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स्व के लिए गोंडवाना की वीरांगना धाय मां इमरती देवी का समर्पण और इमरती ताल

जनजातीय गौरव दिवस के आलोक में गढ़ा -कटंगा,फिर गढ़ा -मंडला के महान हिंदू जनजातीय गोंडवाना साम्राज्य के स्मृत- विस्मृत महान वीरों और वीरांगनाओ अमर गाथा श्रृंखला- भाग -3

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Nov 9, 2024, 07:28 pm IST
inमध्य प्रदेश
इमरती ताल

इमरती ताल

भारत के महान जनजातीय सम्राट संग्राम शाह ने 15वीं शताब्दी में गढ़ा कटंगा में वृहत गोंडवाना साम्राज्य का निर्माण किया और कालिंजर के राजा कीरत सिंह के साथ रक्षात्मक संधि स्वीकार करते हुए अपने पुत्र दलपति शाह के लिए उनकी पुत्री वीरांगना दुर्गावती के साथ विवाह का प्रस्ताव रखा। सन 1541 में संग्राम शाह का निधन हो गया। इसके बाद उनके पुत्र दलपति शाह सम्राट बने। सन 1542 में दलपति शाह का विवाह, वीरांगना दुर्गावती से हुआ। महारथी दलपति शाह ने मदन महल की जगह सिंगौरगढ़ को अपना निवास स्थान बनाया। सिंगौरगढ़ में सन 1543 में वीर नारायण सिंह का जन्म हुआ और धाय मां के रूप में इमरती देवी नियुक्त हुईं।

मध्य युग में राजपूताना में जो स्थान महान वीरांगना पन्ना धाय को प्राप्त है, वही स्थान गोंडवाना में इमरती देवी का है। भारत में स्वामी के प्रति भक्ति और समर्पण का इतिहास सदियों से चला आ रहा है। रामायण में भक्त हनुमान ने प्रभु राम के प्रति अपनी भक्ति और समर्पण से जहां उनके प्रिय बने वहीं महाभारत काल में पांडव पुत्र अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के प्रति समर्पण और भक्ति के लिए याद किए जाते हैं। इसी तरह की स्वामी भक्ति और त्याग गोंडवाना साम्राज्य में धाय मां इमरती देवी में देखने को मिलती है। जिन्होंने राजकुमार वीरनारायण को दुश्मनों से बचाते हुए जंगल में सुरक्षित रखा। इसी स्वामिभक्ति को देखते हुए गोंड राजा दलपति शाह और रानी दुर्गावती ने गढ़ा में इमरती ताल का निर्माण कराया। आज यह तालाब जल संरक्षण के साथ ही सौंदर्य के लिए भी पहचाना जाता है। सन 1542 में रानी दुर्गावती और दलपति शाह का विवाह हुआ और इसके साथ थी साम्राज्य का चरमोत्कर्ष भी प्रारंभ हुआ। राज्य का विस्तार उत्तर से दक्षिण 300 मील एवं पूर्व से पश्चिम 225 मील कुल 67500 वर्ग मील तक फैल गया था।

मालवा के सुल्तान कादिर शाह के आक्रमण के विरुद्ध दलपति शाह की योजना

सन 1544 में दलपति शाह और रानी दुर्गावती का निवास सिंगौरगढ़ में ही था और इसी समय ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार मालवा के सुल्तान कादिर शाह उर्फ मल्लू खां ने गोंडवाना पर आक्रमण करने की योजना बनाई। इस बात की खबर गुप्तचरों के माध्यम से दलपति शाह को लग गई, उन्होंने अपनी सेना को तीन हिस्सों में बांट दिया और 5000 सैनिकों और एक हजार धनुर्धारियों का नेतृत्व रानी दुर्गावती को सौंपकर सिंगौरगढ़ में रक्षा के लिए रखा और स्वयं दमोह के निकट बरसई घाटी के दर्रे में कादिर खान को धूल चटाने के लिए मोर्चा जमाया।

वीरनारायण सिंह धाय मां इमरती देवी की सुरक्षा में, युद्ध का आरंभ और विजय

रानी दुर्गावती ने वीरनारायण को धाय मां इमरती देवी के सौंप कर सिंगौरगढ़ से निकलकर दर्रे का ऊपरी मोर्चा संभाल लिया। एक सुनियोजित रणनीति के अंतर्गत युद्ध आरंभ हुआ। योजना के अंतर्गत गोंड सैनिक पीछे हटने लगे और सुल्तान की सेना आगे बढ़ने लगी और दर्रे के मध्य में फंस गई। इसी का लाभ उठाते हुए एक ओर से दलपति शाह और दूसरी ओर से रानी दुर्गावती ने भयानक हमला किया, सुल्तान की सेना में भगदड़ मच गई। सुल्तान की पराजय हुई।

वीर नारायण की रक्षा के लिए धाय मां इमरती देवी का युद्ध

बरसई घाटी के युद्ध में सुल्तान पराजित हुआ, परंतु इसी समय उसकी एक टुकड़ी भटककर धाय मां इमरती देवी के पास पहुंच गई। जैसे ही उन्होंने शिविर पर आक्रमण किया वैसे ही अपने सैनिकों समेत धाय मां इमरती ने तलवार लेकर सैनिकों पर हमला किया। भीषण युद्ध हुआ जिसमें पांच मुस्लिम सैनिकों का वध करके, वह वीरनारायण को लेकर ओझल हो गईं। एक नाले को पार करते समय उनके पांव की हड्डी टूट गई बावजूद इसके इमरती देवी ने वीरनारायण की रक्षा की। दलपति शाह और रानी दुर्गावती ने वीरनारायण और इमरती देवी को शिविर में ना पाकर तलाश किया तब एक सुरक्षित स्थान पर दोनों को पाया। धाय मां इमरती देवी की स्वामिभक्ति और कर्तव्यनिष्ठा ने सभी को अभिभूत कर दिया और उनके सम्मान में इमरती ताल का निर्माण कराया जो इस वृत्तांत का साक्षी है।

गौरतलब है कि गोंडवाना साम्राज्य में जल संरक्षण पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया गया। राजाओं ने अपने सेवकों और भक्तों को पुरस्कार स्वरूप तालाबों का निर्माण कराया। इससे यह भी संदेश दिया गया कि तालाब वर्षों तक भरे रहेंगे तो पानी की समस्या नहीं रहेगी। गढ़ा में पंडा की मढ़िया के पास बने इस तालाब की देखरेख नगर निगम के हाथों में है। तालाब को संरक्षित करने और सौंदर्य को लेकर हर साल समाजसेवी और राजनीतिक संगठनों से जुड़े लोग सफाई अभियान चलाते हैं। जिससे इस तालाब की सुंदरता भी देखी जा सकती है। इसी क्रम में गोंड काल में जितने भी तालाबों का निर्माण कराया गया वह किसी न किसी उद्देश्य को लेकर कराया गया। इमरती ताल राजकुमार वीर नारायण की धाय मां को वीर नारायण को शत्रुओं से सुरक्षित बचाने के लिए पुरस्कार स्वरूप दिया गया था। इसी तरह संग्राम सागर, राजा संग्राम शाह के नाम उन्हीं के द्वारा निर्मित किया गया। रानीताल को रानी दुर्गावती के नाम पर बनाया गया। फूलसागर रानी दुर्गावती की देवरानी फूलवती के नाम पर बनाया गया। रानी के विश्वासपात्र आधार सिंह कायस्थ के नाम पर आधारताल और महेश ठाकुर के नाम पर ठाकुर ताल का निर्माण कराया गया। रानी की सेविका रामचेरी के नाम पर चेरीताल का निर्माण कराया गया। भू-जल विशेषज्ञ के नाम पर कीकर ताल और रामचेरी के पुत्र मोतीसिंह के नाम पर मोती ताल बनवाया गया।गोंडवाना काल में जबलपुर परिक्षेत्र में 52 तालाब, 84 तलैया और 40 बावलियां का अनोखा संगम था। इसलिए जबलपुर को तत्कालीन समय में जलहलपुर के नाम से भी जाना जाता था।

 

 

 

Topics: धाय मांइमरती देवीइमरती तालपाञ्चजन्य विशेषरानी दुर्गावतीगोंडवाना साम्राज्य
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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