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सोना: संकट में संरक्षक

सोना निवेश है या संपत्ति संरक्षण, यह प्रश्न कई बार उठता है। दरअसल सोने में निवेश आपकी संपत्ति को संरक्षित करता है और महंगाई से सुरक्षा देता है। पर संपत्ति में वृद्धि से जुड़े निवेश में खतरों को देखते हुए सोने में किया गया संतुलित निवेश आपको आड़े वक्त में डूबने से बचाता है

Written byराजीव रंजन झाराजीव रंजन झा
Apr 22, 2023, 08:07 am IST
in भारत, विश्लेषण, धर्म-संस्कृति, बिजनेस

स्वर्णाभूषणों के बिना राजसी वैभव की कल्पना नहीं की जा सकती। केवल राजाओं के लिए ही नहीं, गरीबों के लिए भी सुख-दुख का साथी है सोना। भारतीयों के मन में यह सोच सहस्राब्दियों से पैठी है। और 1991 में जब पूरे देश का संकट टालना था, भारत सरकार को भी अपने स्वर्ण भंडार का ही सहारा मिला। पर आधुनिक सोच कहती है कि सोना केवल मूल्य संरक्षण के काम आ सकता है, यह उत्पादक निवेश नहीं है।

सोना भारतीयों की कमजोरी भी है और मजबूती भी। कैसे? आइए समझते हैं। आप राम की कल्पना करें या कृष्ण की, स्वर्ण मुकुट ध्यान में जरूर आएगा। स्वर्णाभूषणों के बिना राजसी वैभव की कल्पना नहीं की जा सकती। केवल राजाओं के लिए ही नहीं, गरीबों के लिए भी सुख-दुख का साथी है सोना। भारतीयों के मन में यह सोच सहस्राब्दियों से पैठी है। और 1991 में जब पूरे देश का संकट टालना था, भारत सरकार को भी अपने स्वर्ण भंडार का ही सहारा मिला। पर आधुनिक सोच कहती है कि सोना केवल मूल्य संरक्षण के काम आ सकता है, यह उत्पादक निवेश नहीं है।

ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए, क्योंकि यह शेयर, बॉन्ड या रियल एस्टेट जैसे निवेशों की तरह कोई आय या नकद प्रवाह (कैश फ्लो) उत्पन्न नहीं करता है। शेयरों में जब निवेश किया जाता है, तो इसका मतलब होता है किसी कंपनी में स्वामित्व का एक अंश लेना। चूंकि वह कंपनी कारोबार करती है, उससे लाभ प्राप्त होता है, जिससे निवेश का मूल्य बढ़ता है। बांड में ब्याज का भुगतान होता है तो रियल एस्टेट में किराये की आय मिलती है। इन सबके विपरीत सोना कोई ऐसी उत्पादक गतिविधि नहीं करता जिससे कोई आय हो और निवेश का मूल्य बढ़े, या लाभांश मिले।

महंगाई के सापेक्ष बढ़ती है कीमत
पर सोने की कीमत बढ़ती है ही। आम धारणा है कि इसकी कीमत लगातार बढ़ती है, बाकी किसी चीज में नुकसान हो सकता है पर सोने में लगाये पैसे पर नुकसान नहीं होगा। पर यह धारणा सत्य नहीं है। किसी भी अन्य कमोडिटी की तरह सोने की कीमतें भी ऊपर-नीचे होती हैं। फिर भी, यदि बहुत लंबे समय की बात करें तो स्पष्ट है कि कीमतें ऊपर जाती रहती हैं। तो फिर कीमतें कैसे बढ़ती है, जब सोना किसी उत्पादक गतिविधि का हिस्सा नहीं बनता और किसी भंडार में चुपचाप पड़ा रहता है-वह भारत सरकार का स्वर्ण भंडार हो या आपका बैंक का लॉकर?

मोटे तौर पर यह समझें कि लंबे समय में औसत महंगाई जितनी बढ़ती है, लगभग उतनी ही सोने की कीमत भी बढ़ती है। तो फिर सोने से वास्तविक लाभ या प्रतिफल (रिटर्न) कितना मिला? लगभग शून्य, क्योंकि वास्तविक लाभ होता है खरीद-बिक्री के मूल्य में से महंगाई का असर काटने के बाद बचा पैसा।
अगर बीती शती में सोने की कीमतें देखें, तो 1923 में 10 ग्राम सोने की कीमत 18.35 रुपये थी। अभी इसकी कीमत पहुंच गई है लगभग 62,000 रुपये प्रति दस ग्राम पर। इसकी औसत वार्षिक चक्रवृद्धि दर (सीएजीआर) निकालें, तो लगभग यह 8.46% बैठती है। पिछले 30 साल में 9.44%, पिछले 20 साल में 12.77%, पिछले 10 साल में 7.67% और पिछले 5 साल में 14.53% की औसत वृद्धि।

आम धारणा है कि इसकी कीमत लगातार बढ़ती है, बाकी किसी चीज में नुकसान हो सकता है पर सोने में लगाये पैसे पर नुकसान नहीं होगा। पर यह धारणा सत्य नहीं है। किसी भी अन्य कमोडिटी की तरह सोने की कीमतें भी ऊपर-नीचे होती हैं। फिर भी, यदि बहुत लंबे समय की बात करें तो स्पष्ट है कि कीमतें ऊपर जाती रहती हैं। तो फिर कीमतें कैसे बढ़ती है, जब सोना किसी उत्पादक गतिविधि का हिस्सा नहीं बनता और किसी भंडार में चुपचाप पड़ा रहता है-वह भारत सरकार का स्वर्ण भंडार हो या आपका बैंक का लॉकर?

एक सरल उदाहरण लें। आपने बैंक में साल भर पहले एक लाख रुपये डाले, अब ब्याज मिला कर उसका मूल्य हो गया एक लाख आठ हजार रुपये। आपको लगेगा कि आपका लाभ आठ हजार रुपये है। पर वास्तविक लाभ कितना है? यह प्रश्न इसलिए, कि इसी एक साल में महंगाई भी तो बढ़ी है। महंगाई के चलते आप साल भर पहले एक लाख रुपये में जितना सामान खरीद पाते थे, क्या उतना ही सामान अब खरीद सकेंगे? नहीं। तकरीबन हर चीज पहले से महंगी मिलेगी। कहीं दाम कम बढ़े होंगे, कहीं ज्यादा। इन सबका औसत निकालें तो हमें मुद्रास्फीति या महंगाई दर का पता चलता है।

सो हमें वास्तविक लाभ को समझने के लिए हासिल ब्याज में से महंगाई का असर घटाना होगा। उपरि उदाहरण में अगर ब्याज दर 8% लें, और इस एक साल में महंगाई दर 6% रही, तो वास्तविक लाभ केवल 2% होगा, मतलब केवल 2,000 रुपये, न कि 8,000 रुपये। वहीं अगर साल भर पहले आपने एक लाख रुपये बैंक में एफडी करने के बदले कहीं घर की अलमारी में रख छोड़े होते, तो क्या होता? आपके पास नोट तो एक लाख रुपये के ही होते, पर उनका वास्तविक मूल्य साल भर में 6% घट गया होता। मतलब आपके पास जो एक लाख रुपये पड़े हैं, उनका वास्तविक मोल उतना ही है, जितना साल भर पहले 94,000 रुपये का होता।

खतरा है कम
अब चूंकि सोने की कीमत लगभग उतनी ही बढ़ती है, जितनी महंगाई बढ़ी हो, तो इसे दो तरह से देखा जा सकता है। पहला यह कि इसने आपको महंगाई से सुरक्षा दी। आप 10 साल तक अपनी अलमारी या बैंक लॉकर में एक लाख रुपये नकद रखें तो 10 साल में इसकी असली कीमत काफी घट जाएगी। लेकिन 10 साल तक आप सोने को रखें, तो इसकी असली कीमत नहीं घटेगी।

मगर दूसरी बात यह है कि 10 साल तक आप किसी उत्पादक संपत्ति में निवेश करके रखें, तो उसकी तुलना में सोने की कीमत में हुई वृद्धि कम ही रहेगी। कोई उत्पादक निवेश हमेशा महंगाई दर से कहीं ऊंचा लाभ दिलाएगा, जबकि सोना आपको महंगाई दर के बराबर ही निवेश दिलाएगा। पर उत्पादक निवेश में एक जोखिम है। मान लीजिए जिस कंपनी के शेयरों में आपने पैसा लगाया, वह कंपनी नहीं चली तो आपके पैसे एकदम डूब भी सकते हैं। पर ऐसा खतरा सोने में बहुत कम होता है।

सोने में निवेश करें या नहीं? मोटे तौर पर इसमें उतना ही निवेश करना चाहिए, जितना आपातकालीन धन रखना जरूरी लगता हो। किसी भी व्यवसाय, जमीन-जायदाद, नकदी आदि के साथ जुड़े अलग-अलग जोखिमों को ध्यान में रखते हुए सोने में इससे कुछ और अधिक निवेश भी किया जा सकता है। पर ध्यान रखें कि सोना आपके लिए संपत्ति को बचाने का काम करेगा, कमाने का नहीं। कमाने वाला, यानी उत्पादक निवेश करना है तो दूसरे विकल्पों पर ज्यादा ध्यान दें।

पर ऐसा भी नहीं होता कि कभी भी पांच साल या 10 साल का समय ले लें, तो उस बीच सोने की कीमत औसत रूप से बढ़ेगी ही। इसकी कीमतों में उतार-चढ़ाव के बहुत लंबे चक्र होते हैं। कभी कोई दशक ऐसा बीत सकता है जब इसकी कीमत न बहुत बढ़े, न बहुत घटे। कभी कोई अवधि ऐसी हो सकती है, जब इसकी कीमतें घटती चली जाएं। और ऐसे ठहराव या नुकसान की भरपाई करने के लिए कभी-कभी इसकी कीमतें बहुत तेजी से ऊपर जाती दिखती हैं। जैसे 1923 से 1931 तक इसकी कीमतें मोटे तौर पर 18 से 19 रुपये प्रति 10 ग्राम के बीच लटकी रहीं। 1992 से 2002 तक यह करीब 4,000 से 5,000 के बीच ही ऊपर-नीचे होता रहा।

घटती भी है सोने की कीमत
अगर कोई यह सोचता है कि सोने की कीमत घटती ही नहीं, तो उसे यह ध्यान रखना चाहिए कि नवंबर 2012 में करीब 32,000 रुपये से घट कर यह अप्रैल 2013 में ही लगभग 25,000 पर आ गया था तो सितंबर 2013 के करीब 34,000 से अगस्त 2015 तक घटते-घटते 24,000 प्रति दस ग्राम के पास आ गया था। हाल में अगस्त 2020 के लगभग 55,000 के भाव मार्च 2021 तक घट कर 43,000 के पास चले आये थे। अगर आपने 2012 में 30-32 हजार रुपये के भाव पर सोना खरीदा होता तो सात साल बाद 2019 तक भी आपको लगभग उतना ही भाव नजर आ रहा है।

तो क्या करें
तो सोने में निवेश करें या नहीं? मोटे तौर पर इसमें उतना ही निवेश करना चाहिए, जितना आपातकालीन धन रखना जरूरी लगता हो। किसी भी व्यवसाय, जमीन-जायदाद, नकदी आदि के साथ जुड़े अलग-अलग जोखिमों को ध्यान में रखते हुए सोने में इससे कुछ और अधिक निवेश भी किया जा सकता है। पर ध्यान रखें कि सोना आपके लिए संपत्ति को बचाने का काम करेगा, कमाने का नहीं। कमाने वाला, यानी उत्पादक निवेश करना है तो दूसरे विकल्पों पर ज्यादा ध्यान दें।
(लेखक आर्थिक मासिक पत्रिका निवेश मंथन के संपादक हैं।)

Topics: मुद्रास्फीति या महंगाई दररियल एस्टेटसोने में निवेशसोने की कीमतअक्षय तृतीयाroyal splendorAkshaya tritiyagolden crowngoldreal estateinflationinvesting in goldसोनाgold priceराजसी वैभवgold: custodian in distressस्वर्ण मुकुट
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