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एक श्वास की कीमत तुम क्या जानो रमेश बाबू?

कोई मनुष्य कितना ही धनवान हो या कितना ही गरीब, कितना ही शक्तिशाली हो या निशक्त, फिर भी अपनी एक भी श्वास को वह न तो बढ़ा सकता है और न घटा सकता है

Written byडॉ. विकास दवेडॉ. विकास दवे
Nov 5, 2024, 10:11 am IST
inसोशल मीडिया

आप कहेंगे एक अत्यंत गंभीर शब्द श्वास के साथ रमेश बाबू जैसा फिल्मी संवाद जोड़कर क्यों एक गंभीर विषय को हास्य का विषय बनाना चाहता हूं? यह हास्य का नहीं, बल्कि गंभीर चिंता और उससे अधिक चिंतन का विषय है। यह संस्मरण लिखने का एकमात्र कारण यह है कि हम सब अपनी मानवीयता से ओत-प्रोत ज्ञान परंपरा पर गर्व करने के बाद भी पश्चिमी जगत से कुछ बातें नहीं सीख पाए। हमारी ज्ञान परंपरा में अत्यंत समृद्ध जीवन विज्ञान भरा पड़ा है, किंतु उसे अपने जीवन में अंगीकार नहीं किया तो पुरखों की संपूर्ण तपस्या को धूल-धूसरित होने में समय नहीं लगता। ऐसा ही एक महत्वपूर्ण विषय है-सीपीआर अर्थात् कृत्रिम श्वास देना।

पश्चिमी जगत से तुलना इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि संपूर्ण पश्चिम में बच्चों के स्कूलों में दाखिला लेते ही सीपीआर का महत्व और उसकी प्रक्रिया समझा दी जाती है। लेकिन भारत में विद्यालय स्तर पर ऐसा कोई उपक्रम संपादित होते दिखाई नहीं देता। ये बातें दरअसल इसलिए ध्यान में आईं कि विगत दिनों परिवार के विवाह समारोह में एक अप्रत्याशित घटना घटी। समारोह में सब कुछ आनंदपूर्वक चल रहा था। सैकड़ों परिजन भोजन, नृत्य और संगीत का आनंद ले रहे थे कि अनायास रुक-रुक बारिश शुरू हो गई। वर्षा ने पूरे कार्यक्रम में थोड़ी-सी असहजता पैदा की, किंतु जल्दी ही संपूर्ण व्यवस्थाएं पुन: सुचारु रूप से संचालित होने लगीं।

एक नवयुवक जो मुश्किल से 18-20 वर्ष का रहा होगा। एक स्टॉल की तरफ रखे कूलर को ठीक करने के लिए गया। इसे उस तरुण का दुर्भाग्य ही कहूंगा कि वह जैसे ही पानी में डूबे कूलर के पास पहुंचा, अचानक बिजली का एक तार मैदान में छू गया और बिजली के झटके से युवक जमीन पर गिरकर तड़पने लगा। वह न केवल अचेत हो चुका था, बल्कि उसकी जीभ भी बाहर की ओर लटक गई थी। आनन-फानन में विद्युत प्रवाह को बाधित किया गया। इसके बाद एक शिक्षित समाज की परीक्षा प्रारंभ हुई। आमतौर पर भारतीय समाज में जैसा होता है, उस युवा को घेर कर सारे लोग या तो भय के वशीभूत केवल मूक दर्शक बने थे या कुछ लोगों ने मोबाइल निकाल कर फोटो और वीडियो बनाना प्रारंभ कर दिया था। इतना ही नहीं, कई लोग जिस दिशा से कूलर की हवा आ रही थी, उसे रोक कर युवक को मृत्यु के मुख में जाते हुए देख रहे थे।

इसी बीच, एक तेजस्वी स्त्री का स्वर वातावरण में गूंजा। यह स्वर जानी-मानी तैराक कविता रावल का था। उनका क्रोध चरम पर था। उन्होंने तेज आवाज में कहा, ‘सारे लोग दूर हट जाइए और कम से कम कूलर से आने वाली हवा को मत रोकिए।’ क्रोध से उनके तमतमाते चेहरे को देखकर लोग सकते में आ गए थे। देखते-देखते भीड़ छंट गई। अब कूलर की ठंडी हवा अचेत पड़े युवक के चेहरे पर आने लगी। कविता ने तत्काल सीपीआर प्रक्रिया शुरू कर दी यानी युवक के सीने पर पंप देना शुरू किया।

मैंने कुछ व्यास पीठ से कुछ कथा वाचकों को यह कहते सुना था कि ईश्वर ने मनुष्य को एक निश्चित जीवन दिया है। प्रभु एक-एक श्वास का हिसाब रखते हैं। मनुष्य चाहे कितना ही धनवान हो या कितना ही गरीब, कितना ही शक्तिशाली या निशक्त, अपनी एक भी श्वास को न तो बढ़ा सकता है और न घटा सकता है। यही कारण है कि जीवन-मृत्यु पर मनुष्य का आज तक बस नहीं चला। मनुष्य देह धारण करके जगत में आता है तो प्रभु की इच्छा से और जाता भी है तो प्रभु की इच्छा से।

परंतु उस दिन ईश्वर की बनाई एक कृति कविता विधाता के बनाए विधान को चुनौती तो नहीं दे रही थी, पर ईश्वर का एक संदेश जरूर पूरे जन समूह में प्रसारित कर रही थी कि मनुष्य को जीवन अंतिम आस तक संघर्ष करते रहना चाहिए। संभवत: ईश्वर ने किसी व्यक्ति को और जीने का प्रसाद दिया हो और हम मनुष्यों की जिजीविषा,साहस और प्रत्युत्पन्नमति की कमी के कारण शायद वह समय से पूर्व दुनिया छोड़ रहा हो।
अभी तक जो कविता रावल दुर्गा के रूप में दिख रही थी, युवक को कृत्रिम श्वास देने के समय ऐसा लग रहा था मानो वह ममतामयी मां कौशल्या और यशोदा की तरह उस बच्चे को जीवन प्रदान करने के लिए अपनी श्वासों का नेह आशीर्वाद स्वरुप प्रदान रही थी। युवा पुनर्जीवन प्राप्त कर चुका था। विवाह की खुशियों पर लगता ग्रहण अचानक छंट गया था। प्रसन्नता की लहर चारों ओर फैल गई थी। बाद में युवक के परिजनों की कृतज्ञता की कल्पना हम कर सकते हैं। बाद में नागर समाज ने कविता रावल को ‘नागर वीरांगना सम्मान’ से सम्मानित भी किया।

कविता ने आग्रह किया कि कृत्रिम श्वास देने की यह प्रक्रिया समाज के सभी स्त्री, पुरुषों, युवाओं और बच्चों को ज्ञात होनी चाहिए। उन्होंने अपने सम्मान के प्रत्युत्तर में यह आग्रह किया कि मेरा वास्तविक सम्मान तब होगा, जब एक बड़ा प्रशिक्षण कार्यक्रम रख कर आप सब भी इस प्रक्रिया में पारंगत हो सकें।

मैंने कविता से पूछा – आपने अब तक बीसियों लोगों को डूबने से बचाया है, पर सीपीआर से बचाने का अनुभव कैसा रहा? वह बोलीं-दोनों ही जीवन प्राप्ति के संघर्ष हैं, पर तैराकी सीखकर किसी को बचाना लंबे प्रशिक्षण के बाद संभव है, जबकि सीपीआर प्रक्रिया बहुत संक्षिप्त प्रशिक्षण से सीखा जा सकता है।

इस संपूर्ण घटनाक्रम ने यह बात तो स्पष्ट कर दी कि भले ही ईश्वर ने प्रत्येक मनुष्य को श्वासें गिन कर दी हैं, किंतु यदि कोई मनुष्य चाहे तो सीपीआर पद्धति से अपनी कुछ श्वास उधार देकर मृत्यु के मुख में जाने वाले मनुष्य को जीवन भर के लिए और लाखों करोड़ों श्वास प्रदान कर सकता है। आपकी दी हुई हर सूक्ष्म श्वास से विराट हो जाने की इस प्रक्रिया को हमें अवश्य जानना चाहिए।

Topics: पुरखों की संपूर्ण तपस्याWestern worldman counted his breathscomplete penance of ancestorsज्ञान परंपराभारतीय समाजIndian Societyknowledge traditionपश्चिमी जगतमनुष्य को श्वासें गिन कर दी
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