समरसता का महाकुंभ
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समरसता का महाकुंभ

जाहिर है महाकुंभ में समाज के सभी वर्गों की जोर-शोर से भागीदारी ने कथित लिबरल-सेकुलर गैंग के उस नरेटिव की धार को भोथरा कर दिया है जो हिंदू समाज को जाति के चश्मे से देखता था।

Written byअनिल पांडेयअनिल पांडेय
Feb 28, 2025, 07:39 pm IST
in विश्लेषण

कुछ कारणों से भारत में सनातन धर्म की एक ऐसी छवि पेश करने की कोशिश की गई जिसमें इसकी उदात्त चेतना, समरसता व विविधता में एकता की भावना को नजरअंदाज कर इसे सिर्फ जातियों के खाने में बांट दिया गया। इसके कुछ राजनीतिक कारण भी थे।

एक सरल राजनीतिक गणित यह था देश की बहुदलीय व्यवस्था में कोई दल 30 प्रतिशत वोटों के साथ भी सत्ता में आ जाता है और यह पूरा आख्यान चुनावी लाभ के लिए रचा गया। इसका एकमात्र मकसद था दलित-पिछड़ा के नाम पर एक-दो जातियों और थोक मुस्लिम वोटों के सहारे सत्ता में आना। यही वो वजह है जिसके लिए आज भी जातिगत जनगणना की मांग उठाई जा रही है ताकि जाति-बिरादरी के बंधनों से उपर उठ रहे बहुसंख्यक समाज की एकता को खंडित कर चुनावी लाभ उठाया जा सके। लेकिन क्या सनातन धर्म जातियों में बिखरा समाज है या फिर समरसता की एक अदृश्य सरस्वती सदियों से प्रवाहमान है? इस सवाल के जवाब प्रयागराज में 45 दिन चले महाकुंभ में मिले जहां देश के कोने-कोने से आए 66 करोड़ हिंदुओं ने गंगा में डुबकी लगाई। अगर सिर्फ संख्या पर ही जाएं तो जाति के मुद्दे पर लेफ्ट-लिबरल नरेटिव अपने ही जाल में फंसा दिखता है। इतने करोड़ सवर्ण कहां हैं देश में? जाहिर है कि इसमें बड़ी आबादी दलितों-पिछड़ों की ही रही होगी।

लेफ्ट-लिबरल नरेटिव को गहरी चोट

कुंभ में इतने बड़े पैमाने पर दलितों-पिछड़ों के आने से ‘ब्राह्मणवादी व्यवस्था’ के लेफ्ट-लिबरल नरेटिव को गहरी चोट लगनी स्वाभाविक है। इसलिए तरह-तरह से दुष्प्रचार के प्रयास भी हुए। किसी ने भगदड़ का मुद्दा उठाया, तो किसी ने गंदगी का तो किसी ने इसे ‘फालतू’ आयोजन बता डाला। एक राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष ने तो यहां तक पूछ लिया कि क्या त्रिवेणी में डुबकी लगाने से गरीबी दूर हो जाएगी?

जाहिर है महाकुंभ में समाज के सभी वर्गों की जोर-शोर से भागीदारी ने कथित लिबरल-सेकुलर गैंग के उस नरेटिव की धार को भोथरा कर दिया है जो हिंदू समाज को जाति के चश्मे से देखता था। देश के हर कोने से भीड़ भरी बसों और ट्रेनों में यात्रा कर और फिर कई कोस पैदल चल संगम तट पर डुबकी लगाने पहुंचे लोगों के मन में जाति थी या वे किसी आध्यात्मिक उद्देश्य व श्रद्धा से प्रेरित होकर इतनी तकलीफें झेलकर यहां पहुंचे थे? और इस विराट महाकुंभ के जो फोटो और वीडियो आए हैं, उनमें देखा जा सकता है कि बड़ी आबादी दिल्ली-मुंबई के कारपोरेट पेशेवरों के बजाय उन मुफस्सिल गांवों और कस्बों के लोगों की थी जिन्होंने रोटी-रोटी के कठिन संघर्ष में भी अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक चेतना को जीवंत रखा है।

केवल राष्ट्रीयता के भाव का तिलक

जाति-पाति, ऊंच-नीच, भाषा और अमीरी गरीब से परे लोगों के मन में एक ही भाव था कि इस आध्यात्मिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संगम में सब विभेद को भूल कर केवल राष्ट्रीयता के भाव का तिलक लगाकर इसका चिरकाल तक साक्षी बनना है। वे एक दायित्व बोध से भी बंधे रहे। महाकुंभ में औसतन हर दिन डेढ़ करोड़ लोगों ने पवित्र संगम में स्नान किया। भगदड़ के एक हादसे के अलावा सनातन के इस विराट जमावड़े से एक भी नकारात्मक खबर नहीं आई। छियासठ करोड़ लोग पहुंचे, डुबकी लगाई और अभीष्ठ पूरा हुआ। यह अनुशासन था। किसी ने किसी की जाति नहीं पूछी। सामूहिकता के इस उत्सव में करोड़ों लोगों का एक लक्ष्य और एक विचार था कि भारतीय संस्कृति के महाकुंभ में शामिल होना है। इसके लिए किसी को न्योता भी नहीं दिया गया था। यह सब सहज, सरल और स्वप्रेरित था।

भारतीय संस्कृति का मूल आधार समरसता

भारतीय संस्कृति का मूल आधार ही समरसता है। ऊपर से जातियों में बंटे इस समाज में एक ऐसी अदृश्य एकता है जो अटूट है। तभी तो इकबाल कहते हैं, ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा।’ इतने झंझावातों के बाद भी एक राष्ट्र के तौर पर अपनी संस्कृति को हमने हजारों वर्षों से संजोए रखा है। इतिहास गवाह रहा है कि जो राष्ट्र अपनी संस्कृति की रक्षा नहीं कर पाया उसका अस्तित्व मिट गया। और जब-जब इस पर संकट आया साधु-संतों के साथ आम जनता ने प्राणपण से इसकी रक्षा में अपना सर्वस्व झोंका है। मध्य काल में जब आक्रांताओं के अत्याचारों से समाज कराह रहा था तो भक्ति आंदोलन ने हमारी धार्मिक- सांस्कृतिक चेतना को पुनर्जीवित किया। स्वतंत्रता आंदोलन में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के ‘गीता-गोरक्षा-गणपति’ ने जनमानस की चेतना को झकझोरा। यानी जाति नहीं बल्कि वह बृहद धार्मिक-सांस्कृतिक चेतना है जो राष्ट्र को एकसूत्र में पिरोती है। हमारी उदात्त चेतना, हमारी उत्सवधर्मिता हमारी सबसे बड़ी शक्ति हैं। इसकी घोषणा वेद के मंत्र भी करते हैं-

‘समानी व आकूतिः’ मंत्र: समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः। समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति।

यानी समरसता हमारी संस्कृति की प्रत्येक परंपरा, पर्व और त्योहार के केंद्र में है। जिस साफ्ट पावर की बात आज की जा रही है, वह हमारे पास हमेशा से रहा है। बस सायास तरीके से इसे सामने नहीं आने दिया गया। जिस साफ्ट पावर के लिए दूसरे देश व संस्कृतियां नाना प्रकार के उपक्रम करती हैं, हम अपने रंगबिरगे पर्वों, त्योहारों, नृत्य-संगीत, भजन-कीर्तन और कुंभ जैसे आयोजनों से बिना किसी प्रयास के हासिल कर लेते हैं।

सांस्कृतिक चेतना का पुनरुत्थान

आस्था का यह महाकुंभ सनातन संस्कृति के साफ्ट पावर का शंखनाद है। इतनी विविधताओं के बावजूद पूरी दुनिया में मौजूद सनातनधर्मियों की लगभग आधी आबादी ने संगम तट पर एकता के इस महाकुंभ में डुबकी लगाई। महाकुंभ से गरीबी खत्म होगी या नहीं, ये अलग सवाल है लेकिन इसने देश की सांस्कृतिक चेतना के पुनरुत्थान में अपनी भूमिका निभा दी है। ये वो लोग थे जो इससे किंचित भयभीत नहीं थे कि उन्हें रूढ़िवादी और पोंगापंथी कहा जाएगा। उल्टे वे गर्व से टीका लगाए अपनी तस्वीरें सोशल मीडिया मंचों पर डाल रहे थे। साफ है कि अब हिंदू अपनी धार्मिक पहचान व आस्थाओं को लेकर शर्मिंदा नहीं हैं और न ही उन्हें किसी से कोई प्रमाणपत्र चाहिए। यह एक आश्वस्त और आत्मविश्वासी समाज है।

धार्मिक-सांस्कृतिक एकजुटता दिखी

इस ऐतिहासिक महाकुंभ ने दुनिया के सामने हमारी धार्मिक-सांस्कृतिक एकजुटता का सबूत पेश किया है और जाति-बिरादरी के बांटने वाले आख्यान को दरकिनार करते हुए इस बात पर मुहर लगाई है कि तमाम भाषाओं, संस्कृतियों, राति-रिवाजों और खान-पान की विविधता के बावजूद सांस्कृतिक-आध्यात्मिक समरसता की अदृश्य सरस्वती का प्रवाह आज भी अविरल है, आगे भी रहेगा।

(लेखक मीडिया रणनीतिकार व राजनीतिक विश्लेषक हैं)

Topics: सनातन धर्ममहाकुंभलेफ्ट लिबरल नरेटिव
अनिल पांडेय
अनिल पांडेय
मीडिया रणनीतिकार और राजनीतिक विश्लेषक [Read more]
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