कभी शरणार्थियों से परेशान रहा, कभी चलती थी गोलियां और अब मिट चुके ऐसे 'इलाके'! डेनमार्क ने आखिर कैसे किया यह सब ?
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कभी शरणार्थियों से परेशान रहा, कभी चलती थी गोलियां और अब मिट चुके ऐसे ‘इलाके’! डेनमार्क ने आखिर कैसे किया यह सब ?

डेनमार्क में अवैध शरणार्थियों के ऐसे इलाके थे, जो बहुत सघन थे और जहां पर डेनमार्क के लोग जा भी नहीं सकते थे

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
May 5, 2025, 05:59 pm IST
inविश्व

पूरा यूरोप इस समय अवैध अप्रवासियों की बढ़ती संख्या को लेकर परेशान है। डेनमार्क भी अपवाद नहीं था। वहां हजारों अवैध आप्रवासी रह रहे थे और उन्होंने अपने इलाके भी बना लिए थे। वे ऐसे इलाके थे, जो बहुत सघन थे और जहां पर डेनमार्क के लोग जा भी नहीं सकते थे।

मगर वर्ष 2019 में सरकार ने चुनावों से पहले यह वादा किया था कि वह डेनमार्क की पहचान को बरकरार रखते हुए अवैध अप्रवासन रोकेगी। उसने सत्ता में आने के बाद यह किया भी। एक समय में हजारों की संख्या में जहां आवेदन लंबित रहते थे, तो वहीं अब ऐसा नहीं है। डेनमार्क ने सबसे पहले बुर्का को प्रतिबंधित किया। ये वे मुस्लिम महिलाएं पहनती थीं, जो विदेशों से अपने शौहरों के साथ आई थीं और यह मुस्लिम पहचान की निशानी होती है। मगर अब डेनमार्क में वे भी बहुत कम दिखती हैं।

डेनमार्क ने अपने देश में शरण लेने के लिए कुछ कानून बनाए। उन कानूनों में सबसे पहला कानून था कि जो भी डेनमार्क में विदेशी है या आने वाला है, उसे सरकार की ओर से दिए जा रहे फ़ायदों को लेने के लिए डेनमार्क की डैनिश भाषा सबसे पहले सीखनी होगी, नहीं तो शरणार्थी का दर्जा समाप्त हो जाएगा।

डेलीमेल की एक रिपोर्ट के अनुसार डेनमार्क में Mjolnerparken कुछ समय पहले तक घेटो था, घेटो अर्थात छोटे-छोटे सघन निवास और वह भी गैर-पश्चिमी नागरिकों के। आए दिन गैंगवार होते थे। दिनदहाड़े गोलियां चलती थीं। यह सब अवैध शरणार्थी करते थे। इस इलाके में रहने वाले अपराधियों को वापस भेज दिया गया है। मूल रूप से फिलिस्तीनी इस्माइल सचबैता यहाँ पर एक एक दुकान चलाते हैं। डेलीमेल को उन्होंने बताया कि अब यह इलाका 99% सुरक्षित है। अब कुछ ही बंदूकें या गैंग रह गए हैं। अधिकतर यहां से चले गए हैं और अपराधियों को वापस भेज दिया गया है। डेनमार्क ने अपना वादा निभाया।

दरअसल अनियंत्रित शरणार्थियों के आने से यूरोपीय देशों की जनसांख्यिकी तो बदल ही रही है, साथ ही वहां की स्थानीय संस्कृति भी प्रभावित हो रही है। जो बाहर से आते हैं, उन्हें यूरोपीय मूल्यों के विषय में नहीं पता होता है। वे यूरोपीय लड़कियों का आदर नहीं करते हैं।

दो भिन्न स्थानों के सांस्कृतिक मूल्य एकदम अलग होते हैं और वे लोग एक दूसरे के साथ नहीं रह सकते हैं। जैसे पश्चिम में लड़कियां मनचाहे कपड़े पहनती हैं, तो वहीं शरणार्थी देशों से आने वाली महिलाएं बुर्का या नकाब आदि पहनती हैं। यह माना जाता है कि जो लड़की अपने आप को पूरी तरह से ढक कर रखेगी, वह अच्छे चरित्र की महिला है। और जो छोटे कपड़े पहनती हैं, वे “उपलब्ध” लड़कियां हैं।

महिलाओं को लेकर ही सोच में इस सीमा तक जमीन आसमान का अंतर है। यही कारण है कि तमाम यूरोपीय देशों में जहां पर भी अवैध शरणार्थियों की संख्या अधिक है, वहां श्वेत लड़कियां पीड़ित हैं। डेनमार्क में भी यह समस्याएं थीं, मगर उन्होंने इसे समाप्त किया। डेनमार्क की प्रधानमंत्री सुश्री मेटे फ्रेडरिकसन ने हाल ही में जोर देकर यह कहा था कि अनियंत्रित आव्रजन ‘यूरोप के दैनिक जीवन के लिए खतरा’ बन गया है और वह इस संख्या को शून्य के करीब लाना चाहती हैं।अनियंत्रित आव्रजन ‘यूरोप के दैनिक जीवन के लिए खतरा’ बन गया है और वह इस संख्या को शून्य के करीब लाना चाहती हैं।

डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने जो नीतियाँ बनाईं उनके केंद्र में डेनमार्क के कामकाजी वर्ग के जीवनयापन के साधनों और माध्यमों की रक्षा सुनिश्चित करना था। उनकी नौकरी की रक्षा करना और यह सुनिश्चित करना शामिल था कि देश में जो नए लोग आ रहे हैं, उनके बच्चों को ही स्कूल और कल्याणकारी प्रक्रियाओं का लाभ न मिलने लगे।

सरकार ने जो कदम उठाए, उनका फल भी बहुत जल्दी देखने को मिला। सरकारी आंकड़े दिखाते हैं कि डेनमार्क के स्कूल्स में कम उम्र के जो बच्चे प्रवेश ले रहे हैं, उनमें डेनमार्क के ही नागरिकों के बच्चे सबसे ज्यादा है। डेलीमेल यह कहता है कि प्रधानमंत्री के इन कदमों का लाभ यह हुआ कि डेनमार्क की दक्षिणपंथी पार्टी का प्रभाव बहुत कम हो गया, क्योंकि वह भी इन्हीं मुद्दों पर राजनीतिक प्रचार कर रही थी।

डेनमार्क के आंकड़ों के अनुसार पिछले दशक में शरण के लिए आवेदन करने वालों की संख्या में लगभग 90 प्रतिशत की गिरावट आई है। पिछले साल यह संख्या घटकर 2,333 रह गई, जबकि ब्रिटेन में यह संख्या रिकॉर्ड 108,138 पर पहुंच गई।

जहाँ वर्ष 2015 में शरणार्थियों के आवेदनों की संख्या  21,316 पहुँच गई थी, तो वहीं अब यह बहुत कम रह गई है। डेनमार्क की सरकार ने शरणार्थियों के लिए प्रतिकूल वातावरण पैदा किया और शरण लेने वाले जिन लोगों ने डेनमार्क सरकार के कानूनों का पालन नहीं किया, तो उनसे रहने का अधिकार छीन लिया गया, और हर प्रकार के लाभों से उन्हें वंचित कर दिया गया।

हालांकि ऐसा नहीं है कि अब वहाँ पर आप्रवासी नहीं हैं। कई ऐसे लोग हैं, जो डेनमार्क की भाषा नहीं समझते हैं, मगर चूंकि उनके अपने देश में हालात बहुत बुरे हैं, इसलिए उन्हें रहने की अनुमति है, जैसे ईरान की कुछ महिलाएं। सीरिया में चल रहे गृह युद्ध के कारण जो लोग डेनमार्क में थे, अब सीरिया में असद की सरकार जाने के बाद सीरिया के लोगों को वापस भेज दिया गया है।

अवैध प्रवासन जिस प्रकार से कम किया गया है, उनमें कठोर नियम शामिल हैं और यह भी सच है कि कुछ ऐसे भी लोग इसकी चपेट में आ गए हैं, जिन्हें शरण की आवश्यकता थी। डेलीमेल में कई लोगों की कहानियाँ हैं, जो अभी डीपोर्टेशन सेंटर में रह रहे हैं।

 

 

Topics: अवैध अप्रवासियोंयूरोपडेनमार्कअवैध शरणार्थी
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