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दाखिला छात्रों का, भूमिका सबकी

बच्चों के लिए 12वीं उत्तीर्ण करने के बाद पाठ्यक्रम और संस्थान का चयन करना एक मुश्किल निर्णय होता है। उसके पूरे जीवन पर इस निर्णय का असर पड़ता है। इसलिए इस निर्णय में छात्रों, अभिभावकों, शिक्षक, परामर्शदाता और सरकार की बड़ी भूमिका है। परंतु इससे जुड़ा निर्णय बच्चे की क्षमताओं को देखकर ही लेना चाहिए

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jun 8, 2023, 10:54 am IST
inभारत, विश्लेषण, शिक्षा
अंकुर जोशी
सहायक प्रोफेसर एफएमएस विजडम बनस्थली, विद्यापीठ

अंकुर जोशी सहायक प्रोफेसर एफएमएस विजडम बनस्थली, विद्यापीठ

मां-बाप के लिए बच्चे का दाखिला कई बार तनाव और अक्सर उलझन का विषय होता है। इसका असर रिश्तों पर भी पड़ता है। इस प्रकार, सबसे महत्वपूर्ण हितधारकों में से एक होने के नाते, माता-पिता को भी इस निर्णय के लिए खुद को तैयार करना चाहिए।

अंकुर जोशी
सहायक प्रोफेसर एफएमएस विजडम बनस्थली, विद्यापीठ

जब बात पढ़ाई के अगले दौर में कदम रखने की हो तो हर छात्र को बहुत कुछ तय करना पड़ता है। विषय से लेकर पाठ्यक्रम, यूनिवर्सिटी, कॉलेज, पढ़ाई – ये सब ऐसे फैसले होते हैं, जिनका प्रभाव पूरे जीवन पर पड़ता है। इस पूरी प्रक्रिया में कई हितधारक होते हैं और सबकी भूमिका अलग-अलग, लेकिन जरूरी होती है।

छात्रों की भूमिका
अगर कोई छात्र नीचे दी गयी बातों का ध्यान रखे, तो उसके लिए निर्णय लेना आसान हो सकता है:

  •  जीवन का उद्देश्य : हम देखते हैं कि संगठनों के संस्थापक या प्रमुख संगठन की दृष्टि और उद्देश्यों के बारे में विस्तार से बताते हैं। ऐसा ही छात्रों को भी करना चाहिए। उन्हें दाखिले की काउंसलिंग करने वाले व्यक्ति से अपने जीवन के उद्देश्यों और दिलचस्पी के संबंध में अपनी बात बतानी चाहिए जिससे वह बेहतर सुझाव दे सके।
  •  छोटी-बड़ी घटनाओं को याद रखना : एक व्यक्ति जीवन में छोटे-बड़े कई निर्णय लेता है। भले ही उनमें से कई उतने महत्वपूर्ण न लगें, पर उनका मोल होता है। छात्रों को यह तथ्य याद रखना चाहिए कि बीते समय उन्हें अपने किस फैसले से फायदा हुआ और किससे नुकसान, यह बात याद रखने से सही फैसला लेने में आसानी होती है।
  •  विशेषज्ञ की राय : इस बात को लेकर आश्वस्त होने के लिए कि आप सही रास्ते पर चल रहे हैं, विशेषज्ञों की राय जरूरी होती है। इसलिए, उद्योग/शिक्षा जगत के अनुभवी लोगों से संपर्क करें। लेकिन यह भी ध्यान रखें कि विशेषज्ञों की राय हमेशा पर्याप्त नहीं होती। उभरते हुए नए क्षेत्र के बारे में लोगों की जानकारी सीमित होती है। इसलिए, अगर आपकी रुचि गैर-परंपरागत क्षेत्र में है, तो अपनी दिशा पर परंपरागत विशेषज्ञों से मुहर लगवाने की जरूरत नहीं।

 

माता-पिता की भूमिका
मां-बाप के लिए बच्चे का दाखिला कई बार तनाव और अक्सर उलझन का विषय होता है। इसका असर रिश्तों पर भी पड़ता है। इस प्रकार, सबसे महत्वपूर्ण हितधारकों में से एक होने के नाते, माता-पिता को भी इस निर्णय के लिए खुद को तैयार करना चाहिए।
अब यह चलन हो गया है कि युवा पीढ़ी निर्णय लेते समय परिवार के बजाय दोस्तों से सलाह लेने में अधिक सहज होती है। इसलिए, माता-पिता के रूप में सबसे पहले तो आपको यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए।

जब बच्चे आश्वस्त हो जाएं कि मां-बाप से सलाह करने की ‘मजबूरी’ नहीं है, तो अधिक संभावना यह होगी कि वे उनसे राय ले लें। यह सिर्फ ‘लड़कपन’ की बात है। इसलिए थोड़ी सतर्कता अपनाकर मां-बाप बच्चे के निर्णय लेने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

मां-बाप के लिए बच्चे का दाखिला कई बार तनाव और अक्सर उलझन का विषय होता है। इसका असर रिश्तों पर भी पड़ता है। इस प्रकार, सबसे महत्वपूर्ण हितधारकों में से एक होने के नाते, माता-पिता को भी इस निर्णय के लिए खुद को तैयार करना चाहिए।अब यह चलन हो गया है कि युवा पीढ़ी निर्णय लेते समय परिवार के बजाय दोस्तों से सलाह लेने में अधिक सहज होती है। इसलिए, माता-पिता के रूप में सबसे पहले तो आपको यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए।

मां-बाप को यह ध्यान में रखना चाहिए कि उद्योग क्षेत्र में लगातार बदलाव हो रहा है। नये प्रकार के करियर विकल्प तैयार हो रहे हैं। भविष्य में काम कैसा होगा, इसको लेकर अनिश्चितताएं हैं। कई जानकारों के पास भी इसका जवाब नहीं है। इसलिए आपका बच्चा भी भ्रमित होगा। ऐसे में, अगर निर्णय गलत भी हो जाए, तो भी आपके अपने बच्चे के फैसले को समर्थन और उसे सहयोग देने से उस पर बड़ा सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

उसे यह आश्वासन दें कि निर्णय सही साबित हो या गलत, आप हर स्थिति में उसके साथ हैं। यहां बच्चों को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि मां-बाप का साथ देना उनका कर्तव्य है और उनका अधिकार। मां-बाप या अभिभावकों की अपेक्षाओं पर खरा उतरना भी जरूरी है। आज लोग स्वतंत्र होने की बात करते हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि मां-बाप के साथ टकराव को स्वाभाविक मान लिया जाए। भारतीय संस्कृति और परंपराओं के अनुसार, माता-पिता की अवहेलना करने वाले व्यक्ति को भगवान भी स्वीकार नहीं करते। यह बात ‘भाषण’ लग सकती है, लेकिन यह सत्य है जिसे व्यक्ति कभी न कभी महसूस करता है।

अभिभावक ध्यान दें, यह सुझाव सरकार के लिए है ताकि व्यवस्था और बेहतर हो सके। आपके लिए तो यही सलाह है कि शिक्षा मंत्रालय, यूजीसी, एनएएसी, एआईसीटीई जैसी वेबसाटों पर जाएं ताकि संस्थान और पाठ्यक्रम के बारे में वास्तविक जानकारी मिल सके।

शिक्षक और शैक्षणिक संस्थान की भूमिका
शिक्षकों से अपेक्षित पहली और सबसे महत्वपूर्ण चीज है सच्चाई। अगर छात्र आपसे सलाह मांगते हैं तो उन्हें सच्ची सलाह दें। दरअसल शिक्षा क्षेत्र और वास्तविक वैश्विक परिदृश्य के बीच बहुत बड़ा अंतर आ गया है। छात्रों के कोर्स का चुनाव उनके 30-35 साल के करियर की दिशा तय करता है। इसलिए, अगर शिक्षक आज की जरूरत के हिसाब से पाठ्यक्रमों के बारे में जानकारी देने में सक्षम नहीं हैं, तो छात्रों को भी किसी ऐसे व्यक्ति से परामर्श लेने में हिचक नहीं होनी चाहिए जो उनके प्रश्नों का उपयुक्त जवाब दे सके।

शिक्षकों या काउंसलरों से सलाह लेना अच्छा है। लेकिन सही मार्गदर्शन तभी मिल सकेगा जब आप गहन आत्म-विश्लेषण के बाद उनके पास जाएं। कई लोगों से राय लेने में कोई हर्ज नहीं है, लेकिन सुनिश्चित करें कि इससे आपका भ्रम न बढ़े।

सरकार की भूमिका
सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों के आने से छात्रों और अभिभावकों के बीच भ्रम का स्तर काफी बढ़ गया है। कई बार माता-पिता की गाढ़ी कमाई धोखे की भेंट चढ़ जाती है। अगर धोखाधड़ी नहीं हुई, लेकिन आपने कम गुणवत्ता वाले संस्थान या फिर कम प्रासंगिकता वाले पाठ्यक्रम को चुन लिया, तो भी इससे बच्चे के भविष्य की संभावनाओं पर असर पड़ता है।

इसलिए सरकार ने संस्थानों के आकलन, उनकी रेटिंग के लिए जो विभिन्न निर्णय लिए हैं, वे सराहनीय हैं। हालांकि, इसके बारे में सुदृढ़ विश्लेषणात्मक ढांचे के आधार पर तैयार की गयी सूचना सरल शब्दों में एक ही पोर्टल पर उपलब्ध कराई जानी चाहिए। इससे मां-बाप से लेकर छात्रों, सबको निर्णय लेने में आसानी होगी।

अभिभावक ध्यान दें, यह सुझाव सरकार के लिए है ताकि व्यवस्था और बेहतर हो सके। आपके लिए तो यही सलाह है कि शिक्षा मंत्रालय, यूजीसी, एनएएसी, एआईसीटीई जैसी वेबसाटों पर जाएं ताकि संस्थान और पाठ्यक्रम के बारे में वास्तविक जानकारी मिल सके।

विशेषज्ञों से लें सलाह
दाखिले की काउंसलिंग प्रक्रिया विभिन्न हितधारकों की सक्रिय भागीदारी पर निर्भर है। छात्रों को जीवन के लक्ष्य पर विचार करना चाहिए, इसके बारे में विशेषज्ञों से बात करके आश्वस्त होना चाहिए कि वह ठीक सोच रहा है और फिर अपनी सूझ-बूझ पर भरोसा करना चाहिए। माता-पिता को खुली बातचीत का वातावरण बनाना चाहिए, बच्चे के निर्णयों का समर्थन करना चाहिए और समझना चाहिए कि रोजगार का बाजार बदल रहा है।

शिक्षकों को बच्चों को सच्ची राह दिखानी चाहिए और अगर वे ऐसा करने की स्थिति में नहीं हों तो बच्चों को किसी अनुभवी व्यक्ति के पास भेज देना चाहिए। सरकार को पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए और एकीकृत पोर्टल के माध्यम से जानकारी सुलभ करानी चाहिए। सभी हितधारकों का सहयोग छात्रों को अपनी शिक्षा और भविष्य के बारे में बेहतर निर्णय लेने में सक्षम बनाता है। ल्ल

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