दृढ़ निश्चयी, पराक्रमी और वीरता की मिसाल थे महाराणा प्रताप
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दृढ़ निश्चयी, पराक्रमी और वीरता की मिसाल थे महाराणा प्रताप

महान राजपूत शासक मेवाड़ के 13वें राजा महाराणा प्रताप की जयंती प्रतिवर्ष धूमधाम से मनाई जाती हैं, जो हिंदी कैलेंडर के अनुसार इस वर्ष 9 जून को मनाई जा रही है।

Written byयोगेश कुमार गोयलयोगेश कुमार गोयल
Jun 9, 2024, 01:20 pm IST
in भारत

अपनी वीरता, स्वाभिमान, दृढ़ संकल्प और त्याग से इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित कराने वाले हिन्दू हृदय सम्राट वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप 16वीं शताब्दी के ऐसे कुशल वीर योद्धा थे, जिन्होंने विभिन्न युद्धों में अपने अदम्य साहस का प्रदर्शन किया। अपने साम्राज्य की रक्षा के लिए उन्होंने अपने जीवनकाल में हमेशा मुगलों को समय-समय पर दांतों चने चबाने पर विवश किया। दरअसल मेवाड़ के शासक महाराणा प्रताप ऐसे महान् वीर और निर्भीक शासक थे, जिन्हें मुगलों का शासन कदापि स्वीकार नहीं था। मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश के राजा राणा उदय सिंह और महारानी जयवंता बाई के ज्येष्ठ पुत्र महाराणा प्रताप बचपन से ही घुड़सवारी, तीरंदाजी और युद्ध कला में भी पारंगत थे। उनकी वीरता से भारत भूमि तो गौरवान्वित हुई ही, मेवाड़ की वह शौर्य-भूमि भी धन्य हुई, जहां उन्होंने जन्म लिया था। इतिहासकार महाराणा प्रताप को ऐसा योद्धा मानते हैं, जिनके युद्ध कौशल के दुश्मन भी कायल थे और इसीलिए प्रायः दुश्मन भी उन्हें सलाम करते थे। मेवाड़ की धरती को मुगलों के आतंक से बचाने के लिए उन्होंने अनेक लड़ाईयां लड़ी, जिनके कारण ही उनका नाम पराक्रमी, शूरवीर, साहसी, महान् राष्ट्रभक्त और एक वीर सम्राट के रूप में इतिहास के पन्नों में अजर-अमर हो गया। युद्ध कला और नीति निर्माण में निपुण महाराणा प्रताप की शौर्य गाथाएं मेवाड़ में तो आज भी लोकगीतों के माध्यम से बताई जाती हैं।

इन्हीं हिन्दू हृदय सम्राट महाराणा प्रताप की जयंती हिंदी कैलेंडर के अनुसार इस वर्ष 9 जून को मनाई जा रही है, जिसे लेकर मेवाड़ में एक सप्ताह पहले ही कार्यक्रम शुरू हो गए थे। महान राजपूत शासक मेवाड़ के 13वें राजा महाराणा प्रताप का जन्म 1540 में राजस्थान के मेवाड़ में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दिन पुष्य नक्षत्र में हुआ था। बचपन में उन्हें कीका के नाम से पुकारा जाता था और उनका राज्याभिषेक गोगुंदा में हुआ था। दरअसल बचपन में महाराणा प्रताप का जीवन काफी समय तक भीलों के साथ भी बीता। भील उस समय अपने पुत्र को कीका कहकर संबोधित करते थे, इसीलिए महाराणा प्रताप को भी कीका कहकर संबोधित किया जाता था। महाराणा प्रताप की शौर्य गाथाओं से तो हालांकि आज की पीढ़ी भी परिचित होगी ही लेकिन यह तथ्य कम लोग ही जानते होंगे कि युद्ध के समय वे एक म्यान में एक साथ दो तलवारें रखा करते थे, एक स्वयं के लिए और दूसरी दुश्मन के लिए। यही नहीं, वह एक कुशल योद्धा की भांति कभी किसी निहत्थे पर वार भी नहीं करते थे और जरूरत पड़ने पर म्यान से निकालकर अपनी ही दूसरी तलवार शत्रु को लड़ने के लिए दे देते थे। महाराणा प्रताप जब युद्ध के लिए प्रस्थान करते थे तो 208 किलोग्राम वजनी दो तलवारें, 72 किलोग्राम का कवच और 80 किलोग्राम का भाला अपने साथ लेकर जाते थे।

मुगल सम्राट अकबर भारत के सभी राजा-महाराजाओं को अपने अधीन कर मुगल साम्राज्य की स्थापना कर पूरे हिन्दुस्तान में इस्लामिक परचम फहराना चाहता था। इसीलिए उसने महाराणा प्रताप के मेवाड़ को जीतने के लिए भी हरसंभव प्रयास किए। महाराणा प्रताप के 24 भाई और 20 बहनें थी। उनके एक सौतेले भाई जगमल ने उन्हें धोखा देते हुए अजमेर जाकर अकबर से संधि कर ली थी लेकिन महाराणा प्रताप अकबर के विशाल साम्राज्य के समक्ष कभी नहीं झुके और उन्होंने जीते-जी अकबर की अधीनता को कभी स्वीकार नहीं किया बल्कि अकबर के साथ कई वर्षों तक संघर्ष किया। उन्होंने देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया और हल्दी घाटी युद्ध में अकबर के साथ वीरतापूर्वक लड़े। महाराणा प्रताप और मुगल बादशाह अकबर के बीच 18 जून 1576 को हल्दी घाटी में भीषण युद्ध हुआ था। उस युद्ध में महाराणा प्रताप को अफगानी राजाओं का समर्थन प्राप्त था। अफगानी हाकिम खान अंतिम सांस तक युद्ध में राजपूतों की ओर से लड़े थे। अन्न की कमी के कारण महाराणा प्रताप की सेना को हार का सामना पड़ा था लेकिन महाराणा प्रताप ने अकबर की 85 हजार सैनिकों वाली विशाल सेना के सामने अपने 20 हजार सैनिकों और सीमित संसाधनों के बल पर स्वतंत्रता के लिए वीरतापूर्वक संघर्ष किया। हालांकि महाराणा प्रताप को उस युद्ध के मैदान से भागने के लिए विवश होना पड़ा था लेकिन उन्होंने जब तक बड़ी संख्या में अकबर की सेना का सफाया करने में कामयाबी हासिल की थी, जिसके चलते उनकी बहादुरी की अपार प्रशंसा हुई। उस युद्ध में जख्मी होने के बावजूद महाराणा मुगलों के हाथ नहीं आए।

हल्दी घाटी की हार के बाद भी दृढ़ निश्चयी, पराक्रमी और वीरता की मिसाल महाराणा प्रताप ने हार नहीं मानी और नई रणनीति के तहत मुगलों से लोहा लेने का संकल्प लिया। इसके लिए उन्होंने गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई और अरावली की पहाड़ियों में शरण ली। वहीं से ही उन्होंने मुगल सेना पर खूब छापामार हमले किए। 12 वर्षों तक उन्होंने वनवास में रहकर ही संघर्ष किया और मेवाड़ को मुगलों से मुक्त कराने का निरंतर प्रयास करते रहे। कहा जाता है कि जंगल में रहते हुए उन्होंने न जमीन पर सोकर रातें गुजारी बल्कि केवल घास की ही रोटी भी खाई लेकिन अकबर के सामने कभी हार नहीं मानी। गुरिल्ला युद्ध के जरिये वे हर पल मुगलों की नाक में नकेल कसते रहे और इस प्रकार उन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। 30 वर्ष लंबे संघर्ष और युद्ध के बाद भी अकबर महाराणा प्रताप को न तो बंदी बना सका और न ही झुका सका।

महाराणा प्रताप के शौर्य की बात हो और उनके प्रिय घोड़े चेतक का जिक्र न किया जाए, यह भी संभव नहीं। दरअसल महान राजपूत योद्धा महाराणा प्रताप का अश्व चेतक भी उन्हीं की भांति वीर योद्धा था, जो दुनिया के सर्वश्रेष्ठ घोड़ों में से एक था। चेतक महाराणा प्रताप के प्रति वफादारी के लिए जाना जाता है, जो एक बेहद बुद्धिमान और ताकतवर घोड़ा था। युद्ध में दुश्मन को चकमा देने के उद्देश्य से उसके मुंह के आगे हाथी की सूंड लगाई जाती थी। एक बार जब मुगल सेना महाराणा प्रताप के पीछे लगी थी, तब चेतक महाराणा प्रताप को अपनी पीठ पर लिए 26 फीट के उस नाले को भी लांघ गया था, जिसे मुगल पार नहीं कर सके। हल्दी घाटी युद्ध में चेतक बुरी तरह घायल हो गया था, जिसके बाद उसकी मृत्यु हो गई और आज उसी युद्धस्थल के पास चेतक का मंदिर बना हुआ है। वीरता, स्वाभिमान और दृढ़ संकल्प के प्रतीक महाराणा प्रताप केवल एक महान योद्धा ही नहीं थे बल्कि एक आदर्श शासक और प्रेरणादायक व्यक्तित्व भी थे, जिन्होंने अपने जीवनकाल में कुंभलगढ़ किले का निर्माण, चावंड, रणकपुर और जगन्नाथपुरी जैसे मंदिरों का निर्माण कराया और गायों की रक्षा के लिए अनेक गौशालाओं की भी स्थापना की। महाराणा प्रताप सदैव भारत के वीर योद्धाओं और देशभक्तों के लिए प्रेरणास्रोत बने रहेंगे। युद्ध और शिकार के दौरान लगी चोटों के कारण 56 वर्ष की आयु में 29 जनवरी 1597 को उन्हें वीरगति प्राप्त हुई। महाराणा प्रताप ने कुल 11 शादियां की थी और राजनीतिक कारणों से हुई उन शादियों से उनके कुल 17 बेटे और 5 बेटियां थी। महाराणा प्रताप के वीरगति को प्राप्त हो जाने के बाद राजगद्दी उनकी पहली पत्नी अजाब्दे पंवार के बेटे अमर सिंह को सौंपी गई।

 

 

 

 

 

 

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