उत्तराखंड: रिस्पना, बिंदाल नदियों के मुहाने तक में बाहर से आए लोगों ने कर लिए अवैध कब्जे
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उत्तराखंड: रिस्पना, बिंदाल नदियों के मुहाने तक में बाहर से आए लोगों ने कर लिए अवैध कब्जे

देहरादून की रिस्पना और बिंदाल नदियों के मुहाने तक अतिक्रमण हो गया है, सरकारी जमीनों, नदी श्रेणी की भूमि पर बाहर से आए लोग कब्जे कर रहे हैं और राजनीतिक दलों के लोग वोट बैंक की लालच में उन्हें संरक्षण दे रहे हैं।

Written byदिनेश मानसेरादिनेश मानसेरा
Dec 2, 2024, 11:44 am IST
inउत्तराखंड
Uttarakhand Rispna Bindal riverfront encroachment

देहरादून: राजधानी और आसपास में नदियां नाले सब जगह सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे ही कब्जे हो रहे हैं। देहरादून की रिस्पना और बिंदाल नदियों के मुहाने तक अतिक्रमण हो गया है, सरकारी जमीनों, नदी श्रेणी की भूमि पर बाहर से आए लोग कब्जे कर रहे हैं और राजनीतिक दलों के लोग वोट बैंक की लालच में उन्हें संरक्षण दे रहे हैं।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के दबाव में प्रशासन ने मई जून माह में रिस्पना नदी किनारे अतिक्रमण हटाने के लिए एक्शन लेना शुरू किया था, उम्मीद की जा रही थी ये अभियान जारी रहेगा कुछ अतिक्रमण एन जी टी को दिखाने के लिए हटाए भी किंतु अब वो फिर से काबिज हो गए हैं, उल्लेखनीय है पूर्व में अतिक्रमण नहीं हटाने पर एन जी टी द्वारा जिला अधिकारी सहित अन्य अधिकारियो पर एक एक लाख का जुर्माना वसूला है और इसे प्रशासनिक लापरवाही माना था। देहरादून प्रशासन, नगर निगम और एमडीडीए अब 2016 के बाद हुए अतिक्रमण को हटाने के लिए अवैध कब्जेदारों को नोटिस देकर कब्जा हटाने की कारवाई कर रहा है। जबकि 2016 के बाद के 534 से ज्यादा अतिक्रमण प्रशासन द्वारा चिन्हित हुए हैं।

2016 से पहले के अतिक्रमण की बात इस लिए नहीं की जा रही, क्योंकि तत्कालीन सरकार ने रिस्पना और बिंदाल बरसाती नदियों किनारे हुए अतिक्रमण को मलिन बस्तियों का रूप देते हुए इन्हें रूगुलाइज किए जाने का फैसला लिया था। देहरादून के बीच बहने वाली ये बरसती नदियां अब नाले में तब्दील हो चुकी है और इसके किनारे बदसूरत बस्तियां, राजनेताओं की राजनीति का अखाड़ा बन चुकी है। तुष्टिकरण, वोट बैंक की राजनीति ने यहां बाहरी लोगों को बसने दिया जो कि अब देहरादून की सबसे बड़ी समस्या का रूप ले चुकी है। एनजीटी का मानना है कि ये अवैध अतिक्रमण नदी के फ्लड जोन में है और एक दिन कोई बड़ा जानमाल का नुकसान हो सकता है। नदी विशेषज्ञ भी मानते हैं कि नदियां तीस पैंतीस साल में अपने पुरानी मार्ग पर जरूर लौट कर आती है। इसलिए बिंदाल और रिस्पना में भी हमेशा खतरा बना रहेगा।

पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपने ड्रीम प्रोजेक्ट में रिस्पना रिवर फ्रंट को बनाए जाने को रखा था। लेकिन उनकी सरकार के जाते ही ये योजना भी मलिन बस्ती आज भी कायम है और नदी के मुहाने तक अवैध कब्जे की जद में आ चुकी है। एनजीटी ने इन नदियों के अतिक्रमण को नहीं हटाने पर देहरादून की डीएम और अन्य अधिकारियों पर एक-एक लाख रु का जुर्माना भी डाला और आगे अतिक्रमण नहीं हटाने पर उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को अग्रिम कारवाई के लिए निर्देशित भी कर दिया था।

इसे भी पढ़ें: उत्तरकाशी हिंदू महापंचायत में शामिल हुए, हैदराबाद विधायक टी राजा, कहा- ‘मैं हिंदू समाज को जगाने के लिए आया हूं’

इस अतिक्रमण को बचाने के लिए राजनीति भी शुरू हो चुकी है, स्थानीय निकाय चुनाव नजदीक है, विधायक, मंत्री, विपक्षी दलों के नेताओ को इसमें अपना वोट बैंक दिखता है। लिहाजा वो प्रशासन की अतिक्रमण हटाओ कारवाई को रोकने के लिए अपने अपने प्रभाव का इस्तेमाल भी करते रहे हैं। प्रशासन के आगे एक तरफ कुआं एक तरफ खाई जैसी कहावत चरितार्थ हो रही है, एक तरफ राजनीतिक प्रभाव तो एक तरफ एनजीटी के भय उन्हें सता रहा है। बताया जाता है कि एनजीटी बेहद सख्त कारवाई का संकेत दे चुकी है। ऐसे में अतिक्रमण हटाना प्रशासन की मजबूरी बना हुआ है।

रिस्पना नदी पर सर्वाधिक अवैध कब्जे

जानकारी के मुताबिक, विधानसभा के पीछे से बहने वाली रिस्पना नदी की खूबसूरती कभी देहरादून की शान होती थी। इस नदी के 13 किमी क्षेत्र में 27 मलिन बस्तियों बन चुकी है। बिंदाल और रिस्पना में 129 बस्तियां चिन्हित हुई है, जिनमें करीब 40 हजार लोग सरकार की जमीन पर अतिक्रमण करके बैठे हुए हैं और ये नदी श्रेणी की भूमि फ्लड जोन का हिस्सा है।

कांग्रेस की सरकार ने दिया था संरक्षण

राज्य और राजधानी बनने के बाद हजारों लोग यहां अवैध रूप से बाहरी प्रदेशों से यहां आकर बसते चले गए, जिनमे ज्यादातर अल्पसंख्यक समुदाय से थे। 2016 में हरीश रावत सरकार ने वोट बैंक की लालच में अपने स्थानीय विधायकों पार्षदों के कहने पर इन मलिन बस्तियों को रेगुलाइज करने का जिओ जारी कर दिया, जिसके बाद से ये अवैध कब्जे की जमीन सौ-सौ के स्टांप पेपर पर बिकने लगी। 2017 में जब बीजेपी सरकार आई तो एक हाई कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका पर एक आदेश के बाद इन बस्तियों के नियमितीकरण की प्रकिया पर रोक लगानी पड़ी। अब इस पर एनजीटी भी संज्ञान ले रहा है, जिसके बाद प्रशासन को अतिक्रमण हटाना पड़ रहा है।

Topics: नदियों के किनारों पर अतिक्रमणदेहरादूनबिंदालउत्तराखंडencroachment on river banksUttarakhandBindalअतिक्रमणEncroachmentएनजीटीNGTDehradunरिस्पनाRispana
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