ही उन्हें चुनिंदा ढंग से प्रस्तुत किया जाए। इस पर, एनसीईआरटी ने स्पष्ट किया है कि कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक ‘समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे’ में किए गए बदलाव राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 तथा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा-स्कूल शिक्षा 2023 के दिशा-निर्देशों के अनुरूप हैं। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को भारत के भूगोल, इतिहास (मध्यकालीन और आधुनिक), आर्थिक जीवन और शासन-प्रणाली के बारे में समग्र और बहु-आयामी दृष्टिकोण से समझ प्रदान करना है। कक्षा 8 के मध्य स्तर की अंतिम कड़ी होने के कारण यह अपेक्षा की जाती है कि छात्र 13वीं से 19वीं शताब्दी के बीच की घटनाओं को समग्रता में समझें और यह जानें कि इनका आधुनिक भारत पर क्या प्रभाव पड़ा।
विषयवस्तु की प्रस्तुति विद्यार्थियों पर सूचनात्मक बोझ न डालते हुए उनकी समीक्षात्मक और विश्लेषणात्मक सोच को विकसित करने पर केंद्रित है। यह सामग्री पांच व्यापक विषयों के अंतर्गत सरल, बोधगम्य और एकीकृत शैली में प्रस्तुत की गई है। इसमें इतिहास की असुविधाजनक घटनाओं को छुपाने की बजाय, उन्हें स्पष्टता, संवेदनशीलता और शोधपरक विवेक के साथ प्रस्तुत किया गया है, जो अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है।

इसका उद्देश्य दोषबोध नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, विवेकशील और समावेशी दृष्टिकोण को विकसित करना है। सभी तथ्य प्रमाणित स्रोतों पर आधारित हैं, जैसे-पृष्ठ 37 पर लिखा है, “वह एक क्रूर और निर्दयी विजेता भी था जिसने अनेक नगरों की समस्त जनता की हत्या की, स्त्रियों एवं बच्चों को दास बनाया और लूटे गए नगरों के नरसंहार के पश्चात् ‘खोपड़ियों के स्तंभ’ बनवाने में गर्व की अनुभूति की।”
यह तथ्य बाबर के क्रूर व्यवहार और ‘खोपड़ियों की मीनार’ का उल्लेख बाबरनामा पर आधारित है। पृष्ठ 44 पर मंदिर विध्वंस पर लिखा गया है, “बनारस (वाराणसी), मथुरा, सोमनाथ सहित अनेक मंदिरों का विध्वंस किया गया।” इसे प्रख्यात इतिहासकार आर.सी. मजूमदार द्वारा संपादित पुस्तक ‘The Mughal Empire’ से लिया गया है। (The History and Culture of the Indian People, खंड 7, भारतीय विद्या भवन, 1974, पृष्ठ 234–235)
इसी प्रकार, नेविल एच.आर. ने बनारस गजेटियर के आधार पर लिखा है, “ऐसा कहा जाता है कि केवल अकेले बनारस नगर में ही कम से कम छिहत्तर मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया।” (पृष्ठ 206) मथुरा के मंदिर विध्वंस का उल्लेख मआसिर-ए-आलमगीरी के सर जदुनाथ सरकार द्वारा अनुदित संस्करण में
मिलता है।
पृष्ठ 39–40 पर शासन विस्तार के संदर्भ में अकबर के विचार हैं। इसमें वह कहता है, ,“पहले मैं दूसरों को अपने धर्म (मजहब पढ़ें) में परिवर्तित करने हेतु विवश करता था और उसे इस्लाम समझता था। परंतु जैसे-जैसे मेरी समझ बढ़ी, मुझे लज्जा आई। जब मैं स्वयं मुसलमान नहीं तो दूसरों को बलपूर्वक मुसलमान बनाना अनुचित था।” ये तथ्य अबुल फजल की रचनाओं से उद्धृत हैं।
चित्तौड़ के भीषण नरसंहार में लगभग 30,000 लोगों की हत्या का उल्लेख प्रो. सतीश चंद्र की पुस्तक ‘Medieval India: From Sultanat to the Mughals–Mughal Empire (1526–1748)’ (पृष्ठ 107) में है।
गुरु तेग बहादुर के साथ औरंगजेब के आदेश पर की गई क्रूरता और उनके बलिदान का उल्लेख पृष्ठ 51 पर किया गया है। यह संदर्भ उमेर मिर्जा की पुस्तक ‘Guru Tegh Bahadur: Prophet & Martyr–A Biography’ से लिया गया है।
इसके अलावा, पाठ्यपुस्तक में ‘अतीत की जटिलताओं पर एक टिप्पणी’ जैसे खंडों के माध्यम से यह सुनिश्चित किया गया है कि विद्यार्थी पूर्वाग्रहों या संकीर्ण दृष्टिकोणों से मुक्त होकर इतिहास को समझें। कुल मिलाकर यह पुस्तक केवल ऐतिहासिक तथ्यों की प्रस्तुति नहीं, बल्कि चिंतनशील, सजग और उत्तरदायी नागरिकों के निर्माण की दिशा में एनसीईआरटी की एक सुदृढ़ शैक्षिक पहल है। इसकी समग्रता को इसी परिप्रेक्ष्य में समझा और सराहा जाना चाहिए।

















