नार्वे: प्रेस स्वतंत्रता की आड़ में भारत का विरोध, PM मोदी के 'संपेरे वाले कार्टून' में पश्चिमी मीडिया की नस्लवादी सोच
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नार्वे: प्रेस स्वतंत्रता की आड़ में भारत का विरोध, PM मोदी के ‘संपेरे वाले कार्टून’ में पश्चिमी मीडिया की नस्लवादी सोच

कार्टून में प्रधानमंत्री मोदी को संपेरे (snake charmer) के रूप में दिखाया गया, जिसमें ईंधन पंप की नली को सांप बनाकर प्रस्तुत किया गया था।

Written byआशीष कुमार 'अंशु'आशीष कुमार 'अंशु'
May 20, 2026, 08:39 am IST
inविश्व

नार्वे की प्रमुख अखबार आफ्टेनपोस्टेन (Aftenposten) ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओस्लो यात्रा के ठीक पहले एक ऐसा कार्टून प्रकाशित किया, जिसने न केवल भारत की गरिमा पर आघात किया बल्कि पूरे भारतीय सभ्यता के प्रति पश्चिमी मानसिकता की घृणित पूर्वाग्रह को उजागर कर दिया।

कार्टून में प्रधानमंत्री मोदी को संपेरे (snake charmer) के रूप में दिखाया गया, जिसमें ईंधन पंप की नली को सांप बनाकर प्रस्तुत किया गया था। लेख का शीर्षक था – “एक चतुर लेकिन थोड़ा परेशान करने वाला आदमी”। (‘A clever yet annoying man’) यह घटना प्रेस स्वतंत्रता की बहस के बीच हुई, जहां एक नार्वेजियन पत्रकार हेल्ले लिंग ने प्रधानमंत्री से सवाल पूछने की कोशिश की और बाद में सोशल मीडिया पर इसे वायरल कर दिया।

अखबार में प्रकाशित प्रधानमंत्री मोदी का कार्टून

यह मात्र एक कार्टून नहीं, बल्कि सांस्कृतिक असहिष्णुता और औपनिवेशिक मानसिकता का प्रतीक है। भारत, विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र, जिसकी सभ्यता हजारों वर्ष पुरानी है, जिसने विश्व को ज्ञान, विज्ञान और लोकतंत्र की प्रेरणा दी, उसे नार्वे जैसे छोटे देश का मीडिया अभी भी ‘सांपों और जादू-टोनों’ की भूमि के रूप में देखता है। यह चिंताजनक है। यह घटना यह भी बताती है कि पश्चिमी देश की मीडिया अपनी ओछी मानसिकता से ऊपर नहीं उठ सके हैं। वह पहले भी भारत को संपेरों का देश कह चुकी है।

प्रेस स्वतंत्रता बनाम अराजकता का प्रदर्शन

घटना का आरंभ नार्वे की पत्रकार हेल्ले लिंग के व्यवहार से हुआ। संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी से सवाल पूछने की कोशिश की और जब उत्तर नहीं मिला तो वीडियो पोस्ट कर दावा किया कि ‘दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस’ के सवालों को अनदेखा किया गया। नार्वे विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में पहले स्थान पर है, जबकि भारत 157वें स्थान पर। लेकिन क्या यह रैंकिंग वास्तविकता दर्शाती है या पूर्वाग्रह?

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता और राजनयिक सिबी जॉर्ज ने ठीक जवाब दिया। भारत की सभ्यतागत विरासत, लोकतांत्रिक मूल्य और विश्वसनीयता को रेखांकित किया। नार्वे की पत्रकार ने “भारत पर भरोसा क्यों करें?” और “मानवाधिकार उल्लंघनों” जैसे आरोप लगाए। यह ठीक उसी समय हुआ जब प्रधानमंत्री द्विपक्षीय संबंधों, व्यापार और भारतीय समुदाय से जुड़ाव मजबूत करने जा रहे थे।

यह घटना प्रेस स्वतंत्रता को नहीं, बल्कि नार्वे में छिपी अराजकता और भारत-विरोधी पूर्वाग्रह को उजागर करती है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मुखिया का इस तरह मखौल उड़ाना कूटनीतिक शिष्टाचार का भी उल्लंघन है। भारत में हजारों समाचार चैनल, लाखों प्रिंट मीडिया और स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म सक्रिय हैं। सरकार की आलोचना रोज होती है। फिर भी RSF जैसे संगठन भारत को निचले पायदान पर रखते हैं।

RSF सूचकांक: पूर्वाग्रहों का पाखंडी व्यायाम

विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (World Press Freedom Index) Reporters Without Borders (RSF) द्वारा प्रकाशित किया जाता है। यह 180 देशों को स्कोर देता है, लेकिन इसकी पद्धति गंभीर सवालों से घिरी है। RSF छोटे सैंपल (लगभग 150 उत्तरदाता, 18 NGOs) पर आधारित है। एक देश के लिए औसतन एक ही अज्ञात उत्तरदाता। पारदर्शिता शून्य। उत्तरदाताओं की पहचान, राजनीतिक झुकाव कुछ भी सार्वजनिक नहीं।

यह हार्ड डेटा (मीडिया संस्थानों की संख्या, प्लुरलिज्म, पहुंच) पर नहीं, बल्कि ‘धारणाओं’ पर निर्भर है। परिणाम? कतर, रवांडा जैसे देश जहां आलोचना अपराध है, भारत से बेहतर रैंक पाते हैं। पाकिस्तान, मेक्सिको, सूडान जैसे पत्रकार हत्याओं वाले देश भी ऊपर। भारत में विविधता और जीवंत बहस को ‘टकराव’ मानकर दंड दिया जाता है, जबकि दबाए गए देशों में रिपोर्टिंग न होने पर ‘शांति’ का स्कोर मिलता है।

RSF की फंडिंग भी संदिग्ध है – फ्रांसीसी सरकार, यूरोपीय आयोग, जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी और फोर्ड फाउंडेशन जैसे स्रोत। पश्चिमी उदारवादी मानक थोपे जाते हैं। भारत की चुनौतियां (आतंकवाद, फेक न्यूज, सुरक्षा) को नजरअंदाज कर केवल ‘मोदी सरकार के दमन’ की कहानी दोहराई जाती है। यह राजनीतिक हथियार है, न कि निष्पक्ष मूल्यांकन।

भारत में प्रेस स्वतंत्र है। आलोचनात्मक रिपोर्टिंग होती है। SLAPP (Strategic Lawsuits Against Public Participation) मुकदमों या हिंसा की घटनाएं दुर्भाग्यपूर्ण हैं, लेकिन वे पूरे लोकतंत्र की निंदा नहीं करतीं। तुलना करें चीन, ईरान, उत्तर कोरिया से। RSF का सूचकांक भारत जैसे उभरते लोकतंत्रों के प्रति द्वेष दिखाता है।

स्टीरियोटाइप नस्लवाद का पुनरुत्थान

संपेरे का चित्रण पश्चिमी मीडिया में भारत के लिए पुराना और घृणित ट्रोप है। घृणित ट्रोप साहित्य, सिनेमा और मीडिया में उपयोग किए जाने वाले वे कथानक या चरित्र होते हैं, जिनसे दर्शक और पाठक अत्यधिक चिढ़ते हैं। आमतौर पर ये बहुत घिसे-पिटे, अतार्किक या रूढ़िवादी होते हैं।

2022 में स्पेनिश अखबार ला वांगुआर्डिया  की भी इसी लिए आलोचना हुई थी, और इसके पीछे की वजह थी नस्लीय रूढ़िवादिता (racial stereotyping) और असंवेदनशील पत्रकारिता। दरअसल, अक्टूबर 2022 में अखबार ने भारत की आर्थिक तरक्की और विकास दर (GDP) को लेकर एक ग्राउंड रिपोर्ट छापी थी, जिसका शीर्षक था-“द ऑवर ऑफ द इंडियन इकॉनमी” (भारतीय अर्थव्यवस्था का समय)।

लेख तो भारत की आर्थिक प्रगति पर था, लेकिन विवाद इसके मुख्य पन्ने पर छपे इलेस्ट्रेशन (कार्टून/ग्राफिक) को लेकर हुआ। अखबार ने भारत की आधुनिक और तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था को दिखाने के लिए एक सपेरे का चित्र बनाया था, जो अपनी बीन से एक टोकरी से निकलते हुए ग्राफ (चार्ट) को ऊपर की ओर ले जा रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 में अमेरिका में कहा था कि भारत अब ‘माउस से जादू’ करता है, न कि सांपों से। 2013 में गुजरात सीएम के रूप में भी उन्होंने इसी रूपक का उल्लेख किया।

फिर भी आफ्टेनपोस्टेन ने ईंधन पंप की नली को सांप बनाकर प्रधानमंत्री का चित्रण किया। यह न केवल प्रधानमंत्री का अपमान है, बल्कि पूरे भारत और भारतीयता का। भारतीय डायस्पोरा और नेटिजन्स ने इसे नस्लवादी बताकर निंदा की। पश्चिम अभी भी भारत को ‘प्रिमिटिव’ (अविकसित) देखना चाहता है, जबकि भारत विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, आईटी पावर और लोकतांत्रिक शक्ति है।

यह घटना पश्चिमी मीडिया की असहजता दर्शाती है। भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका, योग, आयुर्वेद, डिजिटल इंडिया और आत्मनिर्भर भारत उन्हें परेशान करते हैं। इसलिए पुराने स्टीरियोटाइप को हथियार बनाया जाता है।

भारतीय मीडिया को संदेश: भारत-विरोध का खेल बंद करें

भारत की कुछ मोदी-विरोधी और कांग्रेसी मीडिया को भी यह घटना सबक देती है। विदेश में भारत की आलोचना को बढ़ावा देकर वे घरेलू राजनीति खेलते हैं, लेकिन यह भारत-विरोधी ताकतों को बल देता है। क्या नार्वे में यह कार्टून और पत्रकार का व्यवहार किसी भारतीय ‘भारत-विरोधी’ तत्वों के षड्यंत्र का परिणाम तो नहीं? भारत सरकार को इसकी जांच करनी चाहिए।

विदेश यात्रा पर प्रधानमंत्री की आलोचना करना एक बात है, लेकिन विदेशी मीडिया को भारत-विरोधी हथियार मुहैया कराना देशद्रोह के समान है। विपक्ष और मीडिया को राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना चाहिए। राहुल गांधी जैसे नेता विदेशी प्लेटफॉर्म पर भारत की छवि खराब करते हैं, जो दुर्भाग्यपूर्ण है।

भारतीयता की गरिमा और आगे का रास्ता

भारत अपनी प्रेस स्वतंत्रता को मजबूत करने का काम करे – संस्थागत सुधार, पत्रकार सुरक्षा, मीडिया प्लुरलिज्म। लेकिन RSF जैसे संदिग्ध सूचकांकों से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। सच्ची स्वतंत्रता आंतरिक प्रयासों से आती है।

नार्वे को समझना चाहिए कि छोटे देश की ‘स्वतंत्रता’ का दंभ विश्व पटल पर भारत जैसे महाशक्ति को अपमानित नहीं कर सकता। द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान पहुंचाने वाली ऐसी हरकतें कूटनीतिक रूप से हानिकारक हैं।

भारत विश्व गुरु बनने की राह पर है। हमारी सभ्यता ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ सिखाती है, लेकिन अपमान सहने की नहीं। इस घटना की कड़ी निंदा होनी चाहिए। भारतीय डायस्पोरा, सरकार और नागरिकों को एकजुट होकर ऐसी नस्लवादी मानसिकता का विरोध करना चाहिए।

नार्वे की यह घटना प्रेस स्वतंत्रता की आड़ में छिपे पश्चिमी पूर्वाग्रह को बेनकाब करती है। प्रधानमंत्री मोदी का सर्प संचालक चित्रण भारत की प्रगति से जलन का प्रतीक है। हमारा लोकतंत्र जीवंत है, हमारी प्रेस स्वतंत्र है और हमारी सभ्यता अजेय।

ऐसे अपमान हमें और मजबूत करेंगे। भारत को RSF जैसे सूचकांकों से ऊपर उठकर अपनी राह खुद बनानी है। विश्व को भारतीयता की गरिमा याद दिलानी है।

 

Topics: आफ्टेनपोस्टेन अखबारपत्रकार हेल्ले लिंगपश्चिमी जगतनार्वेप्रेस स्वतंत्रता
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार अंशु पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों तक मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान STEP से जुड़े रहे हैं। [Read more]
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