इंडोनेशिया भारतीय ईवीएम का हुआ मुरीद, फिर देश में विपक्ष को क्यों है ऐतराज ?
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इंडोनेशिया भारतीय ईवीएम का हुआ मुरीद, फिर देश में विपक्ष को क्यों है ऐतराज ?

भारत में पहली बार ईवीएम का प्रयोग कांग्रेस की सरकार के समय हुआ था जब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थी। ईवीएम से चुनाव आसान और ज्यादा पारदर्शी होता है।

Written byअभय कुमारअभय कुमार
Jul 7, 2026, 06:12 pm IST
inविश्लेषण
EVM VVPAT

प्रतीकात्मक तस्वीर

भारत में विपक्षी दल अगर चुनाव जीत जाते हैं तो उन्हें ईवीएम में कोई खामी नहीं दिखती, लेकिन हारने पर ईवीएम में कमियां निकालने लगते हैं। इंडोनेशिया जिसकी आबादी लगभग लगभग 29 करोड़  है और जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं, उसने  अपने चुनावी प्रक्रिया को  जनता के लिए आसान और पारदर्शी बनाने के लिए भारत के  ईवीएम से चुनाव करवाने के लिए प्रयासरत है।

भारत में पहली बार ईवीएम का प्रयोग कांग्रेस की सरकार के समय हुआ था जब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थी। ईवीएम से चुनाव आसान और ज्यादा पारदर्शी होता है। भारत में ईवीएम का प्रयोग सबसे  पहले केरल में  मई 1982 में पारवूर विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव में 50 मतदान केंद्रों पर किया गया था। पारवूर विधानसभा का भी अपना इतिहास रहा है। इस सीट पर कांग्रेस 1960  से लगातार पांच बार चुनाव जीतती है मगर 1982  में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के इस्तेमाल के बाद इस सीट से हार गई थी।

कांग्रेस ने  महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में ईवीएम का विरोध यह कहकर किया था कि मतदान केन्द्रों पर पार्टी को उतना भी मत नहीं मिला जितना उनके उम्मीदवारों और पार्टी के नेताओं  के परिवार के सदस्य थे। उसे शंका के निवारण के लिए 1996 के तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव में  ईरोड जिले में  मोदक्कुरिची सीट के परिणाम पर गौर करना चाहिए जब  1033  उम्मीदवार चुनावी मैदान में थे ।  उस चुनाव में 88 उम्मीदवारों को एक भी मत नहीं प्राप्त हुया, यानी उन्होंने खुद को भी वोट नहीं दिया था जबकि  158 उम्मीदवारों को  सिर्फ एक वोट मिला था।

ईवीएम से मतदान प्रक्रिया हुई आसान

ईवीएम के प्रयोग से भारतीय राजनीति में क्रान्तिकारी परिवर्तन देखने को मिला है। इससे मतदान प्रक्रिया काफी आसान और सहज हुई है। पहले मतदाताओं को घंटों कतार में लगना पड़ता था। मगर ईवीएम ने एक झटके में इन सभी समस्याओ का समाधान कर दिया।

ईवीएम के प्रयोग के बाद चुनावी प्रक्रिया में सुधार भी देखा जा रहा है।  बूथ कैप्चरिंग और चुनावी हिंसा अब अतीत की बात हो गई है।  नब्बे के दशक में ईवीएम के प्रयोग से पूर्व चुनावी प्रक्रिया में अंतिम चरण के चुनाव के बाद कुछ दिन इसलिए शेष रखा जाता था जिससे कि चुनावी हिंसा के कारण कुछ केंद्र पर मतदान रद्द होने के कारण उस केंद्र पर पुनर्मतदान के बाद चुनावी गणना हो सके।

ईवीएम से क्यों घबराती है कांग्रेस

कांग्रेस ईवीएम के मतदान से इतनी खौफजदा है कि 2024 लोकसभा चुनाव से पूर्व छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने  अपने समर्थको से अधिक संख्या में नामांकन करने की अपील की थी जिससे की चुनावी प्रक्रिया में ईवीएम का प्रयोग नहीं हो और मतपत्रों से ही चुनाव हो सके। कांग्रेस पार्टी को पता है कि ईवीएम से वोटिंग होने से बड़े पैमाने पर लोग मतदान में हिस्सा लेते हैं और कांग्रेस इन चुनावों में बुरी हार हारती है।  कांग्रेस पार्टी ने लगातार दो लोकसभा चुनाव 2004  और 2009 में ईवीएम से मतदान प्रक्रिया होने के बाद ही सरकार बनाई थी। यहां तक कि कांग्रेस पार्टी का 2009 में पिछले चुनाव के अपेक्षा 61 सीट बढ़कर 206 सीट जीतने  में सफल हुई थी।

कांग्रेस हिमाचल प्रदेश में 2022  विधानसभा चुनाव में भाजपा को हराकर सरकार बनाती है। इस चुनाव में कांग्रेस पार्टी को पूरे राज्य में भाजपा से महज 38000 अधिक मत मिला था। कांग्रेस ने केरलम, कर्नाटक और तेलंगाना राज्यों में पूर्ण बहुमत के साथ ईवीएम से हुए मतदान में सरकार बनाने में सफल हुई है। केरलम में माकपा लगातार दो बार से पूर्ण बहुमत से ईवीएम  के प्रयोग से सरकार बनाने में सफल हुई थी । तमिलनाडु  और पश्चिम बंगाल  जैसे बड़ो राज्यों में ईवीएम से मतदान के बाद डीएमके और ममता बनर्जी स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफल हुई थी।

2024  लोकसभा चुनाव के बाद तीन  राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुआ और  इनमें जम्मू कश्मीर में कांग्रेस पार्टी की सहयोगी नेशनल कांफ्रेंस और झारखण्ड में भी कांग्रेस पार्टी की सहयोगी झारखण्ड मुक्ति मोर्चा अच्छे बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफल हुई थी । जम्मू-कश्मीर और झारखण्ड विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन काफी कमजोर रहा था। क्या कांग्रेस पार्टी ईवीएम पर सवाल उठाकर अपने सहयोगियों की जीत पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करना चाहती हैं ?

मतदान पत्रों से धांधली की आशंका

लगातार दो लोकसभा चुनाव में कमतर प्रदर्शन के बाद कांग्रेस पार्टी ईवीएम के प्रयोग के बाद ही 2024 में  उम्मीद से बेहतर  प्रदर्शन करते हुए 99  सीट जीतकर नेता विपक्ष का पद  ही हासिल करने में सफल हुई है। मतदान पत्र से चुनाव होने पर उसमें धांधली की पूरी संभावना रहती है। यहां तक कि डॉ. आम्बेडकर भी इससे अछूते नहीं रहे थे। उनके उत्तरी मुंबई में 1952 के आम चुनावों में हार के बाद चुनावी कदाचार के आरोप लगे थे। आरोपों के अनुसार कॉमरेड श्रीपाद अमृत डांगे के नेतृत्व में वामपंथी गुटों ने डॉ. आम्बेडकर की चुनावी संभावनाओं को कमजोर करने के लिए धोखाधड़ी का अभियान चलाया था ।

डॉ. अंबेडकर के चुनाव में 1952 में 74333  वोट रद्द होने के बाद  महज 14000  मतो से चुनाव हार गए थे। डॉ. अंबेडकर ने चुनावी प्रक्रिया की ईमानदारी को चुनौती देते हुए और उनके ख़िलाफ़ झूठे प्रचार के आरोप लगाते हुए अदालत में मामला भी दायर किया था । ईवीएम के प्रयोग से चुनावी प्रक्रिया आसान होने के साथ ही परिणाम तुरंत आता है। मतदान कर्मियों को अपने काम करने में आसानी होती है।

ईवीएम के विरोध करनेवाले को यह भी नहीं भूलना चाहिए की भारत विश्व की सबसे बड़ी लोकतंत्र हैं। यहाँ मतदान की गणना प्रक्रिया में अब जितने मतदाता हैं हफ्तों का समय लग सकता हैं । मतपत्रों के प्रयोग से मतदान सहित वोटिंग वो मतगणना प्रक्रिया काफी दुष्कर होता है।

 

Topics: कांग्रेसईवीएम से चुनावभारतीय ईवीएमइंडोनेशिया को भारतीय ईवीएम पसंद
अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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