यूके एक बार फिर से सुर्खियों में है। वहाँ पर इस समय Two Tier Justice अर्थात दो परत वाले न्याय पर विवाद छिड़ा हुआ है। दरअसल मार्च के आरंभ में सेन्टन्सिंग काउंसिल ने इंग्लैंड और वेल्स में न्यायालयों को ये अनुशंसाएं की थी कि यदि अपराधी किसी जातीय, सांस्कृतिक या धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय का है तो एक प्री-सेंटेन्स रिपोर्ट अर्थात निर्णय देने से पूर्व रिपोर्ट पर ध्यान देना आवश्यक करें।
अर्थात इसका अर्थ यह हुआ कि जो लोग जातीय, नस्लीय या फिर धार्मिक रूप से अल्पसंख्यक हैं, तो उन्हें दंड देने में कुछ नरमी बरती जाएगी। यदि दंड देने में इन्हें नरमी दी जाएगी तो फिर कठोर दंड किसे दिया जाएगा? जाहिर है कि दंड में भी लेबर सरकार में भेदभाव किया जा रहा है और इसे लेकर सोशल मीडिया में लोगों का गुस्सा झलक रहा है। वे यह कह रहे हैं कि यह तो पूरी तरह से ईसाई और श्वेत पुरुषों के प्रति अन्याय है।
लेबर सरकार में जस्टिस सेक्रेटरी शबाना महमूद ने हालांकि इन अनुशंसाओं का विरोध किया था, मगर चूंकि यह परिषद एक स्वायत्त परिषद है, इसलिए वे इन दिशानिर्देशों के लिए खुद कुछ नहीं कर सकती हैं। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर का एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें वे यह कह रहे हैं कि इन अनुशंसाओं को लेकर सारे विकल्प खुले हुए हैं।
दरअसल इन नीतियों के सामने आने से ही इनका विरोध आरंभ हो गया था। आम लोगों ने, नेताओं ने प्रश्न उठाने आरंभ किये थे कि दंड देने में ऐसी दोहरी नीति कैसे चलाई जा सकती है? शैडो जस्टिस सेक्रेटरी रॉबर्ट जेनरिक ने इसका विरोध तभी किया था, जब काउंसिल ने इस नीति की अनुशंसा की थी। रॉबर्ट जेनरिक ने स्काईन्यूज के साथ बात करते हुए कहा यथा कि यह टू टायर जस्टिस व्यवस्था, ईसाइयों और श्वेत पुरुषों के विरुद्ध है। यह भेदभाव है।
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उन्होनें जस्टिस सेक्रेटरी शबाना महमूद पर आरोप लगाते हुए कहा था कि या तो यह नीति जस्टिस सेक्रेटरी की ही नीति थी, और फिर उन्होनें अपना विचार बदल लिया, मगर यह उनकी ही नीति थी – या फिर वह सो रही थीं।“
उन्होनें काउंसिल पर आरोप लगाया था कि वे जातीय अल्पसंख्यक, सांस्कृतिक अल्पसंख्यक और/या धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय से आने वालों के लिए हिरासत की सजा की संभावना कम कर रहे हैं।
इसमें ट्रांस-जेंडर लोगों और गर्भवतरी महिलाओं एवं साथ ही 18 से 25 वर्ष के युवाओं के प्रति भी प्री-सेंटेन्सिंग रिपोर्ट पर विचार करने की बात कही गई है।
वहीं काउंसिल के अध्यक्ष ने कहा था कि पीएसआर न्यायालय को अपराधी के विषय में जानकारी प्रदान करने के लिए है। यह सजा का निर्धारण नहीं करती, सजा तो स्वतंत्र ज्यूरी ही करेगी।
काउंसिल की ये अनुशंसाएं एक अप्रेल से लागू हो जाएंगी। इसे लेकर सोशल मीडिया में भी लोग आकर अपनी बात कह रहे हैं और मार्च के आरंभ से ही विरोध कर रहे हैं। इसे लेकर स्वतंत्र पत्रकारों ने भी आपत्ति दर्ज कराई थी। एक स्वतंत्र पत्रकार डैरेन ग्राइम्स ने लिखा था कि
“यदि आप किसी ‘जातीय, सांस्कृतिक या धार्मिक अल्पसंख्यक’ से हैं, तो न्यायालयों को सज़ा सुनाने से पहले इस पर विचार करना चाहिए। कुछ के लिए एक नियम, बाकी सभी के लिए दूसरा। न्याय अंधा नहीं है
https://Twitter.com/darrengrimes_/status/1897352873543147528?
लोगों ने प्रश्न किये थे कि क्या कारण है कि आप्रवासियों को कम दंड मिलने की अनुशंसा की गई है और ब्रिटिश नागरिकों को अधिक? क्या केवल उनके ब्रिटिश होने के कारण?
https://Twitter.com/JohnHann0404/status/1905273784333987907?
हालांकि क्षमा महमूद इस बात से लगातार इनकार कर रही हैं कि दंड में दो लेयर वाली व्यवस्था की वे पक्षधर नहीं हैं। मगर लोगों ने कई निर्णयों की बात करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा कि यह तो पहले से ही लागू है, जिसमें एक अपराध के लिए बाहर से आए लोगों को कम सजा मिलती है और ब्रिटिशर्स को अधिक।
There is 100% a two tier justice system. Stop lying. pic.twitter.com/iCG3nfyIgu
— Thierry’s Boots (@Thierrysboots) March 28, 2025
ऐसा भी उन गाइड लाइंस में है कि जो जातीय अल्पसंख्यक हैं, जो कथित रूप से किसी ट्रॉमा से गुजर रहे हैं, उन्हें जमानत मिलने में प्राथमिकता मिलनी चाहिए, और वे जिस पीड़ा को झेलकर आए हैं, उन्हें ध्यान में रखना चाहिए।
🚨 INSANE: Two-tier justice is getting worse.
Ethnic minority suspects are being given *priority* by judges considering bail under new guidelines issued by the Ministry of Injustice.
Shabana Mahmood laughably said there would be no two-tier justice on her watch.
She lied. pic.twitter.com/H25NXrGtbe
— Lee Harris (@LeeHarris) March 30, 2025
लोगों का कहना है कि बहुत ही सुनियोजित श्वेत-विरोधी नस्लवाद पश्चिम में नीति के रूप में स्थापित हो गया है। नस्लवादी डाइवर्सिटी, इन्क्लूसिवनेस और आइडेंटिटी नीतियों ने पूरे यूरोप को अपने कब्जे में ले लिया है।
जस्टिस सेक्रेटरी ने हालांकि सेंटेसिंग काउंसिल से उन गाइडलाइंस को वापस लेने का अनुरोध किया था, जिसे काउंसिल ने अस्वीकार कर दिया और एक अप्रेल से इन नियमों के लागू होने का रास्ता साफ हो गया है।
अब इसे लेकर ब्रिटेन की सरकार ने कहा है कि वे इन गाइड लाइंस को रोकने के लिए कानून तक पारित कराने तक के सारे विकल्पों पर विचार कर रही है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर का कहना है कि उन्हें काउंसिल के रुख से निराशा हुई है और वे हर प्रकार के विकल्प पर विचार कर रहे हैं।
वहीं लोगों का कहना है कि यदि सरकार को इतनी ही चिंता होती, तो जब इनकी घोषणा हुई थी, तभी से इन परिवर्तनों को रोकने के लिए वह कदम उठा सकती थी, अब जब इन्हें लागू करने का समय आ गया है तो ये दिखावा क्यों?

















