ब्रिटेन से जापान तक घटती जन्मदर: क्या आप्रवासियों पर रहना पड़ेगा निर्भर?
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ब्रिटेन से जापान तक घटती जन्मदर: क्या आप्रवासियों पर रहना पड़ेगा निर्भर?

ब्रिटेन, जापान समेत कई देशों में जन्मदर में तेजी से गिरावट आई है। इससे इन देशों को आप्रवासियों पर जनसंख्या संतुलन के लिए निर्भर रहना पड़ रहा है।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Mar 31, 2025, 07:46 am IST
in विश्व, विश्लेषण
Falling birth rate

प्रतीकात्मक तस्वीर

एक शोर मचता है कि विश्व की जनसंख्या बढ़ रही है और शीघ्र ही जनसंख्या कम करने के उपाय करने चाहिए। परंतु फिर यह भी बहुत आश्चर्यजनक है कि विकसित और विकास की ओर अग्रसर देशों की जनसंख्या में कमी आ रही है और यह कमी इस सीमा तक है कि उन्हे अपने देश में औद्योगिक विकास आदि के लिए बाहर से लोग बुलाने पड़ रहे हैं। बाहर से लोग ही नहीं बुलाने पड़ रहे हैं, बल्कि उन्हीं की आने वाली संतानों पर निर्भर होना पड़ रहा है।

ब्रिटेन से भी ऐसी ही रिपोर्ट्स आई हैं। टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट के अनुसार उम्र के ढलते हुए पड़ाव पर बच्चे पैदा करने के कारण ब्रिटेन को अपनी जन्मदर सुधारने के लिए अप्रवासियों पर निर्भर होना पड़ सकता है।

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में जरावस्था (gerontology) की प्रोफेसर सारा हार्पर ने लॉर्ड्स के आर्थिक मामलों की समिति को यह बताया कि प्रति माता कम से कम 2.1 बच्चों का जो अनुपात है, जो यूके के लिए अपनी जनसंख्या को बनाए रखने के लिए आवश्यक है, वह हाल फिलहाल लौटने वाला नहीं है। इसके स्थान पर यूके और अन्य बूढ़े हो रहे देशों को उन महिलाओं पर निर्भर होना होगा, जो बाहर से आकर बसी हैं, जिससे कि वह जनसंख्या वृद्धि को बढ़ावा दे सके। ऐसी ही समस्या से जापान भी जूझ रहा है। वहाँ पर भी जनसंख्या दर बहुत तेजी से कम हो रही है और बाहर से लोग वहाँ के औद्योगिक विकास को जारी रखने के लिए आ रहे हैं। ब्रिटेन में जहां ब्रिटेन की महिलाओं द्वारा बच्चों को जन्म देने की दर 1.44 प्रति माता तक पहुँच गई है, तो वहीं बाहर से आकार बसी महिलाओं में जन्मदर 2.03 बच्चे प्रति माता है।

इससे पहले जनवरी 2025 में रिपोर्ट आई थी कि ब्रिटेन देश में जनसंख्या बढ़ाने के लिए विदेशी माताओं पर निर्भर है। जीबी न्यूज के अनुसार वर्ष 2022 और 2023 के बीच, विदेश में जन्मी माताओं के जन्म में 2.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई। यह वृद्धि विशेष रूप से पश्चिमी अफ्रीका की माताओं द्वारा संचालित थी, जहाँ जन्मों में 32.5 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। भारतीय माताओं के जन्मों में 21.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि बांग्लादेश की माताओं में 12.6 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई।

ऐसा नहीं है कि ब्रिटेन ही इससे जूझ रहा है। जापान के साथ ही चीन भी इस समस्या से जूझ रहा है और हाल ही में ऐसे समाचार आए थे जिनमें चीन द्वारा अपने यहाँ पर जनसंख्या में वृद्धि करने के लिए तमाम उपायों की बात की गई थी। कनाडा भी इस समस्या से जूझ रहा है।

हालांकि यह भी आँकड़े कहते हैं कि विदेशी माताओं का जन्मदर अनुपात पिछले दशक की तुलना में थोड़ा कम हुआ है, परंतु यह ब्रिटेन की माताओं की तुलना में अभी भी बहुत अधिक है। कई विशेषज्ञों का यह मानना है कि जैसे ही बाहर से आई महिलाओं को बेहतर शिक्षा मिलती है और आय के स्तर में वृद्धि होती है, वैसे ही वे भी बच्चे देर से पैदा करने की तरफ अग्रसर हो जाती हैं।

यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने वाली महिलाएं उसी समय अपना जीवन आरंभ करती हैं, जब उनकी पढ़ाई पूरी हो जाती है और उसके बाद ही वे बच्चे का निर्णय लेती हैं। विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि विदेशी माताओं में अधिक जन्मदर का एक यह भी कारण है कि आप्रवासी भारी संख्या में अपने जीवनसाथी और परिवारों को ला रहे हैं।

ब्रिटेन की इस रिपोर्ट के आधार पर एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि चूंकि किसी भी देश की स्थिरता और संस्कृति को निर्धारित करने वाले और बनाए रखने वाले तत्व उसके अपने लोग होते हैं, और यदि ऐसे में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ने लगे जो वहाँ की संस्कृति से नाता नहीं रखते हैं तो क्या होगा?

इस प्रश्न का उत्तर तो समय के गर्भ में है।

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