नवरात्रि: हिंदू संस्कृति के मूल में है जनजाति जवारे परंपरा
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नवरात्रि: हिंदू संस्कृति के मूल में है जनजाति जवारे परंपरा

नवरात्रि में झाबुआ अंचल के विभिन्न गांवों में गरबा एवं जवारे की पंडाल देखने को मिलेंगे। यह एक सामाजिक समरसता का वनांचल क्षेत्र का बड़ा उदाहरण है।

Written byनिलेश कटारानिलेश कटारा
Oct 3, 2024, 10:10 am IST
inधर्म-संस्कृति
जवारे परंपरा

जवारे परंपरा

भारत की संस्कृति का हृदय स्थल है झाबुआ, जहां जनजाति संस्कृति की आत्मा बसती है। आज भी जनजाति समाज हिंदू संस्कृति के एक के भाव को समाहित कर मां भगवती की उपासना करते हैं। झाबुआ अपनी जनजाति संस्कृति की एक अलग ही पहचान रखता है। जनजाति संस्कृति के साथ-साथ वह अब धार्मिक संस्कृति में अपनी पहचान देश भर में बनाने लगा है। पहले झाबुआ के बारे में लोगों में विभिन्न प्रकार की गलत धारणाएं थीं, लेकिन झाबुआ ने उन धारणाओं को निर्मूल साबित कर दिया। नवरात्रि में झाबुआ अंचल के विभिन्न गांवों में गरबा एवं जवारे की पंडाल देखने को मिलेंगे। यह एक सामाजिक समरसता का वनांचल क्षेत्र का बड़ा उदाहरण है। वनांचल का क्षेत्र विश्व भर के सभी समाज के लिए प्रेरणा स्रोत है। अब यह जनजाति क्षेत्र की प्रमुख संस्कृति बन चुका है।

“इस धारा का केंद्र बिंदु हूं, हां मैं हिंदू हूं”

इस ध्येय वाक्य के साथ हम अपने उत्तरदायित्व को समझते हुए नवदुर्गा कार्यक्रम में अपनी और अपने परिवार के सहभागिता हो। गांव में नवरात्रि में नवदुर्गा अर्चना के साथ-साथ जवारे डाले जाते हैं। जो जनजाति समाज के साधन व व्रत का सबसे बड़ा त्यौहार है। इस दौरान संपूर्ण समाज द्वारा स्थानीय देवी देवताओं की गीतों के माध्यम से उपासना की जाती है एवं प्रतिदिन व्रत रखा जाता है। जवारे का मतलब मिट्टी में जौ उगाने की परंपरा है। जवारे के बिना माता की पूजा अधूरी मानी जाती है। जौ नवरात्रि के पहले दिन से बाय जाते हैं एवं 9 दिन तक नित्य देवी मां की भीली भाषा में गीतों के माध्यम से आराधना की जाती है। यह अंचल की प्रमुख परंपरा है। नौ दिनों तक खान-पान पर विशेष नियंत्रण रखा जाता है। इस दौरान मांस, मछली, भिंडी, दही, बैंगन, गिलकी आदि का सेवन नहीं करते हैं। इस समय सात्विक और शुद्ध आहार ग्रहण करते है। साथ ही में इस समय का ब्रह्मचर्य का नियंत्रण भी लागू होता है। जवारे में मां स्वयं विराजमान होती हैं। इस समय जवारे की पूजा शांति श्रद्धा एवं प्रेम के साथ की जाती है। जवारे के समय सूर्य उदय के साथ ही स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहने जाते हैं। नौ दिन तक इस साधना में बाल दाढ़ी और नाखून भी नहीं काटे जाते हैं। नवरात्रि में जहां पर जवारे डाले जाते हैं, उस स्थान पर जमीन पर सोना होता है। इस अंचल में ऐसे कई प्राचीन धरोहर हैं, जहां समाज पूजा अर्चना करता है।

इस अंचल के प्रमुख तीर्थ स्थल बाबा देव डूंगर, नंदर माता, बाबा कोकिंदा देव, बाबा कासूमोर देव बाबा घोडदेव, बाबा हुआ देव, लालबाई, फूलबाई, सावन माता, भेरुजी खेड़ापति बाबा देव, भोला ईश्वर, राम लक्ष्मण, हनुमान जोधा वीर, झाबुआंचल के प्रमुख पूजनीय देव और ईश्वर हैं। नवरात्रि के समय इन सभी स्थानों पर विभिन्न प्रकार के धार्मिक कार्यक्रम होते हैं और सनातन परंपरा का निर्वहन किया जाता है। जनजाति संस्कृति एवं सनातन संस्कृति में हमें यह समान रूप से देखने को मिलता है। जनजाति संस्कृति में प्रकृति पूजन मुख्य आधार है। जवारे के समय मां प्रकृति का पूजन किया जाता है। इसमें मुख्य रूप से मिट्टी जौ की साधना होती है और रात्रि के समय भी जनजातियों द्वारा गीत गाया जाता है, जो सिद्धि का मुख्य आधार है। सामान्यतः जवारे के आकार के आधार पर ही साधना की पूर्णता व सफलता का आकलन किया जाता है। हरे-भरे व बड़े जवारे सुख समृद्धि व साधना की सफलता का प्रतीक माने जाते हैं। अंतिम दिन देवी मां के नाम से भोग एवं प्रसाद वितरण किया जाता है तथा गांव की समस्त धर्म प्रेमी जनता को भोजन ग्रहण करवाया जाता है।

 

Topics: जनजातिजवारे परंपरानवरात्रिझाबुआ समाचार
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