देवभूमि में 'गजवा ए हिन्द' के लक्ष्य पर काम कर रहे कट्टरपंथी, उत्तराखंड-यूपी से लगे जिलों में हालात अब सामान्य नहीं रहे
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देवभूमि में ‘गजवा ए हिन्द’ के लक्ष्य पर काम कर रहे कट्टरपंथी, उत्तराखंड-यूपी से लगे जिलों में हालात अब सामान्य नहीं रहे

'गजवा ए हिन्द' का संधि विच्छेद करके इसका अर्थ समझें तो युद्ध को 'गजवा' कहा जाता है। काफिरों को युद्ध में हराने की प्रक्रिया को 'गाज़ी' कहा जाता है। यहां हिन्द का मतलब हिन्दुस्तान यानी भारत है। इसलिए जब कोई मुस्लिम देश या संगठन हिंदुस्तान में इस्लाम को स्थापित करने का अभियान चलाते तो उसे 'गजवा ए हिन्द' कहा जाता है।

Written byदिनेश मानसेरादिनेश मानसेरा
Feb 23, 2024, 12:08 pm IST
in उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश
Gajwa E Hind conspiracy

प्रतीकात्मक तस्वीर

देहरादून: दारुल उलूम देवबंद के गजवा ए हिन्द को लेकर जारी किए गए फतवे को लेकर देश में एक बार फिर से बहस छिड़ गई है। राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग के निर्देश पर सहारनपुर के डीएम और एसएसपी को इस संदर्भ में एफआईआर दर्ज करने के लिए कहा गया है, डीएम सहारनपुर ने एसएसपी को इस बारे में रिपोर्ट दर्ज करने के लिए पत्र प्रेषित कर दिया है।

उल्लेखनीय है कि गजवा-ए-हिन्द (भारत पर आक्रमण) को वैध करार देने के जवाब पर इस्लामी शिक्षण संस्था दारुल उलूम दस वर्ष बाद सवालों के घेरे में आ गया है। वेबसाइट के माध्यम से दिए गए फतवे को आधार बनाकर राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने इसे राष्ट्र विरोधी बताते हुए डीएम सहारनपुर और एसएसपी को जांच कर कार्रवाई के आदेश दिए हैं। बृहस्पतिवार को देवबंद एसडीएम अंकुर वर्मा और सीओ अशोक सिसोदिया ने दारुल उलूम प्रबंधन से इस संबंध में पूछताछ भी की।

दरअसल, वर्ष 2015 में दारुल उलूम की वेबसाइट पर किसी व्यक्ति ने गजवा-ए-हिन्द को लेकर जानकारी मांगी थी। जिस पर दारुल उलूम ने अपने जवाब में पुस्तक सुन्नत-अल-नसाई का हवाला दिया था। कहा था कि गजवा-ए-हिन्द को लेकर इसमें पूरा एक अध्याय है। बाल संरक्षण आयोग ने कहा कि यह देश विरोधी है, क्योंकि इसमें गजवा-ए-हिन्द को इस्लाम के नजरिए से जायज बताया गया है। मामले में आयोग के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने डीएम और एसएसपी को पत्र लिखकर कार्रवाई करने को कहा।

क्या है गजवा ए हिन्द?

जानकर बताते हैं कि ‘गजवा ए हिन्द’ का संधि विच्छेद करके इसका अर्थ समझें तो युद्ध को ‘गजवा’ कहा जाता है। काफिरों को युद्ध में हराने की प्रक्रिया को ‘गाज़ी’ कहा जाता है। यहां हिन्द का मतलब हिन्दुस्तान यानी भारत है। इसलिए जब कोई मुस्लिम देश या संगठन हिंदुस्तान में इस्लाम को स्थापित करने का अभियान चलाते तो उसे ‘गजवा ए हिन्द’ कहा जाता है। इस योजना को तब शुरू किया गया था जब भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ था और पाकिस्तान ने अपने पूर्वी पाकिस्तान जो अब बंग्लादेश तक आने जाने के लिए उत्तर भारत से मुस्लिम आबादी बाहुल्य क्षेत्र से एक रास्ता बनाने की योजना बनाई थी।

किन्तु जब भारत ने पूर्वी पाकिस्तान को बांग्लादेश बनवा दिया तो पाकिस्तान की इस योजना को धक्का लगा, बावजूद इसके वो गजवा ए हिन्द की साजिश में लगा हुआ है और वो अपने खुफिया एजेंट्स के माध्यम से इस षड्यंत्र पर बराबर काम करता था है।

भारत में यूपी, राजस्थान, उत्तराखंड, बिहार, असम बंगाल आदि राज्यों में कुछ इसी तरह की साजिश हो रही है, कहा जाता है यहां मुस्लिम समुदाय जमीयत संस्थाओं के दिशा निर्देश पर एक अभियान के तहत अपनी आबादी का विस्तार करने में लगे हुए है। पिछले साल यूपी उत्तराखंड एटीएस द्वारा गजवा ए हिन्द से जुड़े सात आतंकियों को गिरफ्तार भी किया था।

इसे भी पढ़ें:  दारुल उलूम देवबंद ने ‘गजवा ए हिन्द’ को वैधता देने वाला फतवा जारी किया, NCPCR ने लिया एक्शन 

भारत में उत्तराखंड में, असम के बाद सबसे तेजी से मुस्लिम आबादी बढ़ रही है, उत्तराखंड में हर दस साल में दो फीसदी मुस्लिम आबादी बढ़ रही थी जो अब ढाई से तीन प्रतिशत हो रही है, देखने में ये बहुत थोड़ी लगती है, लेकिन इसको दूसरी नजर से देखेंगे तो उत्तराखंड में ये आबादी सत्रह प्रतिशत से अधिक तक हो गई है। अब ये समस्या दूसरी दृष्टि से समझे कि चार मैदानी जिलों, उधमसिंह नगर, नैनीताल हरिद्वार और देहरादून में ये आबादी पैंतीस फीसदी तक और कही और भी ज्यादा हो गई है। ऐसे जानकारी में आया है कि यूपी से लगे उत्तराखंड के इन चारों जिलों में तबलीगी जमात मरकज का अभियान अपनी पूरी तेजी पर है। जिसकी वजह से उत्तराखंड में डेमोग्राफी चेंज समस्या साफ दिखलाई देने लगी है।

कथित रूप से कहा जा रहा है कि गजवा ए हिन्द की योजना है यूपी के मैदानी इलाकों से जुड़े इस क्षेत्र और सीमावर्ती राज्यों में अपनी आबादी के जरिए अपनी गतिविधियों को विस्तार देना है। एक जानकारी के मुताबिक गजवा ए हिन्द के जरिए जमीयत संस्थाओं ने कुछ अपने लक्ष्य निर्धारित किए है।

उत्तराखंड में कैसे-कैसे हो रहे हैं षड्यंत्र?

राज्य वन भूमि और सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे करना, मुस्लिम संगठनों का पहला लक्ष्य रहा है। खनन नदियों के किनारे मुस्लिम आबादी ने अवैध रूप से कब्जे कर लिए है, वन भूमि यहां तक की कोर जोन के जंगलों में भी मुस्लिम गुर्जरों ने सैकड़ों हैक्टेयर भूमि कब्जा ली है, रेलवे, पीडब्ल्यूडी, की जमीनों पर अवैध मजारे मस्जिदें मदरसे आखिर कैसे खड़ी हो गई?

देहरादून में ही विनोबा भावे ट्रस्ट की भूदान जमीन पर, गोल्डन फॉरेस्ट, यहां तक कि देहरादून से लगी जंगल नदी बरसाती नाले की जमीनों पर अवैध कब्जे करने में मुस्लिम संगठनों ने योजना बद्ध तरीके से काम किया है। गौर करें उत्तराखंड के हर कैंट एरिया शहर में एक मजार बनी हुई है, इसके अलावा हर बैराज पुल , रेलवे स्टेशन के पास, दून अस्पताल, राजभवन कैंट एरिया ,तीर्थ नगरी हरिद्वार ऋषिकेश और अन्य संवेदनशील स्थानों पर भी मजारें बनी हुई है, स्मरण होगा कि मुस्लिम समुदाय ने टिहरी झील के आसपास तक मस्जिद मजार बना दी थी। जब ये मजारे, मस्जिदें और मदरसे बन रही थे तब किसी ने इस पर गौर नही किया होगा। लेकिन, अब इनकी सैकड़ों में संख्या को देख ऐसा लगता है कि ये कहीं “गजवा ए हिंद” की योजना का हिस्सा तो नहीं?

हाईवे और सड़कों पर कब्जे

उत्तराखंड में जितने भी नेशनल हाईवे है या प्रमुख सड़के हैं इन पर बिजनौर सहारनपुर मुजफ्फरनगर, मेरठ, पीलीभीत, रामपुर जिले और कहीं-कहीं तो असम से आए मुस्लिम समुदाय के लोगो ने अवैध कब्जे किए हुए हैं। हाल ही में आसन बैराज के पास, पछुवा देहरादून में उत्तराखंड जल विद्युत परियोजना कार्यालय से 900 से ज्यादा अवैध कब्जेदारों को नोटिस दिए गए हैं, जिनमें 714 मुस्लिम परिवार है। ये सभी मुस्लिम लोग यूपी के सहारनपुर जिले से यहां आकर बस गए, यहां से जब प्रशासन ने अतिक्रमण हटाया तो यहां बनी मस्जिदों मदरसों को छोड़ दिया गया, अभियान के एक माह बाद ये अतिक्रमण कारी फिर से धार्मिक स्थलों की आड़ लेकर बसने लगे है।

देहरादून के हालात सबसे खराब

देहरादून में एक सौ सत्तर मस्जिदें, सत्तर मजारें अवैध रूप से बनी हुई है। सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी का अतिक्रमण पछुवा दून में हुआ है। जिनमें से पच्चास के करीब मजारें धामी सरकार के बुल्डोजर ने ध्वस्त कर दी है। बावजूद इसके अभी और मजारें शेष है, गौरतलब बात ये भी है कि जब मुस्लिम सिवाय खुदा के कहीं और सजदा नहीं करते तो फिर ये मजारें किसके लिए बनाई गई ? स्वाभाविक है सरकार की जमीनों पर अवैध कब्जे करने की नियत से बनाई गई और यहां अंधविश्वासी हिन्दू लोगों की आड़ लेकर अपने अवैध कब्जे बढ़ाए जा रहे हैं।

गौर करने की बात है कि तख्त डाल कर नारियल बेचने वाले मुस्लिमों ने एक योजना बद्ध तरीकों से मुख्य सड़क और अस्पताल जैसी संवेदनशील स्थानों के बाहर काबिज है और इन्हें तख्त के पीछे झोपड़ी डाल कर बिठाया गया है। रोड पर नगर प्रशासन जहां पार्किंग की पट्टी लगाती है और फुटपाथ पर वहां मुस्लिम लोग फल सब्जी आदि के ठेले लगा कर बैठ चुके हैं, जबकि पालिका निगम का ये नियम या प्रावधान है कि ये ठेले पहिए के द्वारा चलायमान रहेंगे, कहीं काबिज नही होंगे, किंतु इन्होंने सड़कों को कब्जा लिया है।

जमीनों के दस्तावेजों में हेर फेर

उत्तराखंड सरकार को हाल ही में देहरादून जिले की जमीनों के दस्तावेजों में हेर फेर करने की साजिश का पता चला है, जिसके बाद से सीएम पुष्कर सिंह धामी ने एक विशेष जांच दल गठित किया है। दरअसल, उत्तराखंड बनने से पहले देहरादून सहारनपुर कमिश्नरी का हिस्सा था, राज्य बनने के बाद सहारनपुर में ही जमीनों के दस्तावेज पड़े रहे जिन्हे देहरादून की डीएम सोनिका खुद लेकर यहां आई और जब उनका डिजिटल काम शुरू हुआ तो इस साजिश का पर्दाफाश हुआ। जानकारी के मुस्लिम भू माफिया सराहनपुर से देहरादून आकर यहां की जमीनों के मालिकों को भू दस्तावेजों में बदलाव कर धमकाते थे कि ये जमीन उनकी है। ऐसे प्रकरणों के सामने आने पर धामी सरकार ने सख्त रुख अपनाया है।

बाजार कारोबार पर कब्जे

जमातों में आने वाले मुस्लिम युवाओं को इस बात के लिए प्रेरित किया जाता है कि वो लोहे, प्लास्टिक, मशीन, मोबाइल, बारबर, जहाज और डॉक्टरी के कारोबार करें। गौर कीजिए लोहे का कारोबार कभी हिन्दू वंचित समाज के लोग किया करते थे, अब सब काम मुस्लिम कर रहे हैं, मशीन रखना और चलाने में मिस्त्री कारीगरों एक लंबी सूची है, जिस पर ये मुस्लिम काबिज हो चुके हैं। प्लास्टिक कबाड़ को रीसाइकिल करने में ये मुस्लिम हावी है, अब और महत्वपूर्ण बात कि हर शहर में प्राइम लोकेशन पर मुस्लिम महंगे किराए देकर दुकानें खोल चुके हैं, गौर करें कि यहीं से लव जिहाद के मामले शुरू हो रहे है।

सनातन नगरी हरिद्वार में हरी चादर

गंगा सनातन तीर्थ नगरी हरिद्वार के कुंभ क्षेत्र को छोड़ कर हर तरफ मुस्लिम आबादी ने योजनाबद्ध तरीके से अपने पांव पसार लिए हैं। हरिद्वार से दो किमी बाहर निकलते ही, मस्जिदों मदरसों की भरमार दिखती है, आखिर ये पिछले कुछ सालों में कैसे पनप गए? हरिद्वार जिले में मुस्लिम आबादी 35 फीसदी से अधिक हो चुकी है जिसने सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य ही बदल डाला है।

क्या है लव जिहाद का अभियान का सच?

उत्तराखंड में मुस्लिम युवाओं को हिन्दू और ईसाई लड़की के साथ लव जिहाद के जरिए धर्म परिवर्तन करवा कर निकाह करने का फरमान मिला हुआ है। पिछले दस पंद्रह सालों में मैदानी ही नहीं पहाड़ी जिलों से भी लव जिहाद के मामले सामने आए हैं, नाम बदल कर उत्तराखंड गरीब परिवारों की लड़कियों को बरगला कर भगा ले जाने और उनका धर्म परिवर्तन कराने के मुकदमे पुलिस में दर्ज हुए है। इसके पीछे तबलीगी सोच ये कहती है हिन्दू लड़की को धर्मांतरण करवा कर एक हिन्दू पीढ़ी को खत्म कर देना है।

जमात के और भी हैं लक्ष्य?

देवभूमि उत्तराखंड में मुस्लिम समुदाय को जमात के जरिए ये निर्देश है कि हर साल प्रत्येक बालिग मुस्लिम व्यक्ति 5000 रु जकात, प्रत्येक व्यक्ति को जमात, हर घर से एक मौलवी, प्रत्येक लड़की को इस्लामिक शिक्षा, दावत ए इस्लाम (अपने घर लाकर रोजाना दो हिन्दुओं को दावत, दावत में मांस परोसना), मुस्लिम युवकों को गैरों से निकाह, हर जुम्मे की नमाज और नमाज के दौरान हाजिरी रजिस्टर भरने जैसे लक्ष्य दिए गए हैं।

उत्तराखंड है यूपी सूबे के अधीन

उत्तराखंड अभी यूपी सूबे के साथ है जिसका मुख्यालय लखनऊ में है। यूपी सूबे में नौ हल्के हैं, मेरठ हल्के में सहारनपुर, देहरादून, हरिद्वार ,रुड़की, जिला है। हल्के के नीचे मरकज थिया तहसील है। हर तहसील की मस्जिदों में जो हाजिरी रजिस्टर रखे हुए हैं उनकी रिपोर्ट कंप्यूटर डाटा के जरिए सूबे तक जाती है। इन्हीं सूचनाओं के आधार पर अगले लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं। गौर करने वाली बात है कि आखिर किस जमीनी स्तर पर योजना बद्ध तरीके से उत्तराखंड में मुस्लिम आबादी के पांव पसारने का षड्यंत्र चल रहा है।

पुरोला हल्द्वानी विकासनगर की घटनाएं

पुरेला में लव जिहाद की घटना का हिन्दू संगठनों ने विरोध किया, इसके बाद देहरादून में मुस्लिम संगठनों ने इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त की उससे मालूम होता है कि मस्जिदों से जमात की क्या भूमिका है? इसी तरह से विकासनगर क्षेत्र में लव जिहाद, कांवड़ पर पथराव की घटना के दौरान जिस तरह से इस्लामिक नए लगाए गए उससे पुलिस प्रशासन की नींद भी टूटी है। हल्द्वानी बनभूलपुरा अतिक्रमण मामले में जिस तरह से मुस्लिम संगठन सक्रिय हुए उससे ये संकेत मिलता है कि उत्तराखंड में मुस्लिम सेवा संगठन, भीम आर्मी और अन्य संगठनों के पीछे जमात की एक बड़ी भूमिका है।

उत्तराखंड में गजवा ए हिन्द की गतिविधियों की पुष्टि

2022 साल में दस अक्टूबर को यूपी और उत्तराखंड एटीएस ने गजवा ए हिन्द से जुड़े सात आतंकियों को गिरफ्तार किया था, जिनमें से दो उत्तराखंड से पकड़े गए थे। एटीएस ने सहारनपुर से लुकमान, आलिम, हरिद्वार से अली नूर, मुद्दसिर, देवबंद से कामिल, शामली से शहजाद और झारखंड से नवाजिश को पकड़ कर पूछताछ की थी और उत्तराखंड पुलिस प्रशासन से सूचनाएं साझा की थी, जिसमें ये बात सामने आई थी कि इन आरोपियों ने उत्तराखंड में गजवा ए हिन्द के लिए युवाओं को बरगलाने का काम किया था।

क्या कहती है धामी सरकार?

उत्तराखंड में बीजेपी की धामी सरकार है, संभवतः सीएम पुष्कर धामी ने अपनी सरकार के एजेंडे में सशक्त भू कानून और जनसंख्या असंतुलन जैसे विषयो पर विशेषज्ञों के साथ राय मशविरा शुरू किया है। सीएम धामी कहते है हमारी सरकार ने अतिक्रमण हटाओ अभियान में हजारों एकड़ जमीन को अवैध कब्जे से मुक्त करवाया गया हैं और ये अभियान आगे भी जारी रहेगा।

Topics: कैसे होता है गजवा ए हिन्दIslamगजवा ए हिन्द की शुरुआतइस्लामencroachment of Muslims in Uttarakhandउत्तराखंडwhat is Ghazwa e HindUttarakhandhow does Ghazwa e Hindगजवा ए हिन्दbeginning of Ghazwa e Hindइस्लामिक कट्टरपंथउत्तराखंड में मुस्लिमों का साजिशIslamic fundamentalismGhazwa-e-Hindक्या है गजवा ए हिन्द
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