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किताब का खौफ

बलूचिस्तान में छात्रों ने किताबों को लोकप्रिय बनाने का अभियान चला रखा है, लेकिन पाकिस्तानी हुकूमत अपने लिए इसे खतरा मान रही

Written byअरविन्दअरविन्द
Feb 7, 2025, 10:30 am IST
inविश्लेषण, जम्‍मू एवं कश्‍मीर

आम तौर पर बलूचिस्तान सुर्खियों में बना रहता है— वहां चल रहे आजादी के आंदोलन के तहत सुरक्षा बलों तथा फौज की सरपरस्ती में फल-फूल रहे ‘डेथ स्क्वॉयड’ से जुड़े लोगों पर होने वाले हमलों, मानवाधिकारों के हनन को लेकर आएदिन होने वाले विरोध प्रदर्शनों और बलूचों के खिलाफ होने वाली फौजी सख्ती के लिए। लेकिन इन दिनों यह प्रान्त एक अलग तरह की गतिविधि को लेकर चर्चा में है। वह है यहां आकार ले रही ‘किताब क्रांति’ जिसके तहत जगह-जगह छोटे-छोटे स्तर पर किताब मेलों का आयोजन किया जा रहा है। इसका ऐसा असर है कि पाकिस्तानी हुकूमत के हाथ-पैर फूले हुए हैं और वह इस नई तरह के आंदोलन को व्यापक होने से रोकने के लिए हर हथकंडा अपना रही है।

हथियार कितने भी खतरनाक हों और उन्हें चलाने वालों के दिमाग पर हैवानियत कितनी भी तारी हो, निशस्त्र लोगों में वह ताकत होती है जो अच्छे-अच्छों के होश ठिकाने लगा दे। इसे हमने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हुई तमाम क्रांतियों के रूप में देखा है। हमने देखा है कि जब एक दृढ़ और स्पष्ट लक्ष्य के साथ जनता जमीन पर उतरती है तो कोई भी ताकत उसका मुकाबला नहीं कर पाती। इस तरह के घनीभूत जन-प्रयास के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा कारक बनता है ज्ञान, अनुभूत वास्तविकताओं का व्यापक फैलाव और एक लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता की व्यापकता। यहीं से भूमिका शुरू होती है शिक्षा और पुस्तकों की।

तोते की जान

यह अनुभवसिद्ध बात है कि असीम ताकत वाले तानाशाह को भी अगर किसी चीज से सबसे ज्यादा डर लगता है, तो वह है किताब। इसे समय-समय पर विभिन्न विचारवान लोगों ने दोहराया है। चाहे ‘डॉक्टर फाउस्टस’ कविता रचकर 19वीं शती के इतिहास में अपने लिए एक विशेष जगह बनाने वाले जर्मन लेखक और कवि हेनरिख हाइन हों या फिर 20वीं शताब्दी के ‘कैरी’, ‘द शाइनिंग’, ‘द स्टैंड’ जैसी विविध कृतियों के रचनाकार अमेरिकी लेखक और उपन्यासकार स्टीवन किंग, सबने इस भाव को अपने-अपने तरीके से अभिव्यक्त किया है। हेनरिख हाइने अपने नाटक ‘अल्मंसोर’ में कहते हैं- ‘जहां किताबें जलाई जाती हैं, वहां अंतत: लोगों को भी जलाया जाता है।’ जबकि स्टीवन किंग कहते हैं- ‘तानाशाह को किताबों से डर लगता है क्योंकि किताबें लोगों को सोचने के लिए प्रेरित करती हैं’।

इन दिनों बलूचिस्तान में खौफ का कुछ ऐसा ही आलम है, जहां कुछ समय से किताबों के प्रचार-प्रसार का अभियान चलाया जा रहा है और पाकिस्तानी हुकूमत इससे इतनी खौफजदा है कि वह इनपर छापे मार रही है, किताबों को जब्त कर रही है, इसमें शामिल लोगों को मार-पीट रही है। अपने समय में जाने-माने छात्र नेता रहे हुनक बलोच कहते हैं, ‘‘बलूचिस्तान के छात्रों को ऐसे ही नहीं पाकिस्तान की ज्यादतियों का सामना करना पड़ा है। हमारे कितने ही छात्रों को जान से मार दिया गया, कितनों को अगवा कर लिया गया और आज तक जिनका पता नहीं चला, ऐसे भी छात्रों की तादाद कम नहीं। आज पूरे बलूचिस्तान में ऐसे तमाम स्कूल हैं जिनपर फौज ने कब्जा करके उन्हें अपना ठिकाना बना रखा है। वे जानते हैं कि यहां के लोगों में शिक्षा का स्तर जितना बढ़ेगा, जनांदोलन को उतनी ही मजबूती मिलेगी।’’

छात्रों की मुहिम

वस्तुत: किसी भी आंदोलन की सफलता-असफलता उसमें छात्रों की भूमिका पर निर्भर करती है और बलूचिस्तान के आजादी के आंदोलन में यह तबका खासा सक्रिय रहा है। अब छात्रों के एक प्रभावशाली गुट ‘बलोच स्टूडेंट्स ऐक्शन कमेटी’ ने ‘किताब कारवां’ नाम से एक अभियान चलाया है। इस अभियान के तहत पूरे बलूचिस्तान में जगह-जगह पर किताबें उपलब्ध कराना, बुक स्टॉल लगाना और छोटे-छोटे स्तर पर किताब मेला वगैरह लगाकर लोगों में किताबों के प्रति जागरूकता लाने का प्रयास किया जा रहा है। बलूचिस्तान में शिक्षा की कमजोर ढांचागत सुविधाओं के मद्देनजर यह एक महत्वपूर्ण अभियान हो जाता है और जितने कम समय में यह आम लोगों के बीच पैठ बनाने में सफल रहा, उसने हुकूमत के होश उड़ा दिए।

सुरक्षा बल इस तरह के आयोजनों को जगह-जगह रोकने का प्रयास कर रहे हैं। बंदरगाह शहर ग्वादर से लेकर फजला कच समेच जैसी कई जगहों पर सुरक्षा बलों ने जबरदस्ती किताबों के स्टॉल हटा दिए और लोगों के साथ मारपीट की। ‘किताब कारवां’ के खिलाफ छेड़े गए अभियान के मामले में बलूचिस्तान स्टूडेंट्स ऐक्शन कमेटी ने साफ किया है कि वह इस अभियान को जारी रखेगी। कमेटी का मानना है कि यह अभियान आम लोगों को शिक्षित करने के उद्देश्य से चलाया जा रहा है।

क्वेटा यूनिवर्सिटी के छात्र हकीम बलोच (बदला हुआ नाम) का कहना है कि पाकिस्तान की हुकूमत इसलिए परेशान है क्योंकि उसे पता है कि लोगों को शिक्षित करने का यह अभियान आगे चलकर मजबूत राष्ट्रवादी विचारों को आगे बढ़ाने का माध्यम बन जाएगा। वे कहते हैं, ‘जहां छात्रों को क्वेटा जैसे शहरी इलाकों से भी इसलिए अगवा कर लिया जाता है कि वे बलूचिस्तान में मानवाधिकारों के हनन की बात करते हुए वहां दशकों से पाकिस्तान के अवैध कब्जे पर उंगली उठाते हैं, तो किताब संस्कृति को लोकप्रिय बनाने की किसी भी कोशिश से उसे डर तो लगेगा ही।’

ऐसा नहीं कि किताब कारवां केवल बलूचिस्तान में ही चल रहा है। कमेटी ने बलूचिस्तान के बाहर भी ऐसे ही प्रयास किए हैं लेकिन वहां भी उन्हें सुरक्षा बलों के अत्याचार का सामना करना पड़ा। 29 जनवरी को दजल में पंजाब पुलिस ने कमेटी के बुक स्टॉल पर धावा बोल दिया और वहां मौजूद सात बलूच छात्रों को हिरासत में ले लिया। इसी तरह का अभियान डेरा गाजी खान और आसपास के इलाकों में भी हुआ।

इस बारे में हकीम कहते हैं, ‘दिक्कत बलूचों से है। उन्हें पता है कि शिक्षा-जागरूकता का यह अभियान जैसे-जैसे आगे बढ़ेगा, सच्चाई पर पड़ा धुंधलका छंटता जाएगा और बलूचिस्तान की आजादी की यह लड़ाई और भी मजबूत होती जाएगी, इसकी जड़ें बलूचिस्तान की भौगोलिक सीमाओं के पार फैलती चली जाएंगी।’

दरअसल, दहशतगर्दी को सरकारी नीति के तौर पर इस्तेमाल करने वाला पाकिस्तान अब उस स्थिति में पहुंच गया है जहां उसे अपने किए का फल चखना पड़ रहा है। बात चाहे खैबर पख्तूनख्वा की हो, मुजफ्फराबाद समेत भारत के जबरन कब्जाए हिस्सों की, चाहे सिंध की। बलूचिस्तान के साथ-साथ ये सभी हिस्से सुलग रहे हैं और कभी यहां तो कभी वहां किसी चिनगारी के शोलों में तब्दील होने के वाकये अक्सर दिखते रहते हैं। कभी गुलाम कश्मीर में लोग भारत समर्थक नारे लगाते हुए अपनी किस्मत को कोसते हैं, तो कभी सिंध के लोग पाकिस्तान से आजाद होने के लिए सड़कों पर निकल पड़ते हैं, तो कभी खैबर पख्तूनख्वा में लोग सेना से दो-दो हाथ करने पर आमादा हो जाते हैं।

ऊपर से अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान की जो लगातार जोर-आजमाइश हो रही है, उसने उस पूरी पाकिस्तानी रणनीति को सिर के बल खड़ा कर दिया है जिसने अफगानिस्तान को अपने सूबे की तरह इस्तेमाल करने की मानसिकता विकसित कर ली थी। जाहिर है, दबाव बाहर से भी है और अंदर से भी। राजनीतिक कार्यकर्ता हमीद बलोच कहते हैं, ‘अफगानिस्तान सीमा पर जिस तरह के हालात बन रहे हैं, उसका असर कहीं बड़ा होने वाला है। यह सीमा जितनी अशांत होगी, बलूचों का अभियान उतना ही निर्णायक होगा और अगर यह जुगलबंदी लंबे समय तक चलती है, तो इसके बड़े नतीजे सामने आ सकते हैं।’

Topics: बलोच स्टूडेंट्स ऐक्शन कमेटीकिताब कारवांBaloch Students Action CommitteeKitab CaravanHuman rights violations in Balochistanबलूचिस्तानbalochistanपाञ्चजन्य विशेषबलूचिस्तान में मानवाधिकार
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