इन दिनों अखिल विश्व गायत्री परिवार देश-विदेश में ज्योति कलश यात्राएं निकाल रहा है। ये यात्राएं गायत्री परिवार के संस्थापक पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा प्रज्ज्वलित अखंड ज्योति के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में निकल रही हैं। बता दें कि आचार्यश्री ने आवलखेड़ा (आगरा) में 1926 की वसंत पंचमी पर एक अखंड ज्योति प्रज्ज्वलित की थी। 1971 में यही ज्योति हरिद्वार स्थित शांतिकुंज लाई गई। यह ज्योति 1926 से लगातार जल रही है। इसके सामने कम से कम एक देव कन्या (कुमारी कन्या) 24 घंटे साधनारत रहती है। आचार्यश्री की सहधर्मिणी भगवती देवी शर्मा, जिन्हें वंदनीया माता जी के नाम से जाना जाता है, ने इस ज्योति से देव कन्याओं को जोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई थी। 2026 में उनका भी शताब्दी वर्ष मनाया जाएगा। इन दोनों अवसरों को देखते हुए पूरा गायत्री परिवार ज्योति यात्राओं को सफल बनाने में जुटा है। इन यात्राओं की पूर्णाहुति 2026 की वसंत पंचमी को हरिद्वार में होगी।
गायत्री परिवार के प्रमुख डॉ. प्रणव पंड्या बताते हैं, “90 से अधिक देशों में विस्तारित 15 करोड़ की सदस्य संख्या वाले अखिल विश्व गायत्री परिवार का विस्तार जिन आधारों पर हुआ है; उनमें इन दोनों आधारों (अखंड दीप और वंदनीया माता जी) की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। इन आधारों को और बल देने और सनातन संस्कृति को जन-जन तक पहुंचाने के लिए 2024 से ही अखंड ज्योति यात्राएं निकाली जा रही हैं।”
भारत में अब तक उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा में ज्योति कलश यात्राएं निकल चुकी हैं। वहीं लातविया, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, रूस, अमेरिका, कनाडा, सिंगापुर, मलेशिया, थाइलैंड, वियतनाम, दुबई आदि कई देशों में यात्राएं निकल चुकी हैं और कई जगह तैयारी चल रही है। ये यात्राएं सनातन संस्कृति की ज्ञानधारा को प्रवाहित करने और युगऋ षि के क्रांतिकारी विचारों को जन-जन तक पहुंचाने में अभूतपूर्व भूमिका निभा रही हैं। उल्लेखनीय है कि 7 सितंबर, 2024 को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने शांतिकुंज में ज्योति कलश यात्रा का उद्घाटन किया था। उस समय उन्होंने गायत्री परिवार के इस अभियान की मुक्त कंठ से सराहना करते हुए इसे भारतीय संस्कृति के उन्नयन की दिशा में अभूतपूर्व कदम बताया था।

हटेगा वैचारिक अंधकार
गायत्री तीर्थ शांतिकुंज के तत्वावधान में निकलने वाली इन ज्योति कलश यात्राओं के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए देव संस्कृति विश्वविद्यालय के उप कुलपति डॉ. चिन्मय पंड्या कहते हैं, “विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़े वर्तमान के विषम वैश्विक परिवेश में लोगों के घरों से लेकर मनों तक जो वैचारिक अंधकार फैला हुआ है, उसे परास्त करने के लिए सद्विचारों की ज्योति जलाना युगधर्म है।
ऋ षियुग्म के तप, त्याग व तितिक्षा की साक्षी अखंड ज्योति के दिव्य प्रकाश को जन-जन तक पहुंचाने के लिए ये ज्योति कलश यात्राएं निकाली जा रही हैं। इन यात्राओं का लक्ष्य लोगों का भावनात्मक नवनिर्माण करना है। हम स्वयं जागें और 100-100 को जगाकर पावन गुरुसत्ता को सार्थक श्रद्धांजलि दें, यही इन ज्योति कलश यात्राओं का लक्ष्य है। इस अभियान के अंतर्गत शांतिकुंज के तत्वावधान में समय, श्रम व अंशदान के द्वारा घर-घर यज्ञ एवं सुसंस्कारों के बीजारोपण की जो परंपराएं चलायी जा रही हैं; उन्हें नई गति देना है। युगऋ षि का संदेश गांव-गांव में पहुंचाना है। साथ ही नशा निवारण, वृक्षारोपण, कुरीति उन्मूलन, स्वच्छता अभियान को प्रभावशाली ढंग से कार्यान्वित करने के साथ ही युवाओं को सृजनात्मक कार्य से जोड़ने और वनवासी क्षेत्रों में कन्वर्जन रोकने की गतिविधयों को तीव्र गति देना है।”
मूल आधार हैं वंदनीया माताजी

वंदनीया माताजी भगवती देवी शर्मा ने जहां एक ओर युगद्रष्टा की सहधर्मिणी बनकर कुशल संगठक के रूप में गायत्री परिवार की बागडोर संभाली थी; वहीं उन्होंने नारी जागरण आंदोलन द्वारा नारियों को मूढ़ मान्यताओं से बाहर निकाल उन्हें वैदिक कर्मकांड परंपरा में दीक्षित कर ‘ब्रह्मवादिनी’ बनाया था। यह माताजी का प्रबल पुरुषार्थ ही था कि आज गायत्री परिवार की लाखों नारियां देश-विदेश की भूमि से यज्ञ संस्कारों का सफल संचालन कर रही हैं। यही नहीं, बीती सदी में 26 अश्वमेध महायज्ञों का सफल आयोजन कर उन्होंने जिस तरह सभी मतों, जातियों के लोगों को एक मंच पर लाकर भारतीय संस्कृति का शंखनाद किया, उसे निःसंदेह अभूतपूर्व ही कहा जाएगा।
शांतिकुंज का सिद्ध अखंड दीप
वेदशास्त्रों में उल्लेख आता है कि यदि गोमाता के घृत से कोई दीपक लगातार 24 वर्ष तक जलता रहे तो वह स्वतः ही सिद्ध हो जाता है और ऐसे सिद्ध दीपक के दर्शन मात्र से ही जन्म-जन्मान्तरों के पापों का नाश हो जाता है। ऐसा ही एक सिद्ध अखंड दीपक हरिद्वार स्थित गायत्री तीर्थ शांतिकुंज में जल रहा है। गायत्री के साधकों का अटूट विश्वास है कि इस दीपक के सामने खड़े होकर केवल 11 बार गायत्री मंत्र का जप करने से जटिल से जटिल समस्याओं का समाधान सहज ही हो जाता है। ज्ञातव्य है कि 1926 में गोघृत से प्रज्ज्वलित इस सिद्ध अखंड दीपक के सामने बैठकर स्वयं आचार्यश्री ने सवा-सवा लाख के गायत्री महामंत्र जप के 24 महापुरश्चरणों का महाअनुष्ठान संपन्न किया था। आचार्यश्री कहा करते थे कि यह अखंड दीप कोई सामान्य दीपक नहीं, वरन् गायत्री तीर्थ शांतिकुंज की आत्मा है, जिसकी दिव्य ज्योति में आद्यशक्ति वेदमाता गायत्री स्वयं निवास करती हैं।
डॉ. चिन्मय बताते हैं, “युग निर्माण योजना के अंतर्गत परम पूज्य गुरुदेव ने अपनी सूक्ष्मीकरण साधना में पांच वीरभद्र तैयार कर उन्हें पांच प्रमुख काम सौंपे थे-वायुमंडल का शोधन, वातावरण का परिशोधन, नवयुग का निर्माण, महाविनाश की संभावना का निरस्तीकरण और देवमानवों को जोड़ना। इनमें प्रथम चार कार्य को ऋ षिसत्ता स्वयं कर रही है मगर उनके शिष्य और अनुयायी होने के नाते हमें मात्र एक काम करना है- देवमानवों को जोड़ना। इन ज्योति कलश यात्राओं की सफलता के लिए मिशन की सक्रियता के पांच प्रमुख चरण हैं- ढूंढ़ना, मिलना, मिशन को समझाना, भाव जगाना और उनके साथ दो पग की यात्रा करना। इसके तहत हमें पांच प्रकार के परिजनों को ढूंढना है- विद्वान, धनवान, शक्ति संपन्न्, प्रतिभा संपन्न और भावनाशील।

इसके लिए सघन जनसंपर्क ही इन यात्राओं का मूल उद्देश्य है। इसके लिए प्रत्येक गायत्री परिजन के घर की अलग पहचान जरूरी है। उनके घर के प्रवेश द्वार पर सद्विचारों अथवा गायत्री मंत्र के बोर्ड या स्टिकर अथवा मशाल के चित्र लगे हों, ताकि उन घरों को देखकर ऐसा प्रतीत हो जैसे गुरुदेव-माताजी की दिव्य चेतना यहां निवास करती है। पूज्य गुरुसत्ता ने ब्रह्मकमल के ब्रह्मबीज संपूर्ण विश्व में बिखेरे हैं। हमारी जिम्मेदारी है कि उन बीजों को खोजने तथा उन तक खाद, पानी एवं धूप पहुंचाने की चिंता करें।

















