समरसता का प्रतीक पर्व
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समरसता का प्रतीक पर्व

होली केवल रंगों का त्योहार नहीं है। यह एकता, प्रेम, भाईचारे और सद्भावना का प्रतीक पर्व है। यह पर्व समाज में समरसता को बढ़ावा देता है और हर वर्ग, जाति और मत-पंथ के लोगों को एक सूत्र में जोड़ता है। यह त्योहार प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और जीवन के रंगीन पहलुओं को स्वीकार करना भी सिखाता है

Written byडॉ. विवेकानंद तिवारीडॉ. विवेकानंद तिवारी
Mar 14, 2025, 11:48 am IST
inभारत, विश्लेषण, धर्म-संस्कृति, मनोरंजन

होली एक वैदिक यज्ञ है, जिसका मूल स्वरूप आज विस्मृत हो गया है। वैदिक काल में इसे ‘नवान्नेष्टि’ कहा जाता था। इस दिन खेत के अधपके अन्न का हवन कर प्रसाद बांटने का विधान है। इस अन्न को ‘होला’ कहा जाता है, इसलिए इसे होलिकोत्सव के रूप में मनाया जाता है। होली को नवसंवत्सर तथा वसंत के आगमन के उपलक्ष्य में किया हुआ यज्ञ भी माना जाता है। माना जाता है कि मनु का जन्म इसी दिन हुआ था। अत: इसे मन्वादितिथि भी कहा जाता है। पुराणों के अनुसार भगवान शंकर ने अपनी क्रोधाग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया था, तभी से यह त्योहार मनाने का प्रचलन हुआ।

वेदों-पुराणों में होली

प्रो. विवेकानंद तिवारी
अध्यक्ष, बी.आर. आंबेडकर पीठ, एचपीयू, शिमला

प्राचीन संस्कृत साहित्य में होली के अनेक रूपों का विस्तृत वर्णन है। वेदों विशेषकर ऋग्वेद और सामवेद में रंगों और ऋतुओं के महत्व का वर्णन मिलता है। श्रीमद्भागवत महापुराण में रसों के समूह रास का वर्णन है। पुराणों में बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक उत्सव के तौर पर होली का उल्लेख है। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं में भी होली का वर्णन मिलता है। अन्य रचनाओं में ‘रंग’ नामक उत्सव का वर्णन है, जिनमें हर्ष की प्रियदर्शिका व रत्नावली, कालिदास की कुमारसंभवम् तथा मालविकाग्निमित्रम्, जैमिनी के पूर्व मीमांसा व गार्ह्य-सूत्र शामिल हैं। इसके अलावा, नारद पुराण, भविष्य पुराण में भी इस पर्व का उल्लेख मिलता है। बिंध्य क्षेत्र के रामगढ़ स्थित ईसा से 300 वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी इसका उल्लेख है।
रङ्गेषु यच्छद्भूतं रङ्गेषु यच्छद्भवम्।
रङ्गेषु सृजनं सृजामि रङ्गेषु तन्नमोऽस्तु ते॥ (ऋग्वेद 1.164.46)
यह श्लोक प्रकृति के रंगों और जीवन के विभिन्न पहलुओं का आदान-प्रदान करता है।
नृत्यतं गान्यं च श्रुतं, ये हि सर्वे सन्ति सुखं।
रङ्गेषु लहरीयन्ते, जीवनं हर्षितं भवेत्॥ (सामवेद)
यह श्लोक इस बात को व्यक्त करता है कि संगीत, नृत्य और रंगों के माध्यम से जीवन में सुख और आनंद आता है।
सूनृतावन्त: सुभगा इरावन्तो हसामुदा:।
अतृष्या अक्षुध्या गृहा मास्मद् बिभीतन॥ (अथर्ववेद 7.60.6)
अर्थात् जिन घरों में रहने वाले परस्पर मधुर और शिष्ट संभाषण करते हैं, जिनमें सब तरह का सौभाग्य निवास करता है, जो प्रीति-भोजों से संयुक्त है, सभी हास और उल्लासमय जीवन-यापन करते हैं एवं जहां कोई भूखा-प्यासा नहीं, उन घरों में कहीं से भय का संचार न हो।

हमारी संस्कृति मे ‘होली’ का उत्सव तामसिक वृत्तियों के मुखर होने हेतु नियत किया गया है। इस दिन हमारी मर्यादित प्रकृति भी उन्मुक्त हो जाती है। आमोद-प्रमोद निर्बंध हो जाते हैं। उत्सव की इस सम्मोहनी शक्ति को हमारे द्रष्टा महर्षियों ने समझा था। उन्होंने यज्ञों में वसंत को आज्य कहकर घोषित किया था-
यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत।
वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म: इध्म: शरद्धवि॥
(ऋग्वेद 10.90.6)
अर्थात् जब देवों ने विराट पुरुष रूप को हवि मानकर यज्ञ का शुभारंभ किया, तब घृत वसंत ऋतु, ईंधन (समिधा) ग्रीष्म ऋतु एवं हवि शरद ऋतु हुई।

होलिकोत्सव के बारे में भविष्योत्तर पुराण में लिखा गया है, ‘‘राजन्! शीतकाल का अंत है। इस फाल्गुनी पूर्णिमा के पश्चात प्रात: मधुमास होगा। सभी को आप अभय दीजिए। सभी रंग-बिरंगे वस्त्र पहनकर चंदन, अबीर और गुलाल लगाकर पान चबाते हुए एक-दूसरे पर रंग डालने के लिए पिचकारियां लेकर निकलें। जिनके मन में जो आए सो कहें। ऐसे शब्दों से तथा हवन करने से वह पापिनी (होलिका) नष्ट हो जाती है।’’

होली का वर्तमान स्वरूप हजारों वर्ष पहले भारतवर्ष के पूर्व भाग में प्रचलित अनेक प्रकार की उद्यान-क्रीड़ाओं का ही एक हिस्सा है। पाणिनि का ‘प्राचांक्रीणायां सूत्र’ (6,2,72) इसका प्रमाण है। वात्स्यायन ने उन्हें देश परंपरागत क्रीड़ाएं कहा है।

श्रीमद्भागवत (10-75-14.15) में वर्णन इस प्रकार मिलता है- ‘‘गंध, माला, भूषण तथा वस्त्रों से अलंकृत पुरुष और स्त्रियां नदी में अवभृथ स्नान करने के लिए गईं। वहां युवतियां तेल, गोरस, सुगंधित जल, हल्दी और कुमकुम आदि से एक-दूसरे को रंगने लगीं। घत्तियी (चर्मयंत्र) से अपने देवरों और प्रियजनों को भिगो रही थीं।’’ ये घत्तियां ही आधुनिक पिचकारियों की आदिरूप थीं। महाकवि माघ (750 ई.) ने पिचकारी का वर्णन किया है।

प्राचीनकाल में होली को ‘होलाका’ के नाम से जाना जाता था। इस दिन आर्य नवात्रैष्टि यज्ञ करते थे। होलिका दहन के बाद ‘रंग उत्सव’ मनाने की परंपरा भगवान श्रीकृष्ण के काल से प्रारंभ हुई। तभी से इसका नाम फगवाह हो गया, क्योंकि यह फागुन माह में आती है। प्राचीन भारतीय मंदिरों की दीवारों पर होली से संबंधित विभिन्न मूर्तियां या चित्र देखे जा सकते हैं। अहमदनगर और मेवाड़ के चित्रों में भी होली का चित्रण मिलता है। सिंधु घाटी की सभ्यता के अवशेषों में भी होली और दीपावली मनाने के प्रमाण मिले हैं। चूंकि वसंत ऋतु के आगमन के स्वागत होली मनाई जाती है, इसलिए इसे वसंतोत्सव भी कहते हैं।

मानव जीवन में धर्म, अर्थ और मोक्ष के साथ काम भी एक पुरुषार्थ है। वेदों ने इसे ‘कामस्तदाग्रे संवर्तताधि’ कहा है। नृत्य-संगीत प्रभृति समस्त कलाएं, हास-परिहास, व्यंग्य-विनोद, आनंद-उल्लास इसी तृतीय पुरुषार्थ के नानाविध अंग हैं। होलिकोत्सव के रूप में हिंदू समाज ने मनोरंजन को जीवन में स्थान देने के लिए तृतीय पुरुषार्थ के स्वस्थ और लोकोपयोगी स्वरूप को धर्माधिष्ठित मान्यता प्रदान की है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है-
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ।
अर्थात् हे अर्जुन! मैं प्राणियों में धर्मानुकूल कामप्रवृत्ति हूं।
शिवजी ने तीसरे नेत्र से फाल्गुन कृष्णाष्टमी को काम (मदन) का दहन किया। फिर पत्नी रति की प्रार्थना पर होलाष्टक के अंतिम दिन (धुलैड़ी) शिवजी ने प्रद्युम्न के रूप में कामदेव के पुनर्जन्म का वरदान दिया था। इसलिए होली को मदनोत्सव के रूप में मनाया जाता है।

काव्यशास्त्र में भी रंगों के माध्यम से विभिन्न भावनाओं और अवस्थाओं का चित्रण किया गया है। काव्य दशार्ण में रंगों को न केवल सौंदर्य के रूप में देखा गया है, बल्कि वे मनुष्य के अंतर्मन के भावों और जीवन की वास्तविकता के प्रतीक भी होते हैं। कालिदास रचित ऋतुसंहार में एक सर्ग ही ‘वसंतोत्सव’ को समर्पित है, जबकि कुमारसंभवम् और मालविकाग्निमित्रम् में ‘रंग’ उत्सव का वर्णन है। भारवि, माघ और अन्य कई संस्कृत कवियों ने वसंत की चर्चा की है। चंद बरदाई रचित ‘पृथ्वीराज रासो’ में भी होली का वर्णन है।

भक्तिकाल और रीतिकाल के हिंदी साहित्य में होली और फाल्गुन का विशिष्ट महत्व रहा है। विद्यापति से लेकर सूरदास, रहीम, रसखान, पद्माकर, जायसी, मीराबाई, कबीर और बिहारी, केशव, घनानंद जैसे रीतिकाल के अनेक कवियों का भी यह प्रिय विषय रहा है। महाकवि सूरदास ने वसंत और होली पर 78 पद लिखे हैं। वहीं, आधुनिक काल के कवियों में भारतेंदु से लेकर निराला तक, सभी ने होली पर कुछ न कुछ लिखा है।

उत्तराखंड की कुमाऊंनी होली प्रसिद्ध है

गायन की समृद्ध परंपरा

होली पर विशेष प्रकार के गीत गाने की परंपरा भी रही है। वसंत के मादक वातावरण में होली के फाग गीत भी मादकता भरे होते हैं। फाग में चैता, जोगीरा, कबीरा जैसे गीत शामिल होते हैं। फाल्गुन से चैत्र कृष्ण प्रतिपदा और उसके बाद आने वाले मंगलवार तक फाग गाया जाता है। मंगलवार के बाद फाग प्राय: बंद हो जाता है। इसलिए इसे ‘बुढ़वा मंगल’ कहा जाता है। होली के दिन सायंकाल होली मिलन के साथ फाग गायन का क्रम रात भर चलता है। दो-दो फाग गायकों की टोलियां प्रश्नोत्तर यानी दंगल में उतरती हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में फाग गायन के ऐसे दंगल आज भी होते हैं। बुढ़वा मंगल को भी रात भर ऐसे दंगल होते हैं। इसमें पुरस्कार भी रखे जाते हैं। गीत हमारी संस्कृति के लोक-व्यवहार और आचार-विचार से इस प्रकार गुंथे हुए हैं कि वे जीवन का एक अनिवार्य अंग बन गए हैं।

भारतीय शास्त्रीय संगीत तथा लोक संगीत परंपरा में होली का विशेष महत्व है। शास्त्रीय संगीत में धमार का होली से गहरा संबंध है। ध्रुपद, धमार, छोटे-बड़े ख्याल और ठुमरी में तो होली के गीतों का सौंदर्य देखते ही बनता है। कथक नृत्य के साथ होली, धमार और ठुमरी पर प्रस्तुत की जाने वाली अनेक सुंदर बंदिशें आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं-चलो गुंइयां आज खेलें होरी कन्हैया घर। भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ राग ऐसे हैं, जिनमें होली के गीत विशेष रूप से गाए जाते हैं। बसंत, बहार, हिंडोल और काफी ऐसे ही राग हैं। जैसे गुजरात में नवरात्र, महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी, पंजाब में बैसाखी, दक्षिण भारत में पोंगल, बंगाल में दुर्गा पूजा महत्वपूर्ण है, वैसे ही राजस्थान में होली का बहुत महत्व है। इन त्योहार में संगीत का एक अलग ही स्थान रहा है। संगीत बिना इन त्योहारों की कल्पना भी करना मुश्किल-सा लगता है।

उपशास्त्रीय संगीत में होली पर चैती, दादरा और ठुमरी गाई जाती है। होली के अवसर पर संगीत की लोकप्रियता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि संगीत की एक विशेष शैली का नाम ही होली है, जिसमें अलग-अलग प्रांतों में होली के विभिन्न वर्णन सुनने को मिलते हैं। इसमें उस स्थान का इतिहास और धार्मिक महत्व छुपा होता है।

जहां ब्रजधाम में राधा और कृष्ण के होली खेलने के वर्णन मिलते हैं, वहीं अवध में राम और सीता के। जैसे-होली खेलें रघुवीरा अवध में। ब्रज के अधिकतर होली गीत भगवान कृष्ण की लीलाओं पर केंद्रित होते हैं। वहां भगवान कृष्ण के विविध रूप हैं, राधा और गोपियां हैं, संयोग और वियोग है, प्रेम और विरह और प्रकृति की अनुपम छटाएं हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम राम इन होलियों में कम ही दिखाई देते हैं, लेकिन समय के साथ-साथ लोक चेतना ने उन्हें भी होली के उत्सव में शामिल कर लिया है। इसी प्रकार भगवान शिव से संबंधित एक गीत है ‘दिगंबर खेले मसाने में होली’। इसमें शिवजी के श्मशान में होली खेलने का वर्णन है।

रंगों का स्वास्थ्य से संबंध

होली में प्रयुक्त होने वाले रंग-अबीर सुखदायक होते हैं। वास्तव में, रंग हमारे शरीर को पुनर्जीवित और स्वस्थ करने में मदद करते हैं। गुलाल या रंग शरीर के 7 चक्रों से भी जुड़े होते हैं, जो हमारे शरीर की ऊर्जा को प्रभावित करते हैं। ये नकारात्मकता को दूर कर हमें सकारात्मक बनाते हैं। रंग तीन दोषों को बहाल करने में उपयोगी होते हैं। फूलों से बने रंगों से होली खेलने की परंपरा प्राचीन है। आज भी मंदिरों में पारंपरिक होली फूलों से ही खेली जाती है।

होली ठंड की समाप्ति और गर्मी की शुरुआत की घोषणा करने का प्रकृति का तरीका है। पुराने समय में जड़ी-बूटियों, विभिन्न तरह के फूलों-पत्तियों, केसर, चंदन आदि से रंग तैयार किए जाते थे। जैसे-नीम और मेंहदी से हरा, कुमकुम व रक्त चंदन से लाल, हल्दी से पीला, जकरंदा के फूल से नीला तथा अन्य जड़ी-बूटियां जैसे बिल्व, पीली गुलदाउदी, अमलतास और गेंदे के फूल से भी रंग बनाए जाते थे। इनमें कफ को कम करने और त्वचा को डिटॉक्स करने की क्षमता होती है।

ये रंग न केवल त्वचा को कोमल बनाते हैं, बल्कि मृत त्वचा को साफ करने में सहायक होते हैं। रंग बनाने में प्रयुक्त होने वाली अधिकांश सामग्रियों का उपयोग आयुर्वेद में शरीर को स्फूर्तिदायक और कांति प्रदान करने के लिए किया जाता है। प्राकृतिक रंग उबटन का काम करते हैं। होली पर बिहार, उत्तर प्रदेश में तो उबटन लगाने की परंपरा है। इस दिन घर की महिलाएं पूरे परिवार को उबटन लगाती हैं। उबटन सूखने पर उसे छुड़ा कर होलिका में डाला जाता है। मान्यता है कि इससे रोग व दुख जल कर समाप्त हो जाते हैं।

रंग शरीर के लिए महत्वपूर्ण हैं। जब हम होली के रंगों में डूबते हैं तो मन और शरीर को कई लाभ होते हैं। लाल रंग से सांस और दिल की धड़कन सक्रिय होती है। इसी तरह, पीला रंग प्रसन्नता और नीला शांति प्रदान करता है। वसंत ऋतु के साथ ही दिन गर्म होने लगते हैं। ठंड के दिनों की जमा चर्बी (वसा) और कफ इस मौसम में पिघलते हैं, जो शरीर के विभिन्न अंगों को प्रभावित करते हैं। इसका सबसे अधिक प्रभाव हमारे यकृत (लिवर) पर पड़ता है। इससे पाचन तंत्र बिगड़ता है, जो कई बीमारियों का कारण बनता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कमजोर होती है। परंपरागत तरीके से तैयार रंग औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं। इनमें कई औषधियां ऐसी होती हैं, जिनका सेवन व लेपन बहुत कारगर होते हैं। हल्दी विशिष्ट गुणों से भरपूर है। इसी तरह टेसू कफ का नाश करता है। नीम त्वचा के संक्रमण में बहुत लाभकारी है।

मजहब से परे होली

होली केवल हिंदुओं ही नहीं, बल्कि मुसलमानों सहित सभी भारतीयों का पर्व है। मुगलकाल में भी होली हर्षोल्लास से मनाई जाती थी। अकबर के जमाने में पूरे राज्य में यह पर्व धूमधाम से मनाया जाता था। जगह-जगह सोने-चांदी के बने ड्रमों में रंग भरकर रखे जाते थे। आसपास के टेसू के पत्तों को एक आकार में काट-छांटकर उससे महल को सजाया जाता था।

शाहजहां के काल में होली को ईद-ए-गुलाबी (गुलाबी ईद) कहा जाता था। कहीं-कहीं होली को ‘आब-ए-पाशी’ (रंगीन फूलों की बारिश) भी कहा जाता था। तुज्क-ए-जहांगीरी में एक तस्वीर में जहांगीर को होली खेलते दिखा गया है। एक अन्य पेंटिंग में मोहम्मद शाह रंगीला को अपनी बेगम के पीछे रंग की पिचकारी लेकर दौड़ते दिखाया गया है। मिर्जा संगी बेग ने भी अपनी रचना ‘सैर-उल-मंजिल’ में होली की चर्चा की है। उन्होंने लिखा है कि होली में लोग गिले-शिकवे भूलकर एक-दूसरे के साथ मौज-मस्ती करते हैं। अलबरूनी ने भी अपने संस्मरण में ‘होलिकोत्सव’ का उल्लेख किया है।

निजामुद्दीन और अमीर खुसरो जैसे सूफियों ने भी होली पर सुंदर रचनाएं लिखी हैं। बहादुरशाह जफर की तो कई रचनाएं होली को समर्पित हैं। जफर के दरबार में होली खेली जाती थी, जिसमें मंत्री, नवाब और अधिकारी एक-दूसरे को गुलाल लगाते थे और गीत-फाग का आनंद लेते थे। मुंशी जकौल्ला ने ‘तारीख-ए-हिन्दुस्तानी’ में लिखा है, ‘‘कौन कहता है कि होली सिर्फ हिंदुओं का पर्व है। यह तो समस्त जनता का पर्व है।’’ 10 मार्च, 1844 के एक उर्दू अखबार में होली का उल्लेख ऐसे पर्व के रूप में किया गया है, जिसमें हिंदू-मुसलमान सभी भाग लेते थे।

वास्तव में होली सामाजिक समरसता और सामाजिक एकता का प्रतीक पर्व है। इसमें स्वामी-सेवक, छोटे-बड़े सभी तरह के भेदभाव समाप्त हो जाते हैं। होली का पर्व यह दर्शाता है कि समाज में एकता, सद्भावना, प्रेम और भाईचारे को कैसे बढ़ावा दिया जा सकता है। यह पर्व हमें आपसी भेदभाव खत्म कर एक-दूसरे के साथ सौहार्दपूर्ण और प्रेमपूर्वक रहना सिखाता है।

पर्व एक, नाम अनेक

देश के विभिन्न अंचलों में अलग-अलग तरह से होली मनाई जाती है। इसके नाम भी अलग-अलग हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड में होली को फगुआ या फाग कहते हैं। केरल में होली को मंजल कुली और उक्कुली, जबकि पश्चिम बंगाल और ओडिशा में यह ‘बसंत उत्सव’ और ‘डोल पूर्णिमा’ के नाम से जाना जाता है। गुजरात की गोविंदा होली के तो क्या कहने। त्रिपुरा, नागालैंड, सिक्किम और मेघालय में भी होली धूमधाम से मनाई जाती है।

काशी में रंगभरी एकादशी का विशेष महत्व है। जैसे होलाष्टक से ब्रज में होली पर्व शुरू होता है, वैसे ही काशी में रंगभरी एकादशी से होली शुरू होकर 6 दिन तक चलती है। रंगभरी एकादशी भगवान शिव के स्वागत में मनाई जाती है। विवाह के बाद इसी दिन भगवान शिव पहली बार माता पार्वती को विदा कराकर ले जाने के लिए काशी आए थे।

ब्रज क्षेत्र मथुरा, नंदगांव, गोकुल, वृंदावन और बरसाना में अलग तरह से होली खेली जाती है, जिसे लट्ठमार होली कहा जाता है। यहां होली खेलते हुए महिलाएं पुरुषों को लाठियों से मारती हैं। वृंदावन में फूलेरा दूज पर फूलों की होली खेली जाती है।

पंजाब में यह पर्व होला मोहल्ला के रूप में मनाया जाता है। यह एक तरह की योद्धा होली है, जो निहंग सिखों द्वारा मनाई जाती है। इस दिन निहंग मार्शल आर्ट का प्रदर्शन करते हुए गाते हैं।
हरियाणा में होली को दुलंडी या धुलंडी कहा जाता है।

मध्यप्रदेश- छत्तीसगढ़ में पहले दिन होलिका दहन, दूसरे दिन धुलंडी और पांचवें दिन रंग पंचमी मनाने की परंपरा है। यहां के जनजातीय समाज में होली विशेष रूप से प्रचलित है।

मणिपुर में मनाई जाने वाली होली को योशांग या ओसांग पर्व कहा जाता है, जो पांच दिन तक चलता है। यहां धुलंडी को पिचकारी कहा जाता है। रंगों के साथ इस पर्व को लोग गायन, नृत्य और अन्य पारंपरिक तरीकों से मनाते हैं। मुख्य आकर्षण थाबल चोंगबा होता है, जो मणिपुरी लोक नृत्य है।
पश्चिम बंगाल में होली को ‘डोल जात्रा’ कहा जाता है। इस दिन लोग राधा-कृष्ण की मूर्ति पालकी में रखकर गुलाल उड़ाते हैं।

उत्तराखंड-हिमाचल प्रदेश में संगीत के साथ खड़ी होली, बैठकी होली और महिला होली मनाने की परंपरा है। किन्नौर स्थित सांगला घाटी की होली भी विशिष्ट होती है। होली के दौरान पूरी घाटी रंगों में रंगी नजर आती है। संगीत, नुक्कड़ नाटक और नृत्य के साथ मनाए जाने वाले इस उत्सव के तीसरे दिन रामायण की प्रस्तुति भी की जाती है। उत्तराखंड की कुमाउंनी होली प्रसिद्ध है।

असम में होली को फकुवा, फगवाह या देओल कहा जाता है। यह ‘डोल जात्रा’ की ही तरह होता है। अंतर सिर्फ इतना होता है कि यह पर्व दो दिन मनाया जाता है। पहले दिन होलिका दहन की कथा के बाद झोपड़ियों को जलाया जाता है। दूसरे दिन लोग रंगों की होली खेलते हैं।

महाराष्ट्र में होली को ‘फाल्गुन पूर्णिमा’ और ‘रंग पंचमी’ के नाम से जाना जाता है। गोवा में इसे शिमगो या शिमगा कहा जाता है।

तमिलनाडु में होली कामदेव के बलिदान के रूप में मनाई जाती है। इस दिन कामदेव की पूजा की जाती है। इसलिए इस पर्व को काम दहनम कहा जाता है।

कर्नाटक में होली को कामना हब्बा, कामाविलास, कमान पंडिगई और कामा-दाहानाम कहा जाता है। इसे काम के देवता कामदेव के बलिदान से जोड़ा जाता है।

आंध्र प्रदेश-तेलंगाना में होली को ‘मेदुरू होली’ कहा जाता है, 10 दिन चलता है। इस दौरान विशेष लोकनृत्य ‘कोलतास’ किया जाता है और लोग एक-दूसरे पर रंग-गुलाल फेंकते हैं।

Topics: प्रेमपाञ्चजन्य विशेष‘समाज में समरसताहोली एक वैदिक यज्ञहोली भाईचारे और सद्भावना का प्रतीक पर्वरंग उत्सवएकतावसंतोत्सवHoliहोली
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