रानी दुर्गावती की युद्ध नीति: अद्वितीय रणनीतियों और सैन्य संगठन की गाथा
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रानी दुर्गावती की युद्ध नीति: अद्वितीय रणनीतियों और सैन्य संगठन की गाथा

रानी दुर्गावती की युद्ध नीति और कूटनीति विलक्षण थी, जिसकी तुलना काकतीय वंश की वीरांगना रुद्रमा देवी और फ्रांस की जान ऑफ आर्क को छोड़कर विश्व की अन्य किसी वीरांगना से नहीं की जा सकती है।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Sep 28, 2024, 02:45 pm IST
in भारत
रानी दुर्गावती

रानी दुर्गावती

जल प्रबंधन और पर्यावरण की दृष्टि से वीरांगना रानी दुर्गावती की योजनाएं आज भी उतना ही प्रासंगिक हैं जितनी उस काल में थीं। यूँ तो अपने साम्राज्य में 1000तालाब और 500 बावलियों का निर्माण कराया था परंतु जबलपुर में 52 सरोवर (तालाब) और 40 बावलियों का अद्भुत एवं अद्वितीय प्रबंधन किया गया था,। सरोवर 3 प्रकार के होते थे प्रथम – शिखर सरोवर – पहाड़ी सरोवर थे जो वनस्पतियों और वन्य जीवों की रक्षा के लिए थे। द्वितीय – तराई सरोवर – पहाड़ियों की तराई में जल संग्रहण हेतु बनाये गये थे। तृतीय – नगरीय सरोवर थे। तीनों प्रकार के सरोवर भूमिगत नहरों द्वारा एक दूसरे से जुड़े हुए थे, इस योजना को पंचासर योजना के नाम से जाना जाता है। जल संवर्धन के लिए वैज्ञानिक तकनीक का प्रयोग किया गया और भूजल विशेषज्ञ कीकर सिंह पानीकार का नाम उल्लेखनीय है।जल प्रबंधन और पर्यावरण की दृष्टि से गोंडवाना साम्राज्य की व्यवस्थाएं संपूर्ण विश्व में अद्भुत एवं अद्वितीय रही हैं। गोंडवाना के महान् राजा संग्राम शाह ने महान् भूजल विशेषज्ञ कीकर सिंह पानीकार के सहयोग से जल शोधन और प्रबंधन की अनोखी प्रणाली को विकसित किया था। जल प्रबंधन के अंतर्गत 3 प्रकार के तालाब निर्मित किए गए थे और उनको पंचसर (पंचासर) प्रणाली के अंतर्गत भूमिगत नहरों से जोड़ा गया था।

पंचसर का तात्पर्य एक तालाब से 5 तालाबों का जुड़ाव था उसके बाद अन्य तालाब जुड़ते थे। यह योजना संग्राम सागर से प्रारंभ हुई थी। संग्राम सागर से सगड़ा ताल, बाल सागर, कोलाताल, देवताल और सूपाताल क्रमशः जुड़े हुए थे। तदुपरांत इन तालाबों से अन्य तालाब भूमिगत नहरों से जुड़े थे।इसलिए उन दिनों जबलपुर को जलहलपुर के नाम से भी जाना जाता था। संग्राम सागर स्थित महल 5 मंजिला था परंतु अब जीर्ण – शीर्ण हो गया है। भूतल पर 32 कमरों के बीच में एक विशाल कक्ष था जहाँ मंत्रिपरिषद की बैठक होती थीं। मदन महल से भूमिगत चार सुरंग निकलती थीं, जिसमें एक सुरंग महल में खुलती थी, जिसे आम खास कहा जाता है।तालाबों के निकट देवालयों और मठों की स्थापना की गई थी इसलिए तालाबों को अस्वच्छ करने वालों पर अर्थ दंड भी लगाया जाता था। यद्यपि बहुत से ताल तलैयों को पूर कर कालोनियां बना ली गईं इसलिए जल स्तर गिर गया है परंतु अभी भी चौंतीस तालाब विरासत के रुप में बचे हैं जिनमें से कुछ संरक्षित हो गए हैं शेष होना है। उपरोक्तानुसार स्वर्ण युग के लिए आवश्यक सभी प्रतिमानों के आलोक में सिंहावलोकन करने पर यही प्रमाणित होता है कि यह काल गोंडवाना साम्राज्य का स्वर्ण युग था।

क्रौंच व्यूह और अर्द्धचंद्र व्यूह बनाकर करती थीं दुश्मन का सामना-युद्ध नीति और सैन्य संगठन

रानी दुर्गावती की युद्ध नीति और कूटनीति विलक्षण थी, जिसकी तुलना काकतीय वंश की वीरांगना रुद्रमा देवी और फ्रांस की जान ऑफ आर्क को छोड़कर विश्व की अन्य किसी वीरांगना से नहीं की जा सकती है। युद्ध के 9 पारंपरिक युद्ध व्यूहों क्रमशः वज्र व्यूह, क्रौंच व्यूह, अर्धचन्द्र व्यूह, मंडल व्यूह, चक्रशकट व्यूह, मगर व्यूह, औरमी व्यूह, गरुड़ व्यूह, और श्रीन्गातका व्यूह से परिचित थीं। इनमें क्रौंच व्यूह और अर्द्धचंद्र व्यूह में सिद्धहस्त थीं। क्रौंच व्यूह रचना का प्रयोग ,जब सेना ज्यादा होती थी, तब किया जाता था जिसमें क्रौंच पक्षी के आकार के व्यूह में पंखों में सेना और चोंच पर वीरांगना होती थीं और शेष अंगों पर प्रमुख सेनानायक होते थे।

वहीं दूसरी ओर जब सेना छोटी हो और दुश्मन की सेना बड़ी हो तब अर्द्धचंद्र व्यूह रचना का प्रयोग किया जाता था, जिससे सेना एक साथ ज्यादा से ज्यादा जगह से दुश्मन पर मार सके।वीरांगना की रणनीति अकस्मात् आक्रमण करने की होती थी। रानी दुर्गावती दोनों हाथों से तीर और तलवार चलाने में निपुण थीं। गोंडवाना साम्राज्य की सत्ता संभालने के कुछ दिन बाद ही गढ़ों की संख्या 52 से बढ़कर 57 हो गई थी और परगनों की संख्या भी 57 हो गई थी । वीरांगना ने एक बड़ी स्थायी और सुसज्जित सेना तैयार की, जिसमें 20 हजार अश्वारोही एक सहस्र हाथी और प्रचुर संख्या में पदाति थे। तत्कालीन भारत में गोंडवाना साम्राज्य प्रथम साम्राज्य था, जहां महिला सेना का भी दस्ता था और रानी दुर्गावती की बहिन कमलावती और पुरागढ़ की राजकुमारी कमान संभालती थीं।

16 बड़े युद्ध सहित 52 युद्धों में से 51 में अपराजेय रहीं

वीरांगना रानी दुर्गावती के शौर्य, साहस एवं पराक्रम के संबंध में प्रकाश डालते हुए तथाकथित छल समूह के इतिहासकारों ने कुल 4 युद्धों का टूटा-फूटा वर्णन कर इतिश्री कर ली है, जबकि वीरांगना ने 16 बड़े युद्ध (छुटपुट युद्धों को छोड़कर) लड़े। 16 युद्धों में से 15 युद्धों विजयी रहीं, जिसमें 12 युद्ध मुस्लिम आक्राताओं से लड़े गये, उसमें से भी 6 मुगलों के विरुद्ध लड़े गये। वैंसे गोंडवाना में प्रचलित है कि छोटे – बड़े सभी युद्धों की बात की जाए तो वीरांगना रानी दुर्गावती ने अपने जीवनकाल में 52 युद्ध लड़े थे जिसमें 51 युद्धों में उन्होंने विजय प्राप्त की थी। पिता राजा कीरतसिंह के साथ मिलकर, हनुमान द्वार का युद्ध, गणेश द्वार का युद्ध, लाल दरवाजा का युद्ध, बुद्ध भद्र दरवाजा का युद्ध (कालिंजर का किला- अब कामता द्वार,पन्ना द्वार, रीवा द्वार हैं)लड़े गये जिसमें विजयश्री प्राप्त की।

मांडू के शासक बाजबहादुर को घर तक खदेड़ा

गोंडवाना की साम्राज्ञी के रुप में सत्ता संभालते ही मांडू के अय्याश शासक बाजबहादुर ने विधवा महिला जानकर गोंडवाना साम्राज्य दो बार आक्रमण किए परंतु रानी दुर्गावती ने दोनों बार जम कर दुर्गति कर डाली। प्रथम आक्रमण में वीरांगना रानी दुर्गावती ने बाजबहादुर के चाचा फतेह खां को द्वंद्व युद्ध में मार डाला और द्वितीय आक्रमण में बाजबहादुर को मांडू राजधानी घर तक खदेड़ा। बाजबहादुर जीवन भर शरणागत रहा। आगे मालवा के सूबेदार शुजात खाँ की कभी हिम्मत नहीं हुई। शेरखान (शेरशाह) कालिंजर अभियान में मारा गया। कुछ दिनों बाद मुगलों ने पानीपत के द्वितीय युद्ध के उपरांत पुनः सत्ता हथिया ली और अकबर शासक बना। शीघ्र ही उसने येन केन प्रकारेण साम्राज्य विस्तार करना आरंभ कर दिया।

 

Topics: वीरांगना रानी दुर्गावतीपाञ्चजन्य विशेषRani Durgavatirani Durgavati fortRani Durgavati lifeRani Durgavati historyRani Durgavati of Gondwanaरानी दुर्गावती की युद्ध नीतिक्रौंच व्यूहअर्द्धचंद्र व्यूह
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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