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जयंती विशेष: संत शिरोमणि रविदास

रैदास पंथ का पालन करने वाले लोगों में रविदास जयंती का एक विशेष महत्व है

Written byसुरेश कुमार गोयलसुरेश कुमार गोयल
Feb 24, 2024, 06:00 am IST
inभारत

जातिवाद और आध्यात्मिकता के खिलाफ काम करने वाले संत शिरोमणि कवि रविदास का जन्म माघ पूर्णिमा को 1376 ईस्वी को उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर के पास सीर गोबर्धनपुर गांव में हुआ था। उनका जन्म रविवार के दिन हुआ था, ऐसा कहते हैं कि इसी वजह से इनका नाम रविदास रखा गया। इनकी माता का नाम कर्मा देवी (कलसा) तथा पिता का नाम संतोख दास (रग्घु) था। उनके दादा का नाम कालूराम जबकि दादी का नाम लखपती था। इनकी पत्नी लोनाजी से एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम विजय दास था। पंजाब में इन्हें रविदास कहा जाता है, जबकि उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान में इन्हें रैदास के नाम से ही जाना जाता है। गुजरात और महाराष्ट्र के लोग ‘रोहिदास’ और बंगाल के लोग उन्हें ‘रुइदास’ कहते हैं। कई पुरानी पांडुलिपियों में उन्हें रायादास, रेदास, रेमदास और रौदास के नाम से भी जाना गया है।

बचपन में रविदास जी अपने गुरु पंडित शारदा नन्द की पाठशाला में शिक्षा लेने जाया करते थे। उन दिनों जात-पात का बहुत प्रचलन था जिसके कारण कुछ समय बाद ऊँची जाति वालों ने उनका पाठशाला में आना बंद करवा दिया था। यह होनहार और पढ़ने में बहुत तेज थे। पंडित शारदा नन्द जी ने रविदास जी की प्रतिभा को जान लिया था और वे समाज की ऊंच-नीच बातों को नहीं मानते थे। शारदा नन्द जी ने रविदास जी को अपनी व्यक्तिगत् पाठशाला में शिक्षा देना शुरू कर दिया। गुरु जितना उन्हें पढ़ाते थे, उससे ज्यादा वे अपनी समझ से शिक्षा गृहण कर लेते थे। शारदा नन्द जी रविदास जी से बहुत प्रभावित रहते थे। इनके आचरण और प्रतिभा को देख वे सोचा करते थे, कि रविदास एक अच्छा आध्यात्मिक गुरु और महान समाज सुधारक बनेगा।

रविदास जी के साथ पाठशाला में पंडित शारदा नन्द जी का बेटा भी पढ़ता था, वे दोनों अच्छे मित्र थे। ऐसा कहा जाता है कि  एक बार दोनों छुपन छुपाई का खेल रहे थे, 1-2 बार खेलने के बाद रात हो गई लेकिन मन नहीं भरा।  इससे उन लोगों ने अगले दिन खेलने की बात कही। दूसरे दिन सुबह रविदास जी खेलने पहुँचे तो देखा कि वो मित्र नहीं आया है। तब वो उसके घर जाते है, वहां जाकर पता चलता है कि रात को उसके मित्र की मृत्यु हो गई है। ये सुन रविदास सुन्न पड़ जाते है, तब उनके गुरु शारदा नन्द जी उन्हें मृत मित्र के पास ले जाते हैं। रविदास जी को बचपन से ही अलौकिक शक्तियां मिली हुई थी, वे अपने मित्र से कहते है कि ये सोने का समय नहीं है, उठो और मेरे साथ खेलो। ये सुनते ही उनका मृत दोस्त खड़ा हो जाता है और रविदास उसे साथ लेकर खेलने निकल जाते हैं। ये देख वहां मौजूद हर कोई अचंभित हो जाते है।

रविदास जी जाति प्रथा के उन्मूलन में प्रयास करने के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने भक्ति आंदोलन में भी योगदान दिया है, और कबीर जी के अच्छे मित्र के रूप में पहचाने जाते हैं। रैदास पंथ का पालन करने वाले लोगों में रविदास जयंती का एक विशेष महत्व है। संत रविदासजी बहुत ही दयालु और दानवीर थे। संत रविदास ने अपने दोहों व पदों के माध्यम से समाज में जातिगत भेदभाव को दूर कर सामाजिक एकता पर बल दिया और मानवतावादी मूल्यों की नींव रखी। रविदास जी के पिता मरे हुए जानवरों की खाल निकालकर उससे चमड़ा बनाते और फिर उसकी चप्पल बनाते थे। इनका जूते बनाने और सुधारने का काम हुआ करता था।  वे पूरी लगन तथा परिश्रम से अपना कार्य करते थे।

रविदास जी बचपन से ही बहुत बहादुर और भगवान् को बहुत मानने वाले थे। रविदास जी जैसे जैसे बड़े होते गए, भगवान राम के प्रति उनकी भक्ति बढ़ती गई। वे हमेशा राम, रघुनाथ, राजाराम चन्द्र, कृष्णा, हरी, गोविन्द आदि शब्द उपयोग करते थे, जिससे उनकी धार्मिक होने का प्रमाण मिलता था। रविदास जी के पिता की मौत के बाद इन्होंने अपने पड़ोसियों से मदद मांगी, ताकि वे गंगा के तट पर अपने पिता का अंतिम संस्कार कर सकें। साथ न मिलने पर रविदास जी बहुत दुखी और असहाय महसूस कर रहे थे, लेकिन इस घड़ी में भी उन्होंने अपना संयम नहीं खोया और भगवान से अपने पिता की आत्मा की शांति के लिए प्राथना करने लगे। फिर वहां एक बहुत बड़ा तूफान आया, नदी का पानी विपरीत दिशा में बहने लगता है. फिर अचानक पानी की एक बड़ी लहर मृत शरीर के पास आई और सारे अवशेषों को अवशोषित कर लिया।

इनका जन्म ऐसे समय में हुआ था जब उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में मुगलों का शासन था चारों ओर अत्याचार, गरीबी, भ्रष्टाचार व अशिक्षा का बोलबाला था। उस समय मुस्लिम शासकों द्वारा प्रयास किया जाता था कि अधिकांश हिन्दुओं को मुस्लिम बनाया जाए। संत रविदास की ख्याति लगातार बढ़ रही थी जिसके चलते उनके लाखों भक्त थे जिनमें हर जाति के लोग शामिल थे। यह सब देखकर ‘सदना पीर’ उनको मुसलमान बनाने आया था। उसका सोचना था कि यदि रविदास मुसलमान बन जाते हैं तो उनके लाखों भक्त भी मुस्लिम हो जाएंगे। ऐसा सोचकर उनपर हर प्रकार से दबाव बनाया गया था लेकिन संत रविदास तो संत थे उन्हें किसी हिन्दू या मुस्लिम से नहीं मानवता से मतलब था।

वैष्णव भक्तिधारा के महान संत स्वामी रामानंदाचार्य जी के संत रविदास शिष्य थे। संत रविदास तो संत कबीर के समकालीन व गुरूभाई माने जाते हैं। स्वयं कबीरदास जी ने ‘संतन में रविदास’ कहकर इन्हें मान्यता दी है। राजस्थान की कृष्णभक्त कवयित्री मीराबाई उनकी शिष्या थीं। यह भी कहा जाता है कि चित्तौड़ के राणा सांगा की पत्नी झाली रानी उनकी शिष्या बनीं थीं। वहीं चित्तौड़ में संत रविदास की छतरी बनी हुई है।

152 वर्ष धरती पर बिताने के बाद 1528 में अपनी देह त्याग कर सदा के लिए प्रभु धाम चले गए। इनके सम्मान में भारत की मोदी सरकार ने वाराणसी में करोड़ों रुपये खर्च कर रविदास पार्क, रविदास घाट, रविदास नगर, रविदास मेमोरियल गेट सहित बहुत से स्मारक बनाये हैं। इनके जन्म स्थान पर हर वर्ष इनकी जयंती पर मेला लगता है। यहाँ पर दुनिया भर से प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु पहुँच कर नतमस्तक होते हैं।

रविदासजी ने सीधे-सीधे अपनी बानी में लिखा कि ‘रैदास जन्म के कारने होत न कोई नीच, नर कूं नीच कर डारि है, ओछे करम की नीच’ यानी कोई भी व्यक्ति सिर्फ अपने कर्म से नीच होता है। जो व्यक्ति गलत काम करता है वो नीच होता है। कोई भी व्यक्ति जन्म के हिसाब से कभी नीच नहीं होता। संत रविदास ने अपनी कविताओं के लिए जनसाधारण की ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। साथ ही इसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और रेख्ता यानी उर्दू-फारसी के शब्दों का भी मिश्रण है। रविदासजी के लगभग चालीस पद ‘गुरुग्रंथ साहिब’ में भी सम्मिलित किए गए हैं।

Topics: रविदास जयंतीRavidas Jayantiपाञ्चजन्य विशेष२४ फरवरी विशेषसंत रैदास जयंती24 February specialSant Raidas Jayanti
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