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सेवा एवं शोध को समर्पित आईसीएमआर

देश में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने, इससे जुड़े शोध को बढ़ावा देने के लिए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद यानी आईसीएमआर का पुनर्गठन 1948 में किया गया। इसने मलेरिया और तपेदिक जैसे रोगों पर अनुसंधान कर सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों को आकार दिया। कोरोना काल में टीका विकास और परीक्षण में इसकी भूमिका अहम रही

Written byRajpal Singh RawatRajpal Singh Rawat
Jan 9, 2025, 01:21 pm IST
in भारत, विश्लेषण, विज्ञान और तकनीक

स्वतंत्रता पूर्व 18वीं एवं 19वीं शताब्दी में देश में स्वास्थ्य सेवाएं बहुत बेहतर नहीं थीं। उस दौरान अनेकों बीमारियों के उपचार उपलब्ध नहीं थे। भारत में प्लेग, मलेरिया, हैजा, कालाजार और कुपोषण जैसी भयंकर समस्याएं थीं। वर्ष 1897 में ब्रिटिश सर्जन मेजर रोनॉल्ड रॉस ने यह खोजा कि मादा एनाफिलीज मच्छर के द्वारा मलेरिया फैलता है। इसके लिए उन्हें वर्ष 1902 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया। उसी के साथ-साथ 1899 में ब्रिटिश विज्ञानी हॉफकिन ने प्लेगरोधी टीके का विकास किया। वर्ष 1903 में चार्ल्स डोनोवन जो एक आयरिश चिकित्सक थे, उन्होंने भारतीय चिकित्सा सेवा में एक चिकित्सा अधिकारी के रूप में कार्य किया। उन्होंने कालाजार परजीवी की खोज करके इन रोगों के प्रति प्रारंभिक जानकारी उपलब्ध कराई। यह स्वास्थ्य अनुसंधान के क्षेत्र में प्रारंभिक प्रयास थे परंतु संगठित नहीं थे।

डॉ. रजनी कान्त
वरिष्ठ विज्ञानी आईसीएमआर

वर्ष 1900 में बैक्टीरियोलॉजिकल डिपार्टमेंट आफ इंडिया की स्थापना के साथ संगठित स्वास्थ्य अनुसंधान की शुरूआत हुई। इसके बाद बाम्बे बैक्टीरियोलॉजिकल लेबोरेटरी जिसे अब हॉफकिन संस्थान कहा जाता है और कसौली में पाश्चर इंस्टीट्यूट, चेन्नई, गिंडी में किंग संस्थान की स्थापना की गई। चूंकि ये सभी प्रयोगशालाएं विशिष्ट क्षेत्रों में कार्य कर रही थी और इनको एक सूत्र में पिरोने एवं देश व्यापी अनुसंधान कार्यक्रमों को दिशा देने के लिए एक संस्था की जरूरत महसूस की गई। इसलिए ब्रिटिश सरकार द्वारा सर हरकोर्ट बटलर एवं सर पार्डी ल्यूकिस के निर्देशन में वर्ष 1911 में इंडियन रिसर्च फण्ड एसोसिएशन ‘इरफा’ की स्थापना की गई। आजादी के बाद, इरफा में कई बदलाव हुई। नए कलेवर के साथ 1949 में इसे भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ‘आईसीएमआर’ का नाम दे दिया गया।

आईसीएमआर सिर्फ भारत की ही नहीं, दुनिया की सबसे पुरानी और बड़ी ‘मेडिकल रिसर्च बॉडीज’ में से एक है। भारत में बायोमेडिकल रिसर्च के फॉमर््यूलेशन, कोआर्डिनेशन और प्रमोशन की यह सर्वोच्च संस्था है। आईसीएमआर को शोध के लिए धन भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग द्वारा मुहैया कराया जाता। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ही इस काउंसिल के अध्यक्ष होते हैं।

पांच प्रमुख अभियान

आईसीएमआर के पांच प्रमुख अभियान हैं। पहला, नई जानकारी को एकत्रित करना। दूसरा, समाज के अशक्त, असहाय और हाशिए पर छोड़े गए तबकों की स्वास्थ्य समस्याओं के लिए शोध को बढ़ावा देना, तीसरा, देश की स्वास्थ्य समस्याओं को दूर करने के लिए आधुनिक तकनीक और तरीकों के इस्तेमाल बढ़ाना। चौथा, बीमारियों से बचाव के लिए उसकी पहचान कर वैक्सीन को बढ़ावा देना, पांचवा, बुनियादी ढांचे को मजबूत कर देश के मेडिकल कॉलेजों और स्वास्थ्य अनुसंधान से जुड़े संस्थानों में शोध संस्कृति को बढ़ावा देना।

आईएमसीआर द्वारा किए महत्वपूर्ण शोध

जिस समय भारत में मलेरिया एक बड़ा स्वास्थ्य संकट था। आईसीएमार ने मलेरिया के नियंत्रण के लिए बड़े पैमाने पर अनुसंधान किया और इसकी रोकथाम के लिए रणनीतियां विकसित कीं। आईसीएमआर ने भारत में पोलियो के उन्मूलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। परिषद ने पोलियो वायरस के प्रकारों और इसके फैलाव के तरीकों पर गहन अनुसंधान किया और पोलियो टीकाकरण अभियानों को बेहतर बनाने में सहयोग किया। इसके परिणामस्वरूप, 2014 में भारत को पोलियो मुक्त देश घोषित किया गया।

आईसीएमआर के नेतृत्व में मद्रास कीमोथिरेपी सेंटर द्वारा तपेदिक या टीबी के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए। इस दौरान किए गए शोध में यह प्रमाणित किया गया कि टीबी के रोगियों को अलग रखकर नहीं बल्कि दवाओं के माध्यम से घर पर भी उपचार दिया जा सकता है। टीबी के रोगियों से पहले दूरी बनाकर रखी जाती थी माना जाता था कि इनके संपर्क में आने से दूसरों को भी टीबी हो सकती है। 1960 के दशक में भारत में डॉट्स(Directly Observed Treatment Short-Course) की अवधारणा को लागू करने में भी आईसीएमआर का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इसी प्रकार कुष्ठरोग के उपचार के लिए आगरा स्थित आईएमसीआर के राष्ट्रीय जालमा कुष्ठ एवं अन्य माइकोबैक्टीरियल रोग संस्थान (एनजेआईएलओएमडी) ने सराहनीय कार्य किया है। रोग के निदान के दवाएं विकसित करने में महत्वूपूर्ण भूमिका निभाई है। आईसीएमआर ने मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। भारत में मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए आईएमसीआर ने कई अनुसंधान परियोजनाएं चलाई हैं। इनमें सुरक्षित प्रसव, नवजात शिशु देखभाल, और टीकाकरण कार्यक्रम शामिल हैं।

कोविड महामारी में भूमिका

2019 में जब कोविड जैसी महामारी आई तक आईएमसीआर की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। आईएमसीआर तेजी से कोविड-19 जांच के लिए किट विकसित कीं। महामारी के प्रसार की रोकथाम के लिए अनुसंधान किया। साथ ही कोविड के टीके को विकसित करने और फिर वितरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

आज देश ने चेचक, पोलियो, नवजातों को होने वाली टिटनेस जैसे कई बीमारियों का उन्मूलन कर दिया है,इसमें आईसीएमआर ने शोध के माध्यम से भरपूर योगदान दिया है। मलेरिया, टीबी, कालाजार, कुष्ठरोग आदि पर काफी हद तक नियंत्रण भी पा लिया है। इसके अलावा मेडिकल कॉलेजों, विश्वविद्यालयों एवं अन्य संस्थाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करके स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में नए अनुसंधानों को बढ़ावा देकर भारत सरकार के विजन 2047 को साकार करने में प्रयासरत है।

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