"मुगलों के विनाशक बाजीराव ने निजाम को धूल चटाकर ध्वस्त किया दक्षिण भारत में इस्लामी साम्राज्य का सपना"
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“मुगलों के विनाशक बाजीराव ने निजाम को धूल चटाकर ध्वस्त किया दक्षिण भारत में इस्लामी साम्राज्य का सपना”

अठारहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध(सन् 1720 से सन् 1740 तक) में विश्व के महानतम सेनापतियों की बात करें तो बाजीराव प्रथम, विश्व में सर्वश्रेष्ठ थे।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Jan 6, 2025, 05:22 pm IST
inभारत

अठारहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध(सन् 1720 से सन् 1740 तक) में विश्व के महानतम सेनापतियों की बात करें तो बाजीराव प्रथम, विश्व में सर्वश्रेष्ठ थे। बाजीराव प्रथम ने छत्रपति शिवाजी महाराज के हिंदू पद पादशाही के सिद्धांत का समूचे भारत में विस्तार किया था। वह मुगलों के लिए काल थे। बाजीराव प्रथम का उद्देश्य पतन्नोमुख मुगल साम्राज्य पर हिन्दू राज्य की स्थापना करना था।इसलिए बाजीराव प्रथम ने कहा था कि “हमें इस जर्जर वृक्ष के तने पर आक्रमण करना चाहिए, शाखाएं तो स्वयं ही गिर जाएंगी।” (Let us strike at the trunk of withering tree, the branches will fall by themselves) गौरतलब है कि 18वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशक में ही मुगल साम्राज्य का औरंगजेब की मृत्यु के साथ मृत्यु नाद बज गया था और लड़खड़ाते हुए उत्तर मुगल कालीन शासकों ने सत्ता संभाली थी। छत्रपति शाहू की ओर से बाजीराव प्रथम ने संपूर्ण भारत में मुगलों और इस्लामिक शासकों से मुगलिया के नाम से चौथ और सरदेशमुख वसूल की।भारत में इस्लामिक सत्ता की बखिया उधेड़कर उन्हें ध्वस्त कर दिया। इस कड़ी में तत्कालीन भारत में मुगल सेना के सबसे बड़े सेनापति चिनकिलिच खान उर्फ आसफजाह निजामुल्मुल्क (निजाम) जिसे मुस्लिम बड़ा योद्धा समझते जाता थे, उसे हिन्दू महा महारथी बाजीराव प्रथम ने बिना युद्ध के ही दो बार जमकर ठोका था।

उत्तर मुगल कालीन शासक मुहम्मद शाह रंगीला की रंग – रलियों से तंग होकर निजाम दक्षिण भारत भाग आया और उसने सन् 1724 में हैदराबाद की स्थापना की। निजाम चाहता था कि दक्षिण भारत में इस्लामिक साम्राज्य स्थापित हो जाए, परंतु बाजीराव प्रथम के होते हुए यह संभव नहीं था इसलिए बाजीराव प्रथम और निजाम के मध्य निर्णायक युद्ध होना अनिवार्य हो गया था । अचिरात् सन् 1726 में निजाम ने शंभाजी की सहायता से छत्रपति शाहू के विरुद्ध युद्ध आरंभ कर दिया। उस समय शाहू की स्थिति बहुत खराब हो गई। सन् 1727 में अविलंब बाजीराव कर्नाटक से वापस आया उस अवसर पर बाजीराव ने महान् सेनापति की योग्यता का परिचय दिया। एक वर्ष की छुटपुट युद्धों के पश्चात फरवरी सन् 1728 में बाजीराव ने पालखेड (पालखेड़) नामक स्थान पर निजाम को घेर लिया और निजाम को ऐसी कठिन परिस्थिति में डाल दिया कि उसने बिना युद्ध के संधि कर ली यह बाजीराव की महान विजय थी।
मार्च सन् 1728 में मुंगी शेगांव (Mungishegaon) की संधि के द्वारा परास्त निजाम ने –

  1. शाहू को महाराष्ट्र का एकमात्र शासक स्वीकार कर लिया ।
  2. चौथ और सरदेशमुख का वह धन जो पहले से बाकी था ,देने का वादा किया।
  3. मराठा सरदारों को अपनी सीमाओं में रहने देना स्वीकार किया। परंतु निजाम पूर्णतया परास्त नहीं हुआ था उसने सेनापति त्रिम्बकराव दाभादे को बाजीराव के विरुद्ध सहायता दी और इस पराजय के पश्चात भी मराठों में फूट डालने का प्रयत्न करता रहा। सन 1737 में निजाम को पुनः दिल्ली बुलाया गया और उसे आसफजा का पद देकर मराठों के विरुद्ध भेजा गया। भोपाल के निकट निजाम ने अपनी सेना बिछा दी। उसके पास बहुत अच्छा तोपखाना और लगभग डेढ़ लाख की बहुत बड़ी सेना थी। परंतु सेनापति और कई अन्य सरदारों की सहायता के ना होते हुए भी अस्सी हजार सैनिकों को लेकर बाजीराव ने निजाम को घेर कर फसा लिया। इस अवसर पर निजाम की भूल से उसकी सेना में भुखमरी और बर्बादी फैल गई। स्वयं बाजीराव ने कहा था “वह एक बुजुर्ग और अनुभवी व्यक्ति है मैं समझ नहीं पा रहा हूँ, कि उसने अपने को इस बुरी स्थिति में कैसे फंसा लिया, यह संपूर्ण भारत में उसके सम्मान को नष्ट कर देगा।” (He is an old and experienced man. I can not comprehend how he got himself in this difficulty, it will ruin him in the opinion of all India) अंत में बाजीराव प्रथम की बात सही सिद्ध हुई, बिना युद्ध के निजाम को 7 जनवरी 1738 में दुरई – सराय (Durai sarai) की संधि के लिए बाध्य होना पड़ा। जिसके अनुसार बेबस निजाम को-

संपूर्ण मालवा और नर्मदा तथा चंबल नदी के बीच की समस्त भूमि बाजीराव को देनी पड़ी। 2. 50 लाख रुपया बाजी राव को देना पड़ा।
इस युद्ध के पश्चात निजाम ने बाजीराव से पूर्ण पराजय मान ली। बाजीराव प्रथम भारत में विख्यात हो गये क्योंकि उन्होंने उस समय मुगलों के भारत के सबसे बड़े कूटनीतिज्ञ और प्रसिद्ध सेनापति को बिना युद्ध के बुरी तरह से धूल चटाई थी। बाजीराव का नाम उत्तर भारत के उत्तर मुगलकालीन तथाकथित बादशाह रंगीला और संपूर्ण भारत के मुस्लिम शासकों के लिए दहशत का पर्याय बन गया था।

Topics: इस्लामी साम्राज्य का सपना ध्वस्तहिन्दू राज्यBajiraoछत्रपति शिवाजी महाराजबाजीराव प्रथम
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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