‘कब्जाए गए धर्मस्थलों को कराएंगे मुक्त’-विष्णु शंकर जैन
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‘कब्जाए गए धर्मस्थलों को कराएंगे मुक्त’-विष्णु शंकर जैन

ज्ञानवापी में सर्वेक्षण कराने के लिए हम लोगों ने तीन साल तक ट्रायल कोर्ट, उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय तक लड़ाई लड़ी। 4 अगस्त, 2023 को सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वेक्षण की अनुमति दे दी। 

Written byPanchjanyaPanchjanya
Feb 5, 2024, 11:20 am IST
in भारत, उत्तर प्रदेश, धर्म-संस्कृति, साक्षात्कार
विष्णु शंकर जैन

विष्णु शंकर जैन

काशी विश्वनाथ-ज्ञानवापी मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ए.एस.आई.) की रपट के सामने आते ही देश-दुनिया में यह मामला एक बार फिर से गरमा गया है। इस रपट के संदर्भ में हिंदू पक्ष के युवा अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन से पाञ्चजन्य ने बातचीत की। प्रस्तुत हैं उसी वार्ता के मुख्य अंश-   

ज्ञानवापी परिसर के सर्वेक्षण के लिए काफी लंबी लड़ाई लड़ी गई। इसके बारे में विस्तार से बताएं।
ज्ञानवापी में सर्वेक्षण कराने के लिए हम लोगों ने तीन साल तक ट्रायल कोर्ट, उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय तक लड़ाई लड़ी। 4 अगस्त, 2023 को सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वेक्षण की अनुमति दे दी। इसके बाद ए.एस.आई. के 42 सदस्यीय दल को खसरा नं 9130 पर तैनात किया गया। यह सर्वेक्षण 92 दिन तक सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक चला। इसमें अलग-अलग तहखानों से शिवलिंग, हनुमान जी की मूर्ति, गणेश जी की मूर्ति, विष्णु भगवान की मूर्ति, कृष्ण भगवान की टूटी हुई मूर्तियां मिली हैं। सर्वेक्षण के दौरान खुदाई करने की अनुमति नहीं थी।

हालांकि वाराणसी जिला न्यायालय ने आवश्यकता पड़ने पर 21 जुलाई, 2023 को खुदाई करने का आदेश दिया था। पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगाते हुए कहा कि आधुनिक तरीके से ही सर्वेक्षण करें। अभी तो सिर्फ मिट्टी हटाने से जो मूर्तियां मिली हैं, वही सबके सामने हैं। यदि खुदाई हो गई तो वहां देवी-देवताओं की मूर्तियां बड़ी संख्या में मिल सकती हैं। ए.एस.आई. ने जी.पी.आर. तकनीक से किए सर्वे पर अपनी रपट तैयार की है, जिसमें बताया गया है कि तथाकथित मस्जिद से पहले वहां एक भव्य मंदिर था। इसमें एक महत्वपूर्ण बात यह भी कही गई है कि 17वीं शताब्दी में भव्य मंदिर को तोड़ा गया। अभी जिन खंभों पर मस्जिद खड़ी है, वे हिंदू मंदिर के हैं।

उन पर हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां बनी हुई हैं, जिन्हें मिटाने का असफल प्रयास किया गया है। इस तथाकथित मस्जिद के तीन गुंबद हैं। दाएं तरफ वाले गुंबद के नीचे एक कमरा है। वहां से एक टूटा हुआ शिलालेख मिला है। इस शिलालेख का मूल रूप 1965 से नागपुर स्थित ए.एस.आई. कार्यालय में मौजूद है। इसमें लिखा है कि ‘औरंगजेब ने मस्जिद को 17वीं शताब्दी में बनवाया’, जबकि मुस्लिम पक्ष का दावा है कि मुसलमान इस स्थान को हजारों साल से मस्जिद के रूप में इस्तेमाल करते आ रहे हैं। इस शिलालेख के मिलने से मुस्लिम पक्ष का तर्क झूठा साबित हो रहा है।

मुस्लिम पक्ष का यह भी कहना है यह मस्जिद वक्फ की थी, लेकिन ऐसा कोई कागज अभी तक नहीं मिला है जिससे कि सिद्ध हो कि औरंगजेब ने कभी इसे किसी मजहबी संस्था को सौंपा हो। सर्वेक्षण के दौरान हर गतिविधि की फोटोग्राफी की गई है। इसलिए कोई यह नहीं कह सकता कि वहां किसी ने कहीं से लाकर मूर्तियां रख दी हों। यह भी बता दें कि वहां 24 घंटे सीआईएसएफ का पहरा है। कोई भी गैर-मुस्लिम अंदर नहीं जा सकता। सिर्फ मुस्लिम समाज के लोग अंदर जा सकते हैं, लेकिन वे एक पेन भी अपने साथ नहीं ले जा सकते।

वहां हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां मिली हैं? किसी मस्जिद में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां कैसे मिल सकती हैं? इन सभी सवालों के जवाब ए.एस.आई. ने दे दिए हैं। ए.एस.आई. एक जिम्मेदार संगठन है। उसकी रपट को कभी कहीं गलत नहीं ठहराया गया है।

कुछ लोग सर्वेक्षण की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं?  
ऐसे लोगों को पता होना चाहिए कि सर्वेक्षण के दौरान हिंदू पक्ष की ओर से 8-10 लोग होते थे, लेकिन मुस्लिम समाज की तरफ से उनसे 10 गुना ज्यादा लोग मौजूद होते थे। ए.एस.आई की टीम में भी मुसलमान अधिकारी थे। ऐसे में इसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाना केवल सच को दबाने का एक असफल प्रयास है।

कानून के नजरिए से सर्वेक्षण की रपट का क्या महत्व है?
कानूनी दृष्टि से यह रपट बहुत ही महत्वपूर्ण है। पहले अदालत के सामने यह प्रश्न था कि क्या मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई? क्या इस तथाकथित मस्जिद से पहले वहां हिंदू मंदिर हुआ करता था? वहां पर जो खंभे हैं, वे क्या हिंदू मंदिर के हैं? क्या वहां हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां मिली हैं? किसी मस्जिद में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां कैसे मिल सकती हैं? इन सभी सवालों के जवाब ए.एस.आई. ने दे दिए हैं। ए.एस.आई. एक जिम्मेदार संगठन है। उसकी रपट को कभी कहीं गलत नहीं ठहराया गया है। इसलिए यह रपट इस मामले को सुलझाने में बड़ी भूमिका निभाने वाली है।

विश्व हिंदू परिषद ने कहा है कि अब सब कुछ सामने आ गया है तो मुस्लिम समाज को इस जगह को अब हिंदू समाज को सौंप देना चाहिए। इस पर आपका क्या कहना है?
विश्व हिंदू परिषद की इस मांग का मैं समर्थन करता हूं। अंजुमन इंतेजामिया को अब उस स्थान को हिंदू समाज को मंदिर बनाने के लिए सौंप देना चाहिए। एक बात यह भी कहना चाहता हूं कि राम मंदिर की तरह इसके बदले उन्हें जमीन नहीं मिलेगी। मैं पूछना चाहता हूं कि यदि किसी ने आपके घर पर कब्जा कर लिया और बाद में उसे खाली कराया गया तो क्या उसके बदले उसे जमीन दी जाएगी? बिल्कुल नहीं। यह सैद्धांतिक रूप से गलत है।

अभी रामलला के आने का उत्साह है और उसी उत्साह के बीच में काशी पर ए.एस.आई. की रपट आई है। यह मामला कब तक सुलझ सकता है?
राम मंदिर के मामले में यह सीखने को मिला कि इस तरह के मामले का निपटारा कैसे किया जा सकता है। देवकीनंदन अग्रवाल जी ने सिखाया कि देवी-देवताओं का अपना महत्व होता है। हिंदू देवी-देवता जीवंत होते हैं और उनकी तरफ से मामला दर्ज किया जा सकता है। जब समाज जागा तो तब न्यायालय ने इस चीज को गंभीरता से लिया।

पिछले तीन साल में हम ज्ञानवापी से संबंधित दो मामलों में जीत हासिल कर चुके हैं। एक, जिला न्यायालय, वाराणसी से 21 सितंबर 2022 को और दूसरा, इलाहाबाद उच्च न्यायालय से 31 मई, 2023 को। इसी का परिणाम है ए.एस.आई. ने वहां सर्वेक्षण किया। अब हम सर्वोच्च न्यायालय से आग्रह करेंगे कि वजू क्षेत्र का सर्वेक्षण करने का आदेश दें। मुझे उम्मीद है कि ज्ञानवापी मामले को सुलझाने में अब ज्यादा समय नहीं लगेगा। मैं यह भी बताना चाहता हूं कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि मामले में भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पूरे मामले की मूल प्रति को ‘ट्रायल’ के लिए मंगवा लिया है। ज्ञानवापी और श्रीकृष्ण जन्मभूमि का मामला कानूनी एवं साक्ष्य के आधार पर बहुत मजबूत है।

 क्या संदर्भ के रूप में राम मंदिर मामले का इस्तेमाल किया जा सकता है?
राम मंदिर के मामले में हमने जो सीखा, उसका हमें बहुत लाभ मिला। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राम मंदिर मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने हिंदू सनातन नीति को माना और कहा कि अगर एक स्थान पर किसी हिंदू मंदिर की स्थापना हो जाती है, तो अंत तक मंदिर ही रहता है। मंदिर तोड़ देने से इसका अस्तित्व खत्म नहीं होता है। अंतत: फैसला मंदिर के पक्ष में आया।

आक्रांता की बात मत कीजिए। यदि किसी ने आपके घर पर कब्जा कर लिया है, तो क्या उसकी बात भी मत कीजिए। इरफान हबीब से यह भी पूछा जाना चाहिए कि यदि आपके घर पर कोई कब्जा कर ले तो उसे आप छोड़ देंगे? हमारे आस्था स्थलों पर कब्जा किया गया है। उन्हें मुक्त कराना हमारा दायित्व है।

आप केवल काशी ही नहीं, बल्कि मथुरा के मामले को भी अदालत तक ले जा चुके हैं। यह सब करने की प्रेरणा आपको कहां से मिलती है?
मेरे पिताजी श्री हरिशंकर जैन 47 वर्ष से वकालत कर रहे हैं। उन्होंने एक लंबा समय अपने धर्म और समाज की रक्षा के लिए अर्पित किया है। राम मंदिर का भी मुकदमा उन्होंने लड़ा है। बाद में जब मैंने वकालत शुरू की तो मुझे लगा कि पिताजी का सहयोग करना चाहिए। मुगल काल में जितने भी स्थान हमसे छीने गए हैं, उन्हें मुक्त कराना ही हमारा उद्देश्य है।

आपके अंदर संकल्प शक्ति कहां से आती है?
ऐसी शक्ति इतिहास और शास्त्रों के अध्ययन करने से आती है। अध्ययन से पता चला कि सनातन धर्म के लिए काशी बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। वह ज्ञान, अध्यात्म का  क्षेत्र है। यह क्षेत्र असीम ऊर्जा से भरा हुआ है। इसलिए हम लोगों के लिए काशी सिर्फ एक मंदिर नहीं है, बल्कि एक पूरी सभ्यता, संस्कृति है। ऐसे ही हमारे लिए मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि का महत्व है। इन मामलों के लिए हम एक भक्त के नाते लड़ रहे हैं।

वामपंथी इतिहासकार इरफान हबीब कहते हैं कि ठीक है वहां मंदिर के प्रमाण मिले हैं, तो क्या देश मेें मंदिर-मस्जिद ही हाता रहेगा। इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
इरफान हबीब से पूछा जाना चाहिए कि तुर्की में हागिया सोफिया को फिर से मस्जिद में क्यों बदल दिया गया? वह पहले चर्च था। बाद में संग्रहालय बना दिया गया। जुलाई, 2020 में उसे फिर से मस्जिद बना दिया गया है। इसकी क्या आवश्यकता थी? क्या इरफान हबीब जैसे लोग यह कहना चाहते हैं कि किसी आक्रांता की बात मत कीजिए। यदि किसी ने आपके घर पर कब्जा कर लिया है, तो क्या उसकी बात भी मत कीजिए। इरफान हबीब से यह भी पूछा जाना चाहिए कि यदि आपके घर पर कोई कब्जा कर ले तो उसे आप छोड़ देंगे? हमारे आस्था स्थलों पर कब्जा किया गया है। उन्हें मुक्त कराना हमारा दायित्व है।

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