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कंबोडिया के पुरातत्व में सूर्य

प्राचीन काल से ही भारत का संबंध दुनिया से रहा है, इसलिए विभिन्न देशों पर भारतीय संस्कृति की छाप स्पष्ट रूप से दिखती है। कंबोडिया भी भारतीय विचार और संस्कृति से प्रभावित था। वहां नवग्रहों और नौ देवों के साथ सूर्य की पूजा की जाती थी

Written byआचार्य (डॉ.) मनमोहन शर्माआचार्य (डॉ.) मनमोहन शर्मा
Apr 15, 2023, 12:18 pm IST
inभारत, धर्म-संस्कृति

हिंदुओं, बौद्धों व जैनियों की धार्मिक आस्थाओं व प्रथाओं का दक्षिण-पूर्व एशिया में स्वागत किया गया। कंबोडिया के पुरातत्व में भारतीय देवताओं की पूजा के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं। सूर्य व नवग्रह उनमें से एक हैं।

भारतीय जनता का संपर्क, भारतीय संस्कृति का प्रभाव व प्रसार इतिहास के प्रारंभ से ही वैश्विक है। लगभग 4500 ई. पू. से इसके प्रमाण हैं कि भारत व्यापारिक व धार्मिक स्तर पर विश्व के संपर्क में रहा है। रीति-रिवाजों, परंपराओं, विचारों, भाषा, साहित्य, कला और स्थापत्य आदि पर इनका प्रभाव दिखता है। इस प्रकार, विश्व के विभिन्न भागों विशेषकर, दक्षिण-पूर्व एशिया, चीन, जापान और कोरिया में भारतीय सभ्यता-संस्कृति का प्रचार-प्रसार प्राचीन काल से होता रहा है। हिंदुओं, बौद्धों व जैनियों की धार्मिक आस्थाओं व प्रथाओं का दक्षिण-पूर्व एशिया में स्वागत किया गया। कंबोडिया के पुरातत्व में भारतीय देवताओं की पूजा के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं। सूर्य व नवग्रह उनमें से एक हैं।

संस्कृत साहित्य में सूर्य
ऊष्मा का अनंत स्रोत होने के साथ सूर्य में रोगों को दूर करने की क्षमता है। हृदय की बीमारी, पीलिया या खून की कमी व आंखों की सुरक्षा के लिए सूर्य की उपासना जाती है। ब्राह्मण ग्रंथों में सूर्य का आंखों के रोगों से घनिष्ठ संबंध बताया गया है। ग्रहों को कक्षा में स्थिर रखने के साथ इसमें पापों को दूर करने की शक्ति और वर्षा का कारक भी है। इसलिए सूर्य की प्रार्थना-पूजा की जाती रही है। वेदों, उपनिषदों, सूत्रग्रंथों, रामायण, महाभारत सहित पुराणों में भी सूर्य का विस्तृत उल्लेख है। चिकित्सा, ज्योतिष व विज्ञान आदि से सूर्य का संबंध होने के कारण आदिकाल से भारत में सूर्य उपासना एवं सूर्य विज्ञान का प्रचलन रहा। इस कारण जिन देशों से भारत का संपर्क था, वहां इसका प्रसार हुआ। प्राचीन विश्व के लगभग सभी समाज ने किसी न किसी रूप में सूर्य की पूजा की। दक्षिण-पूर्व एशिया में प्राचीनकाल से विभिन्न नामों, चिह्नों और विभिन्न उद्देश्यों के लिए सूर्य की पूजा की जाती रही है। कौषीतकी उपनिषद् और सूत्रग्रंथ में भी पाप से मुक्ति के लिए सूर्य से विशेष रूप से प्रार्थना की गई है।

कंबोडियाई पुरातत्व
साहित्यिक और पुरातात्विक स्रोतों से पता चलता है कि प्राचीन कंबोडिया (कम्बुज) के साथ भारतीयों का संपर्क ईसा सन् से बहुत पहले से था, जो ईस्वी सन् की शुरुआत से अच्छी तरह से स्थापित हो चुका था। हिंदू, बौद्ध और जैन मतावलंबियों ने वहां धार्मिक आस्थाओं व प्रथाओं का प्रचार किया। कंबोडिया में शैव, वैष्णव, शाक्तों और सूर्य, नवग्रहों, मातृकाओं, सप्त ऋषियों दिक्पाल आदि अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियां मिली हैं। शिलालेखों में भी इन देवताओं के नाम और विवरण हैं।

विश्व में सर्वत्र मानवरूपी रूप से पूर्व सूर्य का प्रतीकात्मक निरूपण मिलता है, जिसमें चक्र, किरणें, गोल आकृति आदि हैं। यह प्रथा बाद के काल में भी जारी रही। कंबोडिया में स्टन क्रैप से मिले 1003 ई. के शिलालेख के-693 पर सूर्य व चंद्रमा के प्रतीक उत्कीर्ण हैं। इसमें केंद्रीय समूह के दोनों ओर एक-एक गोला है, जिसमें सूर्य (बाएं, युद्ध रथ में) और चंद्रमा (दाएं, वेदी पर) समय की गति के प्रतीक के तौर पर एक गोले के रूप में दर्शाए गए हैं। ये मानवरूपी नहीं हैं। इनमें सूर्य को वृत्त व चंद्रमा को अर्ध चंद्राकार रूप में दर्शाया गया है, जो शिलालेखों के शीर्ष पर अंकित हैं। भारत में शक् संवत् 1003 के अनंतदेव के विहार पत्थर जैसे कई शिलालेखों पर भी सूर्य को पूर्ण गोले तथा चंद्रमा को अर्धचाप रूप में दिखाया गया है। अप्रादित्य प्रथम का सिंट्रा पत्थर शिलालेख, जो शक् संवत् 1059 का है, स्पष्ट रूप से इसी भाव को दर्शाता है। कुछ ताम्रपत्र शिलालेखों में भी ऐसे रूपांकन हैं। भारत में बड़ी संख्या में सूर्य प्रतिमाएं बैठी व खड़ी अवस्था में मिली हैं, जिसमें उन्हें उनकी पत्नियों, पुत्रों और परिचारकों के साथ दिखाया गया है। वहीं, कंबोडिया में सूर्य की छवियों वाले पृथक सूर्य मंदिर दुर्लभ हैं। हाल ही में 7वीं-8वीं सदी की बलुआ पत्थर की सूर्य प्रतिमा को डेनवर कला संग्रहालय अमेरिका से कंबोडिया वापस लाया गया।

12वीं सदी की सूर्य की कांस्य प्रतिमा

नवग्रह फलकों के अनेक उदाहरण कंबोडिया में भी मिले हैं, जहां आकाशीय पिंडों को अनंतशायी विष्णु के साथ दिखाया गया है, जैसे अंगकोरवाट और बा कान मंदिर से प्राप्त फलकों पर अंकित मिले हैं।

12वीं सदी की सूर्य प्रतिमा
सूर्य प्रतिमा का दूसरा उदाहरण कोह केर काल (928-944) का है। इसमें कमल की दो कलियों को पकड़े सूर्य की एक खड़ी छवि है। इसमें सूर्य नौ देवों का प्रतिनिधित्व करने वाले आठ छोटे देवों के घेरे में खड़े हैं। भारत में सूर्य को रथ पर दिखाया गया है, जो वैदिक श्लोकों पर आधारित है। ऋग्वेद के अनुसार, सूर्य श्येन पक्षी की तरह तेज गति से चलायमान सात घोड़ों वाले रथ में यात्रा करते हैं। बाद के समय में घोड़ों की संख्या एक, चार और सात मिलती है। कंबोडियाई पुरातत्व में भी सूर्य को घोड़ों वाले रथ पर दिखाया गया है। इसमें घोड़े सांपों की लगाम के साथ जुते हुए हैं। यह शिलालेख के-1193पर मिला है। आर्लो ग्रिफिथ के अनुसार, खमेर शिलालेख के-1198(ईस्वी सन् 1014) में पर्यवेक्षक के बाएं हाथ की ओर एक रथ पर सूर्य विराजमान हैं। भट्टाचार्य के अनुसार, शिलालेख पर सूर्य प्रतिमा में लगाम सांपों की है। यही विवरण मत्स्यपुराण में मिलता है-
भुजंगरज्जुभिरबध्वा: सप्तश्व: रश्मिसंयुक्ता:।
पद्मस्थम वाहनस्थवा पद्महस्तम प्रकल्पये।। 
अर्थात् सात घोड़े सर्पों की रस्सियों से बंधे हुए होने चाहिए। हाथों में कमल लिए सूर्य को कमल या वाहन पर खड़ा दिखाना चाहिए।

सूर्य और समयावधि
धार्मिक स्थलों के संबंध में पुरस्कार और दंड का समय मापने के लिए सूर्य और चंद्रमा को पैमाना बनाया गया था। उस समय किसी भी धार्मिक नींव को नष्ट करना या कमजोर करना सामाजिक व नैतिक अपराध माना जाता था। शक् संवत् 925 के स्टंग क्रैप से मिले खमेर शिलालेख के-693 पर चेतावनी अंकित है, ‘‘जो धार्मिक स्थल को नष्ट करते हैं और उनकी अवमानना करते हैं, वे सूर्य और चंद्रमा के रहने तक 32 नरकों में जाएंगे।’’ यही विचार खमेर में के-1198 (साइड सी, पंक्ति 52-53) में मिलता है, ‘‘जो लोग पवित्र कार्य का उल्लंघन करते हैं, वे तब तक नरक में रहें, जब तक सूर्य और चंद्रमा रहेंगे!’’ शिलालेख के-693 और के-1198 पर अंकित सूर्य व चंद्र नश्वर जीवन की सूक्ष्मता का प्रतीक नहीं हैं, वे धार्मिक स्थान की चिरस्थायी व अनुल्लंघनीय प्रकृति को दर्शाते हैं।

ऋग्वेद (10.55.2-3) में 34 प्रकाशित पिंडों का विवरण है। इसमें कहा गया है कि इनका प्रकाश विविध रूपों में फैलता है। ‘प्लैनेट्स इन द संस्कृत लिटरेचर’ में डेविड फरावले लिखते हैं कि 34 पिंडों में 27 नक्षत्र, सूर्य, चंद्रमा व 5 ग्रह हैं। 7 समुद्रों, सप्तऋषि के तारों से भी 7 ग्रहों की पहचान की जाती है। वे ग्रहों से जुड़े हैं। अथर्ववेद (19.6.7,10) कहता है, ‘‘ग्रह, सूर्य, चंद्रमा, राहु जो आकाश में विचरण करते हैं, हमें शांति प्रदान करें।’’ ऋग्वेद (10.72.9) में अदिति के 7 पुत्रों के जरिए शायद सूर्य, चंद्रमा व 5 ग्रहों को ही इंगित किया गया है। ऋग्वेद (10.149.1) के अनुसार, सूर्य ने पृथ्वी व अन्य ग्रहों को आकर्षण से बांध रखा है व उन्हें अपने चारों ओर घुमाते हैं, जैसे नए प्रशिक्षित घोड़ों को प्रशिक्षक अपने चारों ओर घुमाता है।

भारत में नवग्रहों को 7वीं शताब्दी से विष्णु अनंतशायी के सहायक के रूप में देखा जाता है। मथुरा संग्रहालय में 7वीं-8वीं शताब्दी के लिंटेल में लेटे हुए भगवान विष्णु के ऊपर एक पंक्ति में नौ ग्रह दिखाए गए हैं। त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) और दिक्पालों के साथ नवग्रहों का संयोजन प्राचीन भारतीय कला में मिलता है, जैसे बंगाल के अखिल्या के पैनल पर। नवग्रह फलकों के अनेक उदाहरण कंबोडिया में भी मिले हैं, जहां आकाशीय पिंडों को अनंतशायी विष्णु के साथ दिखाया गया है, जैसे अंगकोरवाट और बा कान मंदिर से प्राप्त फलकों पर अंकित मिले हैं। ये पैनल 7वीं सदी के सांबर प्री कुक, 9वीं सदी के सी, लोलेई मंदिर व प्रसाद नियांग खमाऊ, 10वीं सदी के नेक ता कोंग सरोक मंदिर व बा काम मंदिर, परमेम्बन मंदिर, 11वीं सदी के वेस्ट मेबन मंदिर, 12वीं सदी के प्रेह खान, कुक रोका मंदिर और 13वीं सदी के बेयोन मंदिर के हैं। अंगकोरवाट मंदिर में सूर्य, चंद्रमा व ब्रह्मा को वराह अवतार की एक शिला पर उकेरा गया है। यानी प्राचीन कंबोडिया में नौ देवों की अवधारणा बहुत लोकप्रिय थी। सैम्बोर प्री कुक के प्री-अंगकोरियन पैनल में नवग्रह खड़ी मुद्रा में हैं। अंगकोरियन-काल के पैनलों में उनके व्यक्तिगत वाहनों पर नौ देवता हैं। बाद के समूह में 4 ग्रह (सूर्य, चंद्रमा, राहु, केतु) व 5 दिक्पाल का संयोजन है। बाद के सभी पैनलों पर सूर्य को भारतीय मूर्तियों जैसे घोड़ों वाले रथ में दिखाया गया है।

खमेर शिलालेख और नवग्रह
सप्तऋषि खमेर आइकनोग्राफी में दुर्लभ है। यह प्री रूप मंदिर परिसर के पत्थर के पैनल पर मिला है, जो परिसर के दक्षिण-पूर्वी टावर के अंदर स्थापित था। यह नौ देवताओं के पैनल के लिए एक नियमित स्थान भी है। इससे नौ देवताओं और सात ऋषियों के बीच संबंध के संकेत मिलते हैं। कंबोडिया के कुछ शिलालेखों पर भी नौ ग्रहों के उल्लेख मिले हैं। शिलालेख के-726 (फेस-ए) तांग क्रांग, जो 7वीं या 8वीं सदी का है, से पता चलता है कि प्राचीन भारत के समान नौ ग्रहों का समूह इस तिथि से पहले से ज्ञात था। अभिलेख के आरंभ में इनका नाम रवि, शशि, भौम, वुधा (बुद्ध), गुरु, शुक्र, शनैश्चर, राहु और केतु लिखा गया है। 930 ई. के प्रेह नोम मंदिर के शिलालेख के-593 में चंडी (उमा), ईश्वर (शिव), विघ्नपति (गणेश) और लिंग की छवियों के साथ ग्रहों को स्थापित करने का उल्लेख है। अक योम मंदिर से मिले 1001-1002 ई. के शिलालेख के-752 में भगवान श्री गंभीरेश्वर को नवग्रह फलक दान करने वाले उच्च पदासीन एक व्यक्ति का उल्लेख है। नवग्रहों की स्थापना कम से कम 8वीं शताब्दी में प्राचीन खमेर कर्मकांड के संदर्भ में हुई थी। इन्हें मुख्य देवता के सहायक देवताओं के रूप में स्थापित किया गया था। संभवत: इन्हें मुख्य देवता के साथ गर्भगृह के अंदर स्थापित किया गया था, जैसा कि अक योम पैनल के लिए संकेत दिया गया है।

 

ली लोइ मंदिर में नवग्रह फलक

कंबोडिया के कई शिलालेखों में घटनाओं के माह, दिन और नक्षत्र का उल्लेख है। इनमें के-842 दुर्लभ है। इस पर नवग्रहों की स्थिति का उल्लेख है। शिलालेख से पता चलता है कि एक देवता की स्थापना के बाद भगवान शिव का अभिषेक किया गया था।

ग्रहों की खगोलीय स्थिति
कंबोडिया के कई शिलालेखों में घटनाओं के माह, दिन और नक्षत्र का उल्लेख है। इनमें के-842 दुर्लभ है, क्योंकि इस पर नवग्रहों की स्थिति का उल्लेख है। इस नींव शिलालेख से पता चलता है कि एक देवता की स्थापना के बाद भगवान शिव का अभिषेक किया गया था। ‘‘जब कुंभ राशि उदय हो रही थी, मंगल, बृहस्पति व शुक्र 5वें (घर) में थे, चंद्रमा 10वें (घर) के अंत तक पहुंच गया था और (शनि, बुध, सूर्य), अरी (छठे घर) में, माधव महीने की शुरुआत में (शक वर्ष में) मूर्ति (8), (8) और नौ (9), यम के दिन’’ 22 अप्रैल, 967 ई., स्थानीय समय के अनुसार लगभग 18:20 बजे की है। यह अभिलेख भारतीय मास, दिन और ग्रहों की स्थिति की स्पष्ट जानकारी देता है। खमेर शिलालेख से पता चलता है कि भारतीय प्रेरित खगोलीय अवधारणाएं लगभग 598-99 ई. से पूरी तरह से विकसित हो गई थीं, जो रोबंग रोमास के शिलालेख के-151 की तिथि है।

भारतीय समाज में पूर्वकाल से आदित्य, दिनेश, दिनकर, भास्कर, दिवाकर, सूर्य आदि नामों से सूर्य संबंधित नाम रखने की परंपरा रही है। कंबोडिया के 7वीं से 12वीं सदी के अभिलेख में सूर्य संबंधित नाम मिलते हैं। भट्टरादित्य नाम कांडल के तुओल रोलां केन प्रांत के गांव के 7वीं सदी के अभिलेख के-877 पर मिलता है। प्रीह खान क्षेत्र से प्राप्त एक शिलालेख के-627 पर लिखा है-श्री सूर्यशक्ति। सिएम रीप और समान नाम जयवर्मन 7 के बेयोन मंदिर के अभिलेख के-293 पर है। एक अन्य नाम ‘श्री सूर्यदेव’ बंटाय चमर, क्षेत्र: बट्टामबांग से के-696 पर मिला है। तीनों शिलालेख 12वीं सदी के हैं। सूर्यवर्मन एक प्रसिद्ध राजा था। इससे पता चलता है कि समाज में सूर्य का अत्यधिक सम्मान था। इसके अलावा, पुराने शिलालेखों पर अंकित सूर्य व आदित्य सूर्य के पर्यायवाची की लोकप्रियता को इंगित करते हैं। सूर्य के साथ राजा का नाम महत्वपूर्ण है। यह लोगों पर शाही नियंत्रण को दर्शाता है, क्योंकि सूर्य आकाश पर शासन करते हैं।

उपरोक्त अध्ययन से पता चलता है कि अतीत से ही भारत के वैश्विक संबंध थे और सूर्य वैश्विक देवता थे। प्रारंभिक अवस्था में पूजा के लिए सूर्य के प्रतीकों का उपयोग किया जाता था। रथ, घोड़ों और परिवार के सदस्यों के साथ अक्षर मूर्तियां बनाई जाती थीं। कंबोडिया के पुरातत्व से पता चलता है कि यह भारतीय विचार और संस्कृति से प्रभावित था। वहां नवग्रहों और नौ देवों के साथ सूर्य की पूजा की जाती थी। कंबोडियाई शिलालेखों पर सूर्य के प्रतीक के साथ दो घोड़ों वाले रथ भी मिले हैं। लोगों के नाम सूर्य पर रखे गए, जैसे-सूर्यवर्मन। 7वीं शताब्दी से मूर्तियां भी बनाई गर्इं। कुछ शिलालेखों में सूर्य और अन्य ग्रहों की खगोलीय स्थिति भी दर्शाई गई है। इससे स्पष्ट है कि कंबोडिया की संस्कृति भारतीय संस्कृति से बहुत अधिक प्रभावित है।

(लेखक भारतीय इतिहास संकलन समिति, हरियाणा के लेखक प्रमुख हैं)

 

 

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