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स्वाभिमान और स्वावलंबन का प्रतीक ‘भारत’

यह राष्ट्र हमारे स्वावलंबन और हमारे स्वाभिमान को दर्शाता है। यह हमारी पहचान का मूल है। इसमें गुंथी-बुनी सांस्कृतिक एकता हमें राष्ट्रभाव से जोड़ती है।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Mar 22, 2025, 12:55 pm IST
in सम्पादकीय
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने एक कार्यक्रम में इंडिया बनाम भारत के विमर्श का उल्लेख किया। इसके बाद मीडिया में इस विषय पर नए सिरे से चर्चा शुरू हुई। यह आवश्यक भी है, क्योंकि अक्सर लोगों को यह भ्रम रहता है कि संवैधानिक रूप से हिंदी में ‘भारत’ और अंग्रेजी में ‘इंडिया’ बोलने की बाध्यता है। जबकि ऐसा नहीं है। ऐसे में प्रश्न यह भी उठता है कि क्या दुनिया में कहीं ऐसा है कि किसी देश का संविधान उसके दो नामों का प्रावधान करता हो!

हितेश शंकर

वास्तव में एक देश का नाम एक भाषा में अलग और दूसरी भाषा में अलग उच्चारित किया जाए, इसे ठीक किए जाने की बात बार-बार उठती रही है।

वैसे भी, भारत बनाम इंडिया की बहस केवल एक नामकरण का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह हमारी पहचान, इतिहास और स्वाभिमान की खोज का प्रतीक है। यह देश एक भू-राजनैतिक रूपरेखा भर नहीं, भू-सांस्कृतिक राष्ट्र है, जो अचानक से नहीं उभरा बल्कि शाश्वत उपस्थिति रखता है। भारत केवल एक शब्द नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है।

दरअसल, भारत बनाम इंडिया की विसंगति उनके चलते आई, जिनके पास भारत को समझने की दृष्टि नहीं थी। भारत को खोजते हुए जो भी लोग बाहर से यहां आए, उन्होंने इसका अपनी समझ के अनुसार नामकरण करने की चेष्टा भी की। इनमें से कुछ को लगता था कि भारत को उन्होंने खोजा है और उनकी तरह सभी लोग यहां बाहर से ही आए हुए हैं।

वास्तव में ऐसा नहीं है। जब हम किसी सभ्यता और राष्ट्र की बात करते हैं तो वह केवल भूमि का एक टुकड़ा नहीं होता। वह मानवता का जीवंत प्रलेख और प्रवाह होता है। वहां की संस्कृति, परंपराएं, उस राष्ट्र में रहने वाले उसे प्राणवान बनाते हैं। भारत की भी हमेशा से ऐसी ही सभ्यता और संस्कृति रही है। जो भी लोग यह समझते हैं कि भारत 1947 में ही बना और लोगों ने इसके बाद ‘इंडिया’ नाम को अंगीकार किया, वे गलत हैं। यदि भारत पहले से नहीं था, तो ईस्ट इंडिया कंपनी के नाम में ‘इंडिया’ किस स्थान का संकेतक था? वह कंपनी जिसकी खोज में और जिस स्थान पर आई वह क्या था? निश्चित ही भारत!

इसका तो सीधा अर्थ यही हुआ न कि यहां पहले से वह सब कुछ था, जिसकी तलाश में बाहरी लोग यहां खिंचे चले आते रहे। 1498 में जब वास्को डी गामा अफ्रीका से भारत की तरफ चला तो जिस समुद्री रास्ते पर वह चला, उस रास्ते का नाम ही था ‘केप आॅफ गुड होप’ यानी एक ऐसा रास्ता जो आशा जगाता है। इस रास्ते पर जिस उम्मीद और रोशनी की बात की जाती थी, वह आशा दुनिया के एक सिरे पर स्थित ‘भारत’ ही तो जगा रहा था।

इतिहास को तोड़—मोड़कर प्रस्तुत करने वाले वामपंथी इतिहासकार हमेशा से यही कहते आए कि भारत की खोज वास्को डी गामा ने की थी। जबकि वास्को डी गामा ने अपनी यात्रा के बारे में स्वयं लिखा है कि रास्ते में उसे कन्हाई नाम का एक नाविक मिला, जिसने उसे बताया कि यह रास्ता भारत की ओर जाता है। यानी भारत की तो बात छोड़िए, जो इसके बारे में बताते रहे उन्हें किनारे कर पूछने वालों को ही इसका जानकार और ‘गाइड’ बता दिया गया।

उस समय ज्ञान, विज्ञान कृषि, व्यापार आदि में भारत जितना उन्नत था, उतना विश्व का कोई देश नहीं था। तभी दुनियाभर से लोग भारत को खोजते हुए यहां आते थे। 1600 ईस्वी में भारत का वैश्विक व्यापार में 23 प्रतिशत हिस्सा था, जो स्पष्ट करता है कि भारत केवल कृषि प्रधान देश नहीं था, बल्कि औद्योगिक और व्यापारिक रूप से भी अत्यंत विकसित था। वस्त्र उद्योग, धातु विज्ञान, आभूषण निर्माण, वास्तुशिल्प, जहाज निर्माण आदि में भारत ने वैश्विक स्तर पर अपनी श्रेष्ठता साबित की थी।

भारत की प्राचीन शिक्षा प्रणाली अत्यंत उन्नत थी। तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय पूरे विश्व में प्रसिद्ध थे। बाहरी आक्रांताओं और औपनिवेशिक शासन के दौरान इस ज्ञान प्रणाली को व्यवस्थित रूप से नष्ट किया गया।

‘भारत’ की आत्मा उसकी संस्कृत, प्राकृत, पालि, तमिल, तेलुगु, ब्राह्मी जैसी अनेक प्राचीन भाषाओं और लिपियों में बसती है। इन भाषाओं में विकसित साहित्य और ज्ञान भारतीय सभ्यता की बौद्धिक समृद्धि को दर्शाते हैं। वहीं, ‘इंडिया’ अंग्रेजी और पश्चिमी विचारधारा से प्रभावित सीमित संकीर्ण दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें भारतीय भाषाओं और परंपराओं को दोयम दर्जे का बना दिया गया।
ज्ञान परम्परा की दृष्टि से कहें तो ‘भारत’ वह है जिसने इसे ‘इंडिया’ कहे जाने से बहुत पहले से गणित, खगोलशास्त्र, योग, दर्शन और विज्ञान के क्षेत्र में हजारों वर्षों तक योगदान दिया। भारत ने शून्य की खोज, सौर मंडल के नियम, चिकित्सा विज्ञान (चरक और सुश्रुत) और शल्य चिकित्सा के क्षेत्रों में असाधारण उपलब्धियां हासिल की थीं।

वहीं, ‘इंडिया’ उस मानसिकता का प्रतीक है, जो पश्चिमी प्रभाव और औपनिवेशिक प्रभुत्व के तहत भारत को केवल एक कमजोर इकाई और उपभोक्ता मंडी के रूप में देखती रही।

भारत बनाम इंडिया के विमर्श को इसके विभाजन की फांस से पढ़िए। पाकिस्तान के मेहरगढ़ से प्राप्त 6000 वर्ष पुराना पहिया यह दर्शाता है कि भारतीय धातु विज्ञान और प्रौद्योगिकी अत्यंत प्राचीन है।

भारत बनाम इंडिया के विमर्श को अनेक सभ्यताओं के टकराव के रूप में देखने की बजाए समवेत उन्नत गाथा के पन्ने पलटिए। कीझादी सभ्यता (तमिलनाडु) और पांडु राजार ढिबी (बंगाल) का सिंधु घाटी सभ्यता के समकालीन होना यह स्पष्ट करता है कि भारतीय उपमहाद्वीप में समानांतर रूप से उन्नत सभ्यता विकसित थी।

भारत बनाम इंडिया के विमर्श को आर्य आक्रमण के फर्जी सिद्धांत की परत उतारते हुए पढ़िए। तमिलनाडु के कीझादी में मिले 4,500 वर्ष पुराने लोहे ने यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय धातुकर्म कथित ‘आर्य आक्रमण’ के सिद्धांत से कहीं अधिक पुराना था।
ध्यान दीजिए, देश के लिए राजनीतिक नक्शा एक बात है, किंतु यह तथ्य है कि ‘भारत’ केवल नक्शे पर खींचीं राज्यों की लकीरों का निर्जीव गुच्छा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना रखने वाला जीवंत, परस्पर अनन्य भाव से जुड़ा राष्ट्र है।

यह राष्ट्र हमारे स्वावलंबन और हमारे स्वाभिमान को दर्शाता है। यह हमारी पहचान का मूल है। इसमें गुंथी-बुनी सांस्कृतिक एकता हमें राष्ट्रभाव से जोड़ती है।

उदाहरण के लिए, कन्याकुमारी भारत के आखिरी छोर पर है। इस कन्याकुमारी का अर्थ क्या है? तमिलनाडु में कन्याकुमारी वह जगह है, जहां भगवान शिव का वरण करने के लिए तपस्या करते हुए मां गौरा, गौरा से अपर्णा हो गई थीं। उन्होंने पहले खाना—पीना त्यागा और पेड़ों से गिरे हुए पत्ते खाकर तपस्या करना जारी रखा। फिर उन्होंने पत्तों का भी त्याग कर दिया। जिस जगह उन्होंने शिव को पाने के लिए कठिन तपस्या की, उस जगह का ही नाम कन्याकुमारी पड़ा। कन्याकुमारी दक्षिण में है, जहां बैठकर वह शिव को पाने के लिए तप कर रही हैं। वह तप कर रही हैं उत्तर भारत में कैलाश पर बैठे भगवान शिव को पाने के लिए।

जानते हैं उस कन्याकुमारी के पिता का नाम क्या था -भरत!
इस देश को औपनिवेशिक चश्मे से देखने या उत्तर—दक्षिण में बांटने वाली दृष्टि वाले लोग इस विषय को छूना ही नहीं चाहते कि नाम के पीछे कौन सी सांस्कृतिक कड़ियां जुड़ती हैं। निश्चित ही, नाम को लेकर कुछ का कुछ साबित करने के हठ दुराग्रह की हद तक बढ़े हुए हैं। किन्तु यह जिद समय के साथ और समाज की पहल से टूटेगी जरूर।

आज भारत पुन: अपने गौरव को प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर है। विज्ञान, अंतरिक्ष अनुसंधान, डिजिटल क्रांति और औद्योगिक विकास के क्षेत्र में भारत ने अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की है। अब वैश्विक स्तर पर भारत को एक सकारात्मक दृष्टिकोण से देखा जाता है और उसका प्रभाव बढ़ता जा रहा है।

भारत केवल एक राजनीतिक राष्ट्र या संविधान द्वारा संचालित इकाई नहीं है, बल्कि यह एक जीवन दृष्टि, सांस्कृतिक चेतना और आध्यात्मिकता का संगम है। भारत की वास्तविक पहचान को समझना और उसे पुन: जाग्रत करना आवश्यक है, ताकि भारत अपने ऐतिहासिक गौरव को फिर से प्राप्त कर सके।
x@hiteshshankar

Topics: Rashtriya Swayamsevak Sanghईस्ट इंडिया कंपनीEast India Companyसांस्कृतिक एकताcultural unityइंडिया बनाम भारतपाञ्चजन्य विशेषIndia vs Bharatस्वाभिमान और स्वावलंबन का प्रतीक ‘भारत’ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघसभ्यता और राष्ट्रCivilization and Nation
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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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