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Analysis : जल आपदा की त्रासदी और समाधान की राह

जल संकट, बाढ़ और सूखे की त्रासदी का समाधान है वर्षाजल संचयन। जानिए सरकार की योजनाएं, विशेषज्ञों की राय और पारंपरिक जल संस्कृति की भूमिका।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Jul 3, 2025, 08:04 pm IST
inविश्लेषण, पर्यावरण
Uttarakhand water crisis

प्रतीकात्मक तस्वीर

हमारी जल पूजक सनातन संस्कृति में नदी, कुआं, पोखर व तालाबों का पूजन हमारी सदियों पुरानी परम्परा है। वैदिक युग से लेकर बीसवीं सदी के अर्द्ध शतक तक हमारे देश में जलस्रोतों के संरक्षण व संवर्धन की एक अति उन्नत संस्कृति विकसित थी। पहले देश के हर गाँव व कस्बे में ही नहीं, छोटे शहरों और दिल्‍ली, मुंबई, चेन्‍नई और बेंगलुरु जैसे महानगरों में भी पर्याप्त कुएं, तालाब, पोखरे और बावड़ी हुआ करती थीं किन्तु आजादी के बाद अनियोजित औद्योगिक विकास और शहरों के बेतरतीब फैलाव से अधिकतर परम्परागत जलस्रोत पटते चले गये और उन पर कंक्रीट के जंगल खड़े होते गये।

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बीते कुछ दशकों में सूखे और बाढ़ के कारण देशभर में गहराता जा रहा जल संकट इसी का दुष्परिणाम है। हाँ! यह सच है कि सूखा और अतिवृष्टि की प्राकृतिक आपदाएं प्राचीन काल में भी आती थीं। धर्मशास्त्र और इतिहास दोनों ही इस बात की पुष्टि करते हैं लेकिन आज की परिस्थितियां भिन्न हैं। माँ प्रकृति के अतिशय दोहन का कुफल ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन, तेजी से पिघलते ग्लेशियरों और अनियंत्रित वर्षाचक्र के रूप में हम सबके सामने है। यही वजह है कि सूखे और बाढ़ की प्राकृतिक आपदाएं अब महज प्राकृतिक आपदा नहीं वरन मानवीय आपदाएं बनती जा रही हैं। हमारी विलासी जीवनशैली और परम्परागत जलस्रोतों के तेजी से विलुप्तिकरण से भूजल लगातार गिरता जा रहा है। एक ओर साल-दर-साल ग्रीष्म ऋतु में उपलब्ध जल-संसाधनों पर भारी दबाव से स्थितियां लगातार गंभीर होती जा रही हैं, वहीं बाढ़ की विभीषिका भी प्रति वर्ष विकराल रूप लेती जा रही है।

आपदा के प्रमुख कारण

पर्यावरण विज्ञानियों की मानें तो ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परवर्तन के अलावा अतिवृष्टि की इस भयावह आपदा का सबसे बड़ा कारण नदी तल और नदियों के प्रवाह क्षेत्रों में बड़ी संख्या में मानव बसावट, अंधाधुंध वन कटाव, अवैज्ञानिक रासायनिक कृषि तथा प्राकृतिक अपवाह तंत्रों का अवरुद्ध होना है। इन कारणों के फलस्वरूप बाढ़ की तीव्रता, परिमाण और विध्वंसता बढ़ जाती है। केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है कि बीते छह दशक में बाढ़ से 205.8 करोड़ लोग प्रभावित हुए हैं। 2.02 लाख करोड़ रुपए की संपत्ति और 1.09 लाख करोड़ की फसलों का नुकसान हुआ है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक बाढ़ से हर साल औसतन 1,654 लोगों के अलावा 92,763 पशुओं की मौत हो जाती है। इन दिनों समूचा देश अतिवृष्टि की त्रासदी से जूझ रहा है। देश की सभी प्रमुख नदियां उफान पर हैं। पहाड़ टूट रहे हैं और सड़कें बह रही हैं। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में जनजीवन अस्त-व्यस्त है। बाजार के बाजार डूब रहे हैं। लोगों के पास खाने-पीने का सामान तक नहीं है। हिमाचल व उत्तराखंड के हालात बेहद चिंताजनक हैं।

क्या कहते हैं आपदा प्रबंधन विशेषज्ञ

आपदा प्रबंधन के विशेषज्ञ कहते हैं कि बीते कई वर्षों से बाढ़ से नुकसान लगातार बढ़ रहा है। इसकी बड़ी वजह है कि डूब क्षेत्र में आने वाले इलाकों में आर्थिक गतिविधियां बहुत अधिक बढ़ गयी हैं और इंसानी बस्तियां भी बस गयी हैं। इससे नदियों के डूब क्षेत्र में आने वाले लोगों के बाढ़ का शिकार होने की आशंका साल-दर-साल बढ़ती जा रही है। अगर हम नदियों के प्राकृतिक बहाव के मार्ग को अवरुद्ध न होने दें तो इसमें भी बाढ़ की समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। इस दिशा में सरकारी तंत्र को विशेष सजगता बरतने की जरूरत है। साथ ही अतिवृष्टि की आपदा पर नियंत्रण के लिए बाढ़ के पूर्वानुमान तथा चेतावनी नेटवर्क को रिमोट सेंसिंग टेक्नोलाजी अधिक मजबूत बनाना जरूरी है। यही नहीं, तटबंध के कटाव रोकने, जल निकास तंत्र का पुनर्नवीकरण, जल निकास तंत्र में सुधार, वाटर-शेड प्रबंधन तथा मृदा संरक्षण के उपायों को बेहतर बनाने की जरूरत है। एक ऐसे संचार तंत्र का निर्माण करना होगा जो बाढ़ के दौरान भी कार्य कर सके।

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बाढ़ नियंत्रण के लिए राज्य स्तर पर प्रशिक्षण संस्थान स्थापित कर स्थानीय स्तर पर लोगों को बाढ़ के समय किए जाने वाले उपायों के बारे में प्रशिक्षित कर इस आपदा से होने वाली क्षति को कम किया जा सकता है। वर्षा जल संचयन तकनीक के विशेषज्ञ डॉ. शेखर राघवन कहते हैं कि छतो पर रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना हर देशवासी अपना नैतिक कर्तव्य बनाये और परम्परागत जल स्रोतों के संरक्षण को जनांदोलन बनाये। बकौल डॉ. राघवन बारिश के पानी का सबसे बेहतर इस्‍तेमाल करने के मामले में आज ब्राजील सबसे आगे है। ब्राजील के बाद सिंगापुर, चीन, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों का नंबर आता है, जहां घरों से लेकर जलाशयों तक में बारिश के पानी का बेहतरीन तरीके से इस्‍तेमाल किया जा रहा है। हमारे देश को भी सामूहिक प्रयास से इस दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत है, तभी हम भविष्‍य में होने वाले जल युद्ध को रोक पाएंगे।

वर्षाजल संचयन के सरकारी प्रयास

वर्षाजल संचयन को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार द्वारा कई योजनाएं चलायी जा रही हैं। इनमें जलशक्ति मंत्रालय के ‘’कैच द रेन’’ अभियान के तहत ‘रेन वाटर हार्वेस्टिंग’ सिस्टम को बढ़ावा देना तथा ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर ‘अमृत सरोवरों’ की स्थापना प्रमुख है। ज्ञात हो कि जल संकट की चुनौतियों से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने आजादी के अमृत महोत्सव के तहत वर्ष 2022 में ग्रामीण विकास मंत्रालय के तत्वावधान में इस मिशन की शुरुआत की थी। 15 अगस्त 2023 तक 50 हजार सरोवर बनाने का लक्ष्य रखा गया था। मगर इस दिशा में लक्ष्य से काम हुआ है। आंकड़ों के अनुसार अप्रैल 2025 तक देश में 68 हजार से अधिक अमृत सरोवरों के जरिए विभिन्न क्षेत्रों में सतही एवं भूजल की उपलब्धता में अपेक्षित वृद्धि हुई है।

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सूखे कुएं, खाली हैंडपंप एवं आग उगलती धरती की पहचान अब जल संरक्षण की बनने लगी है। इसी तरह वर्ष 2020 से देश के सात राज्यों-हरियाणा, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश  में लागू अटल भूजल योजना जल संकटग्रस्त क्षेत्रों में भूजल प्रबंधन पर केंद्रित है। अमृत 2.0 योजना शहरी क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देती है। जबकि प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना जल उपयोग दक्षता में सुधार और सिंचाई के तहत कृषि योग्य क्षेत्रों का विस्तार करने पर केंद्रित है। कई राज्य सरकारों ने भी वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देने के लिए अनेक योजनाएं शुरू की हैं। जैसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश के करीब 34,000 सरकारी व अर्द्ध सरकारी भवनों में ‘रूफ टॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम’ स्थापित किये गये हैं। योगी सरकार का लक्ष्य है कि अगले दिनों प्रदेश के सभी 2 लाख 35 हजार सरकारी एवं अर्द्ध सरकारी भवनों को वर्षा जल संचयन प्रणाली से युक्त किया जाए। इसी तरह राजस्थान में मुख्यमंत्री ‘जल स्वावलंबन अभियान’ और महाराष्ट्र में ‘जलयुक्त शिवार’। इन योजनाओं का मूल उद्देश्य वर्षाजल का संचयन, भूजल का पुनर्भरण और जल की गुणवत्ता में सुधार लाना है।

Topics: भारत में जल संकटवर्षाजल संचयनबाढ़ का कारणजलवायु परिवर्तन भारतCatch the Rain अभियानअटल भूजल योजनारेन वाटर हार्वेस्टिंग इंडियाग्लोबल वार्मिंग और सूखाजल संरक्षणभारत में बाढ़ आपदाअमृत सरोवर योजनाजल प्रबंधन योजनाएं
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