बांग्लादेश: वापस लिया गया महिला ड्रेस को लेकर जारी “तालिबानी” फतवा, लेकिन क्या यह प्रयोग था?
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बांग्लादेश: वापस लिया गया महिला ड्रेस को लेकर जारी “तालिबानी” फतवा, लेकिन क्या यह प्रयोग था?

बांग्लादेश में धीरे-धीरे ही सही वह सब हो रहा है, जो तालिबानी शासन में हुआ था और हो रहा है। या फिर यह भी कहा जा सकता है कि अभी यह प्रयास हो रहे हैं कि देखा जाए कि जनता कितनी कट्टरपंथी सोच झेलने के लिए तैयार है?

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Jul 26, 2025, 12:19 pm IST
inविश्व

बांग्लादेश में धीरे-धीरे ही सही वह सब हो रहा है, जो तालिबानी शासन में हुआ था और हो रहा है। एक समय में क्रांति और साहित्य का गढ़ कहे जाने वाले बांग्लादेश में अब वस्त्रों को लेकर नियम कानून लागू करने के प्रयास हो रहे हैं। या फिर यह भी कहा जा सकता है कि अभी यह प्रयास हो रहे हैं कि देखा जाए कि जनता कितनी कट्टरपंथी सोच झेलने के लिए तैयार है?

बांग्लादेश में इस माहौल को लेकर मुस्लिम महिलाएं भी खौफजदा हैं। वे महिलाएं भी दहशत में हैं, जो शेख हसीना को अपदस्थ करने के अभियान में शामिल थीं। जिन्होंने शेख हसीना के खिलाफ आंदोलन चलाया था, अब उन्हीं महिलाओं पर यूनुस सरकार दबाव बना रही है। पहले महिला आयोग की सिफारिशों को रोका गया, उससे पहले महिला फुटबॉल गेम्स रोके गए थे और उससे भी पहले लड़कियों के साथ सार्वजनिक स्थलों पर हिजाब न पहनने को लेकर दुर्व्यवहार की भी घटनाएं सामने आई थीं। अब एक नया फतवा जारी हुआ था।

यह फतवा बांग्लादेश के सेंट्रल बैंक की ओर से जारी किया गया कि कर्मचारी और विशेषकर महिलाएं “मॉडेस्ट अर्थात शालीन एवं पेशेवर कपड़े पहनकर आएं”। बैंक के एचआर विभाग ने यहां तक चेतावनी दे दी थी, जो भी इस फतवे को नहीं मानेगा, उसके खिलाफ कड़े कदम उठाए जाएंगे।

मजहबी कट्टरपंथी ड्रेस कोड

बांग्लादेश में इस फतवे के बाद सोशल मीडिया पर उबाल आ गया। लोगों ने सोशल मीडिया पर सरकार को लताड़ना आरंभ कर दिया। यह पूरी तरह मजहबी कट्टरपंथी ड्रेस कोड ही था। इस ड्रेस कोड को ही कथित शालीन कपड़ों की आड़ में कट्टरपंथी मजहबी सरकारें लागू करती हैं। जैसे अफगानिस्तान में शालीन कपड़ों की आड़ में मुस्लिम महिलाओं को पूरी तरह से घरों में कैद कर दिया गया।

पहला कदम महिलाओं के कपड़ो को लेकर

हाल ही में सीरिया में असद सरकार के गिरने के बाद जो कथित क्रांतिकारी सरकार आई उसने अल्पसंख्यकों पर अत्याचार करने के बाद सबसे पहला कदम महिलाओं के कपड़ों पर ही उठाया और बुर्किनी जैसे कपड़ों को समुद्र तट पर पहनने के लिए कहा।

महसा अमीन ने किया था विरोध

ईरान में तो शालीनता की परिभाषा में यहां तक सनक है कि लड़कियों का सिर खुला रहना ही नहीं चाहिए। लड़कियों पर नजर रखने के लिए मॉरल पुलिस है, न जाने कितने कानून और नियम हैं। महसा अमीन का मामला सभी को पता ही होगा और उसके बाद जिस प्रकार से “शालीन” कपड़ों के खिलाफ जो आंदोलन खड़ा हुआ, उसने ईरान की कट्टरपंथी सरकार के पसीने छुड़वा दिए।

ईरान में लड़कों ने भी आवाज उठाई

ईरान में लड़कियों के साथ ही लड़कों ने भी आवाज उठाई और सैकड़ों लोगों को फांसी दे दी गई थी और यह अभी तक जारी है। यह सब मॉडेस्ट की ही आड़ में हो रहा है। बांग्लादेश में लगातार ही कट्टरता बढ़ रही है और यह कट्टरता सबसे पहले हिन्दू, बौद्ध जैसे अल्पसंख्यकों और उसके बाद महिलाओं पर ही अपना कहर ढाती है। मगर बांग्लादेश को लेकर एक सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि वर्तमान में एक अंतरिम सरकार शासन में है, अर्थात वह चुनी हुई सरकार नहीं है।

बांग्लादेश में जो सरकार चुनकर आई थी, उसे हटाकर एक अंतरिम सरकार का गठन किया गया। ऐसे में लोग यह बातें कर रहे हैं कि क्या एक अंतरिम सरकार ऐसे कदम उठा सकती है? या फिर वह केवल कट्टरपंथी ताकतों के हाथों की कठपुतली है। ये कट्टरपंथी ताकतें महिलाओं को सार्वजनिक स्थानों से बाहर करना चाहती हैं? मगर मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार और भी ऐसे कदम उठा रही है, जो लोकतंत्र की आजादी का गला घोंटने के लिए पर्याप्त है।

सरकारी कर्मचारी नहीं उठा सकते अपनी उचित मांगें

जहां महिलाओं के ड्रेस कोड को लेकर तो बांग्लादेश के बैंक का फतवा वापस ले लिया गया है, परंतु एक और फतवा मोहम्मद यूनुस की सरकार द्वारा जारी हुआ है। यह फतवा एक अध्यादेश के रूप में सामने आया है, जिसके अनुसार अब सरकारी कर्मचारी सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन नहीं कर सकते हैं।

क्या लिखा है अध्यादेश में

यह अध्यादेश गवर्नमेंट सर्विस एक्ट 2018 का संशोधन है। रिपोर्ट्स के अनुसार बुधवार को जारी किये गए इस अध्यादेश पर विधि मंत्रालय के विधायी एवं संसदीय कार्य प्रभाग के सचिव हाफिज अहमद चौधरी के हस्ताक्षर थे। इसमें लिखा है कि यदि कोई सरकारी कर्मचारी किसी अन्य को काम न करने के लिए प्रोत्साहित करता है या मजबूर करता है, तो उसे कदाचार के लिए दंडित किया जा सकता है, जैसे कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति या बर्खास्तगी। इस नियम के बाद लोगों को यह डर है कि अब सरकारी कर्मचारी अपनी जायज मांगों को भी उठाने में सफल नहीं होंगे।

हड़ताल और प्रदर्शन पर प्रतिबंध

हालांकि इस अध्यादेश में आंदोलन जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया है, मगर यह स्पष्ट हो जाता है कि हड़ताल, प्रदर्शन, और कदम उठाने के लिए एकत्र होने जैसे कदमों को इस कानून में प्रतिबंधित किया गया है। अब इसके परिणाम स्वरूप सरकारी कर्मचारियों की कोई भी मांग और संगठित आंदोलन—चाहे वह कितना भी न्यायसंगत या संवैधानिक रूप से आधारित क्यों न हो—उस पर अनिवार्य रूप से दबाने के लिए कदम उठाए जाएंगे। नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने यह राय व्यक्त की है कि इस नए कानून ने सरकारी कर्मचारियों के संगठित होने और उचित मांगें रखने के रास्ते को प्रभावी रूप से बाधित कर दिया है।

Topics: बांग्लादेश में अंतरिम सरकारinterim government in Bangladeshबांग्लादेशयूनुस सरकारतालिबानी शासनड्रेस कोड फतवाकट्टरपंथी सोचसार्वजनिक स्थानों पर हिजाब विवाद
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