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विश्वास के 11 साल

भाजपानीत सरकार का 11 साल का कालखंड भारतीय राजनीति की संरचनात्मक भूलभुलैया को तोड़ने, नीतिगत अपंगता से निकल कर भरोसे तथा क्रियान्वयन की राजनीति को परिभाषित और स्थापित करने वाला है

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Jun 14, 2025, 10:23 pm IST
in भारत, सम्पादकीय
PM Narendra Modi

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो ‘11 वर्ष’ की अवधि संयम, तप और नीति की कसौटी है। अधिक गहराई में जाएं तो चर्चा का मुद्दा भाजपानीत और ग्यारह वर्ष भी नहीं है, क्योंकि सिर्फ सत्ता में बने रहना उपलब्धि नहीं होती। जनभावनाओं के अनुकूल ढलने और विचार पर दृढ़ रहने की दुसाध्यता को साधना बड़ी उपलब्धि होती है।

हितेश शंकर

केन्द्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राजग शासन के 11 वर्ष पूरे हो गए। वैसे देखा जाए तो 5-5 बरस चलने वाली निर्वाचन व्यवस्था और स्वतंत्रता के बाद से ही पंचवर्षीय योजनाओं के चश्मे से देश के लिए दूरंदेशी दिखाने के आदी हो चले ‘तंत्र’ के लिए दस अधिक समझ आने वाला आंकड़ा और ‘स्टॉपेज’ है। किंतु यहां स्टॉपेज, ठिठकन, ठहराव कहां? यह तो अपार जनाकांक्षाओं का अनथक रथ है… निरंतर, निर्वैर लक्ष्य की ओर गतिमान। ऐसे में संस्कृति में पगा ‘लोक’ जब ‘तंत्र’ का तिलक करे तो ग्यारह का अंक विशिष्ट हो जाता है।

भारतीय संस्कृति और धर्म में ‘11’ (ग्यारह) की संख्या का विशेष महत्व है। यह केवल एक गणितीय संख्या नहीं, बल्कि इसमें आध्यात्मिक, वैदिक और सांस्कृतिक प्रतीकात्मकता की ‘त्रिवेणी’ जुड़ी है। भारतीय संस्कृति में ग्यारह मात्र एक गणना नहीं, एक संकल्प है- तप, संयम और शक्ति का प्रतीक। वेदों में वर्णित 11 रुद्र, आत्मसंयम की 11 इंद्रियां (5 कर्मेंद्रियां+ 5 ज्ञानेंद्रियां+ 1 मन), यह संख्या भारत की आंतरिक ऊर्जा और संतुलनशील सत्ता का बोध कराती है।

आज जब हम भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार के 11 वर्ष के शासनकाल को देखते हैं, तो यह केवल एक राजनीतिक अवधि नहीं, बल्कि एक ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ के व्रत जैसा प्रतीत होता है। यह कालखंड और इसके संकल्प उसी प्रकार से महत्वपूर्ण हैं, जैसे एकादशी व्रत, जिसमें त्याग है, सेवा है और गहन मनोयोग से स्वयं को संयमित कर लक्ष्य की ओर अग्रसर होने की भावना है।

आज के भारत ने इस शक्ति को नीति, सेवा और समरसता से जोड़ा है और यही इसे मील का पत्थर बनाता है। यह कालखंड दर्शाता है कि जब भारतीय मूल्यों से प्रेरित नेतृत्व औपनिवेशिक और परिवारवादी ढर्रे की राजसत्ता को राष्ट्रधर्म की पटरी पर लाता है, तब मात्र समय नहीं बदलता, समाज की दिशा और देश का मनोबल भी बदलता है।

राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो ‘11 वर्ष’ की अवधि संयम, तप और नीति की कसौटी है। अधिक गहराई में जाएं तो चर्चा का मुद्दा राजग और ग्यारह वर्ष भी नहीं है, क्योंकि सिर्फ सत्ता में बने रहना उपलब्धि नहीं होती। जनभावनाओं के अनुकूल ढलने और विचार पर दृढ़ रहने की दुसाध्यता को साधना बड़ी उपलब्धि होती है।

भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राजग सरकार का 2014 से 2025 तक का 11 वर्षीय शासन भारतीय राजनीति की उस संरचनात्मक भूलभुलैया को तोड़ने वाला रहा है, जिसमें दावे, घोषणाएं और घोषणापत्र इतिहास में खो जाया करते थे। इस कालखंड को ‘मील का पत्थर’ कहने का कारण यही है कि इसने भरोसे और क्रियान्वयन की राजनीति को न केवल परिभाषित किया, बल्कि स्थापित भी किया।

इस कालखंड की पूर्ववर्ती सरकारों से तुलना के करने पर कई विचारोत्तेजक दृश्य उभरते हैं। इनमें पहला नीतिगत निर्णयों में स्पष्टता और समयबद्धता से जुड़ा है। पूर्व में 2जी घोटाला, एयर इंडिया घाटा जैसे प्रकरण नीतिगत अपंगता के उदाहरण थे। आज पीएम गतिशक्ति के माध्यम से 1.5 लाख करोड़ से अधिक बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं को समयबद्धता से जोड़ा गया। नीति आयोग सक्रिय होकर राज्यों की स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बल देता है।

प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) और पारदर्शिता इस परिवर्तन की दूसरी झलक है। पहले सरकारी रियायत सही व्यक्ति तक पहुंचने से पहले ही भ्रष्टाचारी हाथों से गुजरते हुए रिस जाती थी। अब डीबीटी के जरिए ₹34 लाख करोड़ से अधिक की राशि सीधे लाभार्थी के खातों में पहुंची। 9 करोड़ गैस कनेक्शन पीएम उज्ज्वला योजना के अंतर्गत दिए गए, जो पहले केवल ‘नोटिफाइड गरीब’ के लिए थे और वहां भी केवल सपना थे।

राष्ट्रीय आत्मसम्मान को आगे रखना और वैश्विक कूटनीति में सक्रिय समझदारी से साझेदारी करते हुए बढ़ना इस कालखंड का तीसरा प्रमुख दृश्य है। भारत ने वे दिन भी देखे, जब इसके प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री मूकदर्शक की तरह वैश्विक सम्मेलनों में भाग लेते थे। आज जी-20 की अध्यक्षता, भारत-मध्य एशिया शिखर सम्मेलन, क्वाड, अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन भारत के नीति निर्धारण में साझेदार बने हैं। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद भारत के सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडलों के दौरे राष्ट्रीय एकता के भाव को विश्वपटल पर रखते हुए विमर्श को नई धार दे रहे हैं।

इस 11 वर्ष में देश की राजनीति का कोई खाका है तो वह विश्वास, साख और परिणाम के त्रिकोण पर टिका है। यह वादों और दावों की राजनीति बनाम ‘परिणामों की राजनीति’ है। 2014 के पहले जनता जानती थी कि ‘गरीबी’ पर भाषण मिलेंगे, लेकिन यह जाएगी नहीं। ‘सकल घरेलू उत्पाद’ पर बातें होंगी, पर इसका ग्राफ ऊपर उठेगा नहीं। परंतु इन 11 वर्षों में राजनीतिक भरोसे का पुनर्निर्माण हुआ।

विश्व बैंक के अनुसार, बेहद गरीबी झेलते लगभग 2.69 करोड़ भारतीय इस अवधि में दरिद्रता की रेखा फलांग कर जीवन में आगे बढ़ गए। नीति आयोग (2015-16 और 2019–21) की रिपोर्ट के अनुसार, जीवन को चौतरफा प्रभावित करने वाली बहुआयामी गरीबी इस दौरान 24.85 प्रतिशत से घटकर 14.96 पर आ गई।

नागरिकों के पारिवारिक मोर्चों पर राहत के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी विकास के प्रतिमान-नए कीर्तिमान खड़े हुए। 375 किलोमीटर प्रतिमाह की गति से रेलवे का विद्युतीकरण हुआ, जो पूर्व में सिर्फ 50 किमी. प्रतिमाह था। किसानों के खातों में ₹2.7 लाख करोड़ रु. की पीएम-किसान सहायता पहुंची, जिसमें कोई बिचौलिया नहीं रहा। कृषि उपज, उत्पादन, निर्यात तीनों में ऐतिहासिक वृद्धि हुई।

यह राजनीति अब सिर्फ भाषण नहीं, समाज की आकांक्षाओं की भाषा बोलती है। भारतीय राजनीति में भरोसा जगाता यह बदलाव पीढ़ीगत ‘शिफ्ट’ भी है। भारतीय होने के गर्व और भविष्य के प्रति भरोसे से भरा एक नया मतदाता वर्ग, गत 11 वर्ष में एक नई पीढ़ी तैयार हो गई है, जिसने ‘नेहरू-इंदिरा-राजीव’ के वंशवादी मॉडल की असफलताओं को सूचनात्मक लोकतंत्र में नकारा है। यह भावना में न बहने और तर्क-तुलना करने में सक्षम भारत है। इस पीढ़ी ने पहली बार ‘भाजपा मॉडल’ की तुलना परिणामों से की है, वादों से नहीं। इस वर्ग के लिए नेतृत्व = सुशासन+सेवा है, न कि जाति/परिवार। इस परिवर्तन को ‘भरोसे का निर्माण बनाम निराशा का बोझ’ के दृष्टिकोण से देखना चाहिए।

याद कीजिए, कांग्रेस के शासनकाल में युवाओं के मन में ‘यह देश कभी नहीं सुधरेगा’ का स्थायी भाव बन गया था। वहीं, आज यूपीएससी, आईआईटी, स्टार्टअप, डिजिटल इंडिया में भागीदारी का सपना एक सच्चाई बना दिखता है।

कुछ ऐसे तथ्य भी हैं, जो परिवर्तन की इस प्रेरणास्पद यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं, किंतु जिनकी अधिक चर्चा नहीं होती। गांवों में इंटरनेट कनेक्टिविटी इसमें प्रमुख है। 2014 में सिर्फ 59 पंचायतों तक ऑप्टिकल फाइबर पहुंचा था, अब यह संख्या 2.1 लाख पार कर चुकी है। लड़कियों की शिक्षा में भी इस बीच अभूतपूर्व सुधार हुआ है। ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ और स्वच्छ भारत अभियान ने स्कूल छोड़ने की दर को 40 प्रतिशत से घटाकर 16 प्रतिशत किया है।

सामान्य जनता को बैंकिंग और बचत से जोड़ने का काम इस यात्रा का ऐसा अचर्चित अध्याय है, जिसने गरीबों को ऐतिहासिक अन्याय से छुटकारा दिलाया। जन धन योजना के अंतर्गत 55.56 करोड़ बैंक खाते खोले गए, जिनमें ₹2.57 लाख करोड़ से अधिक की बचत जमा हुई। यह ‘बिसराए हुए’ भारत की धमनियों में दौड़ते नए रक्त, नई ऊर्जा और विश्वास की कहानी है।

इस कालखंड में इस भ्रम का भी अंत हुआ है कि राजनीति समाज को बदल नहीं सकती। भले ही पुरानी राजनीति के पुरोधा-पक्षकार और भाजपा के विरोधी अभी भी इन उपलब्धियों को संदिग्ध निगाह से देखें, किंतु लोग उनकी बातों को तोलने लगे हैं, क्योंकि वे राजनीति के जिस स्वर्णिमकाल की बात करते हैं, उस काल में ऐसी कोई नाप-जोखकर बताने लायक उपलब्धि नहीं थी।

भाजपा की सबसे बड़ी सफलता यह नहीं कि वह सबसे बड़ा दल बनी, बल्कि यह है कि उसने राजनीति के एजेंडे को बदला। सेवा को राजनीति का उद्देश्य बनाया, विश्वास को व्यवस्था का आधार बनाया और प्रदर्शन को नेता का मापदंड बनाया। इसलिए आज की राजनीति केवल जीतने की नहीं, भरोसा अर्जित करने की स्पर्धा बन गई है। और निश्चित ही भाजपा इस सब में जनता के अधिक निकट और प्रतिद्वंदियों से बहुत आगे निकल गई है।

X@hiteshshankar

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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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