ट्रम्प की भूमिका पर भ्रम : ऑपरेशन सिंदूर पर भारत का स्पष्ट रुख
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ट्रम्प की भूमिका पर भ्रम : ऑपरेशन सिंदूर पर भारत का स्पष्ट रुख

भारत ने स्पष्ट किया कि ऑपरेशन सिंदूर का युद्धविराम द्विपक्षीय था, ट्रम्प की मध्यस्थता की बात को सिरे से खारिज किया, विपक्ष पर राजनीतिक शोषण का आरोप।

Written byलेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत)लेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत)
Jun 19, 2025, 05:40 pm IST
inरक्षा
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

भारत में कुछ विपक्षी दल अभी भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बयान के साथ अटके हुए हैं, जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के चार दिनों के युद्ध के संघर्ष विराम को हाईजैक करने की असफल कोशिश की है। भारत ने कई बार स्पष्ट किया है की यह आंतरिक युद्ध विराम एक द्विपक्षीय सहमति से हुआ है। एक कहावत है कि झूठ को ढाँकने के लिए आपको ज्यादा झूठ बोलना पड़ता है। राष्ट्रपति ट्रम्प के इस दावे के मामले में भी यही बात साबित होती है। उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम पर कई बार अनावश्यक वक्तव्य दिए हैं।

अंत में, कनाडा में जी -7 शिखर सम्मेलन के आयोजन स्थल से, पीएम मोदी ने रिकॉर्ड को सही करने के लिए राष्ट्रपति ट्रम्प के साथ 35 मिनट की विस्तृत टेलीफोन पर बातचीत करनी पड़ी । उसके बाद विदेश सचिव विक्रम मिस्री के दिए गए बयान में 10 मई को भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय युद्ध विराम समझ के तथ्यों को स्पष्ट रूप से बताया गया है। एक बार फिर आधिकारिक रूप से अमेरिका की किसी भी प्रकार की भूमिका को खारिज किया गया है। श्री मिस्री का बयान न केवल भारत में विपक्षी दलों को संबोधित करता है, बल्कि अमेरिका और अन्य प्रमुख वैश्विक शक्तियों को भी संदेश देता है। यह सशक्त भारत के मामलों में खिलवाड़ न करने का स्पष्ट आह्वान है।

लेकिन कुछ विपक्षी दल राष्ट्रपति ट्रम्प से सार्वजनिक रूप से एक बयान जारी करने की मांग कर रहे हैं कि उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच शत्रुता को समाप्त करने में मध्यस्थता नहीं की थी। अपने बयानों, विशेष रूप से अपने सोशल मीडिया पोस्ट पर फ्लिप फ्लॉप के लिए जाने जाने वाले, राष्ट्रपति ट्रम्प अधिकांश ज्योतिषियों और भविष्यवक्ताओं को चकित कर सकते हैं। वह अक्सर एक विशिष्ट धारणा प्रबंधन पर चलते हैं जो उसके घरेलू दर्शकों को भाता है। उदाहरण के लिए, उन्होंने जी -7 शिखर सम्मेलन  में फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों को ‘प्रचार चाहने वाले नेता’ के रूप में सोशल मीडिया X पर पोस्ट लिखा। शुक्र है, श्री मैक्रॉन ने उनकी मूर्खतापूर्ण टिप्पणी को नजरअंदाज कर दिया।

तो हम भारत में ट्रम्प प्रकरण को कैसे समाप्त कर सकते हैं? जाहिर है, श्री ट्रम्प वह बयान तो देने नहीं जा रहे हैं, जो स्पष्ट रूप से ऑपरेशन सिंदूर में एक अस्थायी ठहराव में उनकी भूमिका से इनकार करते हैं। आखिरकार, राष्ट्रपति ट्रम्प रूस-यूक्रेन युद्ध, इजरायल-हमास संघर्ष और यहां तक कि ईरान को परमाणु हथियार राज्य बनने से रोकने के लिए अपने युद्धविराम प्रयासों के बारे में अनेक बयान दे चुके है। उनके हर बयान के नकारक्तमक परिणाम ही निकले हैं। अब प्रेसीडेंट ट्रम्प ने ईरान में सत्ता परिवर्तन की धमकी दी है। इसलिए, दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र के राष्ट्रपति के रूप में उनकी विश्वसनीयता को गंभीर झटका लगा है।

अब राष्ट्रपति ट्रम्प के भू-राजनीतिक समझ को भी देखें जिसमे असफल पाकिस्तान सेना प्रमुख असीम मुनीर को व्हाइट हाउस में दोपहर के भोजन के लिए आमंत्रित किया जाता है।  इस न्योते से यह बात तो साफ हो जाती है कि पाकिस्तान में सेना प्रमुख ही छद्म प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के जरिए शासन करते हैं। लेकिन दुनिया का  सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका सैन्य कौशल और कूटनीतिक तीक्ष्णता में इतना कमजोर पड़ जाएगा ऐसा शायद ही किसी ने सोचा होगा। यह अमेरिका लोकतांत्रिक मूल्यों को मान्यता नहीं देता है और न ही उसे सीरिया के घोषित अलकायदा आतंकवादी से राष्ट्रपति बने अहमद अल शरा का हाथ पकड़ने में कोई हिचकिचाहट है। इस प्रकार, ट्रम्प 2.0 प्रशासन से बहुत अधिक कूटनीतिक विवेक की उम्मीद नहीं की जा सकती है।

मैं श्री ट्रम्प द्वारा बातचीत किए गए तथाकथित संघर्ष विराम पर पाकिस्तानी प्रतिक्रिया को भी देख रहा था। भारत और पाकिस्तान के बीच 10 मई के संघर्ष विराम समझौते के बाद, शुरू में पाकिस्तान द्वारा श्री ट्रम्प को कोई श्रेय नहीं दिया गया था। बाद में जब श्री ट्रम्प ने बार-बार संघर्ष विराम पर व्यक्तव्य दिए तब जाकर पाकिस्तान प्रशासन ने राष्ट्रपति ट्रम्प को धन्यवाद दिया। मेरी राय में, पाकिस्तान प्रशासन द्वारा इस तरह की देरी से स्वीकृति ट्रम्प प्रशासन द्वारा उन पर दिए गए दबाव की ओर इशारा करती है। व्हाइट हाउस लंच के बाद अब तक तो पाकिस्तान अमेरिका का पूरी तरह से कृतज्ञ हो गया है।

अब 18 जून को पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर के लिए राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा आयोजित दोपहर के भोजन पर आते हैं। मेरी समझ में यह मुलाकात भारत के लिए लाभ का काम करती है। श्री ट्रम्प को स्पष्ट रूप से ईरान के खिलाफ युद्ध में पाकिस्तान के समर्थन की आवश्यकता है, जबकि पाकिस्तान ने ईरान पर इजरायल के हमलों की निंदा की है। इस मुलाकात के दौरान दोनों ने भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम पर भी चर्चा की होगी। इसलिए, इसके बाद पाकिस्तान भारत के विरुद्ध संघर्ष विराम समझौते का उल्लंघन करने से पहले कई बार सोचेगा। पाकिस्तान भारत के खिलाफ आतंकी हमले को प्रायोजित करने से भी हिचकेगा। भारत और पाकिस्तान के बीच अपेक्षाकृत और असहज शांति अब अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रपति ट्रम्प पर भी टिकी हुई है। अनजाने में ही सही,यह मुलाकात भारत के हित में हो सकती है।

श्री ट्रम्प की तथाकथित भूमिका का कुछ राजनीतिक दलों द्वारा संकीर्ण राजनीति के लिए शोषण किया जाएगा। लेकिन अच्छी बात यह है की अधिकांश भारतीय पार्टियां वास्तविक स्थिति को समझती हैं। मुख्यधारा के मीडिया को भी राष्ट्रीय हित में इस मुद्दे को बढ़ा चढ़ा कर नहीं पेश करना चाहिए। धीरे-धीरे यह मुद्दा कर्षण खो देगा और सार्वजनिक सोच विचार से गायब हो जाएगा। भारत के पास कई अन्य महत्वपूर्ण सुरक्षा चिंताएं हैं और एक राष्ट्र के रूप में हमें एक असफल राष्ट्र पाकिस्तान को भारत के साथ जोड़ने के किसी भी प्रयास को नजरअंदाज करना चाहिए।

एक पूर्व सैन्य अधिकारी के रूप में, मैं यह भी सोचता हूं कि हमारे वीर सैनिकों को कैसा महसूस हो रहा होगा जब कुछ विपक्षी दल अस्थायी संघर्ष विराम का श्रेय श्री ट्रम्प को देते हैं। उनकी बहादुरी और सैन्य कौशल, जिसने पाकिस्तान को चार दिनों से भी कम समय में घुटनों पर ला दिया, को इस तरह के गैर-जिम्मेदाराना बयान से जरूर ठेस पहुँचती होगी। भारतीय सशस्त्र सेनाएं और सीमा सुरक्षा बल अभी भी युद्ध की परिचालन तैयारियों की उच्च स्थिति में हैं। इसलिए भारतीय सशस्त्र सेनाओं और अन्य वर्दीधारी बलों को राजनीति से दूर और परे रखा जाना चाहिए।

दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों के बीच सकारात्मक भारत-अमेरिका संबंध दुनिया में शांति और स्थिरता के लिए आवश्यक हैं। प्रधानमंत्री मोदी इस तथ्य से अवगत हैं और उन्होंने दुनिया की दो बड़ी शक्तियों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंधों की आवश्यकता को बनाए रखने में काफी परिपक्वता दिखाई है। यही कारण है कि उन्होंने श्री ट्रम्प को अगले साल भारत आने के लिए आमंत्रित किया जब हमारे देश द्वारा क्वाड शिखर सम्मेलन की मेजबानी की जाएगी।

हमें यह भी देखना चाहिए कि कैसे इजराइल के विपक्षी दलों ने पिछले डेढ़ साल से युद्ध और संघर्ष में, जिसमें ईरान के खिलाफ नवीनतम अभियान भी शामिल है, प्रधानमंत्री श्री बेंजामिन नेतन्याहू का बिना शर्त समर्थन किया है। राष्ट्र और इजराइल के सभी राजनीतिक दल  संकट की स्थितियों में एकजुट रहे हैं। यही इजरायल की सबसे बड़ी ताकत है। इजरायल मणिपुर के आकार का एक छोटा सा देश है, जिसकी आबादी सिर्फ 95 लाख है। राष्ट्रीय एकजुटता का इजरायल की तुलना में कोई बेहतर उदाहरण नहीं है जब उसे अस्तित्व या राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे का सामना करना पड़ता है। मैं भारत के विपक्षी दलों से विनम्र अनुरोध करता हूं कि वे संकीर्ण राजनीतिक लाभ के लिए ट्रम्प के बयानों से बचें और ऑपरेशन सिंदूर के समापन तक राष्ट्रीय एकजुटता पर ध्यान केंद्रित करें। जय भारत!

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