श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद : हिंदू पक्ष की बड़ी जीत, इलाहाबाद हाईकोर्ट से मुस्लिम पक्ष को लगा झटका
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श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद : हिंदू पक्ष की बड़ी जीत, इलाहाबाद हाईकोर्ट से मुस्लिम पक्ष को लगा झटका

सभी 18 मामले सुनवाई योग्य, मुकदमों में यह प्रार्थना की गई है कि मथुरा में कटरा केशव देव मंदिर के साथ 13.37 एकड़ के परिसर से शाही ईदगाह मस्जिद को हटाया जाय

Written byसुनील रायसुनील राय
Aug 1, 2024, 02:52 pm IST
inउत्तर प्रदेश
श्रीकृष्ण जन्मभूमि

श्रीकृष्ण जन्मभूमि

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मथुरा स्थित कृष्ण जन्मभूमि- शाही ईदगाह विवाद में लंबित 18 सिविल वादों की पोषणीयता पर अपना निर्णय सुना दिया है। सभी मामले सुनवाई योग्य हैं। उच्च न्यायालय ने कहा है कि हिंदू पक्ष की ओर से दाखिल सिविल वाद पोषणीय हैं। मुस्लिम पक्ष ने 18 सिविल वाद की पोषणीयता (सुनवाई योग्य) को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। सिविल वादों की पोषणीयता को लेकर दाखिल याचिका पर न्यायमूर्ति मयंक कुमार जैन ने प्रतिदिन लंबी सुनवाई करने के बाद निर्णय सुरक्षित कर लिया था।

सभी 18 मुकदमों में यह प्रार्थना की गई है कि मथुरा में कटरा केशव देव मंदिर के साथ 13.37 एकड़ के परिसर से शाही ईदगाह मस्जिद को हटाया जाय। इसके साथ यह भी प्रार्थना की गई है कि मौजूदा ढांचे को गिराया जाए। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मस्जिद समिति और हिंदू वादियों की बहस को सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। न्यायालय ने इस साल फरवरी में मस्जिद समिति की आपत्तियों पर सुनवाई शुरू की थी। न्यायालय के समक्ष, प्रबंध ट्रस्ट शाही मस्जिद ईदगाह (मथुरा) की समिति ने मुख्य रूप से तर्क दिया कि उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित मुकदमों पर उपासना स्थल अधिनियम 1991, परिसीमा अधिनियम 1963 और स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट के अन्तर्गत केस की सुनवाई प्रतिबंधित है। मस्जिद समिति की ओर से कहा गया कि उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित अधिकांश मुकदमों में वादी भूमि के स्वामित्व का अधिकार मांग रहे हैं, जो 1968 में श्री कृष्ण जन्म स्थान सेवा संघ और शाही मस्जिद ईदगाह के प्रबंधन के बीच हुए समझौते का विषय था। जिसके तहत विवादित भूमि को विभाजित किया गया और दोनों समूहों को एक-दूसरे के क्षेत्रों (13.37 एकड़ के परिसर के भीतर) से दूर रहने को कहा गया। हालांकि, ये मुकदमे कानून (उपासना स्थल अधिनियम 1991, परिसीमा अधिनियम 1963 और विशिष्ट राहत अधिनियम 1963) के तहत पोषणीय नहीं है।

मुस्लिम पक्ष के अधिवक्ता ने कहा कि वादी ने वाद में 1968 के समझौते को स्वीकार किया है और इस तथ्य को भी स्वीकार किया है कि भूमि (जहां ईदगाह बनी है) का कब्जा मस्जिद प्रबंधन के नियंत्रण में है और इसलिए यह वाद सीमा अधिनियम के साथ-साथ उपासना स्थल अधिनियम द्वारा भी वर्जित होगा। क्योंकि वादों में इस तथ्य को भी स्वीकार किया गया है कि संबंधित मस्जिद का निर्माण 1669-70 में हुआ था। समझौता 1967 में किया गया था, जिसे मुकदमे में भी स्वीकार किया गया है, इसलिए, जब उन्होंने 2020 में मुकदमा दायर किया, तो इसे सीमा अधिनियम (3 वर्ष) द्वारा वर्जित किया जाएगा। अगर यह मान भी लिया जाए कि मस्जिद का निर्माण 1969 में (समझौते के बाद) किया गया था, तब भी, अब मुकदमा दायर नहीं किया जा सकता। क्योंकि इसे सीमा अधिनियम द्वारा वर्जित किया जाएगा। स्थायी निषेधाज्ञा की प्रार्थना केवल उस व्यक्ति को दी जा सकती है, जिसके पास मुकदमे दायर करते समय संपत्ति का वास्तविक कब्ज़ा हो। चूंकि वादी के पास मस्जिद नहीं है, इसलिए वे स्थायी निषेधाज्ञा के लिए प्रार्थना नहीं कर सकते।आपत्ति में यह भी कहा गया कि विवादित संपत्ति पर वादी के कब्जे के बिना उनके द्वारा निषेधाज्ञा की मांग नहीं की जा सकती है। जो कोई भी वक्फ संपत्ति (चाहे शाही ईदगाह मस्जिद हो या न हो) के चरित्र पर आपत्ति करता है, उसका निर्णय वक्फ न्यायाधिकरण द्वारा किया जाना चाहिए, और कानून द्वारा सिविल न्यायालय का क्षेत्राधिकार वर्जित होगा।

वहीं हिंदू पक्षकारों ने कहा कि शाही ईदगाह के नाम पर कोई संपत्ति सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं है और ये लोग उस पर अवैध रूप से काबिज हैं। अगर उक्त संपत्ति वक्फ की संपत्ति है तो वक्फ बोर्ड को बताना चाहिए कि विवादित संपत्ति किसने दान की है। यह भी कहा गया कि इस मामले में उपासना अधिनियम, परिसीमा अधिनियम और वक्फ अधिनियम लागू नहीं होगा। किसी भी संपत्ति पर अतिक्रमण करना, उसकी प्रकृति बदलना और बिना स्वामित्व के उसे वक्फ संपत्ति में परिवर्तित करना वक्फ की प्रकृति है और इस तरह की प्रथा की अनुमति नहीं दी जा सकती। यह भी तर्क दिया गया है कि इस मामले में वक्फ अधिनियम के प्रावधान लागू नहीं होंगे क्योंकि विवादित संपत्ति , वक्फ संपत्ति नहीं है। यह भी तर्क दिया गया कि प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम 1958 के प्रावधान विवादित संपत्ति के पूरे हिस्से पर लागू होते हैं। इसकी अधिसूचना 26 फरवरी 1920 को जारी की गई थी और अब इस संपत्ति पर वक्फ के प्रावधान लागू नहीं होंगे।

उल्लेखनीय है कि पूरा विवाद मथुरा में मुगल आक्रांता औरंगजेब के समय की शाही ईदगाह मस्जिद से जुड़ा है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे भगवान कृष्ण के जन्मस्थान पर स्थित मंदिर को तोड़कर बनाया गया था। 1968 में श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान, जो मंदिर प्रबंधन प्राधिकरण है, और ट्रस्ट शाही मस्जिद ईदगाह के बीच एक ‘समझौता’ हुआ था। जिसके तहत दोनों पूजा स्थलों को एक साथ संचालित करने की अनुमति दी गई थी। मंदिर पक्ष का तर्क है कि समझौता धोखाधड़ी से किया गया था और कानून में अमान्य है। विवादित स्थल पर पूजा करने के अधिकार का दावा करते हुए, उनमें से कई ने शाही ईदगाह मस्जिद को हटाने की मांग की है।

Topics: इलाहाबाद हाईकोर्टहिंदू पक्षमुस्लिम पक्षश्रीकृष्ण जन्मभूमिशाही ईदगाह विवाद
सुनील राय
सुनील राय
पाञ्चजन्य ब्यूरो चीफ, लखनऊ, उत्तर प्रदेश [Read more]
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