भारत में सुनियोजित सांप्रदायिक हिंसा से बढ़ती चुनौतियाँ
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भारत में सांप्रदायिक हिंसा के पीछे छिपी साजिश? भारत की आंतरिक सुरक्षा पर बढ़ते असली खतरे का विशेष विश्लेषण

भारत में बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा और कानून-व्यवस्था की स्थिति पर विशेष रिपोर्ट। जानिए क्या है असली खतरा । पढ़िए सांप्रदायिक हिंसा का खौफनाक सच

Written byलेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत)लेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत)
Mar 19, 2025, 11:02 pm IST
in भारत, रक्षा, विश्लेषण

हमारा पश्चिमी पड़ोसी बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में आतंकवाद की अपनी खुराक से पीड़ित है। इस तरह की हिंसा पाकिस्तान में आंतरिक उथल-पुथल और उसके कम विशेषाधिकार प्राप्त नागरिकों के खुले उत्पीड़न की अभिव्यक्ति है। दूसरी ओर भारत देश में कानून और व्यवस्था की स्थिति को बिगाड़ने के लिए गुप्त तंत्र का शिकार बन रहा है। भारत में तो हर नागरिक को समान अधिकार हैं। यह अजीब लग सकता है लेकिन सुनियोजित हिंसा की प्रवर्ती, विशेष रूप से सांप्रदायिक आधार पर, राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा के लिए अधिक खतरनाक है।

यह नेरटिव कि एक अल्पसंख्यक समुदाय जिसकी आबादी लगभग 20 करोड़ (भारत की आबादी का 14.3%) है, भारत में खतरे में है और यह नेरटिव जोर पकड़ रहा है। इंडोनेशिया और पाकिस्तान के बाद भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश है। इतनी बड़ी आबादी को एक तरह से अल्पसंख्यक कहना शायद गलत है क्योंकि भारत में अगला अल्पसंख्यक ईसाई धर्म है, जिसकी आबादी भारत की आबादी का मात्र 2.3% है। इसके बाद सिख समुदाय है जो भारत की कुल आबादी का सिर्फ 1.72% है। भारत में, शायद ही कभी ईसाई और सिखों से जुड़ी सांप्रदायिक हिंसा होती है।

यह मुस्लिम समुदाय में कट्टरपंथ और सांप्रदायिकता का उदय है जिसने देश के कुछ हिस्सों में अशांति को बढ़ावा दिया है। अधिकांश मुस्लिम समुदाय शांति से रहना चाहता है। लेकिन कुछ तत्व उन्हे बरगलाने में लगे रहते हैं। हां, बहुसंख्यक हिंदू समुदाय दशकों की पराधीनता के बाद अब अधिक मुखर है। भारत के सच्चे इतिहास के ज्ञान और कुछ हिंदू शासकों के साथ किए गए अत्याचार ने भी लाखों लोगों के मानस को आंदोलित किया है। हिंदुओं को एकजुट करने का प्रयास किया जा रहा है, जो अब तक जाति के आधार पर अत्यधिक विभाजित थे। यह संभव है कि हिंदुओं द्वारा इस तरह का दावा अधिक मुखर हो सकता है लेकिन जरूरी नहीं कि हिंसक हो। हिंदू धर्म सहिष्णुता सिखाता है और कुल मिलाकर शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में विश्वास करता है। अन्यथा, बहुसंख्यक समुदाय की उदारता के बिना भारत में सभी अल्पसंख्यक समुदायों के लिए समान अधिकारों की कल्पना करना कठिन है।

चूंकि मुस्लिम समुदाय कुछ राजनीतिक दलों के लिए एक आकर्षक वोट बैंक बन गया था, इसलिए इस समुदाय को केंद्र और राज्यों दोनों में विशेष संरक्षण और समर्थन मिला। इस तरह के विशेषाधिकारों को हल्के में लिया गया  और जब नई सरकार द्वारा उन पर सवाल उठाए गए, तो जाहिर है कि प्रतिक्रिया तेज और हिंसक होनी थी। समग्र उद्देश्य पीड़ित कार्ड खेलना और सुधार प्रक्रिया को पटरी से उतारना प्रतीत होता है। मुस्लिम समुदाय के सामने एक प्रमुख मुद्दा वक्फ बोर्ड की नीति की समीक्षा है। इसलिए, पिछले साल नवंबर  में संभल में और अब नागपुर में इस तरह की सांप्रदायिक हिंसा को भड़काना भारत में अशांति फैलाने के लिए एक बड़े गेम प्लान का हिस्सा हो सकता है।

कानून और व्यवस्था राज्य पुलिस की जिम्मेदारी है, जिसे अर्धसैनिक बलों और रैपिड एक्शन फोर्स जैसे अन्य वर्दीधारी बलों द्वारा सहायता प्रदान की जाती है। पुलिस बलों के पास संख्याबल की अपनी कमी है। पुलिस  ज्यादातर बहुत सारे कार्यों में प्रतिबद्ध हैं जिन्हें पुलिसिंग नहीं कहा जा सकता है। पुलिस कर्मियों का एक बड़ा हिस्सा इवेंट मैनेजमेंट और वीआईपी सुरक्षा कर्तव्यों में कार्यरत है। कानून और व्यवस्था की नई उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए पुलिस बलों को नियमित रूप से प्रशिक्षित भी नहीं किया जाता है। इसके अलावा, पुलिस बलों को प्रतिबद्ध नेतृत्व नहीं मिलता है, जो उनकी भलाई की परवाह करता है, ऑन और ऑफ ड्यूटी। इसलिए, भारत में पुलिस का प्रदर्शन कुछ स्थानों पर तो उत्कृष्ट  हैं, लेकिन ज्यादातर जगहों पर आचरण और प्रतिक्रिया में औसत पाए जाते हैं।

सांप्रदायिक हिंसा और दंगे पुलिस की जिम्मेवारी में सबसे कठिन काम हैं। इसलिए कभी-कभी अंतिम उपाय के रूप में नागरिक प्रशासन द्वारा कानून और व्यवस्था बहाल करने के लिए सेना की मांग की जाती है। मैं अपने सैन्य करियर में ऐसी घटनाओं के व्यक्तिगत अनुभव से कह सकता हूँ की पुलिस कोशिश जरूर करती है लेकिन कई बार स्थिति को संभाल नहीं पाती है।  अधिकांश सांप्रदायिक हिंसा में मुख्य समस्या कार्रवाई योग्य खुफिया जानकारी और पूर्व जानकारी का अभाव होता है। मौजूदा खुफिया तंत्र  सांप्रदायिक तनाव और हिंसा को अंजाम देने के लिए हो रही तैयारी का पता लगाने में अक्सर विफल रहता है।

दूसरी ओर, लाठियों, पेट्रोल बॉम्ब और पत्थरों से लैस गुस्साई भीड़ को जुटाने की क्षमता में काफी सुधार हुआ है। मोबाइल फोन और सोशल मीडिया भावनाओं को जगाने के लिए ट्रिगर के रूप में कार्य करते हैं। ऐसा लगता है की हिंसक कृत्य से पहले भीड़ के पास कुछ प्रशिक्षण और ब्रीफिंग है। भीड़ में कुछ स्वयंभू नेता होते हैं जो चुने हुए इलाकों में हिंसा फैलाने  के लिए भीड़ को उत्तेजित करते हैं। वे अपनी पहचान छिपाने के लिए मास्क का उपयोग करते हैं और अब सबूत नष्ट करने के लिए सीसीटीवी कैमरे भी तोड़ रहे हैं। निजी टीवी चैनल सुनिश्चित टीआरपी के लिए हिंसा का और महिमामंडन करते हैं। इस प्रकार सुनियोजित सांप्रदायिक हिंसा को बढ़ावा देने वाले कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कारण हो सकते हैं।

दूसरी ओर पुलिस आत्म-सुरक्षा में ठीक से सुसज्जित नहीं लगती है। इस प्रकार, ऐसे दंगों में बड़ी संख्या में पुलिस कर्मियों का घायल होना आश्चर्यजनक नहीं है। नागपुर में पुलिस ने गुस्साई भीड़ का खामियाजा अपने ऊपर उठाया और जबरदस्त संयम का परिचय दिया। आम तौर पर, ऐसी स्थिति के परिणामस्वरूप भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस को गोली चलानी पड़ती। लेकिन इस तरह के संयम को कमजोरी माना जा सकता है और जहां आवश्यक हो, पुलिस को सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। इसी तरह, हाल ही में बिहार में पुलिस कर्मियों की हत्या और घायल होने की घटना को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

भारत के आकार, विविधता और जनसंख्या वाले देश में कानून और व्यवस्था की समस्याएं अपरिहार्य हैं। हां, त्वरित पुलिस कार्रवाई से ज्यादातर मामलों में दंगों को रोका और नियंत्रित किया जा सकता है। जटिल कानून और व्यवस्था की स्थितियों से निपटने के लिए पुलिस को मजबूत, सुसज्जित और प्रशिक्षित करना होगा। उन्हें बेहतर नेतृत्व की जरूरत है जो सामने से नेतृत्व करे और जिम्मेदारी ले। आसूचना तंत्र में बडे़ पैमाने पर फेरबदल करने और विफलता की स्थिति में जिम्मेदारी निर्धारित करने की आवश्यकता है।

पुलिस को भी जनता के हित में बल के रूप में जनता का विश्वास फिर से हासिल करना होगा। एक आम आदमी को अपनी चिंताओं और किसी भी जानकारी को साझा करने के लिए पुलिस से संपर्क करने में आत्मविश्वास महसूस करना चाहिए। साथ ही, पुलिस को अपने दृष्टिकोण में और अधिक पेशेवर बनना होगा। लेकिन नागरिकों को सुरक्षा के प्रति और अधिक सचेत रहना होगा। आपके पड़ोस में जो हो रहा है उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार, आंख और कान खुले रखना सुरक्षा की सबसे अच्छी गारंटी है।

शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी राजनीतिक और धार्मिक नेतृत्व की भी है। मतभेद की स्थिति में संचार चैनल हमेशा खुले रहने चाहिए। इस संबंध में, होली के त्योहार के दिन शुक्रवार की नमाज का समय बदलना एक-दूसरे की भावनाओं को समायोजित करने का एक अच्छा उदाहरण है।

भारत एक अधिक आत्मविश्वास वाले राष्ट्र के रूप में विकसित हो रहा है। भारत विकास, लोकतंत्र, विश्वास और आध्यात्मिकता में अधिक दृढ़ हो रहा है। महाकुंभ 2025 एक नए और पुनरुत्थानशील भारत का जीता-जागता उदाहरण है। सांप्रदायिक हिंसा का सभ्य समाज में कोई स्थान नहीं है। समान अवसरों के साथ सभी भारतीय नागरिकों का शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, विकसित भारत @2047 का मंत्र होना चाहिए।

Topics: वक्फ बोर्डLaw and Orderterrorismwaqf boardमुस्लिम समुदायसांप्रदायिक हिंसाMuslim CommunityHindu Unityकानून व्यवस्थाहिंदू एकजुटताआतंकवादपुलिस सुधारसोशल मीडियाभारत सुरक्षाsocial mediaPolice ReformCommunal ViolenceIndia Security
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