भारत के सुशासन मॉडल में तेजी से उभरते ओडिशा की नई भूमिका को लेकर ‘पाञ्चजन्य’ द्वारा आयोजित सुशासन संवाद : ‘ओडिशा की उड़ान’ का आयोजन आज (28 जुलाई, 2025) ताज विवांता, भुवनेश्वर में किया गया। कार्यक्रम में प्रज्ञा प्रवाह के संयोजक और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक जे नंदकुमार ने वरिष्ठ पत्रकार अनुराग पुनेठा से बातचीत की। पेश हैं उस बातचीत के कुछ अंश।
आज के वक्त में हिन्दुत्व की बात करना कितना प्रासंगिक है?
आज की तारीख में अगर कोई एक विचार सबसे अधिक प्रासंगिक है केवल भारत नहीं, बल्कि पूरे विश्व में तो वो हिन्दुत्व ही है। इसमें किसी प्रकार के शक की गुंजाइश नहीं है। भारत को विश्व गुरु या विश्वमित्र बनाना है तो उसके लिए एक विचार या दर्शन की आवश्यकता है। और ये दर्शन हिन्दुत्व ही है। अगर भारत के कोर सिद्धांत या उसकी संस्कृति को ये देश नहीं पहचानेगा तो ये आगे भी नहीं बढ़ पाएगा।
पिछले कई सदियों से लोग आगे नहीं आ पा रहे थे या हिन्दुत्व की प्रेरणा नहीं दे पा रहे थे, क्योंकि बाहरी आक्रान्ताओं ने हिन्दुत्व को कुचलने की भरपूर कोशिश की। लेकिन अब वक्त बदल रहा है अब सामान्य इंसान भी हिन्दुत्व बताने के लिए आगे आ रहा है। एक उदाहरण देते हुए नंदकुमार जी कहते हैं कि प्रज्ञा प्रवाह के लिए उन्होंने इंटर्नशिप का एक विज्ञापन दिया और उसके लिए एक सप्ताह का समय दिया। उसी दिन 528 लोगों ने एप्लीकेशन कर दिया। ये आवेदन करने वाले पीजी, यूजी, पीएचडी करने वाले स्टूडेंट से आए। इसलिए अगर कोई ये सोचता है कि युवाओं को हिन्दुत्व के बारे में नहीं पता तो वो गलत हैं। युवा इसके बारे में न केवल जानते हैं, बल्कि इसके प्रति संजीदा भी हैं।
स्वामी चिन्मयानंद का दिया उदाहरण
नंद कुमार जी ने युवाओं को लेकर स्वामी चिन्मयानंद जी को कोट करते हुए कहा, “यूथ आर नॉट यूजलेस, दे आर यूज्ड लेस”, अगर युवाओं का सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो वे काम आएंगे। हां समाज में कुछ लोग हैं, जो कि इनके मन में जानबूझकर कन्फ्यूजन पैदा करने की कोशिशें करते हैं।
यूजलेस को यूजफुल बनाना या फिर जो हिन्दुत्व को आक्रामक हिन्दुत्व बताकर दुष्प्रचार किया जाता है, आपके समक्ष सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण क्या है?
आजकल एक गलत नरैटिव साबित करने की कोशिश करने के लिए कुछ लोग दो विपरीत बातों को सामने रखकर कन्फ्यूजन पैदा करने की कोशिश करते हैं। उदाहरण के तौर पर ‘वामपंथी बनाम दक्षिणपंथी’ बहस। इसमें पहले से वामपंथियों के लिए एक एजेंडा सेट कर दिया जाता है कि लेफ्टिस्ट मतलब प्रोग्रेसिव, लिबरल, सेक्युलर और लोकतांत्रिक, जबकि दक्षिणपंथी को पहले से एक नरैटिव सेट कर देते हैं कि ये तो अंधविश्वासी है, दकियानूसी, पीछे देखने वाला। इसी प्रकार से इन्होंने हिन्दुइज्म बनाम हिन्दुत्व सेट कर रखा है।
वामपंथियों की एक सोची समझी साजिश है कि हिन्दुत्व ठीक नहीं है, हिंदुइज्म ठीक है। इसी नरैटिव को काटने के लिए मेरी किताब में कोशिश की गई है। खास बात ये है कि ये वही लोग हैं, जिन्होंने खुद को हिन्दू कहने से इंकार किया था। नंदकुमार जी ने देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पिता का जिक्र करते हुए कहा कि विदेश प्रवास के दौरान उन्होंने एक होटल में चेक इन के दौरान होटल में खुद को हिन्दू बताने से इंकार कर दिया था।
उन्होंने कहा कि मुझे गधा कहो, लेकिन हिन्दू मत कहो। बाद में उनके बेटे (जवाहरलाल नेहरू) ने प्रधानमंत्री बनने के बाद गर्व से कहा कि मैं अपनी संस्कृति और सभ्यता के रूप में “मैं मुस्लिम हूं”, शिक्षा और प्रोग्रेसिव सोच से मैं ईसाई हूं और दुर्घटनावश मैं हिन्दू पैदा हुआ। एक्सीडेंट क्या हुआ है पता नहीं। एक बार पूजनीय सुदर्शन जी ने कहानी बताया था। उनका एक्सीडेंट क्या है? हिंदू एक्सीडेंट से बनने का कारण क्या है? सुदर्शन जी बताए थे इसलिए मुझे पता है। क्योंकि हम जैसे सामान्य लोग बता नहीं सकते। ब्रह्मलोक से दो बीज ने प्रवास प्रारंभ किया। एक तो एक कश्मीरी मुसलमान महिला के गर्भ में प्रवेश करने के लिए दूसरा एक हिंदू महिला के गर्भ में प्रवेश करने के लिए जाते-जाते वो ब्रह्मलोक से इंद्रलोक तक आया वहां थोड़ा ट्रैफिक जाम था। ये ट्रैफिक जाम के बीच में आकर दोनों के बीच में टकरा हुई। दोनों का रास्ता बदल गया। इससे ज्यादा क्या एक्सीडेंट होना है हिंदू बनने के लिए।
हिन्दुओं को बांटने की कोशिश
इसके साथ ही लोगों ने किताबें लिखी, मैं हिन्दू क्यों हूं? फिर कुछ दिनों के बाद एक और किताब लिखी गई, मैं हिन्दू क्यों नहीं हूं। इसके साथ ही लोगों ने ये भी बताया कि मैं तो विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस की विचारधारा का हिन्दू हूं, तो क्या गोलवलकर जी हिन्दू नहीं हैं। हम लोग हिन्दू नहीं हैं? इसलिए मैंने बताना शुरू किया हिन्दुत्व के बारे में। जिस हिन्दुत्व के बारे में मैं बताता हूं वो हिन्दुइज्म वाला हिन्दू हूं। हिन्दुत्व पॉलिटिकल और कम्युनल है, ऐसा बताना शुरू किया। असल में ये लोग अपने खुद के खोखलेपन के बारे में सभी को बता रहे हैं। जब इन लोगों ने हिन्दुइज्म और हिन्दुत्व की बहस छेड़ी तो हमें भी थोड़ा ग्रामर में जाना पड़ा। हिन्दूइज्म नहीं हो सकता। इस्म यानी क्या ? ये ‘क्लोज्ड टू बुक ऑफ थॉट’ है इसलिए हम बता रहे हैं हिंदुत्व, तब जाकर सब प्रकार का महत्व समझ में आ जाएगा।
हिन्दुइज्म
हिन्दुइज्म एक प्रकार की डॉक्ट्रिन है, जिसे उसी रूप में स्वीकारना पड़ता है। इसमें कोई बदलाव नहीं कर सकते हैं, जैसे मार्क्सिज्म, इस्लामिज्म। इसमें आप कुछ भी अलग से जोड़ नहीं सकते हैं। अगर ऐसा किया तो आपकी हथेली और गला भी काटा जा सकता है। लेकिन, हिन्दू में ऐसा कुछ भी नहीं है। इसमें लगातार सुधार की गुंजाइश है। शंकराचार्य ने गीता का भाष्य लिखा था वो भाष्य के उपोघात में उन्होंने एक शब्द एक सेंटेंस बताया था ‘शीतोअग्नि प्रकाश भ्रवन श्रुति शम प्रामाण्य उप शीतो’।
खुद की निंदा करना, खुद को हीन मानना ये संस्थागत है, या फिर जैविक दुर्गुण या फिर कुछ और?
जिन लोगों के पास आत्मविश्वास की कमी होती है, वही लोग ऐसा करते हैं। ये दुर्गुण है। इसीलिए तो ऐसे लोग कहते हैं कि हिन्दूइज्म में ये नहीं है। मैं ये नहीं मानता, वो नहीं मानता। ऐसे लोग मानसिक तौर पर विकृति के शिकार हैं। जिन लोगों में आत्मविश्वास होता है, वो कहते हैं कि प्रमाण के बिना मुझे स्वीकार नहीं है। शंकराचार्य और श्रीकृष्ण जैसे हिन्दू। संघ के अंदर भी हम ये सीखते हैं कि अगर कोई चीज चलती आ रही है और इसलिए उसे स्वीकार किया जाए। इसके लिए तैयार नहीं हैं हम। गुरुजी गोलवलकर ने पुणे में एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि अगर अस्पृश्यता कोई पाप नहीं है तो इससे बड़ा कोई और पाप नहीं है।
इतने बुद्धिजीवियों से भरे होने के बाद भी क्या संघ पीआर में कमजोर पड़ गया?
जिस पुस्तक का जिक्र आपने किया, उसका नाम है ‘फिलोसॉफी एंड एक्शन ऑफ आरएसएस फॉर हिन्दू स्वराज’ इसका शीर्षक पादरी एंथनी एंलेंजमेकम है। वो अर्नाकुलम के पास के रहने वाले थे। वो बचपन से ही बुद्ध, जैन, हिन्दू, ईसाई आदि का उन्होंने काफी अध्ययन किया था। एंथनी ने 50 से अधिक किताबें लिखी, जिसमें से अधिकतर हिन्दुत्व के ऊपर लिखी हैं। अपने 35 साल की उम्र में उन्होंने उपरोक्त किताब लिखा था। इसमें उन्होंने आरएसएस के दर्शन और कृति का जिक्र किया। आइडियोलॉजी शब्द का इस्तेमाल तक नहीं किया। क्योंकि टर्म्स हमेशा महत्व रखते हैं। ये समझने की बात है कि नरैटिव वॉर में टर्म्स ही मैटर करते हैं। इस किताब को लिखने के पीछे बड़ा कारण है कि 1945 में महात्मा गांधी ने नेहरू जी को एक पत्र लिखा, जिसमें कहा गया कि अंग्रेजों ने तय किया है भारत समेत कई देशों को स्वतंत्र करने का।
गांधी जी ने अपने पत्र में कहा कि अब ये हमारी ड्यूटी है कि हम भारत के भविष्य के बारे में सोचें। गांधी के पत्र के जबाव में नेहरू ने जबावी पत्र लिखा, “बापू आपने जो बताया है, उसे मैंने पहले ही हिंद स्वराज में पढ़ा है। आपने कहा कि गांव के साथ भारत आगे बढ़ सकता है, लेकिन मेरी सोच ऐसी नहीं है। क्योंकि गांव एक पिछड़ेपन का स्थान है। गांवों को खत्म करके इनका शहरीकरण करना होगा। अगर आप हिन्दू स्वराज की बात कर रहे हैं तो कांग्रेस ने कभी भी इसे नहीं अपनाया।”
एंथनी चूंकि एक गांधीवादी थे, इसलिए उनके मन में बड़ी चोट लगी थी। उन्होंने अध्ययन किया और तब उन्हें पता चला कि गांधी जी के हिन्दू स्वराज को अगर कोई सच्चे अर्थों में लागू कर सकता है तो वो है आरएसएस। एंथनी ने 1951 में ही कांग्रेस को लेकर लिखा था कि ये पार्टी अपनी मृतशैय्या पर है। कम्युनिज्म भी नहीं रहेगा। प्स्यूडो सेक्युलरिज्म शब्द का सबसे पहले प्रयोग भी एंथनी ने ही किया था।
रही बात प्रचार की तो संघ शुरू से ही प्रचार के पीछे नहीं भागा। अगर संघ के पीछे भागता तो संघ इतना बड़ा नहीं होता। संघ के ही कुछ लोगों ने नागपुर में आकर गुरूजी से कहा था कि अगर संघ राजनीतिक और प्रचार पर फोक्स नहीं करता है तो ये समाप्त हो जाएगा। तब गुरूजी ने कहा था कि अगर संघ खत्म हो गया तो इसे जीरो से खड़ा करेंगे। डॉ हेडगेवार हमेशा कहते थे कि काम आगे जाने दो, बात पीछे रहने दो।
















