‘स्कन्द पुराण’ और ‘भविष्य पुराण’ में उल्लेख मिलते हैं कि प्राचीन भारत में जिन कन्याओं और विवाहित महिलाओं के भाई नहीं होते थे वे बरगद, पीपल और गूलर के वृक्षों को भाई के रूप में रक्षासूत्र बाँध सकती थीं। यह पौराणिक उद्धरण वृक्षों और वनस्पतियों को रक्षा सूत्र बंधन की प्राचीनता को प्रतिपादित करता है। ऋग्वेद में वृक्षों और वनस्पतियों को जीवनदायिनी सचेतन देव-शक्तियों के रूप में वर्णित किया गया है। इनके असीम परोपकारों के प्रति इन्हें रक्षा सूत्र बाँध कर इनके प्रति आभार व्यक्त करने के साथ इनके रक्षण का संकल्प लेने की सीख वैदिक साहित्य देता है।
वृक्षों के पूजन और संरक्षण की वैदिक परंपरा
वैदिक चिंतन कहता है कि पेड़-पौधे हमारे जीवन का मूल आधार हैं। वे हमारी सांसों द्वारा छोड़ी गयी विषाक्त कार्बन डाई ऑक्साइड को सोख कर ऑक्सीजन के रूप में हमें प्राणवायु देते हैं। हमारे महान वैदिक ऋषि हमारे जीवन में वृक्षों और वनस्पतियों की इस गहरी उपयोगिता से भलीभांति अवगत थे; इसीलिए उन्होंने वैदिक काल में वृक्षों और वनस्पतियों के पूजन, रक्षण और संवर्धन की परम्पराएं विकसित की थीं। ऋग्वेद के दशम मंडल का 97 वां सूक्त ‘औषधि सूक्त’ कहलाता है। इस सूक्त में वृक्ष औषधीय वनस्पतियों की महिमा का वर्णन करते हुए इन्हें ‘सोम’ की संज्ञा दी गयी है, जो अमृत का प्रतीक है। ऋषि वाणी कहती है कि जैसे वनस्पतियां प्राणवायु के साथ पृथ्वी से रस खींचकर फल और फूलों के रूप में हमें अमृत प्रदान करती हैं, वैसे ही मानव समाज को भी उनका रक्षण व पोषण पूरी श्रद्धा से करना चाहिए। वैदिक काल में श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के दिन विधि-विधान से व्रत का अनुष्ठान कर आचार्यों व पुरोहितों द्वारा रक्षासूत्र तैयार किये जाते थे। तदयुग में शिष्यों व यजमानों के साथ पेड़ों को भी रक्षा सूत्र बंधने की परंपरा समाज में थी। यही नहीं वैदिक काल में रक्षाबंधन के साथ अग्निहोत्र और वृक्षारोपण का भी बड़ा महात्म्य था। इस अवसर पर तुलसी के बिरवे रोपना अत्यन्त पुण्यदायी माना जाता था। साथ ही फल फूलों व तरकारियों के बीज रोपने की परम्परा थी। यदि फल फूलों के बीज नहीं मिल पाते थे तो घर की महिलाएं गेहूँ, जौ आदि अन्न को ही बो लेती थीं और नवांकुरों से की श्रावणी पूजन किया जाता था।
पेड़ों की रक्षा का संकल्प, प्रकृति का सम्मान
जानना दिलचस्प होगा कि बीती सदी में कुछ पर्यावरण प्रेमी अग्रदूतों द्वारा पेड़ों की रक्षा के लिए उनको रक्षासूत्र बांधने की परम्परा शुरू की थी जो आज भी कायम है। इस परम्परा में उत्तराखंड के ‘चिपको आन्दोलन’ और राजस्थान के ‘विश्नोई आन्दोलन’ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। बीती सदी में हुए इन जनांदोलनों ने पेड़ों की रक्षा के लिए जान देना तक स्वीकार कर सामुदायिक एकता का अनूठा इतिहास रचा था। वहीं इक्कीसवीं में वर्ष 2012 में बिहार सरकार ने वर्ष 2012 को रक्षाबंधन के अवसर पर आधिकारिक तौर पर ‘बिहार वृक्ष सुरक्षा दिवस’ की शुरुआत की थी। इस पहल का मुख्य उद्देश्य ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन और अंधाधुंध पेड़ों की कटाई के खिलाफ लोगों को जागरूक करना था। हर्ष का विषय है कि आज देश भर के स्कूल, पर्यावरण प्रेमी और सामाजिक संगठन पेड़ों को जीवनदाता और भाई मानकर उन्हें रक्षासूत्र (राखी) बांधने का अभियान चला रहे हैं। सार रूप में कहें तो वैदिक युग से प्रचलित यह पर्व हमारे सांस्कृतिक मूल्यों का पुन:स्मरण कराता है। वृक्ष-वनस्पतियों को रक्षा सूत्र बांधने के पीछे पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं की रक्षा का दिव्य भाव निहित है; ताकि हम सब प्रकृति का संरक्षण कर सुख-शांति तथा सद्भभाव की राह पर चलकर उज्जवल भविष्य की आधारशिला रख सकें।
















