जिन्ना के देश की हर हरकत से उसकी शैतानी मंशाएं साफ झलक जाती हैं। जनरल असीम मुनीर द्वारा खुद को फील्ड मार्शल बना लिए जाने से लेकर ताजा हरकत तक उसका हर कदम या निर्णय उसके दिमाग में पल रही भारत विरोधी नफरत को पुष्ट करने वाला होता है। जिन्ना के देश ने कल अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रमुख जनरल माइकल कुरिल्ला को निशान-ए-इम्तियाज (सेना) से सम्मानित किया है। यह उनकी नजर में एक दोधारा कूटनीतिक कदम है, जो न केवल अमेरिका के साथ संबंधों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश है, बल्कि आगामी फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) बैठक से पहले खुद को अंतरराष्ट्रीय मंच पर बेदाग और ‘आतंकवाद विरोधी’ दिखाने की सोची—समझी रणनीति भी है।
FATF की अगली बैठक इस साल सितंबर-अक्तूबर में होने जा रही है। इस बैठक से पहले पाकिस्तान पर फिर से ग्रे-लिस्ट में डाले जाने का खतरा मंडरा रहा है। भारत ने पहलगाम आतंकी हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान के खिलाफ मजबूत सबूत तैयार किए हैं। लेकिन जिस टीआरएफ को पहले वह पहलगाम में ‘बेदाग’ साबित करने और जिहादी हाफिज सईद पर लगाम लगने की दुहाइयां दे रहा था अब टीआरएफ को दबी जबान में आतंकवादी गुट बता रहा है। लेकिन अब भी यह स्वीकार नहीं कर रहा है कि पहलगाम हमले में उसका हाथ था। ऐसा वह कर भी नहीं सकता, क्योंकि फिर वह ‘जिहादी राज्य’ के नाते सबके सामने उघड़ जाएगा। कारण यह कि जिस लश्करे तैयबा का पैदा किया टीआरएफ है उसका सरगना कथित रूप से पाकिस्तानी सेना की खुफिया एजेंसी आईएसआई की सुरक्षा में रह रहा है।
उधर अमेरिका FATF का संस्थापक सदस्य है और उसकी नीति निर्धारण प्रक्रिया में अमेरिकी नीतिकारों की अहम भूमिका रहती है। ऐसे में पाकिस्तान का अमेरिकी जनरल को यह सम्मान बेशक अमेरिका के राष्ट्रपति की नजर में चढ़ने की कोशिश के तौर पर देखी जा रही है। निशाने-इम्तियाज (सेना) पाकिस्तान का सर्वोच्च सैन्य सम्मान है, जो आमतौर पर देश के लिए असाधारण योगदान देने वाले सैन्य अधिकारियों को दिया जाता है। जनरल कुरिल्ला वही अमेरिकी सेनाधिकारी है जिसने आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान को ‘शानदार साझेदार’ बताया था और गत जून माह में कहा था कि अमेरिका को भारत और पाकिस्तान, दोनों से संबंध रखने चाहिए। भारत ने फौरन इस बयान की कड़ी निंदा की थी।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रमुख को सम्मानित करना पाकिस्तान की अक्षम सेना को अमेरिकी सैन्य ढांचे से जोड़ने की एक कोशिश है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसा करके वह खुद को अफगानिस्तान-पश्चिम एशिया गलियारे में एक अहम लॉजिस्टिक और इंटेलिजेंस साझेदार के रूप में पेश करने की मंशा पाले है।
सब जानते हैं, पिछले दिनों पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर और विदेश मंत्री इशाक डार ने अमेरिका जाकर राष्ट्रपति ट्रंप और अन्य नेताओं से मुलाकात की थी। वहां उन्हें कथित तौर पर खूब फटकार सुननी पड़ी थी। जनरल कुरिल्ला को यह सम्मान देकर पाकिस्तान शायद अमेरिका और उसके राष्ट्रपति के चढ़े पारे को उतारना चाहता है। जिन्ना को देश चाहता है कि ट्रंप प्रशासन के साथ उसके बिगड़े संबंध पटरी पर आ जाएं और देश चलाने को अमेरिका से फिर से मोटा पैसा मिलना शुरू हो जाए।

इतना ही नहीं, राष्ट्रपति ट्रंप के हाल के कुछ बयान, वे चाहे टैरिफ को लेकर हों या वीजा के नियमों को लेकर, भारत के लिए सुभीते नहीं कहे जा सकते हैं। ट्रंप ने अमेरिकी कंपनियों को मना किया है कि भारत में नौकरियां न दें। इस स्थिति पर जिन्ना का देश खुश होकर शायद चाहता है कि ट्रंप उसके साथ तालमेल बढ़ाएं और आतंकवाद के प्रायोजक उस देश को FATF और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे मंचों पर राहत दिलाएं।
एफएटीएफ में बेशक जिन्ना का देश यह दिखाना चाहता है कि वह ‘आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका के साथ मिलकर काम कर रहा है’। जनरल कुरिल्ला को सम्मानित करना ऐसी ही फर्जी छवि को गढ़ने की कोशिश के अलावा और कुछ नहीं हो सकता। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि जिन्ना का देश अंदर ही अंदर घबराया हुआ है कि भारत द्वारा प्रस्तुत स्पष्ट और पुख्ता सबूतों के आधार पर उसे फिर से FATF की ग्रे-लिस्ट में डाला जा सकता है। ऐसे में अमेरिका का समर्थन उसके लिए बहुत सहायक हो सकता है।

















