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होम भारत

जनजातीय हैं सनातनी!

भारत में एक से दूसरे छोर तक व्याप्त हमारा जनजातीय समाज प्रकृति पूजक हैऔर उनकी आस्थाएं वही हैं जो सनातनी हिन्दुओं की हैं। जनजातीय समाज गर्व से स्वयं को सनातन परंपरा से जुड़ा बताता है। लेकिन सेकुलर बुद्धिजीवी इस बात से ईर्ष्या करते हैं और जनजातीय समाज को सनातनी से इतर सिद्ध करने के लिए विभिन्न प्रपंच रचते हैं

Written byकृष्णमुरारी त्रिपाठी ‘अटल’कृष्णमुरारी त्रिपाठी ‘अटल’
Nov 11, 2024, 01:09 pm IST
in भारत, धर्म-संस्कृति

भारतीय सनातन हिन्दू धर्म एवं संस्कृति शाश्वत है। यह अपनी विराटता के साथ कालप्रवाह की धाराओं के सुखद एवं दुखद अनुभवों सहित सतत् प्रवाहित होती आ रही है। इतना ही नहीं इसी सनातन हिन्दू धर्म से सिख, बौद्ध, जैन पंथों का प्रादुर्भाव हुआ। हमारी यही सनातन संस्कृति बिना किसी बन्धन के लोगों के स्वतंत्र चिन्तन-मत के अनुसार बहुलतावादी सांस्कृतिक जीवटता के इतिहास को संजोकर अमर चेतना की तरह जीवन की धार बनकर प्रवाहित हो रही है। अनेकानेक षड्यंत्रों, आक्रमणों, कुठाराघातों के बावजूद इसने अपनी महत्ता को, अपने मूल तत्व को बनाए रखा है। जनजातीय समाज इसी सनातन धर्म-संस्कृति का एक अभिन्न अंग रहा है।

यह अलग बात है कि सभ्यताओं के विकास एवं लगातार आक्रमणों के कारण भारत के विविध क्षेत्रों में निवास कर रहे जनजातीय समाज में परम्पराओं, संस्कृति, विवाह, रीति-रिवाज, पूजा पद्धति, बोली एवं कार्यशैली में शायद कहीं आंशिक अन्तर दिखता हो। किन्तु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सनातन हिन्दू समाज की ‘जनजातीय एवं गैर जनजातीय इकाइयों’ का मूल तत्व एवं केन्द्र हिन्दुत्व की धुरी ही है।

वैदिक कालीन उपासना पद्धति

वैदिक साहित्य की ओर यदि हम दृष्टिपात करें तो ऋग्वैदिक कालीन समाज जनजातीय समाज के स्वरूप के साथ ही आगे बढ़ रहा था। आज भी यदि हम किसी जनजातीय समाज में देखें तो यह साफ दिखता है कि उनकी पूजा पद्धतियों में भगवान शिव का त्रिशूल, डमरू, स्वास्तिक, देव एवं देवी की उपासना, श्रीफल नारियल, तुलसी, तांत्रिक क्रियाओं में नींबू-मिर्च, गोबर से लिपाई-पुताई इत्यादि के प्रयोग क्या उनका हिन्दू समाज से अलग अस्तित्व दर्शाते हैं? जनजातीय समाज द्वारा जिन देवताओं का महायदेव, ठाकुरदेव, बूढ़ा देव, पिलचूहड़ाम के स्वरूप में स्मरण एवं पूजन किया जाता है उन्हीं देवताओं को गैर जनजातीय सनातन हिन्दू धर्मावलम्बी समाज शिव, महेश, नीलकंठ आदि नामों से जानता एवं पूजता है।

वर्तमान परिभाषा अनुसार, जनजातीय समाज एवं गैरजनजातीय समाज कहा जाने वाला हिन्दू समाज, दोनों एक दूसरे के प्राणतत्व हैं, दोनों हिन्दू एवं हिन्दुत्व को हृदय में रचा-बसाकर आगे बढ़ रहे हैं। उत्तर-पूर्व भारत में सीमांत जनजातियों की भांति ‘मिशमिश’ जनजाति सूर्य एवं चन्द्रमा की पूजा दोन्यी-पोलो के स्वरूप में करते हैं। उनका मानना है कि सूर्य, चन्द्र सत्य के पालनकर्ता भगवान हैं। साथ ही इसी परम्परा को अरुणाचल प्रदेश की लगभग सभी पच्चीसों जनजातियां मानती हैं।

प्रकृति पूजन की रीत

सनातन धर्म में, प्रकृति को मां के स्वरूप में पूजने एवं प्रकृति के तत्वों यथा भू-जल-अग्नि-आकाश-सूर्य-चन्द्र-नदी-तालाब-समुद्र और वृक्षों यथा-पीपल, नीम, तुलसी, आम, गुग्गुल, बरगद इत्यादि की पूजा करने की परम्पराएं अनवरत चली आ रही हैं। क्या यह सब हमारी जनजातीय संस्कृति के अभिन्न अंग एवं मूलस्वरूप को नहीं दर्शाता? धार्मिक अनुष्ठानों में यज्ञ वेदी का निर्माण वैदिक कालीन समाज एवं हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो से उन चिन्हों, यथा-वेदी, पशुपति की मूर्ति इत्यादि का प्राप्त होना हमारी उसी संस्कृति का ही प्रमाण है। ये सभी ध्वंसावशेष अवशेष भारत ही नहीं बल्कि विश्व के विभिन्न स्थलों से लगातार प्राप्त हो रहे हैं।

वर्तमान में हमारे जनजातीय समाज में कुल देवी-देवताओं के पूजन की पद्धति एवं हवन (होम) किया जाना हिन्दुत्व की अक्षुण्ण परम्पराओं के द्योतक हैं। जनजातीय समाज के द्वारा नागों की पूजा करना एवं उनके भित्तिचित्र, शैलचित्र को उकेरना, यह सब आज भी गैर जनजातीय हिन्दू समाज में नागपंचमी के रूप में मनाया जाता है। सनातनी भी नाग देवता की पूजा कर अपने घरों के मुख्य द्वार पर नाग देवता का प्रतीकात्मक चित्रण कर उनसे लोकमंगल की कामना करते हैं। यह हमारी विशुद्ध सांस्कृतिक विरासत ही तो है जिसे सनातन समाज का प्रत्येक वर्ग बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाता है। यदि हम आधुनिक इतिहास के बोध से इतर अपने सनातन कालक्रम को देखें, तो हमारी हिन्दू संस्कृति अपनी साहचर्यता, बन्धुता एवं समन्वय के साथ विश्व की अनूठी संस्कृति के तौर पर स्थापित है। सनातन परंपरा में ईश्वरीय अवतारों, संत-महात्माओं की जाति देखने की परंपरा कभी नहीं रही।

प्रभु राम का आदर्श

त्रेतायुग में भगवान श्रीराम के वनवास काल में चित्रकूट से दण्डक वन तथा लंका युद्ध में विजय तक के समय में उनके सहयोगी वनांचलों में निवास करने वाले जनजातीय समाज रहे थे। इस कड़ी में श्रृंग्वेरपुर के राजा निषाद राज गुह ने भगवान के वनवास की जानकारी होते ही अपना राज्य अपने आराध्य को सौंपने की बात कही। किन्तु भगवान राम ने उन्हें मित्र की पदवी देकर अपने समतुल्य बतलाया और मैत्रीबोध का श्रेष्ठतम मानक स्थापित किया। चाहे गंगा पार उतारने के समय का केवट व भगवान राम का स्नेहिल संवाद हो या भगवान राम की भक्ति में लीन शबरी माता के जूठे बेर का सेवन करना हो। यह सब हमारी सनातन संस्कृति की ही विशेषता है। माता शबरी को आज भी समूचा हिन्दू समाज मां के रूप में पूजता है, इससे अनूठा उदाहरण विश्व में और कहां मिलेगा? यही तो हमारी सनातन संस्कृति एवं उसकी सदा प्रवाहित होने वाली स्नेह, सामंजस्य, श्रेष्ठता की अविरल धारा है।

महापुरुषों की थाती

सनातन संस्कृति के महानायकों, यथा-निषादराज गुह, माता शबरी, बिरसा मुंडा, टंट्या भील, जात्रा भगत, कालीबाई, गोविन्दगुरु, ठक्कर बापा, गुलाब महाराज, राणा पूंजा, भीमा नायक, भाऊसिंह राजनेगी, राजा विश्वासु भील, तुंडा भील, रानी दुर्गावती, सरदार विष्णु गोंड जैसे अनेकानेक वीरों ने सनातन की रक्षा एवं निज संस्कृति व राष्ट्र के लिए जीवन समर्पित कर दिया। उस महान परम्परा के संवाहकों के वंशजों को हिन्दू समाज से अलग बताना एवं लगातार विभिन्न तरीकों से उन्हें उनकी सांस्कृतिक विरासत से काटने के षड्यंत्र रचने वाले क्या हमारे जनजातीय समाज के गौरवशाली अतीत एवं उनके पुरखों द्वारा स्थापित परिपाटी को नष्ट नहीं कर रहे हैं? यदि जनजातीय समाज सनातन हिन्दू धर्म से अलग होता तो क्या जनजातीय समाज के वीर महापुरुष स्वयं की आहुति देकर कन्वर्जन के विरोध एवं संस्कृति की रक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग करते?

संकट झेले, साथ रहे

इस्लामिक आक्रान्ताओं, लुटेरों के बर्बर कालखण्ड एवं अंग्रेजी उपनिवेशवाद की त्रासदी से चले आ रहे षड्यंत्रों के बावजूद जनजातीय समाज सनातन हिन्दू समाज का वह अविभाज्य एवं मूल अंग बना रहा है, जिसके बिना सम्पूर्ण हिन्दू समाज की कल्पना नहीं की जा सकती है। जब हमारे जनजातीय समाज कष्ट में होते हैं या उनके साथ षड्यंत्र होते हैं तब समूचा हिन्दू समाज स्वयं को आहत समझता है। क्या यह पीड़ा अपनेपन से नहीं उपजी? यदि हमारे जनजातीय समाज को कोई हमसे अलग करने की कुचेष्टा करता है तो हमारा रक्त क्यों नहीं खौलना चाहिए?

मंदिर हैं प्रमाण

विश्व प्रसिद्ध ओडिशा के जगन्नाथपुरी मंदिर का इतिहास इस बात का साक्षी है कि भगवान जगन्नाथ की मूर्ति का मूल काष्ठ खंड जनजातीय समाज के महान राजा विश्वासु भील को ही प्राप्त हुआ था। इसी तरह भुवनेश्वर में भगवान लिंगराज को बाड जनजाति के पुजारियों द्वारा स्नान करवाया जाता है। कुल्के एवं रॉथरमुंड नामक विद्वानों ने अपने विभिन्न शोधों में पाया कि कुरुबा, लंबाडी, येरुकुल, येनाडी एवं चेंचू जनजातियों के तिरुपति के भगवान वेंकटेश्वर मंदिर से गहरे सम्बन्ध हैं।

इसी तरह दक्षिण मेघालय में मासिनराम के निकट मावजिम्बुइन गुफाएं हैं, जहां गुफा की छत से टपकते हुए जल मिश्रित चूने के जमाव से शिवलिंग बना है। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार यह मान्यता लगभग 13वीं शताब्दी से ही रही। ‘हाटकेश्वर’ शिवलिंग जयन्तिया पर्वत की गुफा में वहां की रानी सिंगा के समय से स्थापित है। हाटकेश्वर धाम में जयन्तिया जनजाति समाज के लोग प्रतिवर्ष शिवरात्रि का महोत्सव बड़े हर्षोल्लास से मनाते हैं।

अद्भुत है रामनामी समाज

वहीं वैष्णों देवी तथा केरल के भगवान अयप्पा से जनजातीय समाज के आत्मिक एवं आध्यात्मिक सम्बन्ध हैं। जनजातीय समाज द्वारा भगवान नृसिंह की प्रतिमाओं को पूजा जाता है। इसी प्रकार विंध्य की विभिन्न जनजातियों द्वारा हिन्दू परम्पराओं, पूजा पद्धतियों का लगभग उसी तरह पालन एवं निर्वहन किया जाता है जिस प्रकार शेष अन्य हिन्दू समाज करता है। छत्तीसगढ़ का रामनामी समाज तो भगवान राम के लिए समर्पित होने के लिए ही जाना जाता है, जिसका विस्तार मध्य प्रदेश तथा झारखंड तक है। रामनामी समाज पूर्णरूपेण राममय है, इस समाज के बन्धु अपने सम्पूर्ण शरीर पर राम नाम गुदवा लेते हैं, मोरपंख धारण करते हैं, राम नाम का संकीर्तन करते हैं। राम के प्रति अगाध श्रद्धा रखने वाला यह समाज सनातन हिन्दू धर्म का वटवृक्ष है।

जनजातीय समाज का सनातन हिन्दू धर्म के उन्नयन में योगदान की गाथा झुठलाई नहीं जा सकती। पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक निवास करने वाला जनजातीय समाज सनातन धर्म की धर्मध्वजा को ऊंचा रखता आया है। यहां यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जिस कठोरता एवं नियमबद्धता के साथ हमारा जनजातीय समाज हिन्दू धर्म का अपनी परंपराओं के अनुसार पालन एवं कार्यान्वयन करता है। नि:संदेह जनजातीय समाज विशुद्ध रूप से सनातन हिन्दू समाज का अभिन्न अंग है।

छोटानागपुर क्षेत्र में 1831-32 का जनजातीय संघर्ष बड़ा व्यापक था। इस संघर्ष का नेतृत्व बुधू भगत ने किया। उनकी रणनीति सीमित साधनों में भी अद्भुत सफलता प्राप्त कर रही थी। इस आन्दोलन में भी धार्मिक, सामाजिक व सांस्कृतिक पुर्नसंरचना का आधार था। उन्होंने अपने साथियों के साथ घात लगाकर अंग्रेजों पर इतने हमले किए कि अंग्रेज सकते में आए गए। उनका इतना खौफ था कि अंग्रेजी सेनाओं ने अपनी छावनी तक से निकलना बंद कर दिया था। छावनी में भी अंग्रेज डरे रहते थे कि कहीं हमला न हो जाए। अंग्रेजों की लाख कोशिशों के बाद भी वह उन तक नहीं पहुंच पा रहे थे। अंतत: अंग्रेजी हुकूमत ने बुधू भगत को जिंदा या मुर्दा पकड़ने पर 1000 रुपये का इनाम घोषित कर दिया। उस वक्त यह बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी। 13 फरवरी, 1832 को अपने ग्रामवासियों एवं साथियों के साथ बहादुरीपूर्वक लड़ते हुए बुधू भगत बलिदान हो गए।

Topics: Sanatan Dharma Cultureऋग्वैदिक कालीन समाज जनजातीय समाजवैदिक साहित्यसनातन हिन्दू समाजRigvedic period societyVedic literatureसांस्कृतिक विरासतSanatan Hindu societytribal societyसंस्कृति व राष्ट्रCultural Heritageपाञ्चजन्य विशेषसनातन धर्म संस्कृति
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