क्या चल रहा अमेरिका के मन में, आम चुनाव की खास बातें
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क्या चल रहा अमेरिका के मन में, आम चुनाव की खास बातें

ध्यान रखने की बात यह भी है कि जब तक मुक़ाबला जो बाइडन व ट्रम्प के बीच था तब तक ट्रम्प सर्वेक्षणों मे 6 प्रतिशत तक से आगे चल रहे थे परन्तु, बाइडन के पीछे हटने और कमला के चुनावी दंगल में आने से अब मुक़ाबला बराबरी का लग रहा है।

Written byप्रो. बृज किशोर कुठियालाप्रो. बृज किशोर कुठियाला
Aug 8, 2024, 12:51 pm IST
inविश्व, विश्लेषण
सर्वेक्षणों में कभी कमला हैरिस तो कभी डोनाल्ड ट्रम्प आगे

सर्वेक्षणों में कभी कमला हैरिस तो कभी डोनाल्ड ट्रम्प आगे

वर्तमान उपराष्ट्रपति कमला देवी हैरिस डेमोक्रेटिक पार्टी की पहली उम्मीदवार हैं, जिनकी वंशावली में भारतीय सम्बन्ध निकलता है। उनकी माता तमिल भारतीय मूल की थीं व कैंसर शोध की वैज्ञानिक होने के साथ साथ अफ्रीकी समुदाय के संघर्षों में सक्रिय थीं। कमला के पिता कैरेबियन सागर मे जमायका द्वीप के अफ्रीकी मूल के थे। कमला का जन्म अमेरिका में हुआ। अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनाव को समझने के लिए यह जानना महत्वपूर्ण है क्योंकि कमला अफ्रीकी कालों व भारतीय मूल के मतदाताओं को अपील करने के साथ ही अमेरिकी डेमोक्रेटिक गोरों को भी अपना मतदाता मानती है।

अमेरिकी मतदाताओं को सामान्यतः चार बड़े वर्गों में बाँटा जाता है। गोरे, काले (हब्शी), स्पेनी व एशियायी। गोरे दोनों पार्टियों में बंटे हुए हैं, पर रिपब्लिकन पार्टी के साथ कुछ अधिक हैं। काले मतदाता 90 प्रतिशत या अधिक डेमोक्रेट के साथ हैं और लगभग 60 प्रतिशत स्पेनी उनके साथ हैं। हालाँकि हाल के सर्वेक्षणों में ऐसा लगता है कि रिपब्लिकन पार्टी को स्पेनी लोगों का समर्थन बढ़ा है। एशियाई लोग अमेरिका की जनसंख्या का लगभग 6 प्रतिशत हैं, जिनमें डेढ़ प्रतिशत भारतीय मूल के और थोड़े कम चीनी मूल के हैं। यह इतने कम हैं कि चुनाव में भारतीयों व चीनियों की तरफ़ ध्यान कम जाता है। यही कारण है कि कमला देवी हैरिस अपने को अफ्रीकियों (ब्लैक) से अधिक निकट जताती हैं। इसी विषय को लेकर डोनाल्ड ट्रम्प चुनावी रैलियों में उसकी भर्त्सना करते हैं। कमला के पति गोरे यहूदी अमेरिकन हैं इसलिए यहूदियों व गोरों का समर्थन भी उनको अपेक्षित है।

पूर्व राष्ट्रपति ट्रम्प की छवि अमेरिकी हितों की रक्षा करने वाली बनी है। उनका नारा ही अमेरिका फ़र्स्ट का है। वह इतने स्पष्टवादी हैं कि कुछ टिप्पणीकारों ने उन्हें बड़बोला तक कह दिया है। ट्रम्प के ऊपर कई मुक़दमे दायर हैं जिनमें उन्हें चरित्रहीन, धन की हेराफेरी करने बाला, गुप्त दस्तावेज़ों का चोर व हिंसा भड़काने वाला सिद्ध करने के प्रयास हैं। वर्तमान डेमोक्रेटिक सरकार राष्ट्रपति जो बाइडन ने बहुत प्रयास किया कि ट्रम्प को अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित किया जाए। तीन राज्यों के न्यायालयों में अयोग्य घोषित कर भी दिया परन्तु सुप्रीम कोर्ट ने इन निर्णयों को निरस्त करके ट्रम्प का चुनाव लड़ने का रास्ता बनाए रखा। रिपब्लिकन पार्टी का प्रचार तन्त्र मतदाताओं के मस्तिष्क में यह डालने का प्रयास कर रहा है कि विरोधी पक्ष ट्रम्प की लोकप्रियता से डर कर इनके खिलाफ मनगढ़ंत आरोप लगा रहा है। कमला हैरिस पूर्व में अधिवक्ता रही हैं इसलिए उनकी तर्क करने की कला व संचार कौशल उनकी शक्ति मानी जा रही है।

ध्यान रखने की बात यह भी है कि जब तक मुक़ाबला जो बाइडन व ट्रम्प के बीच था तब तक ट्रम्प सर्वेक्षणों मे 6 प्रतिशत तक से आगे चल रहे थे परन्तु, बाइडन के पीछे हटने और कमला के चुनावी दंगल में आने से अब मुक़ाबला बराबरी का लग रहा है। सर्वेक्षणों में कभी कमला आगे और कभी ट्रम्प आगे। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भारत की तरह चुनाव से पूर्व के सर्वेक्षण और एक्ज़िट पोल अमेरिका में वास्तविकता की काफ़ी सही झलक देते हैं। पिछले सप्ताह की मुख्य घटना है कमला हैरिस का अपने उपराष्ट्रपति का तय करना। रिपब्लिकन पार्टी के 9 नेताओं की इस के लिए प्रारंभिक सूची बनी थी। बाद में दो में से एक को चुनना था। कमला ने टिम वाल्ज को चुना, जो मिनिसोटा राज्य के गवर्नर हैं। ऐसा माना जाता है कि आम मेहनती गोरा समुदाय उनके प्रति समर्पण भाव रखता है। मध्य अमेरिका के गोरे मतदाताओं को लुभाने के लिए टिम वाल्ज को डेमोक्रेटिक पार्टी का उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार चुना गया। दूसरे संभावित उम्मीदवार थे जोश सपीरो जो वर्तमान में पेंसिलवेनिया के गवर्नर हैं। जोश यहूदियों व इजरायल का खुलेआम समर्थन करते हैं। इनको अपने साथ उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार न लेने से यहूदियों का समूह नाराज़ हो सकता है और थोड़ा-बहुत नुकसान भी हो सकता है। रिपब्लिकन पार्टी के उपराष्ट्रपति के उम्मीदवार जे डी वांस हैं जो एक समय में रिपब्लिकन पार्टी व ट्रम्प के विरोधी के रूप में विख्यात थे। वे बहुत कुशल और प्रभावी वक्ता है, युवा हैं और राजनीति में उभरते सितारे हैं।

अमेरिका में आम चुनाव की अनूठी विशेषताएं

अमेरिका के आम चुनाव की कुछ विशेषताएं अनूठी हैं। राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति का चुनाव एक साथ होता है। हर राज्य के चुनाव कानून, नियम और प्रकिया भिन्न है। कुछ राज्यों में सीनेटर व कांग्रेस के प्रतिनिधि का चुनाव भी इसी समय होता है। चुनाव से पहले मतदाता को पंजीकरण करवाना होता है। बैलट पेपर मतदाता तक पहुँचाए जाते हैं। अपना मत पत्र डाक से भी भेज सकते हैं। 5 नवम्बर से पहले ही स्थान-स्थान पर मत पेटियाँ रख दी जाती हैं। कभी भी मतदान किया जा सकता है। इलेक्ट्रॉनिक बैलट मार्कर या बैलट मार्किंग डिवाइस पर टच स्क्रीन का प्रयोग करके भी वोट दी जा सकती है। मतों की गिनती स्कैनिंग से होती है। पूरी चुनाव प्रकिया पर भारत से अधिक नकारात्मक प्रश्न उठते हैं। 2020 के चुनावों में रिपब्लिकनों ने हेराफेरी के आरोप लगाए है, इस वार भी रिपब्लिकन चुनाव परिणामों को नकारने की संभावना व्यक्त करने की घोषणाएं कर रहे हैं।

क्या चल रहा अमेरिका के मन में

पार्टियों की राजनीति से अलग, अमेरिका का निष्पक्ष बौद्धिक वर्ग एक बड़े विषय पर विमर्श व मनन कर रहा है। प्रश्न यह है कि नयी व्यवस्था विश्व में अपना वर्चस्व व दादागिरी बनाए रखना चाहेगी या उसके प्रयास, घन व समय अमेरिका में केन्द्रित रह कर अमेरिकी नागरिकों के जीवन को अधिक सुखमय व अधिक सुरक्षित बनाएँगे। इन्हीं चर्चाओं में यह मुख्य रूप से आता है कि इजरायल व यूक्रेन को युद्ध को जारी रखने में और बढ़ाने के लिए घन, हथियार व समर्थन देने से अमेरिका के हित सधते हैं या युद्धों को समेटने से। यह भी विषय है कि चीन से अमेरिकी हितों को बचाने के लिए क्या नीति अपनानी है। रूस-चीन-ईरान व उतरी कोरिया का गठबंधन भी जाग्रत अमेरिकी की चिन्ता का विषय है। ट्रम्प ने बार-बार आश्वासन दिया है कि अमेरिका को ड्रोन, मिसायल व राकेट हमलों से बचाने के लिए वह इलेक्ट्रॉनिक डोम बनवाएँगे। डेमोक्रेटिक पार्टी सन्धियों व सहयोग से देश की सुरक्षा का आश्वासन देती है। इसी तरह से मैक्सिको की सीमा से गैरकानूनी रूप से आए लाखों लोगों को वीसा व नागरिक सुविधाएं देना भी बड़े वर्ग, ख़ासतौर से मध्यवर्गीय कर दाताओं के लिए नाजुक मुद्दा है। बढ़ती हुई महंगाई और बेरोजगारी भी वर्तमान डेमोक्रेटिक दल की सरकार, राष्ट्रपति जो बाइडन व उप राष्ट्रपति कमला हैरिस पर दोषारोपण करने के लिए प्रयोग में आ रहे है। भारत की अपेक्षा और प्रयास यही हैं कि जो भी राष्ट्रपति बने हमारा अमेरिका को निर्यात बढ़े, अमेरिकी पूँजी का भारत में और निवेश हो और दोनों देश मिलकर चीन की विस्तारवादी नीतियों का मुंहतोड़ जवाब दें।

Topics: कमला हैरिसडोनाल्ड ट्रंपपाञ्चजन्य विशेषअमेरिकी चुनावअमेरिका में आम चुनाव
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