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वीर सावरकर विज्ञान, वेद और डॉ. आंबेडकर से उनका संबंध

भारत महान सुधारकों, स्वतंत्रता सेनानियों, शासकों और ऋषियों का घर है, जिन्होंने समाज की बेहतरी और हमारे शानदार राष्ट्र को अत्याचारों, शोषण और सांस्कृतिक पतन से बचाने के लिए बलिदान दिए हैं।

Written byडॉ. पंकज जगन्नाथ जयस्वालडॉ. पंकज जगन्नाथ जयस्वाल
May 27, 2025, 08:22 am IST
inभारत
वीर सावरकर

वीर सावरकर

भारत महान सुधारकों, स्वतंत्रता सेनानियों, शासकों और ऋषियों का घर है, जिन्होंने समाज की बेहतरी और हमारे शानदार राष्ट्र को अत्याचारों, शोषण और सांस्कृतिक पतन से बचाने के लिए बलिदान दिए हैं। इन वीर योद्धाओं ने भारत को कई आक्रमणों के साथ-साथ आंतरिक शत्रुओं से भी बचाया। उन्होंने राष्ट्रीय चरित्र को विकसित करके समाज को जोड़ने का भी प्रयास किया है। स्वातंत्र्यवीर सावरकर एक ऐसे बहुआयामी व्यक्तित्व थे, जिन्होंने महान भारत के लिए कई मोर्चों पर काम किया, एकता को प्राथमिकता दी, वैज्ञानिक झुकाव रखा और “राष्ट्र प्रथम” रवैया बनाए रखा।

वीर सावरकर को लगातार झूठी कहानियों के साथ निशाना बनाया गया। ऐसी ही एक झूठी कहानी यह थी कि उन्होंने केवल उच्च जाति के लिए काम किया। आइए डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के साथ उनके संबंधों को देखें।

डॉ. भीमराव आंबेडकर और स्वातंत्र्यवीर सावरकर दोनों ही भारतीय समाज सुधारक थे, जिन्होंने समाज में असमानता और अन्याय के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान दिया। दोनों ने सामाजिक परिवर्तन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सावरकर की पहल पर, 23 जनवरी, 1924 को हिंदू महासभा की स्थापना की गई और तीन प्रस्ताव पारित किए गए, जिनमें से एक अस्पृश्यता को गैरकानूनी घोषित करने के प्रयास को संबोधित करता था। अपनी पहल पर, सावरकर ने इस आंदोलन को जन आंदोलन बनाने के लक्ष्य के साथ रत्नागिरी में सामूहिक भजन, सहभोज कार्यक्रम और मंदिर प्रवेश सहित कई कार्यक्रमों की योजना बनाई।

वीर सावरकर और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर

स्वातंत्र्यवीर सावरकर
  • जाति व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई – सावरकर ने जाति व्यवस्था का विरोध किया और “सभी हिंदू समान हैं” का विचार प्रस्तुत किया।
  • अस्पृश्यता के खिलाफ आवाज उठाई और मंदिर प्रवेश आंदोलन चलाया।
  • समानताएं: दोनों नेताओं ने जाति व्यवस्था का विरोध किया और समाज में असमानताओं को खत्म करने के लिए काम किया।

4 अप्रैल 1942 को सावरकर द्वारा डॉ. अंबेडकर को भेजा गया बधाई संदेश सामाजिक सुधार आंदोलन में उनके आपसी सम्मान और सहयोग का एक उदाहरण है। यह संदेश उनके एक-दूसरे के प्रति सम्मान का प्रतीक है और समाज को बेहतर बनाने के उनके संयुक्त प्रयासों का प्रतिबिंब है। संदेश का सटीक पाठ इस प्रकार है:

प्रिय डॉ. अंबेडकर,

मैं देश की सेवा में आपके महान कार्य के लिए आपको बधाई देता हूँ। आपके अथक परिश्रम और दृढ़ संकल्प ने दलित समुदाय के लोगों को एक नई दिशा में प्रेरित किया है। आपने जो सामाजिक सुधार का काम किया है, वह हमें भारत के भविष्य को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखने की अनुमति देता है। जाति व्यवस्था के खिलाफ आपने जो संघर्ष किया है, वह बहुत महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक है। आपके नेतृत्व में समाज में बड़े बदलाव हुए हैं और होते रहेंगे। मैं इस प्रयास में आपकी सफलता की कामना करता हूँ।

सावरकर ने इस प्रकार की भ्रांतियों की कड़ी आलोचना की: स्पर्श आपको गंदा करता है, धर्म नष्ट करता है, किसी को दूसरे को नहीं छूना चाहिए, यदि किसी की छाया आप पर पड़ती है, तो आप नष्ट हो जाएंगे। सावरकर कहते हैं, “यदि आप उनके स्पर्श से नष्ट हो जाते हैं, तो आप और आपका ईश्वर जिसने उन्हें बनाया है, पहले ही नष्ट हो चुके हैं।” यद्यपि आंबेडकर रत्नागिरी में सावरकर के कार्य को देखने नहीं आ सके, आंबेडकर ने सावरकर को निम्नलिखित पत्र में उनके कार्य के महत्व को व्यक्त किया, फिर भी मैं इस अवसर पर आपके द्वारा सामाजिक सुधार के क्षेत्र में किए जा रहे कार्य की सराहना करना चाहता हूँ। यदि अछूतों को हिंदू समाज का अभिन्न अंग बनाना है, तो केवल गैर-जिम्मेदारी को हटाना ही पर्याप्त नहीं है; इसके लिए आपको चातुर्वर्ण्य को नष्ट करना होगा। मुझे खुशी है कि आप उन बहुत कम लोगों में से एक हैं जिन्होंने इसे महसूस किया है।

वेदोक्तबंदी के विरुद्ध उनके विचार और कार्यवाही

कोई भी हिन्दू जो वेदों का अध्ययन करना चाहता है, उसे ऐसा करने का अधिकार होना चाहिए, चाहे वह किसी भी जाति का हो। धर्म के नाम पर किए जाने वाले अवांछनीय कर्मकांड और अछूतों को दंडित करना बंद होना चाहिए। सच्चा वैदिक धर्म आम लोगों तक पहुंचना चाहिए। उन्होंने इन गलत धारणाओ के बारे में केवल बातें ही नहीं कीं, बल्कि उन्हें करके भी दिखाया। 19 मई, 1929 को मालवण में आयोजित पूर्वप्रसंग परिषद में सावरकर की अध्यक्षता में अछूतों को वेदों के अध्ययन का अधिकार दिया गया और यज्ञोपवीत (जनवे) भी वितरित किया गया। कुछ राजनीतिक हस्तियों का दावा है कि वे ब्रिटिश सरकार की कठपुतली थे; यदि ऐसा है, तो सरकार ने उनके साहित्य को क्यों दबाया?

उनके प्रकाशनों को सार्वजनिक डोमेन में न आने देना ब्रिटिश भय का स्पष्ट संकेत है, और कई राजनीतिक नेता आज भी ब्रिटिश विरासत का पालन करते हैं।

अंग्रेजों ने सावरकर की निम्नलिखित पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाया-

  1. मैजिनी की जीवनी (मराठी) – 1908।
  2. 1857 चे स्वातंत्र्यसमर (भारतीय स्वतंत्रता संग्राम) अंग्रेजी – 1909।
  3. अंग्रेजों ने 10 मई 1930 को डॉ. नारायणराव सावरकर द्वारा संचालित साप्ताहिक ‘श्रद्धानंद’ को बंद कर दिया. इस साप्ताहिक में स्वातंत्र्यवीर सावरकर के कई लेख प्रकाशित हुए थे।
  4. जुलाई 1931 में पंजाब सरकार ने सावरकर की उर्दू में जीवनी पर प्रतिबंध लगा दिया. बाद में तमिल, कन्नड़ और मराठी में भी जीवनी पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
  5. मराठी पुस्तक ‘माझी जन्मठेप’ पर 1934 में प्रतिबंध लगा दिया गया था. तमिल में उनकी जीवनी पर 24 अक्टूबर 1940 को प्रतिबंध लगा दिया गया था।
  6. नवंबर 1941 में, जी.पी. परचुरे द्वारा लिखित सावरकर की संक्षिप्त जीवनी पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।
  7. नवंबर 1943 में, श्री एल. करंदीकर द्वारा मराठी में लिखी गई सावरकर की जीवनी पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
वीर सावरकर ने सनातन धर्म और विज्ञान को कैसे जोड़ा

हिंदुत्व का जोरदार प्रचार और प्रस्तुति करने वाले स्वातंत्र्यवीर सावरकर का एक विशिष्ट पहलू विज्ञान के प्रति उनकी निष्ठा है। ‘विज्ञान के प्रति निष्ठा को बढ़ावा देना बुद्धिजीवियों का कर्तव्य और धर्म है’ कहते हुए सावरकर कहते हैं, ‘जिस अर्थ में हम सुधारक यह समझने में विफल रहे हैं कि हमारे हिंदू राष्ट्र को दबाने वाली इस जाति व्यवस्था को समाप्त किए बिना हिंदू राष्ट्र का उदय असंभव है, उस अर्थ में, हम, बुद्धिजीवियों, वैज्ञानिक सुधारकों को मानव बुद्धि को सभी प्रकार की धार्मिक बयानबाजी और भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहिए, चाहे वह वैदिक हो, बाइबिल हो, कुरानिक हो या पौराणिक हो – यह धर्म का पवित्र कार्य है और इसमें मानव जाति का कल्याण निहित है।’, स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने ऐसे शब्दों में विज्ञान के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त की है। ऐसा दृढ़ मत व्यक्त करते हुए, वे अपने सनातन धर्म को भी उतने ही दृढ़ शब्दों में व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं, ‘असतो मां सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय। साथ ही हमारा धर्म जो कहता है ‘ओम सहनाववतु सहनौभुनक्तु सहवीर्यं करवावहै’ या ‘सत्यमेव जयते’ या ‘दीपज्योतिर्नमोस्तुते’, विज्ञान के विरुद्ध नहीं जाता। यह विज्ञान का पूरक है। सावरकर के अनुयायी बाल जेरे कहते हैं, वीर सावरकर वैज्ञानिक सोच के थे। अध्यात्म उनकी निजी रुचि थी। लेकिन उनका मत था कि समाज के नियम अध्यात्म पर आधारित नहीं होने चाहिए। सावरकर कहते हैं, ‘सृष्टि के नियम और वैज्ञानिक सत्य जो आज मानव ज्ञान की पहुंच में आ गए हैं, उन्हें हम सनातन धर्म कहते हैं। प्रकाश, ऊष्मा, गति, गणित, ध्वनि, बिजली, चुंबकत्व, विकिरण, फिजियोथेरेपी, मशीनरी, मूर्तिकला के जो नियम आज ज्ञात हैं, वे ही सच्चा सनातन धर्म हैं… परिस्थितियां बदलने पर इन प्रतिबंधों को बदलना वांछनीय है।

इसलिए व्यक्ति के सभी सांसारिक व्यवहार, आचार-विचार, रीति-रिवाज, प्रतिबंध इस बात की कसौटी पर कसे जाने चाहिए कि वे इस दुनिया में उसके लिए लाभदायक हैं या नहीं। परिस्थिति के अनुसार उनमें परिवर्तन किया जाना चाहिए। ऐसे मानवीय व्यवहार शाश्वत नहीं हो सकते।’ (किर्लोस्कर: 1934 से 1937, सावरकर के सामाजिक विचार: पृष्ठ 41 से 52)
भारतीय दंड संहिता की धारा 51ए इस बात पर जोर देती है कि वैज्ञानिक मानसिकता, मानवता, जिज्ञासा और सुधार नागरिक के मौलिक कर्तव्यों का आधार हैं। इससे पता चलता है कि संविधान ने सावरकर के वैज्ञानिक विचारों को स्वीकार किया है।

भले ही कई राजनीतिक हस्तियां और कम्युनिस्ट वीर सावरकर का तिरस्कार करते हों, लेकिन स्वतंत्रता संग्राम में उनकी उपलब्धियां, हिंदुओं को एक साथ लाने की उनकी क्षमता, जाति व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई और उनके बहुमुखी चरित्र ने उन्हें राष्ट्रीय नायक बना दिया है। इस असाधारण व्यक्ति को नमन।

Topics: veer savarkarवीर सावरकरभारतीय स्वतंत्रता संग्रामडॉ. भीमराव आंबेडकरसावरकर और आंबेडकर संबंधसनातन धर्म
डॉ. पंकज जगन्नाथ जयस्वाल
डॉ. पंकज जगन्नाथ जयस्वाल
डॉ पंकज जगन्नाथ जयस्वाल, शिक्षाविद्, लेखक और स्तंभकार हैं [Read more]
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