रामनवमी विशेष : सनातन जीवन मूल्यों के सर्वोच्च प्रतिमान श्रीराम
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Ram Navami Special : सनातन जीवन मूल्यों के सर्वोच्च प्रतिमान मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का वनवास काल और लोकनायक बनने की यात्रा। जानें कैसे उन्होंने भारत से दक्षिण एशिया तक संस्कृति को जोड़ा

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Apr 6, 2025, 06:00 am IST
inविश्लेषण

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम यकीनन सनातन भारतीय जनमानस के उच्चतम आदर्श हैं; एक ऐसे लोकनायक जिनके चरित्र व व्यवहार की मर्यादा का कोई सानी नहीं। राष्ट्र व राष्ट्रीयता उनके व्यक्तित्व के कण-कण से प्रतिबिंबित होती है। साम्प्रदायिक वैमनस्य के पोषक लोगों की जमात भले की उन पर केवल हिन्दू धर्मावलम्बियों का आराध्य होने का तमगा लगाये; किन्तु साम्प्रदायिकता के इस चश्मे को दरकिनार कर यदि ईमानदारी से उनके चारित्रिक गुणों का विश्लेषण किया जाये तो साफतौर पर स्पष्ट हो जाएगा कि श्री राम सही मायने में इस भारतभूमि के संस्कृति पुरुष हैं। जन्म से लेकर लोकलीला के संवरण तक उनके जीवन के प्रत्येक घटनाक्रम में मानवीय आदर्श की पराकाष्ठा प्रतिबिम्बित होती है। उन्होंने मानव मात्र के लिए मर्यादा पालन का जैसा आदर्श जनसमाज के समक्ष प्रस्तुत किया; वैसा कोई दूसरा उदाहरण संसार के इतिहास में नहीं मिलता। श्रीराम के लोकनायक चरित्र ने जाति, धर्म और संप्रदाय और क्षेत्र की सीमाओं को लांघ कर जन-जन को अनुप्राणित किया। यही वजह है कि हिमालय से कन्याकुमारी तक ही समूचे भारतवर्ष में नहीं अपितु दक्षिण एशिया में थाईलैण्ड, मलेशिया, इण्डोनेशिया, मॉरीशस, फिजी, त्रिनिडाड, सूरीनाम, कंबोडिया, म्यांमार आदि से लेकर मध्य एशिया चीन तक व यूरोप में रूस से लेकर फ्राँस, इंग्लैण्ड तथा अमेरिका आदि सुदूर देशों में भी प्रभु श्रीराम का नाम असाधारण श्रद्धा का केंद्रबिंदु बना हुआ है।

लोकनायक श्रीराम का लोकमंगलकारी वनपथ      

प्रभु श्रीराम के राजकुमार से मर्यादा पुरुषोत्तम बनने की यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव उनका वनवास काल माना जाता है। 14 वर्ष के वन प्रवास में उनके जीवन में बहुत कुछ ऐसा घटा जिसने उन्हें लोकनायक राम के रूप में रूपांतरित कर दिया। इसीलिए भारतीय मनीषा कहती है कि राम ‘वन’ (जंगल) गये तो ‘बन’ (लोकनायक) गये। भगवान श्रीराम को दैवीय शक्ति प्राप्ति थी। वे चाहते तो एक इशारे में कुछ भी कर सकते थे; लेकिन वन प्रवास के दौरान उन्होंने अपने शौर्य से न केवल ताड़का, मारीच सुबाहु व खर-दूषण जैसी अनेक मायावी राक्षसी शक्तियों का अंत कर ऋषि-मुनियों और पीड़ित वनवासियों को भयमुक्त किया अपितु प्रेमपूर्ण मर्यादित व्यवहार से वन प्रांत के कमजोर, गरीब और सर्वहारा वर्ग को संगठित कर समाज को सुदृढ़ व सशक्त बनाने का अनुकरणीय उदाहरण भी जन सामान्य के सामने प्रस्तुत किया। वनवासी राम का कर्तव्य परायण सभी के लिए अद्भुत प्रेरणा स्रोत है। वन में राम, लक्ष्मण सीता परिश्रम से जीवन यापन करते हैं। स्वयं कुटी बनाते हैं, स्वयं ईंधन की लकड़ी, फल, कन्दमूल लाते हैं, सीता स्वयं भोजन बनाती हैं। ज्ञात हो कि वन में एक से एक त्रिकालदर्शी ऋषि मुनि रहते थे जो सहज ही अपनी दिव्य दृष्टि से उनको सीता हरण की पूरी जानकारी दे सकते थे और प्रभु राम सहज ही लंकापति रावण का वध कर अपनी अर्धांगिनी सीता माता को मुक्त करा सकते थे; किन्तु उन्होंने वैसा नहीं किया। कारण कि उन्हें तदयुगीन पथभ्रांत समाज को एक दूरगामी सन्देश देना था। वनवास काल में उनकी कुशल प्रबंधन और संगठन क्षमता उजागर होती है। श्री राम वन प्रांत के जटायु, सुग्रीव, हनुमान आदि साधारण वानर वनवासियों की मदद से अल्प साधनों में स्वयं के पराक्रम से उस युग की सर्वाधिक शक्तिशाली आसुरी शक्ति त्रिलोक विजेता रावण को पराजित अन्याय पर न्याय की विजय पताका लहरायी और संगठन की शक्ति की महत्ता स्थापित की। वनवास काल में प्रभु श्रीराम ने उत्तर से दक्षिण तक संपूर्ण भारत को एकता के सूत्र में बांधा। वे एक चक्रवर्ती सम्राट के पुत्र थे जो राजा बनने वाले थे किन्तु पिता के वचन का मान रखने के लिए उन्होंने खुशी-खुशी वन पथ चुन लिया। वे चाहते तो केवट, निषादराज व शबरी जैसी छोटी जातियों को गले लगाये बिना भी अपना वनवास गुजार सकते थे क्यूंकि यह भेदभाव तद्युदीन समाज की सामान्य व्यवस्था थी किन्तु उन्होंने इस कुव्यवस्था का खंडन कर पिछड़ी जाति के लोगों को गले लगाकर अपने आचरण से समाज में सामाजिक समरसता का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। श्रीराम का वनपथ के सच्चे लोकनायक का पथ है। वन के प्रत्येक प्राणी की मुश्किल उनकी अपनी मुश्किल है। जब प्रभु श्रीराम अयोध्या से चले तो केवल पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण साथ में थे; पर जब वनवास काल पूरा कर अयोध्या वापस लौटे तो पूरी सेना के साथ; एक आतातायी के साम्राज्य को नष्ट कर एक नीतियुक्त साम्राज्य की स्थापना करके। यही वजह है सदियां बीत जाने के बाद भी भारतीय जनमानस में श्रीराम की स्वीकार्यता में रंचमात्र भी अंतर नहीं आया है।

वाल्मीकि रामायण में उल्लेख है वनवास काल में अत्रि ऋषि के कहने पर श्रीराम ने वन्य क्षेत्र के राक्षसों का अंतकर अपने वनवास के 11 साल चित्रकूट में बिताये थे। तत्पश्चात सुतीक्षण मुनि के कहने पर महामुनि अगस्त्य का आशीर्वाद लेने उनके आश्रम नासिक (दक्षिण भारत) गये थे जिन्होंने उन्हें दंडकारण्य में रहने की सलाह दी थी। आज भी वहां के नदियों, पहाड़ों, सरोवरों एवं गुफाओं में राम से जुड़े सबूतों की भरमार मिलती है। इसी दंडकारण्य में आंध्रप्रदेश का भद्राचलम शहर गोदावरी नदी के तट पर भद्रगिरि पर्वत पर निर्मित सीता-रामचंद्र का भव्य मंदिर के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इसी भद्राचलम के निकट पंचवटी नामक स्थान से सीता जी के अपहरण के बाद जहाँ रावण और जटायु का युद्ध हुआ वहाँ आज देश का अकेला जटायु का मंदिर है। इसी तरह   सीता की खोज में निकले श्रीराम मतंग मुनि के आश्रम जाकर भीलनी जाति की महातपस्वनी माता शबरी के झूठे बेर खाकर जिस ‘नवधा भक्ति’ का उपदेश देते हैं, वह भक्तियोग की अमूल्य निधि मानी जाती है। वर्तमान में केरल के विश्व प्रसिद्ध ‘सबरीमला मंदिर’ के निकट माता शबरी का यह आश्रम स्थित है।

अनेक देशों में जीवंत हैं भगवान श्रीराम

सत्य, सौहार्द, दया, करुणा, मैत्री, त्याग, आस्था, आदर्श, तप और मर्यादा के महानतम प्रतीक के रूप में भगवान श्रीराम आज दुनिया के अनेक देशों में पूर्ण प्रमाणिकता के साथ जीवंत हैं। दक्षिण पूर्व एशिया के देश थाईलैण्ड, वियतनाम, इण्डोनेशिया, कम्बोडिया और कैरेबियन देश वेस्टइंडीज, सूरीनाम व मॉरिशस में रामायण और श्रीराम से संबंधित अनेक प्रसंग जीवंत हैं। मध्य पूर्व ईराक, सीरिया, मिश्र सहित यूरोप इंग्लैड, बेल्जियम और मध्य अमेरिका के होण्डुरास सहित शेष विश्व के कई देशों में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का समग्र रूप मौजूद है। जैसे ईरान-इराक की सीमा पर स्थित बेलुला में लगभग 4000 वर्ष प्राचीन श्रीराम से संबंधित गुफा चित्र मिले हैं, वैसे ही मिस्र में 1,500 वर्ष पूर्व राजाओं के नाम तथा कहानियां ‘राम‘ की भांति ही मिलती हैं। इसी तरह इटली में पांचवी शताब्दी ईसा पूर्व रामायण से मिलते-जुलते चित्र दीवारों पर मिलते हैं। जानकारों की मानें तो प्राचीन इटली की एट्रस्कैन सभ्यता पर भी रामायण संस्कृति का गहरा प्रभाव था। जिसका प्रमाण हैं इटली की चित्रकला में राम कथा की राम लक्ष्मण सीताजी के वन गमन, सीताहरण, लव-कुश द्वारा अश्वमेघ का घोड़ा पकड़ना, हनुमानजी द्वारा संजीवनी बूटी लाने की प्रमुख घटनाओं का खूबसूरत चित्रांकन। इसी तरह प्राचीन इटली के ‘रावन्ना‘ क्षेत्र से स्वर्ण मृग मारीच, रावण द्वारा आकाशमार्ग से सीताहरण तथा रावण व जटायु युद्ध की भी कलाकृतियां प्राप्त हुई हैं। जानकारों के अनुसार ब्रिटेन, फिलीपींस, कम्बोडिया और पाकिस्तान आदि देशों में भी श्रीराम की संस्कृति के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं जो श्रीराम की वैश्विक लोकप्रियता को प्रमाणिक करते हैं।

राष्ट्र का प्राण तत्व है राम नाम

भारत की महान ऋषि मनीषा ने ‘राम’ नाम को राष्ट्र का प्राणतत्व यूं ही नहीं माना है। राम तत्व की आध्यात्मिक व्याख्या करते हुए भारतीय मनीषा कहती है कि राम का अर्थ है स्वयं के अंतस का प्रकाश; स्वयं के भीतर की ज्योति। गायत्री महाविद्या के महामनीषी पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के अनुसार मनुष्य के ह्रदय का प्रकाश ही राम है जो हर्ष और विषाद दोनों ही अवस्थाओं में व्यक्ति के अंतस को प्रकाशमान रखता है। बताते चलें कि सनातनधर्मियों के बीच अभिवादन व प्रणाम के हर रूप में ‘राम-राम’ के प्रचलन के पीछे हमारे ऋषियों का गूढ़ ज्ञान विज्ञान निहित है। विख्यात मानस मनीषी प्रेम भूषण जी महराज राम नाम की महत्ता की अनूठी व्याख्या करते हुए कहते हैं-राम अर्थात र+अ+म। हिंदी वर्णमाला में र अक्षर 27 नंबर, अक्षर 2 नंबर और म अक्षर 25 नंबर पर आता है। इन तीनों अक्षरों का योग 54 है और दो बार राम कहने से यह योग 108 हो जाता है। इस तरह कोई व्यक्ति राम-राम कहता है तो वह बिना किसी यत्न के राम नाम का एक माला जाप कर लेता है। इससे व्यक्ति के अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यही वजह है कि सनातन हिन्दू धर्म में जन्म से लेकर जीवन की अंतिम यात्रा तक ‘राम’ नाम का उदघोष किया जाता है। शास्त्रज्ञ कहते हैं कि काशी में देह त्यागने वाले को मोक्ष प्रदान करने वाले देवाधिदेव महादेव सदा इसी राम नाम का जप किया करते हैं; इसीलिए हिन्दू संस्कृति में राम नाम को ‘तारक मंत्र’ की संज्ञा दी गयी है। भारतीय संतों व चिंतकों के अनुसार समय के प्रवाह में हमारी भारतभूमि ने अनेक झंझावात झेले, विपदाएं सहीं, भाषा-पंरपरा और यहां तक कि अपनी भूमि भी खोयी लेकिन एक नाम जो सनातनी भारतीयों के मन से कभी विस्मृत नहीं हुआ; वह है- राम।      यही वजह है कि भारत के सनातन हिन्दू धर्मावलम्बियों का अटूट विश्वास है कि भले ही सारे सेतु ( उपाय) टूट जाएं पर राम नाम का सेतु अनन्त काल तक सदा सर्वदा कायम रहेगा।

Topics: दंडकारण्य श्रीराम स्थलSita Ram Bhadrachalam Templeभगवान श्रीराममर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम इंटरनेशनल एयरपोर्टरामनवमी विशेषRam Navami specialRam Navami 2025श्रीराम का वनवासRamayana Global InfluenceShri Ram Global Legacyराम नाम की महिमा
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