संत कबीर जयंती विशेष : जब राममय संत कबीर ने धर्मान्ध सिकंदर लोदी को पराभूत किया
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संत कबीर जयंती विशेष : जब राममय संत कबीर ने धर्मान्ध सिकंदर लोदी को पराभूत किया

संत कबीर ने सिकंदर लोदी के सामने रामभक्ति के लिए जो अदम्य साहस दिखाया, वह भारतीय संत परंपरा में अमर अध्याय है। जानिए पूरी ऐतिहासिक कथा...

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Jun 10, 2025, 06:20 pm IST
inभारत
संत कबीरदास

संत कबीरदास

ऐसा कभी-कभी होता है, जब कोई असाधारण आत्मा सामान्य स्तर से ऊपर उठकर ईश्वर के विषय में अधिक गहराई से प्रति संवेदन करती है, और देवीय मार्गदर्शन दर्शन के अनुरूप वीरतापूर्वक आचरण करती है, ऐसी महान आत्मा का आलोक अंधकारमय और अस्त-व्यस्त संसार के लिए प्रखर दीप का कार्य करती है, संत कबीर की आत्मा इसी कोटि की उच्चतर मानक है।

संत कबीर की भक्ति का मूलाधार राम हैं इसलिए संत कबीर का राम के प्रति आत्मसमर्पण अद्भुत और अद्वितीय है। कबीर दास राम के कुत्ते के रूप में अपना परिचय देते हुए जरा भी नहीं लजाते हैं, वह कहते हैं कि-

“कबिरा कूता राम का, मुतिया मेरा नाउँ।
गले राम की जेवड़ी, जित खैंचे तित जाउँ।।
तो तो कर तौ बाहुडौं, दूरि दूरि करै तो जाउँ।
ज्यूँ हरि राखै त्यूँ रहौं, जो देवे सो खाएँ।।

संत कबीर ने श्रीराम को पूर्ण परमात्मा माना है, इसलिए तो वे कहते हैं कि-

“जिस मरनैं थैं जग डरै सो मेरे आनन्द।
कब मरिहूँ कब देखिहूँ पूरण परमानंद॥”

अब आप देखिए कि संत कबीर राममय होकर किस तरह से परमेश्वर राम के लिए तत्कालीन धर्मांध और लंपट शासक सिकंदर लोदी से भिड़ गए।

कट्टरपंथी मुसलमान तो तभी से संत कबीर से चिढ़े बैठे हैं, जबकि हिन्दू बड़े उल्लास के साथ संत कबीर को आत्मसात करते हुए जयंती मनाते हैं। कतिपय संत और श्रद्धालुओं को संत कबीर के परमात्मा को समझना होगा तभी दृष्टि दोष दूर हो सकेगा।

राम के प्रति संत कबीर की आगाध भक्ति थी, इसलिए सिकंदर लोदी जैसे क्रूर सुल्तान कबीर का बाल भी बांका ना कर सके।

भारत में अरबों और तुर्कों के आक्रमण मूलतः इस्लाम के प्रचार और प्रसार को लेकर हुए हैं। सन् 1206 में दिल्ली सल्तनत की स्थापना के साथ मुस्लिम आक्रांताओं का शासन प्रारंभ हुआ था। मुस्लिम शासकों का प्रशासन शरीयत पर आधारित था, एवं उलेमाओं का बदस्तूर हस्तक्षेप था। इस तरह दिल्ली सल्तनत अंतर्गत धर्म राज्य स्थापित था और तलवार के बल पर इस्लाम का प्रचार जारी रहा। हिंदुओं के मंदिरों मूर्तियों और बहुमूल्य दस्तावेजों का विनाश किया जा रहा था वहीं दूसरी ओर हिंदू शासकों का मुसलमानों के विरुद्ध प्रबल संघर्ष जारी था।

ऐसी विषम परिस्थितियों में भक्ति आंदोलन रामबाण सिद्ध हुआ, तथा उस अंधकारमय युग में काशी के समीप लहरतारा में कबीर के रूप में एक देदीप्यमान नक्षत्र का जन्म हुआ, जिसके आलोक में न केवल हिंदुओं और मुसलमानों के मध्य एक सेतु का निर्माण हुआ वरन् निर्गुण – सगुण राम भक्ति शाखा का विकास हुआ।

महान् रामानंद के शिष्य कबीर के विचार बहुआयामी है, परंतु तत्कालीन परिस्थितियों में हिंदू- मुसलमानों के मध्य एकता करने हेतु किए गए प्रयास अद्वितीय एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं।

कबीर ने जातिगत, वंशगत, धर्मगत, संस्कारगत, विश्वासगत और शास्त्रगत रूढ़ियों के मायाजाल को बुरी तरह छिन्न-भिन्न किया है। संत कबीर के समय दिल्ली सल्तनत का सुल्तान सिकंदर लोदी था, उन दिनों काशी में संत कबीर की लोकप्रियता और विरोध चरम पर था।

पुनर्जागरण काल में कबीर वाणी हिंदुओं के लिए शिरोधार्य थी, परंतु मुल्ला – मौलवियों को स्वीकार नहीं थी।अतः वे संत कबीर से कुपित थे और उन्हें सबक सिखाना चाहते थे, इसलिए जब सिकंदर लोदी काशी आया तब मुल्ला – मौलवियों ने संत कबीर की शिकायतों की फेहरिस्त सौंपी।

जिसमें यह बताया गया था कि कबीर सुन्नी, हज काबा अजान, कुर्बानी और ताजियेदारी की खिल्ली उड़ाते हैं।

उदाहरण स्वरूप वह सुन्नत को लेकर कहते हैं कि-

“सुन्नति किये तुरक जो होइगा, औरत का क्या करियै।
 अद्ध सरीरी नारी न छोड़े, ताते हिंदू ही रहियै।।”

हज्ज काबा के बारे में कहते हैं कि-

“सेख -सबूरी बाहिरा क्या हज काबे जाई।
 जाका दिल साबत नहीं, ताको कहां खुदाई।।

वहीं अजान के बारे में कहते हैं कि-

“मुल्ला मुनारे क्या चढ़हि सांइ न बहरा होई।
जाँ कारण तू बांग देहि दिल ही भीतर सोइ।।
काँकर पाथर जोरि कर मस्जिद लई चिनाय।
 ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, क्या बहिरा हुआ खुदाई।।

वहीं कुर्बानी और हलाल के बारे में कहते हैं कि-

“गाफिल गरब करैं अधिकाई।
स्वारथ अरथि वधै ए गाई।।
जाको दूध धाइ करि पीजे।
ता माता को बध क्यों कीजे।।
पकरी जीउआनिआ देह बिनाशी।
माटी कहु बिसमिल कीआ।।
जोति सरुप अनाहत लागी।
कहु हलाल किउ कीआ।।

उक्त उदाहरण देते हुए शिकायत दर्ज कराई गई साथ ही यह भी शिकायत हुई कि कबीरदास मुसलमान होकर भी हिंदू देवी देवताओं की पूजा करता है।

सिकंदर लोदी का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया और उसने संत कबीर को पकड़कर दरबार में हाजिर करने के लिए आदेश जारी कर दिया। कबीरदास भी तुलसी माला पहनकर, चंदन लगाकर और पगड़ी बांधकर सैनिकों के साथ निकल पड़े, तो रास्ते में हजारों लोग उनके पीछे हो लिए।

कबीर दास दरबार में पहुंचे और उन्होंने झुक कर सलाम नहीं किया तब सिकंदर लोधी क्रोधित होकर बोला कि गुस्ताख तेरी इतनी हिम्मत कि तूने सुल्तान को सलाम नहीं किया तब कबीर दास जी बोले मेरे स्वामी भगवान राम हैं , वही सारे जगत के राजा हैं इतने बड़े राजा का सेवक होकर मैं किसी छोटे-मोटे सुल्तान को सलाम नहीं कर सकता। मेरा सिर मेरे प्रभु राम और गुरुदेव के अतिरिक्त किसी के सामने नहीं झुकता है।

कुपित सुल्तान ने कबीर दास जी को जंजीरों से बांधकर और साथ में पत्थर बांधकर गंगा जी में डलवा दिया परंतु उस समय भी कबीरदास मुस्कुराते हुए राम नाम का जाप कर रहे थे। कबीर दास जी ने भगवान राम से प्रार्थना की, हे! प्रभु आपका नाम लेने से तो जीव का भाव बंधन छूट जाता है तो मेरी ये साधारण जंजीर वाले बंधन नहीं छूटेंगे क्या? जैंसे ही कबीर दास जी ने भगवान राम से यह प्रार्थना की, उनकी सारी जंजीर स्वयं ही खुल गईं और कबीर दास जी मुक्त हो गए तथा तैरकर गंगा जी के किनारे आ गए।

सुल्तान हतप्रभ रह गया और उसने कबीर दास जी को कहा कि यदि तू राम नाम लेना छोड़ कर मुझे सलाम करता है तो तेरी जान बक्श दी जाएगी, वरना नहीं। कबीर जी बोले कि जिसका रक्षक राम है उसे कोई मार नहीं सकता। प्रभु जगन्नाथ का दास जगत से हार नहीं सकता।

यह सुनते ही सुल्तान ने लकड़ियों में आग लगवाकर कबीरदास को बैठा दिया परंतु कबीरदास सही सलामत रहे बल्कि उनका चेहरा और चमकने लगा था। इस सबसे सुल्तान और भड़क उठा अब उसने एक मदमस्त हाथी से कबीरदास को कुचलवाने का प्रयास किया परंतु सफल न हो सका। कहते हैं कि नरसिंह अवतार सुल्तान ने देख लिया था। यह सब देखकर सिकंदर लोदी घबरा गया और उसने संत कबीर से क्षमा मांगी नतमस्तक हो गया था।

संत कबीर सिकंदर लोदी के चंगुल से छूटकर आए और उन्होंने अपने शिष्यों से कहा कि मृत्यु तो बलिदान है। सांसारिक विषयी व्यक्ति आत्महत्या करते हैं जिन्हें अमरत्व का ज्ञान ही नहीं है।

कबीर पुनः कहते हैं कि मुझे जीवनदाता राम प्राप्त हो गए हैं अतः मैं अमर हो गया हूँ, मैं अब कभी नहीं मरूँगा। मैंने मृत्यु को भलीभांति जान लिया है, मृत्यु उनकी है जिन्होंने राम को नहीं जाना है। शाक्त जन ही मरते हैं, जबकि संत जन जीवित रहते हुए रामरस ब्रह्मानंद का भरपूर पान करते हैं। मैं तो ब्रम्हमय हो गया हूँ, “अहं ब्रह्मास्मि”। यदि ब्रह्म मरेंगे तो हम भी मरेंगे परब्रह्म अविनाशी हैं अतः हम भी नहीं मरेंगे। कबीर का मन तो उस मन से मिल गया है, अतः वह अमर हो गया है, और उसे अनंत सुख की प्राप्ति हो गई है।

” हम ना मरैं मरिहैं संसारा,
हम कूँ मिला जियावन हारा।
अब न मरौं मरने मन माना,
तेई मुए जिन राम न जाना।।
साकत मरै संत जन जीवैं,
 भरि-भरि राम रसायन पीवै।।
हरि मरिहैं तो हम हूँ मरिहैं,
 हरि न मरै हम काहे कूँ मरिहैं।।
कह कबीर मन मनहिं मिलावा,
अमर भए सुख सागर पावा।।  

Topics: कबीर और इस्लाम विरोधकबीर की शिक्षाएंSant Kabir vs Muslim RulersRam Bhakti Movementकबीर और भक्ति आंदोलनसंत कबीर और रामभक्तिकबीर और सिकंदर लोदीSant Kabir Historyकबीरदास का जीवनSant Kabir Jayanti 2025कबीर का राम के प्रति समर्पण
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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