1947 : रियासतों का एकीकरण : पटेल न होते, तो यह नक्शा न होता
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1947 : रियासतों का एकीकरण : पटेल न होते, तो यह नक्शा न होता

हैदराबाद और जूनागढ़ रियासतों ने विलय से पूर्व जिस प्रकार का बर्ताव किया था, उसे पटेल जैसे लौह पुरुष ही संभाल सकते थे।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Aug 12, 2023, 09:59 pm IST
inभारत, जम्‍मू एवं कश्‍मीर
केवडिया में सरदार पटेल की गगनचुंबी प्रतिमा

केवडिया में सरदार पटेल की गगनचुंबी प्रतिमा

देश में 562 ऐसी रियासतें छोड़ दी गईं, जिन्होंने अंग्रेज सरकार से नागरिक सेवाएं प्रदान करने तथा कर वसूलने का ‘ठेका’ जैसा लिया हुआ था। भारत के स्वतंत्रता अधिनियम-1947 में रियासतों को यह विकल्प दिया गया कि वे भारत अथवा पाकिस्तान में शामिल हो सकती हैं अथवा स्वतंत्र संप्रभु राज्य बनकर रह सकती हैं।

भारत छोड़ते हुए अंग्रेजों ने स्वतंत्र भारत के लिए अधिकतम संभव समस्याएं पैदा करने की कोशिश की। देश में 562 ऐसी रियासतें छोड़ दी गईं, जिन्होंने अंग्रेज सरकार से नागरिक सेवाएं प्रदान करने तथा कर वसूलने का ‘ठेका’ जैसा लिया हुआ था। भारत के स्वतंत्रता अधिनियम-1947 में रियासतों को यह विकल्प दिया गया कि वे भारत अथवा पाकिस्तान में शामिल हो सकती हैं अथवा स्वतंत्र संप्रभु राज्य बनकर रह सकती हैं। उस वक्त 500 से अधिक रियासतें भारत के लगभग 48 प्रतिशत भूभाग और 28 प्रतिशत जनसंख्या अपने में समेटे थीं।

भारत के पहले उपप्रधानमंत्री एवं गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल को वीपी मेनन के सहयोग से रियासतों के एकीकरण की महत जिम्मेदारी सौंपी गई। पटेल ने सबसे पहले उस वक्त के राजाओं का आह्वान किया कि वे भारत को अखंड और अक्षुण्ण बनाने के लिए गणराज्य में शामिल हों। कई रियासतों ने भारत में सम्मिलित होने को सहर्ष स्वीकृति दी, तो कुछ स्वतंत्र रहना चाहती थीं, जबकि कुछ पाकिस्तान में मिलने का मन बना रही थीं। जैसे दक्षिण तट पर त्रावणकोर। ये उन शुरूआती रियासतों में से एक थी जिसने भारत में विलय से इनकार किया था। लेकिन केरल समाजवादी पार्टी के एक कार्यकर्ता ने जब रियासत के दीवान सीपी अय्यर की हत्या का असफल प्रयास किया, तब उन्होंने भारत में शामिल होने का मन बना लिया और 30 जुलाई, 1947 को त्रावणकोर ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए।

कश्मीर के तत्कालीन राजा हरिसिंह के साथ सरदार पटेल

सरदार पटेल का मानना था कि अगर जूनागढ़ को पाकिस्तान में जाने की इजाजत दी गई तो वहां की 80 प्रतिशत बहुसंख्यक हिंदू आबादी उस फैसले को स्वीकार नहीं करेगी। तब भारत सरकार ने ‘जनमत संग्रह’ के रास्ते विलय के प्रश्न के हल का प्रस्ताव रखा।

इसी प्रकार हैदराबाद और जूनागढ़ रियासतों ने विलय से पूर्व जिस प्रकार का बर्ताव किया था, उसे पटेल जैसे लौह पुरुष ही संभाल सकते थे। इन दोनों रियासतों के विलय में पटेल ने अपनी दूरदर्शिता और भारत के प्रति असंदिग्ध निष्ठा का असाधारण परिचय दिया था। जूनागढ़ रियासत गुजरात के दक्षिण-पश्चिम में स्थित थी। वह 15 अगस्त, 1947 तक भारत का हिस्सा नहीं बनी थी। वहां की अधिकांश जनसंख्या हिंदू थी, लेकिन मुस्लिम शासक नवाब मुहम्मद महाबत खानजी ने पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला किया। उधर जूनागढ़ रियासत के अधीन दो राज्यों, मंगरोल और बाबरियावाड ने जूनागढ़ से आजाद होकर भारत में शामिल होने की घोषणा कर दी थी।

सरदार पटेल का मानना था कि अगर जूनागढ़ को पाकिस्तान में जाने की इजाजत दी गई तो वहां की 80 प्रतिशत बहुसंख्यक हिंदू आबादी उस फैसले को स्वीकार नहीं करेगी। तब भारत सरकार ने ‘जनमत संग्रह’ के रास्ते विलय के प्रश्न के हल का प्रस्ताव रखा। इधर भारत की सेनाएं मंगरोल तथा बाबरियावाड की सुरक्षा में तैनात हो चुकी थीं। अंतत: सरदार के प्रयासों से फरवरी 1948 में रियासत के लोगों ने सर्वसम्मति से भारत में शामिल होने की हामी भरी। इसी प्रकार कश्मीर रियासत के राजा हरिसिंह ने काफी जद्दोजहद, और पाकिस्तान के आक्रमण के बाद, 26 अक्तूबर,1947 को भारत के साथ ‘विलय पत्र’ पर हस्ताक्षर किए थे।

Topics: this map would not have happenedजनमत संग्रहस्वतंत्र भारतसरदार वल्लभभाई पटेलराजा हरिसिंहमुस्लिम शासक नवाब मुहम्मद महाबत खानजीIndependent IndiaSardar Vallabhbhai PatelRaja Harisinghसमाजवादी पार्टीMuslim Ruler Nawab Muhammad Mahabat KhanjiSamajwadi PartyHad Patel not been therereferendum
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