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बजरंग दल पर प्रतिबंध : उल्टा पड़ा दांव

गरीब के लिए समाजवाद, शाही खानदान के लिए सत्ता, वोट के लिए जाति और जीत की गारंटी के लिए गट्ठा ‘अल्पसंख्यक’ वोट. कर्नाटक कांग्रेस का चुनावी घोषणापत्र और उसमें बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने की बात कांग्रेस के मनोविज्ञान और चुनावशास्त्र का कच्चा चिट्ठा है. दांव उलटा पड़ गया है.

Written byप्रशांत बाजपेईप्रशांत बाजपेई
May 6, 2023, 03:27 pm IST
in भारत, कर्नाटक
दिल्ली में कांग्रेस कार्यालय के बाहर प्रदर्शन करते बजरंग दल के कार्यकर्ता

दिल्ली में कांग्रेस कार्यालय के बाहर प्रदर्शन करते बजरंग दल के कार्यकर्ता

जब कांग्रेस दारा बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने का चुनावी वादा सब ओर सुर्ख़ियों में छा रहा था तभी कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री वीरप्पा मोइली का बयान आया कि ऐसा प्रतिबंध लगाना राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में ही नहीं है. ये बयान हवा का रुख बता रहा है. लेकिन तीर तो तरकश से निकल चुका है. पृष्ठभूमि में एक लंबा सफ़र है.

ओसीडी नाम की एक बीमारी होती है. पूरा नाम है ऑब्सेसिव कम्पल्सिव डिसऑर्डर. यह एक मानसिक, आदतन बीमारी है जिससे पीड़ित व्यक्ति के अंदर किसी काम को बार बार दोहराए चले जाने की सनक या मानसिक मजबूरी होती है. कांग्रेस पार्टी भी तुष्टीकरण की ओसीडी का शिकार है. वर्षों की जातिवादी राजनीति, भ्रष्टाचार के गगनचुंबी बुर्जों और तुष्टीकरण के इतिहास सिद्ध ख़ास कांग्रेस मार्का ब्रांड ने उसे चुनावी दंगल में बार-बार औंधे मुँह पटका है. भ्रष्टाचार के हर प्रकार पर उसकी ‘मूल निर्माता’ वाली छाप लगी है. वंशवाद ने उसे केंद्र से लेकर राज्यों तक खोखला कर दिया है. अपने ही नेताओं को निपटाने का उसका दशकों का अभ्यास है. गवर्नेंस का उसका कोई अभ्यास नहीं है. ऊपर से टीवी और सोशल मीडिया का ये अभूतपूर्व दौर, जिसमें हर बात को उघाड़ने का चाव और क्षमता है, जिसके चलते राहुल गांधी की दर्जनों लॉन्चिंग असफल हो चुकी हैं. यहां तक कि बरसों से कांग्रेस द्वारा पोसा गया इको सिस्टम और जॉर्ज सॉरोस जैसों का अकूत धन और साधन भी बेअसर साबित हो रहे हैं, ऐसे में बदहवास हुई पार्टी बार-बार तुष्टीकरण के बिल में जा घुसती है.

गरीब के लिए समाजवाद, शाही खानदान के लिए सत्ता, वोट के लिए जाति और जीत की गारंटी गट्ठा वोट. दशकों तक कांग्रेस का ये सफल चुनावशास्त्र काम करता रहा. फिर इसमें सेंध लगाने वाले स्थानीय दल खड़े हो गए. कांग्रेस उनके हाथों जमीन खोती गई. जाति के गणित में स्थानीय खिलाड़ी ज्यादा तगड़े साबित हुए. उत्तरप्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, आंध्र जैसे राज्य उसके हाथों से फिसले. समाजवादी मॉडल के प्रतिस्पर्धी खड़े हुए, फिर सब ओर से मुफ्त योजनाओं की बौछार होने लगी. उधर, 2009 के आम चुनावों का चमत्कारी दाँव बताई गई मनरेगा जैसी योजना कांग्रेस के पिछले सात दशकों के “गरीबी हटाओ” अभियान के लिए प्रश्नचिन्ह बन गई. जाति और क्षेत्रीयता के मैदान के खिलाड़ी गट्ठा वोट के मैदान में बहुत पहले ही कूद चुके थे, इसलिए ‘अल्पसंख्यक” वोटों के लिए “सेकुलर खेमा” आपस में जूझ पड़ा.

कांग्रेस ने देश में एक सोच को स्थापित किया था कि मुस्लिम तुष्टीकरण एक सहज, स्वाभाविक बात है और हिंदू पहचान, हिंदू होने का अहसास साम्प्रदायिकता है. इसलिए इस धर्मप्राण देश को “सेकुलर” बनाया गया, और इसकी हर पहचान छिपाने-मिटाने-नकारने की चीज हो गई. भारत के इतिहास को तोड़ने मरोड़ने और भारतीयों को झूठ पढ़ा-सुना-दिखाकर हताश करने का ठेका कम्युनिस्टों को दिया गया. हज सब्सिडी अधिकार बन गई और राम जन्मभूमि को वापस मांगना अपराध हो गया. जम्मू-कश्मीर को 370 की बेड़ियों में कस दिया गया, संविधान की मूल भावना को चुनौती देते हुए मुस्लिम पर्सनल लॉ को मान्यता और महिमा दी गई. अल्पसंख्यक आरक्षण का दांव खेला गया. देश में कहीं भी, किसी भी जमीन पर वक्फ बोर्ड दावा और कब्जा कर सके, इसकी छूट देने वाला वक्फ बोर्ड क़ानून केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने बनाया. हिंदुओं का दमन करने का कानूनी लाइसेंस देने वाला क़ानून “सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा विधेयक” लाने की कोशिश मनमोहन सरकार द्वारा की गई. बंग्लादेशी घुसपैठ को रोकने के नाम पर जो आईएमडीटी एक्ट कांग्रेस सरकार ने बनाया था, उसे सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहते हुए निरस्त किया कि यह एक्ट तो घुसपैठियों की मदद के लिए बनाया गया लगता है.
ये सारे काम और इसके अलावा और भी अनेक हथकंडे वोटबैंक के लिए अपनाए जाते रहे. 2014 का सत्ता परिवर्तन कांग्रेस व उसके सहयोगी दलों तथा उसके कई साथी प्रतिस्पर्धियों के लिए बहुत बड़ा झटका था. दस सालों से यूपीए गठबंधन सत्ता में था. 2013 -14 आते-आते कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के अंदर ये अहसास आने लगा था कि जनता का मिजाज, वोटों के उनके गणित से मेल नहीं खा रहा है, पर उन्हें अंत तक इस बात का पक्का भरोसा था कि भले ही कांग्रेस सत्ता से बाहर हो जाए, लेकिन सत्ता की चाबियाँ उसके ही हाथ रहेंगी. अनेक नामी लेखकों ने कांग्रेस के नेताओं से इस संदर्भ में हुई चर्चाओं का वर्णन किताबों में किया है.

2014 के बाद आवरण को बदलने की कवायद शुरू हुई. राहुल गांधी धोती पहने, त्रिपुंड लगाए दिखने लगे. मंदिर जाने लगे. “जनेऊधारी” हो गए. इसके विपरीत कांग्रेस पहले से कहीं ज्यादा कम्युनिस्ट एक्टिविस्टों और योजनाकारों के हाथ चली गई और बुजुर्ग नेता बागी होते गए. योजना थी कि हिंदू दिखते हुए मुस्लिम वोटबैंक को और शिद्दत से फुसलाया जाए, और हिंदू वोट को बारीकी से पीसा जाए. लेकिन समय का फेर कि दाँव उलटे पड़े, और दिन पर दिन उलटे पड़ रहे हैं.

मोदी का कद और मोदी की अपील कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी जमीनी चुनौती बनी हुई है लेकिन कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या ये है कि जंग का मैदान मोदी तय करते हैं, और उसे अपनी शर्तों पर लड़ने के लिए मजबूर करते हैं. हवा की दिशा को भांपने में मोदी और उनकी टीम का कोई सानी नहीं है. बजरंगदल पर प्रतिबंध के मुद्दे को मोदी ने कांग्रेस पर हमले का हथियार बना लिया. कर्नाटक कांग्रेस के चुनावी कागजों से निकले इस मुद्दे ने देश में जगह बना ली है. लोग इसकी चर्चा ही नहीं कर रहे कि बजरंगदल और पीएफआई में कोई समानता है या नहीं, जैसी कि कांग्रेस को उम्मीद थी. बहस कांग्रेस की मानसिकता और इरादों पर हो रही है.

कर्नाटक में पूर्व की कांग्रेस सरकार द्वारा 4 प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण का मामला भी गरमा गया है. कांग्रेस और उसके सेकुलर साथियों व प्रतिस्पर्धियों के लिए नई परेशानी और हताशा ये है कि हिंदू मतदाता जो पहले मुस्लिम आरक्षण व अन्य “सेकुलर” हरकतों के प्रति उदासीन रहता था, अब प्रतिक्रिया देने लगा है. उसी हताशा में से निकलते हैं, “लिंचिस्तान”, “असहिष्णुता” और पोस्ट ट्रूथ जैसे आयातित जुमले. मौलिकता की कमी यहाँ भी हावी है.

Topics: कांग्रेसकर्नाटक चुनावबजरंग दल पर प्रतिबंधबजरंग दल बैनवीरप्पा मोइलीचुनावी घोषणापत्र
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