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मणिपुर को आखिर किसकी नजर लग गई ?

यह बेहद दुखद स्थिति है कि भारत के ही नागरिक अपने ही देश के एक भाग में भड़की खूनी हिंसा के कारण वहां से जान बचाकर भाग रहे हैं। निश्चित रूप से यह कोई सामान्य घटना नहीं है। क्या भारत इसलिए बना था कि यहां के एक भाग में इतनी हिंसा होगी कि स्थानीय नागरिकों के साथ अन्य प्रदेशों के लोग भी वहां से जान बचाकर भागने की कोशिश करेंगे?

Written byआर.के. सिन्हाआर.के. सिन्हा
May 13, 2023, 10:26 am IST
inभारत, विश्लेषण
फाइल फोटो

फाइल फोटो

अभी गृह युद्ध में फंसे सूडान से भारतीय नागरिकों को सुरक्षित स्वदेश में वापस लाने संबंधी खबरें आनी बंद ही हुईं थीं कि मणिपुर में भड़की जातीय हिंसा के कारण वहां पर रहने वाले हजारों अन्य राज्यों के नागरिकों ने अपने प्रदेशों में जाना शुरू कर दिया। करीब-करीब सब राज्य सरकारें अपने–अपने नागरिकों को मणिपुर से निकालने के लिए विशेष विमानों की व्यवस्था कर रही है। सड़क मार्ग से कोई भी अपनी मंजिल तक नहीं जाना चाहता। सड़क मार्ग फ़िलहाल असुरक्षित माने जा रहे हैं। बेशक, ये बेहद दुखद स्थिति है कि भारत के ही नागरिक अपने ही देश के एक भाग में भड़की खूनी हिंसा के कारण वहां से जान बचाकर भाग रहे हैं। निश्चित रूप से यह कोई सामान्य घटना नहीं है। क्या भारत इसलिए बना था कि यहां के एक भाग में इतनी हिंसा होगी कि स्थानीय नागरिकों के साथ अन्य प्रदेशों के लोग भी वहां से जान बचाकर भागने की कोशिश करेंगे? इस प्रश्न पर देश के हरएक जागरूक नागरिक को विचार करना होगा।

सच पूछिए तो मणिपुर को किसी की नजर लग गई है। नॉर्थ ईस्ट का यह नन्हा सा राज्य खेलों में सारे देश के लिए उदाहरण पेश करता रहा है। यहां से महिला और पुरुष खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में देश का नाम रोशन कर रहे हैं। मणिपुर भारत के फुटबॉल के गढ़ के रूप में उभर रहा है। भारत में साल 2017 में हुए अंडर 17 विश्व कप फुटबॉल चैंपिंयनशिप आयोजित हुई थी। उस भारतीय टीम में आठ खिलाड़ी मणिपुर से थे। हालांकि माना जाता है कि भारत के फुटबॉल की राजधानी पश्चिम बंगाल है। मणिपुर से देश को मेरी कॉम तथा डिंको सिंह जैसे महान मुक्केबाज मिले हैं।

क्या मणिपुर बहुत विकसित राज्य है? नहीं। फिर भी यह खेलों में बड़े-बड़े राज्यों से आगे है। पिछले टोक्यो ओलंपिक खेलों में भारतीय खेमे से मणिपुर के खिलाड़ियों के अभूतपूर्व प्रदर्शन की गूंज को सारा देश गर्व से देख-सुन रहा है। वेटलिफ्टिंग में चानू मीराबाई के शानदार प्रदर्शन से खेलों के पहले ही दिन भारत की बोहनी भी हो गई थी। उन्होंने देश की झोली में सिल्वर मेडल डाला। सब जानते हैं कि मुक्केबाज मैरी कॉम भी मणिपुर से हैं। वे मेरे साथ राज्यसभा में भी रही हैं। आप मैरी कॉम को दादा ध्यानचंद या सचिन तेंदुलकर के कद का खिलाड़ी ही मान सकते हैं। वह छह बार विश्व चैंपियन रहीं और एक बार भारत को ओलंपिक पदक भी जितवा चुकी हैं। इन उपलब्धियों पर मैरी कॉम जितना चाहे फख्र कर सकती हैं। वे अत्यंत ही विनम्र और मिलनसार विदुषी हैं।

मणिपुर में महिला खिलाड़ियों की अभूतपूर्व उपलब्धियों से जहां सारे देश को गर्व है, वहीं ये ठोस गवाही भी है कि पूर्वोत्तर भारत नारी सशक्तिकरण के मामले में बहुत आगे बढ़ चुका है। वहां पर बहुत ही कम संसाधनों के बाद भी अभिभावक अपनी बेटियों को खेलों की दुनिया में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते ही रहते हैं। मैरी कॉम और चानू मीराबाई जैसी महिला खिलाड़ी सारे देश की आधी आबादी के लिए प्रेरणा हैं। इन सबने कठिन और विपरीत हालातों में भी अपने देश का नाम रोशन किया है। इन्होंने देश को कितने गौरव और आनंद के लम्हें दिए, इसका अंदाजा तो शायद इन्हें भी नहीं होगा। ओलंपिक जैसे मंच पर अपनी श्रेष्ठता को साबित करना कोई सामान्य उपलब्धि तो नहीं है।

आप अपने करियर की रेस में सफल होते हैं, तो आप एक तरह से अपना और अपने परिवार का ही भला करते हैं। इस बीच मणिपुर के पहले नामवर मुक्केबाज डिंको सिंह थे उन्होंने 1997 में बैंकॉक में किंग्स कप जीता, वह भारतीय नौसेना में थे। उन्हें 1998 में थाईलैंड में बैंकाक एशियाई खेलों में मुक्केबाजी स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने के लिए जाना जाता है। यह दुर्भाग्य है कि उनका कुछ समय पहले कैंसर से निधन हो गया था। मणिपुर में ताजा हिंसा चूरचंद्र जिले में हुई है। इस जिले का नाम उस महान विभूति के नाम पर है जिसने मणिपुर में खेलों को बढ़ावा देने की नींव रखी थी। राजा चूरचंद्र सिंह ने खेलों को बढ़ाने के लिए कई स्तर पर प्रतियोगिताओं का आयोजन किया और मुफ़्त में खेल के पुरस्कार भी बाँटें। मणिपुर के खून में खेल है। मणिपुर में कई स्थानीय देवी-देवता हैं, जिनके नाम से जितने भी त्यौहार मनाए जाते हैं, उन अवसरों में भी खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन होता है।

इस बीच, शेष पूर्वोत्तर राज्यों की तरह मणिपुर भी हिंदी सीख रहा है। वहां पर हिंदी समझने, जानने वाले तथा बोलने वाले लोगों की संख्या पर्याप्त हैं। दरअसल पूर्वोत्तर राज्यों में हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार में केन्द्रीय हिन्दी संस्थान का योगदान भी उल्लेखनीय रहा है। संस्थान के तीन केन्द्र गुवाहाटी, शिलांग तथा दीमापुर में सक्रिय हैं। ये तीनों केन्द्र अपने-अपने राज्यों में हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार के विशेष कार्यक्रम चलाते हैं। मणिपुर में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ओर से सन् 1928 से हिन्दी का प्रचार-कार्य शुरू हो गया था। कुछ वर्षों बाद राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा ने अपनी शाखा मणिपुर में खोली। यहां इम्फाल के हिन्दी प्रेमियों ने मिलकर 7 जून, सन 1953 को ‘मणिपुर हिंदी परिषद’ की स्थापना की। मणिपुर की दूसरी प्रमुख हिन्दी संस्था का नाम ‘मणिपुर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ है।

अब जरा सोचिए कि इस तरह के आदर्श राज्य में हिंसा का होना कितना दुखद है। मणिपुर में फिर से शांत की बहाली तुरंत होनी चाहिए। राज्य में 1993 के बाद इतनी भीषण हिंसा हुई है। तब एक दिन में 100 से ज्यादा लोगों को मार दिया गया था। अब करीब 60 मौतें हो चुकी हैं। राज्य के सभी प्रमुख समुदायों के नेताओं को अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए प्रदेश में शांति बहाल करने में सरकार को साथ देना होगा। हिंसा से कुछ मिलने वाला नहीं है। अगर राज्य में लगातार अशांति और हिंसा जारी रही तो राज्य कहीं का नहीं रहेगा। उधर, सरकार को राज्य के सभी समुदायों के हक में काम करना होगा। सरकार को अपनी नीतियों से साबित करना होगा कि वह सभी वर्गों को लेकर एक समान राय रखती है। उसके लिए सब ही विशेष हैं।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं) 

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