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ब्रिटेन में हिन्दू्फोबिया

ब्रिटेन में हिंदुओं के प्रति बढ़ती नफरत की जड़ संभ्रांत अंग्रेजों की वह कलुषित मानसिकता है, जो हिंदुओं और उसके धर्म से घृणा तथा चर्च व इस्लाम का महिमामंडन करते थे। अब वामपंथी, पाकिस्तानी मुस्लिम, खालिस्तानी समर्थक और चर्च घृणा की उसी ‘परंपरा’ को आगे बढ़ा रहे हैं

Written byप्रवीण लिंगमप्रवीण लिंगम
May 13, 2023, 12:03 pm IST
in विश्व
लंदन में द गार्जियन के कार्यालय के सामने प्रदर्शन करते हिंदू समुदाय के लोग

लंदन में द गार्जियन के कार्यालय के सामने प्रदर्शन करते हिंदू समुदाय के लोग

ब्रिटिश थिंक टैंक हेनरी जैक्सन सोसाइटी ने हिंदू युवाओं के साथ होने वाले भेदभाव को लेकर पहला राष्ट्रीय अध्ययन किया है। इसमें यह जानने की कोशिश की गई है कि हिंदू विरोधी नफरत कैसी दिखती है

ब्रिटेन में हिंदुओं के विरुद्ध नफरत और अपराध लगातार बढ़ रहा है। ब्रिटेन की हिंदू गृह मंत्री प्रीति पटेल और पूर्व प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन को एक कार्टून में गाय-बैल के रूप में दर्शा कर उनका उपहास, आक्सफोर्ड यूनियन में भारतीय छात्रा रश्मि सावंत पर नफरती हमला, लीसेस्टर में मुसलमानों की हिंदुओं के साथ की गई हिंसा और न्यू लंदन स्कूल आफ इकोनॉमिक्स के छात्र करण कटारिया को निशाना बनाने तक, सभी अपराधों में नस्लीय टिप्पणी कर अपमानित करने से लेकर हिंदुओं की संपत्ति व धार्मिक संस्थानों में तोड़-फोड़ भी शामिल है।

ब्रिटेन के गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2017-18 में इंग्लैंड में हिंदुओं के विरुद्ध घृणा से जुड़े अपराधों की संख्या 58 थी। 2018-19 और 2019-20 में यह बढ़कर 114 और 2020-21 में 166 हो गई यानी महज 4 वर्ष में हिंदू विरोधी अपराधों में लगभग 200 प्रतिशत की वृद्धि हुई। हिंदूफोबिक गतिविधियों के दायरे में हिंदुओं के पवित्र स्थलों में तोड़-फोड़ और उन्हें अपवित्र करना, जबरन कन्वर्जन, सामुदायिक संस्थानों-संगठनों पर लक्षित हिंसा और उनका अस्तित्व मिटाने के लिए नरसंहार आदि आते हैं।

हिंदुओं से भेदभाव पर पहली रिपोर्ट
ब्रिटिश थिंक टैंक हेनरी जैक्सन सोसाइटी ने हिंदू युवाओं के साथ होने वाले भेदभाव को लेकर पहला राष्ट्रीय अध्ययन किया है। इसमें यह जानने की कोशिश की गई है कि हिंदू विरोधी नफरत कैसी दिखती है और शुरुआत में स्कूलों में हिंदू विद्यार्थियों के विरुद्ध भेदभाव की व्यापकता को देखते हुए यह ब्रिटेन में किस हद तक प्रकट हो रही है। इंग्लैंड के विद्यालयों में 16 वर्ष की आयु तक धार्मिक शिक्षा (रिलीजियस एजुकेशन) अनिवार्य है। जनरल सर्टिफिकेट आफ सेकेंडरी एजुकेशन पाठ्यक्रम के तहत इसे परीक्षा मॉड्यूल के रूप में लेने का विकल्प है। रिपोर्ट का विश्लेषण देशभर के 1,000 स्कूलों से सूचना की स्वतंत्रता (एफओआई) के अनुरोधों और स्कूली बच्चों के अनुभव के बारे में 988 अभिभावकों के सर्वेक्षण परिणामों पर आधारित है।

सर्वेक्षण में 51 प्रतिशत हिंदू अभिभावकों ने कहा कि उनके बच्चों ने स्कूलों में घृणा का सामना किया, जबकि 1 प्रतिशत से भी कम स्कूलों ने बीते 5 वर्षों में हिंदू विरोधी घटनाओं की सूचना दी। कुछ का कहना है कि विद्यालयों में हिंदू धर्म के बारे में पढ़ाया जाने वाला पाठ भी हिंदू विद्यार्थियों के प्रति धार्मिक भेदभाव को बढ़ावा देने का कारण बन रहा है। सर्वेक्षण में शामिल 19 प्रतिशत हिंदू अभिभावकों का मानना है कि विद्यालय हिंदू-विरोधी नफरत की पहचान करने में सक्षम हैं। वहीं, सर्वेक्षण में शामिल 15 प्रतिशत हिंदू अभिभावकों ने माना कि हिंदू-विरोधी घटनाओं पर विद्यालय गंभीरता से कार्रवाई करते हैं और उन पर उचित नियंत्रण रखने का प्रयास करते हैं।

विद्यार्थियों पर कन्वर्जन का दबाव
हिंदू-विरोधी नफरत के पीछे कई विचारधाराएं काम करती हैं। हिंदू छात्रों पर रंगभेदी छींटाकशी की जाती है। ईसाई सहपाठी कहते हैं कि वे चर्च में प्रवेश नहीं कर सकते है, जबकि मुस्लिम सहपाठी कन्वर्जन का दबाव बनाते हैं। वे कहते हैं कि कन्वर्ट हो जाने के बाद ‘सब ठीक हो जाएगा।’ सर्वेक्षण के अनुसार, अधिकतर हिंदू बच्चों के माता-पिता का मानना है कि पाठ्यपुस्तकों में हिंदू धर्म को जिस तरीके से पढ़ाया जा रहा है, समस्या वहीं से शुरू हुई है। उन्होंने खासतौर से विद्यालयों में पढ़ाए जा रहे हिंदू धर्म के पाठ पर चिंता जताई है। दरअसल, हिंदू धर्म को अब्राहमिक मान्यताओं के चश्मे से पढ़ाया जाता है, जो कहता है ‘ईश्वर’ एक है और हिंदू धर्म के बहु-ईश्वरवादी चिंतन के मूल भाव को समझे बगैर उसकी सतही व्याख्या की जाती है।

हिंदू-विरोधी नफरत अंग्रेजी-भाषी दुनिया में हिंदुओं और हिंदू धर्म के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसत औपनिवेशिक दृष्टिकोण से जन्मी है। अंग्रेज शिक्षकों को हिंदू धर्म के मूल चिंतन और सारगर्भित ज्ञान कोश की समझ नहीं है। रिपोर्ट की लेखिका शार्लोट लिटिलवुड का कहना है कि बीते वर्ष 7 अगस्त को दुबई में आयोजित एशिया कप में भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच के दौरान लीसेस्टर में हिंदू-मुस्लिम हिंसा का विश्लेषण करते समय उनका ध्यान विद्यालयों पर गया। रिपोर्ट में इसे भी रेखांकित किया गया है कि ब्रिटेन के विद्यालय हिंदू-विरोधी नफरत की पहचान करने और इसकी रोकथाम में न तो सक्षम हैं और न ही इसके लिए तैयार हैं।

अप्रैल 2023 में करण कटारिया ने इस बात पर प्रकाश डाला कि ब्रिटेन के कॉलेजों में हिंदूफोबिया फैला हुआ है। लंदन स्कूल आफ इकोनॉमिक्स में मास्टर्स इन लॉ की पढ़ाई करते हुए उन्होंने दावा किया कि उन्हें ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ होने के कारण महासचिव पद के चुनाव के लिए अयोग्य ठहराया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि परिसर में धर्म के आधार पर भारी भेदभाव है और खुलेआम भारत विरोधी बयानबाजी होती रहती है। इससे पहले, आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी छात्र संघ की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष रश्मि सामंत को उनके धर्म के कारण बदनाम किया गया। उन्हें अपने पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया था। हालांकि, बाद में आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा की गई एक आंतरिक जांच में उन्हें सही ठहराया गया। इस तरह ब्रिटिश थिंक टैंक की रिपोर्ट ने एक ज्वलंत मुद्दा खड़ा किया है। यदि बच्चे विद्यालय जाने से डर रहे हैं तो इसे बिल्कुल भी स्वीकार नहीं किया जा सकता, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो। इस रिपोर्ट पर अभी तक विद्यालयों के अधिकारियों की ओर से कोई टिप्पणी नहीं आई है। लेकिन हिंदू धर्म के पाश्चात्य विश्लेषण पर सवाल उठाते हुए पाठ्यक्रम में सुधार की मांग की मांग तेज हो रही है। ब्रिटेन के स्कूलों में ‘हिंदूफोबिया’ पर हेनरी जैक्सन की रिपोर्ट को सिफारिशों के साथ शिक्षा सचिव को भेजा जाएगा।

पहले के सर्वेक्षण और रिपोर्ट

1928 इंस्टीट्यूट ने आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर ब्रिटिश भारतीयों पर एक सर्वेक्षण किया था। इसमें 80 प्रतिशत लोगों ने कहा कि भारतीय होने के कारण उन्होंने पूर्वाग्रह से ग्रस्त व्यवहार और सबसे ज्यादा हिंदूफोबिया का सामना किया। ब्रिटेन की लेबर पार्टी के सासंदों के समाजवादी अभियान समूह के सदस्य नवेंदु मिश्रा ने इस रिपोर्ट को प्रारंभिक दिन के प्रस्ताव के तौर पर पेश किया था। इस पर अब तक 45 सांसद हस्ताक्षर कर चुके हैं।

अमेरिका स्थित नेटवर्क कॉन्टैगियन रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनसीआरआई) की रिपोर्ट, ‘साइबर सोशल स्वार्मिंग प्रिसीड्स रियल वर्ल्ड राइट्स इन लीसेस्टर:  हाउ सोशल मीडिया बिकेम ए वेपन फॉर वायलेंस’ में संक्षेप में बताया गया है कि, ‘विभिन्न विचारधारा वाले लोगों के बीच हिंदुओं के विरुद्ध फैलती नफरत के तहत हिंदुओं को विधर्मी बताना, उन्हें दुष्ट, गंदे, अत्याचारी, नरसंहारक या विश्वासघाती कहना जैसे रुझान दिख रहे हैं।’ इसमें यह रेखांकित किया गया है कि हिंदुओं के लिए ‘गो मूत्र पीने वाला’ जैसे अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया जाता है। उनका उपहास उड़ाने के लिए बहुदेवतावाद, शाकाहार, शारीरिक कमजोरी, हिंदू देवताओं और प्रतीकों के संदर्भों का उल्लेख किया जाता है।

अमेरिका में जॉर्जिया विधानसभा ने भी एक प्रस्ताव पारित कर हिंदूफोबिया व हिंदू-विरोधी कट्टरता की निंदा की है। इस तरह की विधायी कार्यवाही करने वाला अमेरिका का यह पहला राज्य है। प्रस्ताव में इस पर प्रकाश डाला गया है कि हिंदू धर्म विविधताओं वाला धर्म है, जिसके दुनियाभर में 1.2 बिलियन से अधिक अनुयायी हैं। इसमें सम्मति के महत्व, आपसी सम्मान व शांति के मूल्यों को प्रमुखता दी जाती है। प्रस्ताव में विज्ञान, चिकित्सा, इंजीनियरिंग व आतिथ्य जैसे क्षेत्रों में अमेरिकी हिंदू समुदाय के योगदान की सराहना की गई है। इसके अलावा, योग, ध्यान, आयुर्वेद, संगीत और कला के क्षेत्र में किए गए योगदान को भी स्वीकार किया गया है, जिसने अमेरिकी संस्कृति को समृद्ध किया है। प्रस्ताव में देश के कई हिस्सों में हिंदू अमेरिकियों के विरुद्ध हुए नफरती अपराधों को स्वीकार करते हुए कहा गया है कि हिंदूफोबिया को कुछ शिक्षाविद् संस्थागत तरीके से उकसा रहे हैं, जिनका लक्ष्य हिंदू धर्म को समाप्त करना है। ये लोग हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथों, सांस्कृतिक प्रथाओं पर हिंसा और उत्पीड़न को बढ़ावा देने के आरोप लगाते हैं।

पूर्व में हुए कुछ नफरती अपराध
सितंबर 2022 में लीसेस्टर में एक हिंसक झड़प हुई थी, जिसकी आंच बर्मिंघम तक पहुंच गई थी। इस दौरान हिंदुत्व से जुड़ी झूठी कहानियां गढ़कर सामुदायिक तनाव बढ़ाया गया और त्योहारों को ‘हिंदुत्व अतिवाद’ और ‘हिंदू आतंकवाद’ के रूप में प्रचारित कर युवाओं को हिंसा के लिए उकसाया गया। हिंदुओं पर हमले किए गए, मंदिरों व संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया। इससे पूर्व साध्वी ऋतंभरा एक सभा को संबोधित करने के लिए लंदन जाने वाली थीं, लेकिन व्यापक विरोध के कारण उन्हें यात्रा रद्द करनी पड़ी। इसी तरह, 2021 में आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी यूनियन की अध्यक्ष चुने जाने पर रश्मि सामंत को निशाना बनाया गया। इससे कुछ समय पहले रश्मि ने सोशल मीडिया पर ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध विचार व्यक्त किए थे।

इसे लेकर वामपंथियों और इस्लामवादियों ने उन्हें बहुत परेशान किया। उनकी सोशल मीडिया पोस्ट को नस्लभेदी, यहूदी विरोधी, इस्लामोफोबिक और ट्रांसफोबिक करार दिया गया। उन्हें हिंदू होने के कारण खासतौर से निशाना बनाया गया। उनके विभाग के एक सदस्य डॉ. अभिजीत सरकार ने रश्मि के माता-पिता को भी विवाद में घसीट लिया था। उनके सोशल मीडिया अकाउंट पर लगी भगवान श्री राम की तस्वीर के कारण उनके परिवार पर आरोप लगाया गया कि छात्र परिषद चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रश्मि को वित्तीय सहायता दी। इस प्रताड़ना के कारण रश्मि को विश्वविद्यालय ही नहीं, बल्कि देश छोड़ने के लिए भी मजबूर होना पड़ा। 2008 में नरेंद्र मोदी का ब्रिटिश वीजा रद्द करवाने के पीछे ऐसी ही लॉबी सक्रिय थी।

कौन हैं नफरत फैलाने वाले?

स्कूलों और कॉलेजों में हिंदुओं के विरुद्ध नफरत फैलाने वालों में पाकिस्तानी मुस्लिम, खालिस्तान समर्थक, चर्च शामिल हैं। चर्च के अनुयायी हिंदुओं के घर जाकर उन्हें बहला-फुसलाकर या उनका जबरन कन्वर्जन करते हैं। इसमें कुछ गैर-हिंदू शिक्षक भी शामिल हैं, जिन्हें हिंदू धर्म की जानकारी नहीं है। यदि है भी तो बहुत कम। ये शिक्षक गोरे छात्रों को हिंदू धर्म के बारे में उलटा-सीधा पाठ पढ़ाते हैं, जिसके कारण वे हिंदू छात्रों पर फब्तियां कसते हैं और उनसे नफरत भरा व्यवहार करते हैं।

दरअसल, 200 से अधिक वर्षों तक ब्रिटेन के प्रभावशाली लोगों के मन में हिंदुओं के प्रति नफरत भरी रही। हिंदुओं के विरुद्ध नफरत और अपराध की मूल जड़ यही है। हिंदू विरोधी एजेंडे का जन्मदाता जेम्स मिल्स था। 1817 में उसकी किताब ‘द हिस्ट्री आॅफ ब्रिटिश इंडिया’ को हैलेबरी कॉलेज के पाठ्यक्रम में काफी महत्व दिया गया। इस कॉलेज में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासनिक अधिकारियों को पढ़ाया जाता था। मिल्स लिखता है, ‘‘हिंदू कपट व झूठ से भरे हुए हैं, इसलिए उनका दमन उनकी सार्वभौमिक नियति है। किसी अन्य जाति के लोगों के मुकाबले ऊंचाई तक पहुंचने के लिए वे अपने झूठ की बुराइयों के अंबार को ही जरिया बनाते हैं। किसी ने भी ब्रह्मांड की इतनी बेढ़ब और घृणित तस्वीर नहीं खींची, जितनी हिंदुओं के ग्रंथों में प्रस्तुत की गई है।’’

मिल्स को इस्लाम में कोई बुराई नजर नहीं आती थी। उसका कहना था कि इस्लाम के बारे में बताने के लिए ‘‘ज्यादा शब्दों की आवश्यकता ही नहीं है; क्योंकि रिलीजन के मामले में मुसलमानों की श्रेष्ठता निर्विवाद है।’’ 1857 के विद्रोह के बाद हिंदू धर्म को खत्म करने का आह्वान किया गया था। बैपटिस्ट उपदेशक चार्ल्स स्पर्जन ने क्रिस्टल पैलेस में एकत्रित 25,000 लोगों की एक सभा में कहा था, ‘‘ईश्वर की दृष्टि में हिंदुओं का धर्म ऐसा है, जिसका पतन भारत के ही शासकों द्वारा होना तय है।’’ अंग्रेजों ने भारत तो छोड़ दिया, लेकिन हिंदुओं के प्रति उनकी नफरत बनी रही

चर्चिल ने भी किया हिंदुओं का अपमान
फरवरी 1945 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल अपने सचिव जॉन कोलविले और एयर चीफ मार्शल सर आर्थर हैरिस के साथ रात्रिभोज कर रहे थे। उस समय चर्चिल ने जो कहा उसे कोलविले ने अपनी डायरी में लिखा है। कोलविले लिखता है, ‘‘प्रधानमंत्री ने कहा कि हिंदू एक बुरी नस्ल है और वे चाहते थे कि बर्ट हैरिस उन्हें नष्ट करने के लिए अपने कुछ अतिरिक्त बमवर्षक विमानों को भेज दें।’’ चर्चिल ने इससे पहले भी हिंदुओं का अपमान किया था। उस रात्रिभोज के तीन वर्ष पूर्व चर्चिल ने लंदन में सोवियत के राजदूत इवान मिखाइलोविच मैस्की से कहा था कि क्या अंग्रेजों पर भारत छोड़ने के लिए दबाव बनाना सही है? आखिरकार, ‘‘मुसलमान मालिक बन जाएंगे, क्योंकि वे योद्धा हैं, जबकि हिंदू हवा के बुलबुले हैं। हिंदू ‘हवा में महल’ बनाने में माहिर हैं। जब किसी बात को जल्दी तय करने, लागू करने या निष्पादित करने की बात आती है तो हिंदू ‘मुझसे नहीं होगा’ कह कर पलायन कर जाते हैं। यही पर उनकी आंतरिक निष्क्रियता प्रकट होती है।’’

चर्चिल के विचार बेवर्ली निकोल्स की 1944 की पुस्तक ‘वर्डिक्ट आन इंडिया’ से प्रभावित थे। निकोल्स नाजियों के प्रति सहानुभूति रखने वाला व्यक्ति था। उसने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की छवि खराब करने के लिए एक पुस्तक लिखी थी, जो उस दौरान ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलन कर रही थी। निकोल्स का उद्देश्य हिंदू हितों को ध्वस्त करना था। इसलिए आज जो हिंदू विरोधी भावनाएं उभरती दिख रही हैं, वह भारतीय समाज और परंपराओं को मलिन करने की एक लंबी गाथा की कड़ियां हैं।

 

ब्रिटिश हिंदू समुदाय चिंतित
वर्तमान स्थिति पर ब्रिटिश हिंदू समुदाय बहुत चिंतित है। समुदाय ने अपने प्रति नफरत और हिंसा के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने के लिए ब्रिटेन सरकार से गुहार लगाई है। इस याचिका को लेकर अभी हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है। इसमें कहा गया है कि ब्रिटिश हिंदू समुदाय के साथ होने वाले अपराधों, हिंदू विरोधी प्रचार और नफरती हिंसा संबंधी मामलों की जांच की जाए। समुदाय ने एक संसदीय समिति बनाने का अनुरोध किया है, जिसके तहत निम्नलिखित कार्य चिह्नित किए गए हैं-

६ हिंदू हितधारकों और नीतियों के प्रस्तावों के साथ मुद्दों व चिंताओं पर चर्चा करने के लिए एक क्रॉस-गवर्नमेंट एंटी-हिंदू हेट्रेड वर्किंग ग्रुप का गठन।

६ ब्रिटेन में हिंदू समुदाय पर हाल के हमलों के दौरान उचित और समय पर कार्रवाई की गई या नहीं, इसकी जांच की जाए।
रश्मि सामंत मामले में देशभर के 300 से अधिक सदस्य संगठनों के साथ ब्रिटिश हिंदुओं की सबसे प्रमुख संस्था, हिंदू फोरम आफ ब्रिटेन ने आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से कहा कि डॉ. ए. सरकार के विरुद्ध सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में किसी को ऐसी अपमानजनक और अन्यायपूर्ण स्थिति से न गुजरना पड़े जैसा कि रश्मि सामंत को आक्सफोर्ड में झेलनी पड़ी। ब्रिटेन की हिंदू काउंसिल का मुख्य उद्देश्य नीतिगत मामलों में ब्रिटेन के हिंदुओं की आवाज को तत्कालीन सरकार तक प्रभावी तरीके से पहुंचाना व ब्रिटेन में प्रमुख मत-मजहब के बीच आपसी समझ को बढ़ाना है। इसने ‘हिंदू-विरोधी’ गतिविधियों पर चिंता जताते हुए कहा कि इस मुद्दे को गंभीरता से लेने की जरूरत है।

एक रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन में 80 प्रतिशत हिंदू हिंदूफोबिया के शिकार हैं

हिंदू-विरोधी नफरत एक बहुआयामी भावना है, जिसके पीछे कई विचारधाराएं काम करती हैं। हिंदू विद्यार्थियों पर रंगभेदी छींटाकशी की जाती है। ईसाई सहपाठी उन पर फब्तियां करते हैं कि वे चर्च में प्रवेश नहीं कर सकते, जबकि मुस्लिम सहपाठी कन्वर्जन का दबाव बनाते हैं

हिंदू काउंसिल ब्रिटेन के संस्थापक सदस्य अनिल भनोट कहते हैं, ‘‘हम अपने कर्तव्य की जिम्मेदारी लेते हैं और जहां हमें बदलने की जरूरत होती है, हम ऐसा करने की कोशिश करते हैं, लेकिन जहां लोग हम पर हमला करते हैं, वहां हमें उनके हिंदू विरोधी एजेंडे या प्रचार का डटकर सामना करना होगा।’

घृणा का व्यावहारिक कारण
ब्रिटेन में जिन वजहों से घृणा का माहौल उपजा, उन्हें परिभाषित करना मुश्किल नहीं। वैश्विक व्यापार, वाणिज्य, प्रौद्योगिकी और शिक्षाविदों पर भारतीयों का बढ़ता प्रभाव, हीन भावना से ग्रस्त प्रतिद्वंद्वी समुदायों के गले की फांस बन गया है। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि फॉर्च्यून 500 की शीर्ष कंपनियों के लगभग 30 प्रतिशत सीईओ भारतीय मूल के हैं। वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का करीब 15 प्रतिशत उन कंपनियों द्वारा उत्पादित किया जा रहा है, जिसके प्रबंधक या मालिक भारतीय हैं।

पश्चिम के शीर्ष शैक्षणिक संस्थानों में 10 प्रतिशत से अधिक फैकल्टी में भारतीय मूल के लोग काम कर रहे हैं। इस साल संडे टाइम्स द्वारा जारी अमीरों की सूची में ब्रिटिश हिंदू सबसे ऊपर हैं। हिंदू कई प्रमुख राजनीतिक और प्रशासनिक पदों पर हैं। हिंदू सहिष्णुता और बहुलवाद का पालन करते हैं, जिसकी राह स्वामी विवेकानंद ने दिखाई थी। स्वामी जी ने अमेरिका में कहा था, ‘‘ईसाई धर्म जैसे सभी धर्मों का दोष यह है कि उनके पास सभी के लिए तय नियम हैं। लेकिन हिंदू धर्म धार्मिक आकांक्षाओं और प्रगति के सभी स्तरों के अनुकूल है। इसमें सभी आदर्श अपने पूर्ण रूप में समाहित हैं।’’

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