सनातन परंपराओं एवं आदर्श राज-व्यवस्था की संरक्षिका-संपोषिका महारानी अहिल्याबाई होल्कर
July 27, 2026
  • Read Ecopy
  • Circulation
  • Advertise
  • Careers
  • About Us
  • Contact Us
Android appiPhone AppArattai
Panchjanya
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
Panchjanya
panchjanya android mobile app
  • होम
  • भारत
  • विश्व
  • संघ @100
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विश्लेषण
  • मत अभिमत
  • रक्षा
  • धर्म-संस्कृति
  • पत्रिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
  • Print Edition
  • Ecopy
होम विश्लेषण

सनातन परंपराओं एवं आदर्श राज-व्यवस्था की संरक्षिका-संपोषिका महारानी अहिल्याबाई होल्कर

महारानी अहिल्याबाई होल्कर का जन्म 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के चौंडी नामक गांव में हुआ था, जो वर्तमान में अहमदनगर जिले के जामखेड में पड़ता है।

Written byप्रणय कुमारप्रणय कुमार
May 31, 2024, 03:32 pm IST
in विश्लेषण

यह भारत-भू वीर प्रसूता है। यहां हर युग, हर काल में ऐसे-ऐसे वीर-वीरांगनाओं ने जन्म लिया, जिनके व्यक्तित्व एवं कर्तव्य के आगे सारा संसार सिर झुकाता है। इन वीर-वीरांगनाओं ने समय के शिलालेख पर अमिट अक्षरों में कर्म एवं पुरुषार्थ की उज्ज्वल कहानियां लिखीं। किसी ने युद्ध के मैदान में अपनी तेजस्विता की चमक बिखेरीं तो किसी ने मानव-मात्र के कल्याण के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। धर्म की इस महान एवं सनातन भूमि पर प्रेरणा के ऐसे प्रकाश-पुंजों की कमी नहीं रही। ऐसी ही एक तेजस्विनी-महिमामयी नारी थीं- महारानी अहिल्याबाई होल्कर। उन्होंने भारतीय संस्कृति के कीर्ति-ध्वजा को तो दसों-दिशाओं में फहराया ही, हिंदू परंपराओं एवं मान्यताओं के अनुकूल आदर्श शासन एवं राज-व्यवस्था की भी स्थापना की। उनका जीवन और शासन लोक-कल्याण को समर्पित था। समाज एवं राष्ट्र के लिए जब आवश्यकता पड़ी उन्होंने खड्ग भी धारण किया तो धर्म का कीर्ति-ध्वज फहराए रखने के लिए अनेकानेक अभिनव, असाधारण एवं ऐतिहासिक पहल व प्रयत्न किए।

महारानी अहिल्याबाई होल्कर का जन्म 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के चौंडी नामक गांव में हुआ था, जो वर्तमान में अहमदनगर जिले के जामखेड में पड़ता है। उनके पिता मानकोजी शिंदे एक संस्कारक्षम व्यक्ति थे। उन्होंने अहिल्या में बचपन से ही धार्मिक एवं राष्ट्रीय संस्कारों का भाव भरा था। उस दौर में भी उनके पिता ने उन्हें पढ़ाने-लिखाने की समुचित व्यवस्था की थी। उन दिनों छोटी आयु में भी विवाह की प्रथा प्रचलित थी। यों तो सनातन समाज सदैव वैज्ञानिक तौर-तरीकों से जीवन जीता आया है। महान भारत वर्ष में तो स्वयंवर तक की प्रथा रही, जहां कन्या गुणों के आधार पर वर का वरण करती थी। पर विधर्मियों एवं विदेशी आक्रांताओं से अपनी ललनाओं की रक्षा के लिए काल-विशेष में सनातन समाज में बाल विवाह एवं पर्दा प्रथा जैसी रूढ़ियाँ प्रचलित हो गईं थीं, जो समय के साथ स्वतः समाप्तप्राय हो चली हैं।

कहते हैं कि पुणे जाते समय मालवा राज्य के पेशवा मल्हारराव होल्कर की दृष्टि 8 वर्षीय अहिल्याबाई पर पड़ी। वे उनके गुणों से बहुत प्रभावित हुए। उतनी छोटी अवस्था में भी वह गरीबों और भूखों की मदद कर रही थीं। उनकी निष्ठा एवं परोपकारिता से प्रभावित होकर मल्हारराव ने उनके पिता मानकोजी से उनका हाथ अपने बेटे खंडेराव के लिए मांगा।

उनका विवाह इंदौर राज्य के संस्थापक एवं पेशवा मल्हारराव होल्कर के पुत्र खंडेराव के साथ धूमधाम से संपन्न हुआ। महारानी अहिल्याबाई ने 1745 में एक पुत्र एवं उसके तीन वर्ष पश्चात एक कन्या को जन्म दिया। पुत्र का नाम मालेराव और कन्या का नाम मुक्ताराव रखा गया। कहा जाता है कि खंडेराव में भी जिम्मेदारी-बोध का स्फुरण-जागरण महारानी अहिल्याबाई की प्रेरणा से ही हुआ। वे उन्हें राज-काज एवं शासन-व्यवस्था में सहयोग प्रदान करती थीं। उन्होंने बड़ी कुशलता से अपने पति के स्वाभिमान एवं गौरव-बोध को जागृत किया। अपने पिता के मार्गदर्शन में खंडेराव कुशल योद्धा एवं निपुण शासक बनते जा रहे थे। मल्हारराव होल्कर अपनी पुत्रवधू अहिल्याबाई को भी राज-काज की शिक्षा देते रहते थे। अपनी पुत्रवधू की बुद्धि, कार्य-कुशलता, नीतिनिपुणता से वे बहुत प्रसन्न थे। परंतु दुर्भाग्य से 1754 ई. में खंडेराव का निधन हो गया। 1766 ई. में मल्हारराव भी इस संसार को छोड़कर देवलोक गमन कर गए।

श्वसुर के देहावसान के पश्चात अहिल्याबाई के नेतृत्व में उनके बेटे मालेराव होल्कर ने शासन की बागडोर संभाली। पर उस समय अहिल्याबाई और मालवा पर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा, जब 5 अप्रैल 1767 को शासन की बागडोर संभालने के कुछ ही महीने बाद उनके बेटे की मृत्यु हो गई। कोई भी स्त्री जिससे थोड़े-थोड़े अंतराल पर उसके पति, श्वसुर, पुत्र का सहारा छिन जाए, उसके दुःख एवं मनःस्थिति की सहज ही कल्पना की जा सकती है! परंतु रानी अहिल्याबाई ने नियति एवं परिस्थिति के आगे घुटने नहीं टेके। उन्होंने मालवा राज्य की प्रजा को अपनी संतान मानते हुए 11 दिसंबर 1767 ई. को शासन की बागडोर अपने हाथों में ली। थोड़े ही दिनों में महारानी की लोकप्रियता राज्य भर में फैल गई। परिस्थितियों का लाभ उठाने के उद्देश्य से मालवा पर कुदृष्टि रखने वाले लोगों को मुंह की खानी पड़ी। अपने राज्य एवं प्रजा की रक्षा के लिए उन्होंने न केवल अस्त्र-शस्त्र उठाया, बल्कि अनेक युद्धों-मोर्चों पर स्वयं आगे आकर अपनी सेना का कुशल नेतृत्व किया।

इतना ही नहीं, जब आवश्यकता पड़ी उन्होंने कूटनीति से भी काम लिया। राज्य हड़पने के उद्देश्य से जब राघोवा पेशवा ने मालवा पर आक्रमण के लिए अपनी सेना भेजी तो महारानी अहिल्याबाई के केवल एक पत्र से यह युद्ध टल गया और पेशवा ने उन्हें उनके राज्य की सुरक्षा का वचन दिया। उस पत्र ने पेशवा राघोवा की सुप्त चेतना को जागृत किया। उस पत्र के एक-एक शब्द ने उन पर नुकीले तीर-सा असर किया और उन्होंने महारानी से युद्ध का इरादा बदल दिया। महारानी इतनी कुशल एवं दूरदर्शी थीं कि व्यापारी बनकर आए अंग्रेजों और ईस्ट इंडिया कंपनी के फूट डालो और शासन करो की नीति को उन्होंने सबसे पूर्व भांप लिया था। उन्होंने तत्कालीन पेशवा प्रमुख को इस संदर्भ में पत्र लिखकर उन्हें सतर्क भी किया था। वे प्रतिभा को पहचानती थीं। उन्होंने अपने विश्वसनीय सेनानी सूबेदार तुकोजीराव होल्कर (मल्हारराव के दत्तक पुत्र) को सेना-प्रमुख बनाया था। वे उन पर भरोसा करती थीं और तुकोजीराव भी उनके प्रति अखंड निष्ठा एवं श्रद्धा रखते थे।

महारानी अहिल्याबाई का शासन-काल भले ही अल्प रहा, पर उन्होंने भावी भारत पर बहुत गहरा एवं व्यापक प्रभाव छोड़ा। अल्पावधि के अपने शासन-काल में उन्होंने अनगिनत निर्माण-कार्य करवाए। न केवल राज्य की सीमाओं के भीतर बल्कि संपूर्ण भारत वर्ष के प्रमुख तीर्थों और स्थानों में उन्होंने मंदिर बनवाए, पुराने मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया, कुओं, तालाबों, बावड़ियों का निर्माण करवाया, मार्ग बनवाए, सड़कों की मरम्मत करवाई, भूखों के लिए अन्नसत्र खुलवाए, प्यासों के लिए स्थान-स्थान पर प्याऊ लगवाए, तीर्थस्थलों पर धर्मशालाओं का निर्माण करवाया, शास्त्रों के अध्ययन-चिंतन-मनन-प्रवचन हेतु मंदिरों में विद्वान आचार्यों की नियुक्ति की।

आत्म-प्रतिष्ठा एवं प्रवंचना का मोह त्यागकर उन्होंने सदैव न्याय करने का प्रयत्न किया। कहते हैं कि वे इतनी न्यायप्रिय थीं कि एक बार अपने इकलौते एवं दत्तक पुत्र तक को मृत्युदंड देने को उद्धत हो गई थीं। प्रजाजनों की विनती के बावजूद वह न्याय से टस-मस नहीं हुईं। उनके पुत्र के रथ से कुचलकर एक नवजात बछड़ा घायल हो गया और वहीं उसकी मौत हो गई। मृत बछड़े के पास उसकी माँ यानी गाय आकर बैठ गई। थोड़ी देर बाद अहिल्याबाई वहाँ से गुजरीं। संवेदनशील एवं न्यायप्रिय रानी से गौमाता का शोक कैसे छिप पाता! सारा घटनाक्रम जानने के बाद अहिल्याबाई ने दरबार में मालोजी की पत्नी मेनावाई से पूछा -” यदि कोई व्यक्ति किसी माँ के सामने उसके बेटे की हत्या कर दे, तो उसे क्या दंड मिलना चाहिए?” मेनावाई ने उत्तर दिया- ”उसे प्राणदंड मिलना चाहिए।’ इसके बाद महारानी अहिल्याबाई ने मालोराव को हाथ-पैर बाँधकर सड़क पर डालने को कहा और फिर उन्होंने आदेश दिया कि उन्हें रथ से कुचलकर मृत्युदंड दिया जाय।

इस कार्य के लिए जब कोई सारथी आगे नहीं आया तो वह स्वयं इस कार्य के लिए रथ पर सवार हो गईं। पर विधाता को यह स्वीकार नहीं था। कहते हैं कि जब वे रथ को लेकर मालोराव की ओर आगे बढ़ीं तो वही गाय रथ के सम्मुख आकर खड़ी हो गई। यह दृश्य देखकर मंत्री एवं प्रजाजनों ने उनसे गुहार लगाई कि ‘शायद यह गाय भी नहीं चाहती कि किसी और माँ के बेटे के साथ ऐसा हो। वह मालोजी के लिए आपसे दया की भीख माँग रही है।” कहा यह भी जाता है कि स्वयं एकलिंग भगवान शिव गाय का रूप धारण कर न्याय के प्रति उनकी निष्ठा की परीक्षा ले रहे थे। जिसमें वे सौ प्रतिशत खरी उतरीं।

वे न्याय के संदर्भ में अपने समकालीन पुणे के न्यायाधीश श्री रामशास्त्री जी की परंपरा का अनुसरण करती थीं तो राजधर्म एवं वीरता में महारानी लक्ष्मीबाई जैसी उत्तरकालीन शासिकाओं पर उनका प्रभाव देखने को मिलता है। उनके जीवन-काल में ही जनता ने उन्हें ‘देवी’ समझना और कहना प्रारंभ कर दिया था। शासन और व्यवस्था के नाम पर जब देश में विधर्मियों और विदेशियों का अनाचार-अत्याचार का बोलबाला था, प्रजाजन-साधारण गृहस्थ, किसान-मजदूर-व्यापारी अत्यंत दीन-हीन अवस्था में जीने को अभिशप्त थे, जब समाज तरह-तरह के अंधविश्वासों और रूढ़ियों में जकड़ा हुआ था, ऐसे घोर अँधेरे कालखंड में महारानी अहिल्याबाई का शासन वहाँ की प्रजाजनों के लिए किसी प्रकाशपुंज से कम नहीं!

13 अगस्त सन 1795 को उनकी जीवन-लीला समाप्त हो गई पर उससे पूर्व उन्होंने जो-जो काम किया वह इतिहास के पृष्ठों में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। चाहे माहेश्वर को राजधानी बनाने का अभिनव प्रयोग हो या संपूर्ण हिंदू समाज के गौरव और सनातन संस्कृति के केंद्र काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण व जीर्णोद्धार या अन्य लोक-मंगल की भावना से संचालित निःस्वार्थ सेवा-कार्य- उन सबके पीछे महारानी अहिल्याबाई की सनातन जीवन-दृष्टि, प्रजावत्सलता एवं कर्त्तव्यपरायणता थी। निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि महारानी अहिल्याबाई ने न केवल अपने समय एवं समाज पर गहरा व व्यापक प्रभाव डाला, बल्कि सनातन संस्कृति एवं सरोकारों को जीने, समझने और अक्षुण्ण रखने के कारण उनका योगदान सदियों तक अमर एवं अविस्मरणीय रहेगा।

 

 

 

 

 

 

 

Topics: inspiring story of ahilyabai holkarahilyabai holkar biography in hindiAhilyabai holkar jayantiAhilyabai holkar historyAhilyabai holkar history in hindiअहिल्याबाई होलकर का इतिहासSanatan DharmaAhilyabai Holkarअहिल्याबाई होल्करAhilyabai holkar jayanti 2024
Share1TweetSendShareSend
Subscribe Panchjanya YouTube Channel
Download Panchjanya mobile apps: Google Play Store  / App Store

संबंधित समाचार

तमन्ना ने अपनाया सनातन धर्म

Ghar Wapsi: तमन्ना ने इस्लाम छोड़ अपनाया सनातन धर्म, हुआ वैदिक रीति से घर वापसी संस्कार

जगन्नाथ रथ यात्रा 2026 : भगवान जगन्नाथ मंदिर से बाहर क्यों निकलते हैं, क्या है महत्व? जानिये

अट्टहास शक्तिपीठ – जहां मूर्ति नहीं, एक विशाल शिला की होती है पूजा!

25 आदिवासी एवं वनवासी भाई-बहनों ने अपनाया सनातन धर्म

Ghar Wapsi: “आओ, अब घर लौट चलें”: गुजरात में 25 लोगों ने की शारदापीठ शंकराचार्य की प्रेरणा से घर वापसी

अमरनाथ यात्रा: भारत की सनातन आस्था और राष्ट्रभाव का अप्रतिम प्रतीक

मां भद्रकाली मंदिर

38 साल बाद कश्मीर में लौटी मां भद्रकाली, आतंकियों से कैसे वापस मिली सदियों पुरानी मूर्ति?

Load More

ताज़ा समाचार

Indian Dying in gulf contries

खाड़ी देशों में भारतीय मजदूरों की मौत: 2023-2025 में 800+ मौतें, MEA डेटा में चौंकाने वाले आंकड़े

E20 Janta Party

CJP के बाद अब मैदान में E20 जनता पार्टी, सरकार से कर डाली खास मांग

Hormuz Strait Iran attack on Kuwait

13 दिनों के हमलों के बाद अमेरिका-ईरान ने अस्थायी युद्धविराम किया, इस्लामी मुल्क ने स्पष्ट किया अपना स्टैंड

आज का राशिफल

27 जुलाई राशिफल: इन राशियों के रुके काम होंगे पूरे, कुछ को खर्च और तनाव से रहना होगा सावधान

आज का इतिहास

27 जुलाई का इतिहास: CRPF स्थापना दिवस से लेकर कश्मीर युद्धबंदी रेखा समझौते तक, जानें आज के दिन की प्रमुख घटनाएं

भारोत्तोलक ऋषिकांता सिंह चानमबम

राष्ट्रमंडल खेल 2026 : भारोत्तोलक ऋषिकांता ने भारत को दिलाया रजत पदक

राजनाथ सिंह, रक्षामंत्री

पाकिस्तान के साथ अब कोई भी बातचीत सिर्फ पीओजेके पर फोकस होगी : रक्षामंत्री राजनाथ सिंह

नंदन नीलेकणि

परीक्षा सुधारों पर पीएम मोदी की बड़ी घोषणा, नंदन नीलेकणि के नेतृत्व में बना हाई पावर टास्क फोर्स

मीराबाई चानू ने जीता स्वर्ण पदक

राष्ट्रमंडल खेल 2026: मीराबाई चानू ने रचा इतिहास, जीता स्वर्ण, लगाई सोने की हैट्रिक

आस्थावान समाज की सहभागिता से हो मंदिरों का प्रबंधन

Load More
  • Privacy
  • Terms
  • Cookie Policy
  • Refund and Cancellation
  • Delivery and Shipping

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies

  • Search Panchjanya
  • होम
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • सामाजिक समरसता
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • पर्यावरण
      • नागरिक कर्तव्य
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विभाजन-विभीषिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
    • सुशासन संवाद
    • सागर मंथन
    • मुंबई संकल्प
    • अष्टायाम
    • गुरुकुलम
    • साबरमती संवाद
    • आधार इन्फ्रा
  • वेब स्टोरी
  • ऑपरेशन सिंदूर
  • विश्लेषण
  • लव जिहाद
  • खेल
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म-संस्कृति
  • पर्यावरण
  • बिजनेस
  • साक्षात्कार
  • शिक्षा
  • रक्षा
  • कला-साहित्य
    • पुस्तकें
    • पुस्तक समीक्षा
  • सोशल मीडिया
  • विज्ञान और तकनीक
  • मत अभिमत
  • श्रद्धांजलि
  • संविधान
  • आजादी का अमृत महोत्सव
  • पॉडकास्ट
  • पत्रिका
  • हमारे लेखक
  • Read Ecopy
  • प्रसार विभाग – Circulation
  • About Us
  • Contact Us
  • Careers @ BPDL
  • Advertise
  • Privacy Policy

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies