शिक्षा : नवाचार और अनुसंधान की राह
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नवाचार और अनुसंधान की राह

12वीं कक्षा में भौतिकी, रसायन और जीव विज्ञान के छात्रों लिए जेनेटिक्स इंजीनियरिंग में स्नातक पाठ्यक्रम में दाखिला एक अच्छा विकल्प। यह एक बहुआयामी पाठ्यक्रम है, जो नवाचार से लेकर अनुसंधान के क्षेत्र में कॅरियर को गति दे सकता है

Written byनागार्जुननागार्जुन
Jun 23, 2025, 03:12 pm IST
in भारत, विश्लेषण, शिक्षा, पर्यावरण

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 शिक्षा प्रणाली को 21वीं सदी की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने का एक दूरदर्शी कदम है। इसका उद्देश्य समग्र, लचीली और कौशल आधारित शिक्षा प्रदान करना है, जो भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाए। 5+3+3+4 संरचना नई शिक्षा नीति द्वारा प्रस्तुत एक नया शैक्षिक ढांचा है, जो पारंपरिक 10+2 शिक्षा प्रणाली का स्थान लेता है।

इसमें विभिन्न विकासात्मक चरण शामिल हैं, जैसे-आधारभूत शिक्षा के लिए 5 वर्ष, प्रारंभिक शिक्षा के लिए 3 वर्ष, मध्य शिक्षा के लिए 3 वर्ष और माध्यमिक शिक्षा के लिए 4 वर्ष। जेनेटिक इंजीनियरिंग में पाठ्यक्रम को भी नई शिक्षा नीति के तहत 3 या 4 वर्षीय स्नातक डिग्री के तौर पर डिजाइन किया गया है। यह जैव प्रौद्योगिकी का एक महत्वपूर्ण और तेजी से विकसित हो रहा क्षेत्र है। यह विज्ञान और प्रौद्योगिकी का ऐसा संगम है, जो चिकित्सा, कृषि, पर्यावरण और उद्योग जैसे क्षेत्रों में क्रांतिकारी बदलाव ला रहा है।

पाठ्यक्रम की संरचना

जेनेटिक इंजीनियरिंग में बीएससी जीव विज्ञान और प्रौद्योगिकी के सिद्धांतों पर आधारित है। यह पाठ्यक्रम छात्रों को जीन, डीएनए और अन्य आनुवांशिक सामग्रियों के परिवर्तन (मैनीपुलेशन) की तकनीकों में प्रशिक्षित करता है। इस पाठ्यक्रम का उद्देश्य छात्रों को जेनेटिक इंजीनियरिंग के वैज्ञानिक और नैतिक पहलुओं से परिचित कराना है, ताकि वे इस क्षेत्र में नवाचार और अनुसंधान में योगदान दे सकें।

कई विश्वविद्यालयों में जेनेटिक इंजीनियरिंग को बीएससी बायोटेक्नोलॉजी या बीएससी जेनेटिक्स के हिस्से के रूप में पढ़ाया जाता है। पाठ्यक्रम के दौरान छात्रों को सैद्धांतिक ज्ञान के साथ-साथ प्रयोगशाला कार्य और प्रोजेक्ट्स के माध्यम से व्यावहारिक अनुभव भी प्रदान किया जाता है। बीएससी जेनेटिक इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम में आमतौर पर निम्नलिखित विषय शामिल होते हैं-

आणविक जीव विज्ञान : यह जीव विज्ञान की वह शाखा है, जो कोशिकाओं के भीतर और उनके बीच जैविक गतिविधि के आणविक आधार का अध्ययन करती है। इसका मुख्य जोर जैव-आणविक संश्लेषण, संशोधन, तंत्र और अंतःक्रियाओं पर होता है। दूसरे शब्दों में, यह जानने की कोशिश करता है कि कोशिकाएं कैसे काम करती हैं, उनके भीतर क्या होता है, और ये प्रक्रियाएं कैसे नियंत्रित होती हैं।

आणविक जीव विज्ञान जैविक प्रक्रियाओं जैसे-डीएनए प्रतिकृति, आरएनए प्रतिलेखन और प्रोटीन संश्लेषण को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह बीमारियों के आणविक आधार को समझने में मददगार है, जिससे नए निदान व उपचार विकसित करने में मदद मिलती है। आणविक जीव विज्ञान जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपकरण है, जिसका उपयोग आनुवांशिक रूप से संशोधित जीवों, दवाइयों और अन्य उत्पाद बनाने और फसलों के उत्पादन व प्रतिरोधकता में सुधार के लिए किया जाता है।

प्रमुख छात्रवृत्तियां

  •  राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पोर्टल (NSP): मेधावी और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए।
  •  पात्रता : 10+2 में 60% से अधिक अंक, पारिवारिक आय ₹2.5 लाख प्रति वर्ष से कम।
  •  राशि : 10,000-50,000 रुपये प्रतिवर्ष।
  •  यहां करें आवेदन : www.scholarships.gov.in
  •  प्रधानमंत्री विद्या लक्ष्मी योजना : उच्च शिक्षा के लिए कम ब्याज दर पर ऋ ण।
  •  पात्रता : मान्यता प्राप्त संस्थानों में प्रवेश।
  • राशि: 4-10 लाख रुपये।
  •  यहां करें आवेदन : www.vidyalakshmi.co.in
  •  INSPIRE स्कॉलरशिप : विज्ञान और अनुसंधान में रुचि रखने वाले छात्रों के लिए।
  • पात्रता : 10+2 में शीर्ष 1% रैंक, विज्ञान स्ट्रीम।
  •  राशि : 80,000 रुपये प्रतिवर्ष।
  •  यहां करें आवेदन : www.online-inspire.gov.in

आनुवांशिकी (जेनेटिक्स) : इसमें जीन, वंशानुक्रम और आनुवंशिक विविधता का अध्ययन किया जाता है। जैसे-जीन और उनके कार्य तथा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में लक्षणों का संचरण कैसे होता है। यानी आनुवंशिक परीक्षण का उपयोग किसी व्यक्ति में बीमारी का निदान करने या यह निर्धारित करने के लिए किया जाता है कि क्या कोई व्यक्ति किसी बीमारी का वाहक है।

डीएनए तकनीक : इसे आनुवांशिक इंजीनियरिंग या पुनर्योगज डीएनए तकनीक (recombinant DNA technology) भी कहा जाता है। यह किसी जीव के जीनोम में वांछित लक्षणों वाले जीनों को प्रविष्ट कराकर एक नए प्रकार का डीएनए बनाने की तकनीक है। इसमें जीन क्लोनिंग (किसी विशिष्ट जीन की प्रतियां बनाना), पीसीआर (डीएनए के छोटे हिस्सों को बढ़ाना) और जीन एडिटिंग (जैसे CRISPR-Cas9) जैसी तकनीकों का उपयोग करके डीएनए में सटीक परिवर्तन करना, आदि का अध्ययन किया जाता है।

  • जैव प्रौद्योगिकी : जैविक प्रक्रियाओं का उपयोग करके उत्पादों और प्रौद्योगिकियों का विकास।
  •  जेनेटिक मैनीपुलेशन : डीएनए में परिवर्तन करके जीवों की विशेषताओं को संशोधित करना।
  •  माइक्रोबायोलॉजी : सूक्ष्मजीवों और उनके जेनेटिक संशोधन का अध्ययन।
  •  बायोइन्फॉरमैटिक्स : जेनेटिक डेटा का विश्लेषण करने के लिए कम्प्यूटेशनल टूल्स का उपयोग।
  •  नैतिकता और बायोसेफ्टी : जेनेटिक इंजीनियरिंग के नैतिक और सुरक्षा पहलू।
  •  डीएनए सीक्वेंसिंग : जीन की संरचना को समझने के लिए डीएनए के न्यूक्लियोटाइड अनुक्रम का निर्धारण।

जैव प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग

पिछले कुछ वर्षों में जैव प्रौद्योगिकी ने चिकित्सा, कृषि, आनुवंशिक इंजीनियरिंग सहित कई क्षेत्रों में अलग पहचान बनाई है-

चिकित्सा : जैव प्रौद्योगिकी चिकित्सा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके कारण दवाओं, टीकों, नैदानिक उपकरणों के विकास और उत्पादन में क्रांति आई है। इंसुलिन, इंटरफेरॉन, वृद्धि हारमोन, मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज, और स्टेम सेल थेरेपी जैसे महत्वपूर्ण उत्पादों, दवाओं और प्रोटीन के उत्पादन में इसका उपयोग हो रहा है। यह आनुवंशिक रोगों के उपचार और रोकथाम के लिए जीन थेरेपी और आनुवंशिक परीक्षण जैसी नई तकनीकों को भी सक्षम बनाती है। इसके अलावा, डीएनए फिंगरप्रिंटिंग जैसी तकनीकों के माध्यम से अपराध की जांच और अपराधियों की पहचान में भी जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जाता है। यहां तक कि कृत्रिम अंग बनाने और प्रत्यारोपण में भी इसका उपयोग किया जा सकता है।

कृषि : कृषि में जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग कई तरीकों से किया जाता है। इसमें जिसमें फसलों की पैदावार बढ़ाना, कीटों व रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित करना और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी फसलें उपजाना शामिल है। इसके अलावा, जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग पशु स्वास्थ्य और प्रजनन में सुधार के लिए भी किया जाता है।

पर्यावरण :
जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग पर्यावरण संरक्षण और सुधार में भी किया जा रहा है, जैसे- प्रदूषण नियंत्रण, अपशिष्ट प्रबंधन और जैव ईंधन या नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन। बायोरेमेडिएशन एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें सूक्ष्मजीवों जैसे- बैक्टीरिया और कवक का उपयोग करके दूषित मिट्टी, पानी और हवा को साफ किया जाता है। पर्यावरण संरक्षण के अलावा इसका उपयोग पर्यावरण निगरानी के लिए भी किया जाता है, जैसे-प्रदूषण स्तर को मापना और हानिकारक जीवों की मौजूदगी का पता लगाना। कुछ सूक्ष्मजीवों में प्लास्टिक, तेल को तोड़ने या इसे ऊर्जा स्रोत के रूप में उपयोग करने की क्षमता होती है, जो समुद्री तेल रिसाव के बाद सफाई में मददगार होते हैं।

 

कहां लें दाखिला?

देश के शिक्षण संस्थानों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के तहत पाठ्यक्रमों को नियमित रूप से अपडेट किया जा रहा है और जेनेटिक इंजीनियरिंग के लिए विशेष मॉड्यूल्स जोड़े जा रहे हैं। साथ ही, नई नीति ने पाठ्यक्रम में प्रवेश प्रक्रियाओं को एकीकृत और पारदर्शी बनाने के लिए Common University Entrance Test (CUET) को अनिवार्य किया है। कुछ निजी संस्थान अलग से भी प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करते हैं, जबकि कुछ अंकों के आधार पर प्रवेश देते हैं। इसके लिए 10+2 में न्यूनतम 50-60 प्रतिशत अंक आवश्यक हैं।

देश के कुछ प्रमुख संस्थान, जहां जेनेटिक इंजीनियरिंग/बायोटेक्नोलॉजी की पढ़ाई होती है, उनमें आईआईटी दिल्ली-मद्रास-खड़गपुर के अलावा बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस (BITS) पिलानी में जेनेटिक इंजीनियरिंग मुख्य रूप से बी.ई. बायोटेक्नोलॉजी प्रोग्राम के अंतर्गत पढ़ाई जाती है। इसमें दाखिले के लिए ऑनलाइन प्रवेश परीक्षा (BITSAT) आयोजित की जाती है, जिसमें अभ्यर्थी का भौतिकी, रसायन, गणित/जीव विज्ञान में न्यूनतम 75 प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण होना आवश्यक है।

इसके अतिरक्त भी कुछ प्रमुख संस्थान हैं, जहां छात्र दाखिला ले सकते हैं, जैसे-
एसआरएम इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी – चेन्नई स्थित एसआरएमआईएसटी देश के अग्रणी संस्थानों में से एक है, जहां 4 वर्षीय जेनेटिक इंजीनियरिंग में उच्च गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और शोध की सुविधा उपलब्ध है। पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए SRMJEEE (UG) प्रवेश परीक्षा आयोजित की जाती है। कुछ श्रेणियों के लिए सीधे प्रवेश और छात्रवृत्ति की भी सुविधा उपलब्ध है। यहां अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं हैं, जैसे- जीनोमिक्स, मॉलिक्यूलर जेनेटिक्स, जेनेटिक्स इंजीनियरिंग, रेडियोएक्टिव रिसर्च लैब आदि।

भारत विश्वविद्यालय, चेन्नई – भारत इंस्टीट्यूट ऑफ हायर एजुकेशन एंड रिसर्च (BIHER) जेनेटिक इंजीनियरिंग में स्नातक स्तर की पढ़ाई के लिए देश के प्रमुख संस्थानों में है। यहां प्रवेश योग्यता के आधार पर और कुछ पाठ्यक्रमों में प्रवेश परीक्षा में मेरिट के आधार पर होता है। पाठ्यक्रम में जेनेटिक इंजीनियरिंग के साथ बायोटेक्नोलॉजी के विषय भी शामिल हैं। इस संस्थान में आधुनिक जेनेटिक और बायोटेक्नोलॉजी प्रयोगशालाएं हैं।

आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय (एकेयू) -पटना स्थित एकेयू बिहार का प्रमुख शैक्षणिक संस्थान है, जो इंजीनियरिंग, मेडिकल, फार्मेसी, नर्सिंग सहित विभिन्न क्षेत्रों में उच्च शिक्षा प्रदान करता है। इसमें राज्य स्तरीय (बीसीईसीई) या राष्ट्रीय स्तर पर जेईई मेन प्रवेश परीक्षा के माध्यम से दाखिला लिया जा सकता है। एकेयू से संबद्ध कॉलेजों के अलावा, पटना साइंस कॉलेज, अनुग्रह नारायण कॉलेज, पटना वीमेंस कॉलेज और के.के. विश्वविद्यालय में भी जेनेटिक इंजीनियरिंग की पढ़ाई होती है। आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय बिहार सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त प्रमुख तकनीकी विश्वविद्यालय है।

मदुरै कामराज विश्वविद्यालय – यह तमिलनाडु का प्रतिष्ठित राज्य विश्वविद्यालय है, जो जैव प्रौद्योगिकी और जेनेटिक इंजीनियरिंग सहित विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में उच्च शिक्षा और शोध के लिए प्रसिद्ध है।
महात्मा ज्योति राव फुले विश्वविद्यालय, जयपुर-यह राजस्थान का प्रमुख निजी विश्वविद्यालय है, जो बायोटेक्नोलॉजी और संबद्ध क्षेत्रों में स्नातक एवं स्नातकोत्तर कोर्स प्रदान करता है। यहां आधुनिक प्रयोगशालाएं, प्रैक्टिकल ट्रेनिंग, प्रोजेक्ट वर्क जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध हैं।

कुवेम्पु विश्वविद्यालय-यह कर्नाटक का एक प्रमुख राज्य विश्वविद्यालय है, जो विज्ञान, जैव प्रौद्योगिकी और संबद्ध क्षेत्रों में उच्च शिक्षा प्रदान करता है। यहां जेनेटिक इंजीनियरिंग/बायोटेक्नोलॉजी में 3 वर्षीय पाठ्यक्रम उपलब्ध है। विश्वविद्यालय में जैव प्रौद्योगिकी विभाग जेनेटिक इंजीनियरिंग सहित आधुनिक विषयों पर शिक्षा और शोध उपलब्ध कराता है। यहां अप्लाइड जूलॉजी, एप्लाइड बॉटनी, माइक्रोबायोलॉजी, बायोइन्फॉर्मेटिक्स आदि विभाग भी हैं।

कॅरियर के अवसर

जेनेटिक इंजीनियरिंग में बीएससी करने वाले छात्रों के लिए कॅरियर के अवसर विविध और आकर्षक हैं। हालांकि स्नातकों का वेतन पैकेज अनुभव, कौशल और कार्य क्षेत्र पर निर्भर करता है। पढ़ाई पूरी करने के बाद छात्र चिकित्सा, कृषि, पर्यावरण में जेनेटिक इंजीनियर, फार्मास्यूटिकल्स, खाद्य उद्योग व जैव ईंधन में बायोटेक्नोलॉजिस्ट, जेनेटिक्स और बायोटेक्नोलॉजी में शोध वैज्ञानिक के रूप में विश्वविद्यालय, अनुसंधान संस्थान और निजी कंपनियों में कॅरियर बना सकते हैं।

वहीं फार्मास्यूटिकल और बायोटेक कंपनियों में क्लिनिकल रिसर्च एसोसिएट, अनुसंधान और डेटा साइंस में बायोइन्फॉरमैटिक्स विश्लेषक, फार्मा और बायोटेक उद्योग, क्वालिटी कंट्रोल एनालिस्ट के अलावा, जेनेटिक रिसर्चर, जीन थेरेपिस्ट, फार्मास्यूटिकल डेवलपर के तौर पर कॅरियर बना सकते हैं।

जिनकी रुचि कृषि और पर्यावरण में है, वे जीएम फसल डेवलपर, पर्यावरण संरक्षण विशेषज्ञ तथा जैव सूचना विज्ञान में रुचि रखने वाले डेटा विश्लेषक, जीनोमिक्स रिसर्चर, डेटाबेस मैनेजर के तौर पर अपना कॅरियर शुरू कर सकते हैं। जेनेटिक काउंसलिंग का भी विकल्प है, जिसमें वे अस्पतालों और क्लीनिकों में आनुवंशिक रोगों के जोखिम का मूल्यांकन, रोगियों को परामर्श दे सकते हैं। नई शिक्षा नीति के तहत इंटर्नशिप और व्यावसायिक प्रशिक्षण पर जोर ने इन क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों को बढ़ाया है।

जेनेटिक इंजीनियरिंग में बीएससी करने के बाद छात्रों के लिए कॅरियर के कई अवसर उपलब्ध हैं। यह क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है, और बायोटेक्नोलॉजी और फार्मास्यूटिकल्स उद्योगों में पेशेवरों की मांग बढ़ रही है। कॅरियर के लिहाज से बायोटेक और फार्मा क्षेत्र न केवल अभ्यर्थियों को नौकरी और उच्च वेतन प्रदान करता है, बल्कि भारत को वैश्विक बायोटेक्नोलॉजी केंद्र के रूप में स्थापित करने में भी योगदान देता है।

कुल मिलाकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने जेनेटिक इंजीनियरिंग में बीएससी पाठ्यक्रम को एक आकर्षक और भविष्योन्मुखी विकल्प बनाया है। यह पाठ्यक्रम जैव विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बीच एक सेतु बनाता है, जो छात्रों को चिकित्सा, कृषि और अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में कॅरियर के लिए तैयार करता है। छात्रवृत्ति और वित्तीय सहायता योजनाओं ने इस पाठ्यक्रम को सुलभ बना दिया है। इसलिए बेहतर कॅरियर अवसरों के लिए छात्रों को एमएससी या PhD पर विचार करना चाहिए।

Topics: राष्ट्रीय शिक्षा नीतिरसायनपाञ्चजन्य विशेषभौतिकीजीव विज्ञान10+2 शिक्षा प्रणालीजेनेटिक इंजीनियरिंगपर्यावरण और उद्योगपर्यावरण संरक्षण
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